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प्रतिभा का पलायन अब एक बौद्धिक लाभ बन गया

जुलाई 04, 2011

फाइनेंशियल एक्सप्रेस : सौरभ श्रीवास्तव

भारत अपने वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय विचार तथा प्रयोग के सफलतापूर्ण उन्नयन का सशक्त दावा बहुत पहले से करता आ रहा है। आज का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ अंकीकृत विश्व भारतीय अन्वेषण ‘'शून्य'' अथवा जीरो पर निर्भर है। यद्यपि कुछ सहस्त्राब्दियों से अभिनव वैचारिक नेतृत्व में किसी कारणवश कुछ मत-भिन्नता आयी है। भारतीय इतिहास के प्रारम्भिक काल में विकसित लोकाचारों ने हमारे वर्तमान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की प्रगति को आगे बढ़ाने में सहायता प्रदान किया है।

भारत की वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय प्रतिभा की परम उत्कृष्टता के प्रति बढ़ती स्वीकृति के परिणाम स्वरूप यह देश विकसित विश्व, प्रधानतः संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए एक विशालतम् उद्गम स्थल बन गया है। हम पुराने दिनों में इसे ‘'प्रतिभा का पलायन'' कहते थे क्योंकि 70 और 80 के दशकों का शिथिल सामाजिक-आर्थिक एवं राजनैतिक-प्रशासनिक वातावरण ही था, जिसने हमारी सर्वोत्तम प्रतिभाओं को हरे-भरे चारागाहों की ओर निर्गमन के लिए बाध्य कर दिया था।

तथापि हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री एवं तत्कालीन वित्त मंत्री द्वारा 1991 में किये गये आर्थिक सुधार प्रक्रिया की पहल ने दोष को गुण में परिवर्तित कर दिया था। हमारी कुछ सर्वोत्तम प्रतिभायें जिन्होंने कई वर्षों एवं दशकों तक सम्पूर्ण विश्व में अपने ज्ञान एवं कौशल को पैना करने में बिताया था, अब स्वदेश वापस आना शुरू हो गये हैं तथा भारत के विकास और प्रगति में योगदान कर रहे हैं। अतः ‘प्रतिभा का पलायन' अब एक ‘बौद्धिक लाभ' बन गया है।

राष्ट्र के सतत विकास में जो महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी ऊर्जा लगाना जानते हैं, वे इसे समझ चुके हैं। प्रौद्योगिकी, वहनीय व्यय-भार में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा, उन्नत जलवायु-मैत्री पूर्ण ऊर्जा विकास और स्थिर व्यापक ग्रामीण जनसंख्या का परिनियोजन तथा समाज के निचले वर्ग में उन्नत शिक्षा प्राप्त करने में हमें सक्षम बनाती है। चूँकि प्रौद्योगिकी, कृषि, उद्योग और सेवाओं का मूलाधार है इस लिए आर्थिक योजना की मुख्यधारा से इसे जोड़ कर आगे बढ़ाने का यही उपयुक्त समय है।

एक देश की आर्थिक गतिविधि का सम्बंध निःसंदेह इसकी बौद्धिक पूँजी की गुणवत्ता से है। हमारे पास विश्व की तृतीय विशालतम् उच्च शिक्षा प्रणाली है जिसकी अद्भुत गुणात्मक विविधताऐं समस्या बन गयी हैं।

पश्चिमी एवं एशियाई देश सभ्यता के सभी चार आधार शिलाओं, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आदि पर विकसित हुए हैं। भारत अपने अभिनव प्रौद्योगिकीय उच्चीकरण तथा अनुसंधान एवं विकास के समुचित उपयोगों से प्रगति के पथ पर अग्रसर होता रहा है और एक दशक से भी अधिक पूर्व से शुरू हुई एक प्रक्रिया के अन्तर्गत अनुसंधान एवं विकास में वैश्विक मण्ड़ी के रूप में उभर चुका था। परन्तु अभी हमें महासागरों को पार करना है।

भारतीय कम्पनियों को स्वयं अपने देश एवं विश्व के अन्य भागों में भी अनुसंधान एवं विकास में न्यूनतम् स्तर के निवेश की आलोचना का सामना एक लम्बे समय से करना पड़ रहा था। इस वास्तविकता ने वैश्विक बाजारों में हमें एक गम्भीर खिलाड़ी बनने से वंचित रखा था। अनेकों प्रमुख प्रगतियों के बावजूद भी अभी हाल तक भारत की छवि एक तृतीय विश्व के देश जैसी बनी हुई है, जो पश्चिमी उत्पादों की नकल करते हैं और अपनी लचर पेटेंट नीतियों का सहारा लेते हैं। जब हम परिवर्तन का शुभारम्भ कर रहे हैं, तब हम जापान की बेहतर प्रौद्योगिकी अनुदेश पुस्तक का एक पृष्ठ ले सकते हैं! हमें भी वैसा ही करने की आवश्यकता है।

सौभाग्य से सूचना एवं प्रौद्योगिकी तथा बी पी ओ के अग्रणी केन्द्र के रूप में हमारी प्रतिष्ठा से ही हमें वैश्विक अनुसंधान एवं विकास स्थल के रूप में उभरने का अवसर मिला है, जहाँ माइक्रोसाफ्ट, मोटोरोला , सी ए, सिस्को, आई बी एम, गूगल इत्यादि, ने अनुसंधान में प्रवेश करने की शुरुआत किया था। यह मात्र सूचना प्रौद्योगिकी खिलाड़ियों तक सीमित नही रहा था वल्कि दूरसंचार, औषध, जैविक प्रौद्योगिकी, आदि कुछ ऐसे वैश्विक महारथियों के नाम हैं, जो भारतीय बाजारों को आंशिक सेवा प्रदान करने तथा वैश्विक बाजार तक अधिक सस्ते एवं तीव्रतर गति से नई पीढ़ी के उत्पादों को पहुँचाने की दृष्टि से अनुसंधान एवं विकास की महत्वाकाँक्षी परियोजनाओं की स्थापना कर रहे हैं।

भारतीय उद्यमियों को इस रुख से अनुबंध अनुसंधान कम्पनियों के सृजन की दिशा प्राप्त हुई है, जो वैश्विक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सेवा प्रदान करेंगी और इससे नये उद्योग ‘'अनुसंधान वाह्यस्रोत प्रक्रिया'' अथवा आर पी ओ का सृजन हुआ है, जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए न केवल भारत में ‘स्थानीय' उत्पादों से पोषण करेगा अपितु विदेश में उनकी प्रतिस्पर्धता की वृद्धि करेगा और वर्तमान बाजारों में अर्पित सेवाओं की श्रृंखला को विस्तार देगा। भारत के लिए वैश्विक अनुसंधान विकास मानचित्र पर अपना स्थान प्राप्त करने हेतु इसने एक अन्य अवसर का सृजन किया है।

अनुसंधान एवं विकास में बहुमूल्य श्रृखला की ओर बढ़ते इस देश पर इन सभी प्रभावों के फलस्वरूप विश्व भर में जो कुछ घटित हो रहा है, उसके साथ और अधिक समन्वय स्थापित करने के अवसर प्राप्त होंगे और ऐसा किसी भी बेहतर समय में हो सकता था। विश्व की अधिकतर अभिनव कम्पनियों में से कुछ एशिया क्षेत्र से पहले ही उभरना शुरू हो चुकी थी और अधिकाँश भविष्यवाणियों का अनुमान था कि यदि दक्षिण अफ्रीका के हाल में घटित हुए सशक्त लोकतांत्रिक आंदोलनों ने कुछ चमत्कार नही किया तो तीव्रतम् विकास ब्रिक (बी आर आई सी) राष्ट्रों से भारत और यहाँ तक कि अधिकतर चीन के नेतृत्व में होगा।

सफलता निश्चित ही स्वयं की समस्याओं का सृजन करती है। भारत का निगमीय क्षेत्र उच्च गुणवत्ता के कुशल मानवीय ऊर्जा के कमी की गम्भीर समस्या का सामना करना शुरू कर रहा है। अनेकों मानव संसाधन (एच आर) अभिकरण इस कमी का सामना करने के लिए, सरकारों, शिक्षा क्षेत्र, कौशल विकास एवं प्रशिक्षण प्रदान करने वाले विशेष व्यक्तियों, आदि के सहयोग से कार्य मानकों को विकसित करने पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए रणनीतियों की संस्तुति की है। हम जिस किसी भी सामूहिक विकल्पों पर सहमत होते हैं, उसमें अनिवार्य रूप से अन्तर्क्रियाशीलता और एक उचित सार्वजनिक-निजी भागीदारी का प्रतिरूप मिलना चाहिए।

मैने प्रारम्भ में प्रतिभा पलायन की बात की थी और प्रक्रिया के पलटने का संकेत दिया था। उच्च कौशल प्राप्त योग्यतम् लोगों की वापसी अत्यधिक उत्साहवर्धक है क्योंकि वे विश्व में कहीं भी रोजगार प्राप्त कर सकते हैंI यह सच-मुच उन अवसरों को स्वदेश वापस ला रहे हैं, जो हमारे सामने परिलक्षित हो रहे हैं। उद्योगों के लिए आवश्यक कौशल विकास को प्रोत्साहित करना है, इसे भूलते हुए कहीं हम इसे दूर न फेंक दें, इसके लिए हमें सावधान रहना होगा।

उद्योग एवं शिक्षा जगत दोनों इसे स्वीकार करते हैं और एक साथ मिल कर यह सुनिश्चित करना शुरू कर रहे हैं कि उद्योग द्वारा तैयार किया गया एक व्यावसायिक समूह प्रति वर्ष पारिस्थिकीय प्रणाली के अनुसंधान एवं विकास में प्रवेश करे। सरकार ने भी इस विषय को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया है और अनुसंधान एवं विकास पर केन्द्रित कहीं अधिक विश्व स्तरीय विश्वविद्यालयों के सृजन के विभिन्न पहल की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। भारत को अपनी विशाल समस्याओं का समाधान करना है, देश के 80% लोगों के बैंक खाते नही हैं, आधे से अधिक लोगों के पास ऐसी स्वास्थ्य सुविधा नही है

जिसका वे व्यय भार वहन कर सके, हमारे पास आवश्यकता का मात्र एक तिहाई अध्यापक ही है और हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्यापक पैमाने पर रिसाव हो रहा है। इन सभी का उत्तर प्रौद्योगिकी एवं नवनिर्माण माध्यम में छुपा है और सौभाग्य से जहाँ एक ओर हम एक विकासशील राष्ट्र की समस्याओं से ग्रस्त हैं, वहीं दूसरी ओर हम स्वयं उनका समाधान पाने में सभी कौशल से सम्पन्न भी हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में हमारा पौराणिक कौशल, विश्व स्तरीय उद्यमियों का उदय और ऐसी सरकार जिसकी अब प्रौद्योगिकी एवं नवनिर्माण में उचित रूप से आस्था है, ये सर्वोत्तम स्थितियाँ एक लम्बे समयान्तराल में हमारे सामने साकार हुई हैं।

भारत की प्रगति लागत के वाणिज्यिक मुनाफे की संरचना के साथ संलग्न होते हुए उच्च मूल्यों का आरोहण कर रही है, जिसके साथ जुड़ा अंतरिक्ष उत्सव का कारक है और यह उत्सव हमारे अकेले के लिए नही है। वैश्विक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, जिन्होंने भारत में अनुसंधान वं विकास के उँचे परिणाम प्राप्त करने के लिए ढ़ेर सारा बीज बोया था, उसके लाभ की फसल, नवनिर्माण में प्रवेश और ऐसे उत्पादों के रूप में काट रहा है, जो स्थानीय एवं वैश्विक दोनों स्तरों पर काम आ रही है। भारत का एक पुराना उद्योग-उपक्रम ड़ी एन ए अनगिनत शुरुआतों के साथ प्रतिशोध पर उतर आया है, भारत की सीमाओं और विदेशों में, नये उत्पादों, नये बाजारों और नये समाधानों का सृजन करते हुए यह अपने व्यापक विस्तार का आग्रही है।

भारत में श्रेष्टता की सम्भावनायें सदैव ही विद्यमान रही हैं। हमें जिसने पीछे रखा वे थे, पूँजी, सही दिशा, सरकार एवं उद्योग तथा शिक्षा जगत के बीच ताल-मेल, आदि में कमी और दीर्घकालिक निवेश एवं विकास के लिए सहायक, नीतिगत संरचना का अभाव। बहुत बड़ा समाचार यह है कि अब यह सब एक साथ आना शुरू हो गये हैं और इससे भी बेहतर समाचार यह है कि अब हमारे पास उद्यमियों की एक नई नस्ल है, यह आत्मविश्वास एवं वैश्विक महत्वाकाँक्षा से परिपूर्ण है, जो उन महानतम् अवसरों के लिए जो कभी भी किसी के पास रही होगीं, को प्राप्त करने के लिए उत्तोलक की भूमिका निभाने को तत्परता से कदम बढ़ाने के लिए तैयार है।

लेखक, सी ए टेक्नाँलोजीज (भारत) के अध्यक्ष हैं

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