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बांग्लादेशी लड़ाकों की कब्रें ढूंढने में मदद करेगा भारत

जुलाई 21, 2012

बीबीसी हिन्दी: शनिवार, 21 जुलाई, 2012 को 20:29 IST तक के समाचार

bangladesh_warभारत ने कहा है कि वो 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश की आज़ादी के संग्राम में मारे गए बांग्लादेशी लड़ाकों की क़ब्रों को ढूंढने में मदद करेगा.

भारतीय अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि सरकार ने ये काम शुरू करने के लिए कर्मचारी नियुक्त भी कर दिए हैं.

2,000 से ज्यादा बांग्लादेशी सैनिक बांग्लादेश से सटी भारतीय सीमा के दूरदराज़ के इलाकों में दफन हैं.

1971 में नौ महीने तक चली आज़ादी की लड़ाई में भारत के सहयोग से ही स्वतंत्र बांग्लादेश का उदय हुआ था.

मार्च 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश पहले इसी नाम से जाना जाता था) में स्वायत्तता और आज़ादी की मांग को लेकर गृहयुद्ध भड़क उठा था.

नो मैन्स लैंड

इस लड़ाई के दौरान मारे गए लोगों की असल संख्या अभी भी पूरी तरह मालूम नहीं है लेकिन बांग्लादेश का कहता रहा है कि युद्ध में 30 लाख लोग मारे गए थे.

दूसरे शोधकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में तीन से पांच लाख लोग मारे गए थे.

बांग्लादेश ने 2,416 लोगों की एक सूची भारत को सौंपी है जिनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी लड़ाके हैं.

बांग्लादेशी सरकार का मानना है कि ये लड़ाके भारत की सीमा और उस इलाके में दफ्न हैं जिसे ''नो मैन्स लैंड'' कहा जाता है.

इन दफन सैनिकों का पता लगाने का काम शुरू करने के लिए बांग्लादेश के एक वरिष्ठ अधिकारी की अध्यक्षता वाले एक दल ने पिछले साल जून में भारत की यात्रा की थी.

"हम बांग्लादेश की मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

सैय्यद अकबरुद्दीन, प्रवक्ता, भारतीय विदेश मंत्रालय

इस दल ने सैनिकों की क़ब्रों की पहचान के लिए की दिशा सुनिश्चित करने के लिए भारत के कई मंत्रालयों के बड़े अधिकारियों से मुलाकात की थी.

ये टीम भारत के पूर्वी राज्य असम, मेघालय, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल भी गई थी जहां इन क़ब्रों के होने की संभावना जताई जाती है.

डीएनए जाँच

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैय्यद अकबरुद्दीन ने बीबीसी से कहा, "हम बांग्लादेश की मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि ऐसे क़ब्रों की पहचान किस तरह की जा सकती है.उनका कहना था, "40 साल पहले जिन लोगों ने युद्ध नायक हमीदुर्रहमान के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया था, उन्होंने उनकी क़ब्र को ढूंढने में हमारी मदद की. इसी तरह अब स्थानीय लोग भी हमारी मदद कर सकते हैं."

उन्होंने ये भी कहा कि डीएनए जांच भी एक विकल्प है जिसके द्वारा युद्धवीरों की पहचान की जा सकती है.

(व्‍यक्‍त किये गये उपरोक्‍त विचार लेखक के व्‍यक्तिगत विचार हैं)

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