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डिजिटल रनवे से गांवों का टेकऑफ़

जून 02, 2015

शालू यादव / बीबीसी, दिल्ली

मुझे याद है जब करीब दस साल पहले मेरे माता-पिता ने मुझे कंप्यूटर दिलवाया था तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दिल्ली के उस ‘इलीट क्लब’ का हिस्सा बन गई थी जिसे एक बटन के क्लिक से दुनिया से जुड़ने का भाग्य प्राप्त है.

गर्मियों की छुट्टियों में गांव से जब मेरे चचेरे और ममेरे भाई-बहन आते तो कंप्यूटर देख कर उनकी आंखों में एक ललक सी जाग जाती थी.

नई तकनीक का उन्हें इस कद्र शौक था कि छुट्टियां ख़त्म होने के बाद बुआ को उन्हें ज़बर्दस्ती वापस ले जाना पड़ता था. आखिर दिल्ली में ही उन्हें ऐसी चीज़ें देखने को जो मिलती थीं.

लेकिन अब समय बदल गया है. आज गांव में रहते हुए भी उनके पास पर्सनल लैपटॉप हैं. हालांकि वहां ब्रॉडबैन्ड इंटरनेट स्पीड कुछ ख़ास नहीं है.

ग्रामीण और शहरी भारत के बीच के डिजिटल फ़ासले का जायज़ा लेने के लिए मैंने भारत के तीन राज्यों का दौरा किया – राजस्थान का चंदौली गांव, केरल का इड्डुकी ज़िला और मध्य प्रदेश का चंदेरी कस्बा.

इन यात्राओं के दौरान जो मैंने देखा और पाया, उससे मेरा पूर्वाग्रह दूर हो गया......[और पढ़ें]

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