विशिष्ट व्याख्यान विशिष्ट व्याख्यान

ब्रेक्जिट और भारत के लिए इसके निहितार्थ

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) भासवती मुखर्जी
    Venue: द जादवपुर एसोसिएशन आफ इंटरनेशनल रिलेशंस, कोलकाता
    Date: जुलाई 06, 2019

द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से उभरे यूरोपीय देशों का सपना एक उदार कल्याणकारी राष्ट्रों को विकसित करने का था जहां नागरिकों को सर्वशक्तिमान यूरोपीय न्यायालय द्वारा गारंटीयुक्त मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता मिल सके। इससे उन बुरी शक्तियों पर नियंत्रण होना था जिन्होंने मध्य युगम में सौ वर्षों के युद्ध सहित एक महादेश को स्थायी रूप से युद्ध में झोंक दिया था, इन ग्रैंड एलाएंस के कारण प्रथम विश्व युद्ध हुआ और द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व फासीवाद और अत्यधिक राष्ट्रवाद का उदय हुआ। यूके उक्त गठजोड़ का एक महत्वपूर्ण और मान्य साझेदार था। सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य के रूप में यूके ने अपनी उपस्थति से यूरोपीय संघ को मजबूत किया।

लिस्बन संधि के अनुच्छेद 50, जिसमें यूरोपीय संघ के सदस्य राष्ट्रों को प्रथम बार यूरोपीय संघ को छोड़ने का विशिष्ट अधिकार दिया, में ऐसा करने की प्रक्रिया का उल्लेख है। यह संधि एक रूप में एक अद्वितीय अंतरराष्ट्रीय कानूनी लिख है जिसमें इसे सदस्य राष्ट्रों और आयोग के बीच राष्ट्रीय संप्रभुता को कुशलतापूर्वक बांटा गया है। सदस्य राष्ट्रों द्वारा इन साझा क्षमताओं की भिन्न व्याख्या के कारण भी यूरोप के भीतर ब्रेक्जिट और वैश्विकरण के विरूद्ध अभियान चलाने वाली ताकतें उभरीं। यह यूरोपीय संसदीय चुनाव के परिणाम में सबसे अधिक परिलक्षित हुआ है।

ब्रेक्जिट का मामला अध्ययन


ब्रेक्जिट ने जन भावना सहित हर चीज को बदल दिया। ब्रेक्जिट को उदार लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के समक्ष उभरने वाले समकालीन खतरों के संदर्भ में एक उत्कृष्ट मामला अध्ययन माना जाता है। ब्रेक्जिट बनने के कई कारक हैं यथा यूरोप से यूनाइटेड किंग्डम का लंबे समय से और नाखुशी से अलग रहना। मेरी अवधारणा मेरी पुस्तक ‘इंडिया एंड ईयू:इंसाइडर व्यू’ में परिलक्षित है कि यूरोप से ब्रिटेन के अलग होने का चल रहा और जटिल मुद्दा रूढ़िवाद, मध्य वर्ग, इंग्लिश यूरो संशयवाद में गहरे जमा है। अंततोगत्वा ब्रेक्जिट ने इस प्रकार से यूरोपीय संघ, इस आयोग और ब्रुसेल्स की नौकरशाही जैसे बड़ी बाह्य शक्तियों के लिए ब्रिटेन केवैश्विकरण और प्रवासन तथा स्वाभाविक विरोध को बहिष्करण को प्रस्तुत करता है।

सोशल मीडिया ने भी ‘ब्रेक्जिटियरों’ के लिए एक छोटी सी जीत को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। इस अलगाव अभियान के अगुवा जो मे का उत्तराधिकारी हो सकता है, वह है बोरिस जॉनसन जिसने पहले से प्रकट पूर्वाग्रहों को और मजबूत करने के लिए गलत आंकड़ों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया। इसका एक उदाहरण वह दावा था कि यूके यूरोपीय संघ को हर हफ्ते 350 मिलियन पाउंड भेजता है। इस गुमराह करने वाले आंकड़े ने यूके के लिए ब्रुसेल्स से साप्ताहिक मौद्रिक प्रवाह की उपेक्षा की किंतु इसका जनमत संग्रह के परिणाम को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।

घरेलु राजनीति के संदर्भ में ब्रेक्जिट ने दो प्रधानमंत्रियों, कैमरून और मे के भविष्य को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया। यूरोपीय संघ द्वारा सहमति वाला वर्तमान विस्तार 31 अक्टूबर, 2019 तक है जिसमें यदि संसद में इस समझौते पर सहमति बनी तो ब्रिटेन के लिए इसे शीघ्र छोड़ने का विकल्प होगा। इसका दायित्व ब्रिटेन पर था कि वह एक समाधान खोजे जो ‘बैकस्टोप’ सहित यूरोपीय संघ के साथ इन महीनों में मूल समझौते के मौलिक सिद्धांतों में संशोधन नहीं करेगा।

समझौता या समझौता नहीं

संशयी हाउस ऑफ कामंस को इस समझौते के बारे में समझाने में मे की असफलता के परिणामस्वरूप उसे अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। प्रधानमंत्री बनने के लिए अग्रणी बोरिस जॉनसन ने किसी समझौते के साथ या समझौते के बिना 31 अक्टूबर, 2019 तक यूरोपीय संघ से यूके को निकालने का वादा किया है।

मे ने इस समझौते को 29 अप्रैल, 2019 को हुई लिस्बन की संधि के अनुसार होने वाले ब्रिटेन के अंतिम अलगाव के पूर्व अनुसमर्थन के लिए यूके और यूरोपीय संसदों को समझौते के लिए आवश्यक रूप से रखे जाने के 524 दिनों के बाद किया। यह अलगाव 585 पृष्ठों का था जिसे कानूनी रूप से बाध्यकारी संधी और भावी संबंध पर 26 पृष्ठ का राजनीतिक घोषणा का आधार होना चाहिए। दूसारा दस्तावेज (जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है) दोनों ही पक्षों को राजनीतिक रूप से भावी बातचीत में कुछ मूल मानकों के लिए बाध्य करता है। इसकी ब्रेक्जिटियरों द्वारा यूके की संप्रभुता को प्रभावित करने के रूप में व्याख्या की गयी है।

इस समझौते को हाउस आफ कामंस द्वारा कभी अनुमोदित नहीं किया गया। यदि इसका सिंहावलोकन करें तो मे ने नागरिक अधिकारों, 39 बिलियन पाउंड के अलगाव संबंधी समझौते और तथाकथित बैकस्टाप के रूप में ब्रेक्जिट के पश्चात उत्तरी आयरलैंड और रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के बीच उदार सीमा के मुद्दे सहित सभी प्रमुख मुद्दों पर चालबाजी की। सबसे विवादास्पद मुद्दा बैकस्टॉप का था जो आयरिश सीमा मुद्दे पर भावी व्यापार बातचीत के असफल होने पर आकस्मिक योजना है। ब्रेक्जिट के समर्थक यह नोट कर गुस्से में थे कि इससे यूके नीति पर कुछ कहे बिना यूरोपीय संघ के भीतर होगा।

इस समझौता का अभिप्राय यूके में तीन मिलियन से अधिक यूरोपीय संघ के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना तथा यूरोपीय संघ के देशों में एक मिलियन से अधिक नागरिकों को उनके वर्तमान कार्य स्थलों जहां उन्होंने अपना घर बनाया था, पर रहने देने और कार्य करने देने की अनुमति देना था। ऐसे सभी लोग जो यूके में किसी भी समय आए हों और पारगमन के समय की समाप्ति तक जो 2022 तक समाप्त हो सकता है, तक विस्तारित किया जाना चाहिए ताकि उन्हें वे अधिकार मिलें जो अधिकार यूरोपीय संघ के नागरिकों को आज ब्रिटेन में अपने घरों में रहने, कार्य करने और पढ़ाई के लिए प्राप्त है।

इस अलगाव की लागत बहुत अधिक है। यूके को 2020 तक यूरोपीय संघ की बजट में अपने अंशदान को पाटने के लिए लगभग 39 बिलियन पाउंड देने और यूरोपीय संघ के अधिकारियों के लिए इस प्रकार के पेंशनों की अन्य बकाया संचित प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की आवश्यकता होगी। बोरिस जॉनसन ने इस पृष्ठभूमि में नरम पड़ते हुए यूरोपीय संघ को इन लागतों को बंधक बनाए रखने की प्रतिज्ञा ली है।

यूरोपीय संसद के चुनावों के परिणाम का प्रभाव

ब्रेक्जिट के संबंध में जटिल और जरूरत से अधिक खींचे हुए समझौते के परिणामस्वरूप यूके मई 2019 में यूरोपीय संसद में होने वाले चुनाव में एक अनिच्छुक प्रतिभागी बन गया। इसे यूरोपीय संघ के नेताओं जो इस तथ्य से पूर्णत: वाकिफ थे कि ब्रेक्जिट पूर्व ब्रिटेन के जहरीले ध्रुवीकरण की अगुवाई निगेल फराज द्वारा की गयी थी, द्वारा कभी विचार नहीं किया गयाकि इससे बदलाव आएगा और वे एजेंडे खतरे में पड़ेंगे जिन पर चुनाव लड़े जा रहे थे। लोकवाद और लोकवादी दल अब मार्केल और मैक्रोन द्वारा प्रतीक मध्यमार्गी विकल्प की अपेक्षा इस वाद-विवाद पर हावी होगा। फ्रांस – जर्मनी नेतृत्वजिसने शीत युद्ध की जटिलताओं के माध्यम से यूरोपीय संघ को नेतृत्व दिया था, दबाव में था जो दबाव पहले कभी नहीं था।

यूरोपीय संसदीय चुनाव के परिणाम को दिव्यदर्शी शिक्षाविद् टेरी ई गिवन्स द्वारा समुचित रूप में सार प्रस्तुत किया गया: "इस मतदान ने विरोधाभास के साथ … संपूर्ण यूरोप के मतदाता के अलग और ध्रुवीकृत आधार को प्रस्तुत किया… यदि राजनीति में नागरिकों द्वारा विघटनकारी पुन:अनुबंध किया जाए तो यह एक नई समीकरण का भी संकेत देता है।”

सामान्यतया, किसी भी लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया में अधिक मतदाताओं के मतदान करने से सत्ता में बैठे राजनीतिज्ञों को एक कठोर संदेश जाता है कि यह सामान्य बात नहीं है। निश्चय ही इस चुनाव में ऐसा था। यूके के लिए नए ब्रेक्जिट पार्टी की अनुमानित सफलता के अलावा जिसे लगभग 30 प्रतिशत वोट से अधिकांश सीटें जीत ली गयीं, लिबरल डेमोक्रेट 20 प्रतिशत को ही जीतने में सफल रहे। लेबर पार्टी 14 प्रतिशत मत के साथ ग्रीन पार्टी के 12 प्रतिशत मत से थोड़ा ही आगे थी। थेरेसा मे और उसके उत्तराधिकारी के लिए बड़ी चिंता की बात टोरिस की भारी हार थी जो केवल 9 प्रतिशत मत ही हासिल कर पाया। यह जब कभी भी यूके में आम चुनाव हुए तो कंजरवेटिव पार्टी के लिए यह अच्छा शगुन नहीं होता है।

लिस्बन संधि के अनुसार यूरोपीय संसद की मुख्य भूमिका को देखते हुए इन परिणामों का भावी नीतियों पर प्रभाव पड़ता है।परंपरागत नरम दलों जिनका यूरोपरीय संघ के सृजन के बाद से ही यूरोपीय राजनीति में प्रभुत्व था, धीरे-धीरे अपना आधार खो रहे हैं। यह यूरोपीय सपने के केन्द्र में उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए अच्छा शकुन नहीं है। सौभाग्यवश, यूरोप के लिए लिबरल और डेमोक्रेटों के गठबंधन के उदार-नरमपंथी समूह (एएलडीईएंडआर), जिसमें मैक्रोन की पार्टी भी शामिल है, को 32 सीटें प्राप्त हुईं। अब यह संगठन मुख्य ईयू स्थिति के लिए अधिकारियों को नामित करने तथा यह सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे कि ये उच्चाधिकारी लोकवादी नहीं हैं।

इसके मुख्य व्यक्ति यूरोपीय संसद के राष्ट्रपति होंगे। एक अन्य नयी पार्टी ग्रीन पार्टी गठबंधन है जिसके नरमदलीय होने की उम्मीद है। उत्तरी यूरोप में इसके उत्कृष्ट कार्यनिष्पादन से पूर्वी यूरोप में दलों द्वारा लोकवादी प्रचार का विरोध होना चाहिए।

ऐसे कई लोग हैं जो यह तर्क देते हैं कि यूरोपीय संसदीय चुनाव 2019 में उत्तरार्द्ध में होने वाले राष्ट्रीय चुनावों के लिए केवल एक परीक्षा भर है। राहत है कि स्पष्ट रूप से यूरोप में यूरोपीय संघ विरोधी ताकतें एक तिहाई सीटें नहीं जीत पायीं क्योंकि यह डर था, जिन्होंने उन्हें इस नए संसद में नेताओं के रूप में लोकवादियों को चुनने में उन्हें समर्थ बनाया होगा।

भारत पर ब्रेक्जिट का संभावित आर्थिक प्रभाव

इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्रेक्जिट एक चुनौती है। यह एक अवसर है या नहीं यह देखा जाना होगा किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि यह अविश्वसनीय है। भारत-ईयू कारोबारी संबंध और भारत-यूके साझेदारी पर ब्रेक्जिट के प्रभाव के संबंध में गंभीर अनुमान की इस पृष्ठभूमि में भारत के लिए क्या दावं पर है?

युरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है, जो वर्ष 2017 में भारत के कुल वस्तु व्यापार का लगभग 13 प्रतिशत है। भारत यूरोपीय संघ के कुल व्यापार के 2.3 प्रतिशत का योगदान देता है और यह यूरोपीय संघ का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 91 बिलियन यूरो के भारत यूके व्यापार और 19.4 बिलियन यूरो के भारत यूके व्यापार के दांव के साथ सभी साझेदारों को कारोबार और वाणिज्यिक संदर्भ में इस मुद्दे पर ध्यानपूर्वक विचार किए जाने की आवश्यकता है।

यूरोपीय संघ और भारत के बीच व्यापार में सेवा क्षेत्र भी एक महत्वपूर्ण संघटक है। यूरोस्टेट आंकड़ा यह बतलाता है कि यूरोपीय संघ को भारतीय सेवा निर्यात वर्ष 2018 में 16.6 बिलियन यूरो का था जबकि आयात 17.1 बिलियन यूरो का था। इस क्षेत्र में जर्मनी, नीदरलैंड, फ्रांस, इटलीऔर बेल्जियम तथा यूके से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी किया गया है।

भारत का यूके के साथ वर्ष 2015 में लगभग 3.64 बिलियन अमेरिकी डॉलर सकारात्मक व्यापार अधिशेष था। वित्तीय वर्ष 2017-18 में यूके के लिए निर्यात में 13.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। यूके से आयात में 31.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है जो लगभग 4.83 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है। ब्रिटिश पाउंड के अवमूल्यन से निर्यातकों और आयातकों पर प्रभाव पड़ रहा है। यदि अंतिम ब्रेक्जिट के संदर्भ में कोई समझौता नहीं होता है जिसकी संभावना बढ़ती प्रतीत हो रही है, तो यूके में भारतीय कारोबार को यूरोपीय बाजार में प्रवेश पर मनाही हो जाएगी और इसके परिणामस्वरूप भारतीय कारोबार को यूके से यूरोप पलायन करना होगा। भारतीय फर्म यूके को यूरोपीय संघ का प्रवेश द्वार माना है। एक साझा बाजार ने अब तक इन कंपनियों को यूरोपीय देशों में बाधा मुक्त पहुंच प्रदान किया है।

ब्रेक्जिट के साथ एक कठोर अथवा किसी प्रकार का समझौता नहीं होने से ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में यूके स्थित 800 से अधिक भारतीय कंपनियों पर अवश्यंभावी प्रभाव पड़ेगा, ये कंपनियां 110,000 से अधिक रोजगार दे रही हैा और यूके में भारत से पर्यटन और कारोबार का प्रवाह होता है। इनमें से आधे से अधिक लोग ब्रिटेन में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक टाटा समूह की केवल पांच कंपनियों में कार्यरत हैं। कुछ कंपनियां अत्यधिक कीमती वस्तुओं का निर्माण करने वाली कंपनियां हैं यथा भारतीय स्वामित्व में जेगुआर, जिसका जोखिम प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहा है। एक साझे बाजार ने अब तक इन कंपनियों के लिए यूरोपीय देशों में बाधा मुक्त पहुंच देने को सुनिश्चित किया है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र जिनके प्रभावित होने की संभावना है उनमें आटोमोबाइल, आटो संघटक, भेषज, रत्न और आभूषण, शिक्षा व आईटी युक्त सेवाएं हैं। फिक्की ने नोट किया है कि इनमें से अधिकांश क्षेत्र की कंपनियां मांग में बदलाव और मुद्रा मूल्यों के लिए सुभेद्य होगी।

पिछले कुछ वर्षों में कई भारतीय कंपनियां ब्रिटेन में फलीफूली यथा रोल्टा, भारती एयरटेल आदि। यूके में परिचालित कर रहीं इन कंपनियों का ब्रिटिश मुद्रा में अर्जित राजस्व का 13 प्रतिशत है यद्यपि यूरोपीय संघ की दृष्टि से यह संख्या 30 प्रतिशत जितना है। भेषज क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जहां भारतीय कारोबारों का यूके में बहुत बेहतर प्रदर्शन रहा है। उनके लिए ब्रेक्जिट स्पष्टत: एक बुरी खबर है। पाउंड स्टलिंग के कमजोर होने से उनका राजस्व प्रभावित होगा।

आर्थिक रूप से विश्व के सबसे सफल उत्पाद संघ (जीडीपी और मानव विकास सूचकांक दोनों द्वारा मापित) को छोड़ने से ब्रेक्जिट के बाद प्रथम 15 वर्षों में ब्रिटेन का सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) 3.9 प्रतिशत से 9.3 प्रतिशत कम हो जाएगा। वर्ष 2017 में यूरोप में व्यापार कर रहे शीर्ष 10 भारतीय कंपनियों में से चार कंपनियां यूके की अधिकृत की गयी कंपनियां थीं (ब्रेक्जिट मत के बाद रूपए की तुलना में पाउंड के मूल्य में कमी से आंशिक रूप से प्रभावित)।

भारत यूके के 19.4 बिलियन यूरो के खतरे में पड़ने के साथ भारतीय प्रवासी और यूके में स्थित 400 से अधिक भारतीय कंपनियां जिन्होंने ब्रेक्जिट के विरूद्ध जबरदस्त तरीके से वोट किया, को विश्व में यूनाइटेड किंगडम के अलग थलग पड़ने के कारण भविष्य का डर है।

कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि वे या तो रिपब्लिक आफ आयरलैंड अथवा नीदरलैंड की ओर रूख करेंगे जहां यूके के सदृश्य वातावरण में परिचालित करने के लिए ऐसी कंपनियों हेतु अनुकूल दशा है। ब्रेक्जिट के मामले में कोई समझौता नहीं होने से भारतीय कंपनियों को लंदन से उस महादेश में पहुंच बनाने पर प्रतिबंध लग जाएगा। इनमें से कई कंपनियां अवसंरचना और जनशक्ति में बढ़ती लागतों के जोखिम के साथ एम्सटर्डम अथवा डबलीन की ओर रूख कर रही हैं।

अन्य लोग नोट करते हैं कि यूरोपीय संघ से यूके का निकलना भारत के लिए बेहतर स्थिति को प्रस्तुत करता है। उनका विचार है कि भारत निर्मित वस्तुओं के संबंध में भारत व्यापार अंतर को पाट सकता है। वर्तमान संदर्भ में ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता है। यूके में वर्तमान विदेशी विरोधी भावना ने इन समझौतों को जटिल बना दिया है।

ब्रेक्जिट के बाद भावी व्यापार व्यवस्था

भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने मध्य 2017 में इसकी पुष्टि की कि भारत और यूके आधिकारिक रूप से यूके के यूरोपीय संघ से निकल जाने के बाद ही एफटीए पर कार्य कर सकते हैं। उसके बाद वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने इन समझौतों के पूर्वानुमान में यूके के साथ व्यापार के लिए एक आंतरिक 'लेखा परीक्षा' और विश्लेषणशुरू किया। भावी भारत-यूके व्यापार समझौते का विषय वस्तु समझौते के प्रकार और बाहर होने की शर्त जो यूके ब्रेक्जिट को अंतिम रूप देने के लिए समझौता करेगा, पर निर्भर करेगा। जब तक यूके यूरोपीय संघ का हिस्सा है, वह भारत के साथ कोई व्यापार समझौता नहीं कर सकता है। यह स्थिति बहुत जटिल है क्योंकि भारत ब्रेक्जिट परिदृश्य के बाद मोड 4 (मोड 4 में स्वाभाविक लोगों की अस्थायी आवाजाही शामिल है) को शामिल करने पर जोर देगा। ज्ञात स्रोतों के अनुसार भारत यूरोपीय संघ की योग्यता वाले क्षेत्रों में यूके को पृथक विशेषानुमति देने से भी मना करेगा।

भारतीय अर्थशास्त्रियों का यह विचार है कि ब्रेक्जिट भारत के लिए बहुपक्षीय स्तर पर और मुक्त व्यापार समझौतों पर यूके और यूरोपीय संघ के साथ अपने व्यापार की कानूनी शर्तों को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए अवसर है। मूल बात यह है कि भारत को ब्रेक्जिट के लिए किस प्रकार प्रतिक्रिया देना चाहिए ताकि ब्रेक्जिट के बाद अपनी वस्तुओं और सेवा क्षेत्रों के लिए अधिकतम अवसर प्राप्त कर सकें?

इन अर्थशास्त्रियों का विचार है कि भारत को यूके के साथ और यूरोपीय संघ व विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) के साथ वस्तुओं और सेवाओं के लिए रियायत अनुसूची हेतु पुन: समझौता करना चाहिए, यूरोपीय संघ के सथ अपना बीटीआईए चर्चा शुरू करना चाहिए तथा ब्रेक्जिट के बाद यूके के साथ एफटीए बातचीत को शुरू करने की तैयारी करनी चाहिए।

भारत को ब्रेक्जिट की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए कि कृषि और औद्योगिक उत्पादों के भारतीय निर्यातकों को बाजार पहुंच सुविधा सुनिश्चित करने में यूके से भारत को आवश्यक नयी रियायतें, क्षतिपूर्ति समायोजना और/अथवा पर्याप्त क्षतिपूर्ति प्राप्त करने की स्थिति को देखते हुए इसे सुनिश्चित करते हुए जीएटीटी अनुच्छेद 28 (प्रशुल्क अनुसूची में संबंधित संशोधन) के अनुप्रयोग के संबंध में महत्वपूर्ण रूप से सोचने की आवश्यकता होगी ताकि उन वस्तुओं के भारतीय निर्यातक ब्रेक्जिट के बाद गंभीर रूप से प्रभावित न हों।

यही नियम सेवाओं के लिए भी लागू होंगे। भारत को जीएटीएस अनुच्छेद ईक्कीस (अनुसूची का संशोधन) के तहत भारतीय सेवा निर्यातकों हेतु यूके और यूरोपीय संघ के साथ बाजार पहुंच और राष्ट्रीय व्यवहार संदर्भों पर पुन: समझौता करना चाहिए।

वस्तुओं के संबंध में भारत को शुरूआत में यूके और/अथवा यूरोपीय संघ के साथ किए गए समझौते के समान रियायतों की सूची तैयार करने की आवश्यकता है जिसे वह संशोधित करेगा अथवा वापस लेगा। सेवा क्षेत्रों में उसे यूके और/ अथवा यूरोपीय संघ आफरों की क्षतिपूर्ति समयोजनों पर डब्लूटीओ मध्यस्थता की प्रत्याशा के मूल्यांकन करने की आवश्यकता है जिसे भारत अस्वीकार्य समझता है और उसके बाद पर्याप्त रूप से समतुल्य लाभों में संशोधन करने अथवा वापस लेने की आवश्यकता है।

यदि यूके भारत के साथ व्यापार समझौता करने में रूचि रखता है तो उसे मोड 4 के संबंध में लचीलापन दर्शाने तथा आब्रजन के लिए मार्ग खोलने की आवश्यकता होगी। भारतीय व्यापार नीति स्थिर है जिन्हें जीएटीएस में मोड 4 सेवा आपूर्ति के रूप में अथवा सामान्य रूप से कारोबारी पेशेवरों के अस्थायी प्रवास के रूप में परिभाषित किया जाता है।

इसके बदले यूके समझौताकर्ताओं ने मोड 4 की अपेक्षा मोड 1, 2 और 3 को और अधिक स्वीकार्य मोड के रूप में ऑफर किया है।

मोड 1 (सीमा पार आपूर्ति) आउटसोर्सिंग से संबंधित है यथा भारतीय पेशेवर मुम्बई में अपने कार्यालयों में बैठकर इंटरनेट के जरिये मेनचेस्टर में अपने रोगियों और मोवक्किलों को सेवाएं प्रदान कर रहा हो। मोड 2 (विदेश में उपभोग) शीर्ष गुणवत्ता वाले चिकित्सा उपचार और प्रथम श्रेणी वाली इंजीनियरिंग परामर्श हेतु भारत की यात्रा से संबंधित है। मोड 3 (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) स्वागतयोग्य है क्योंकि इसमें यूके में निवेश करने वाली और ब्रिटिश नागरिकों को नौकरी देने वाली भारतीय कंपनियां शामिल हैं। तथापि, भारत यूके अथवा यूरोपीय संघ के साथ किसी भी व्यापार समझौते के लिए मोड 4 पर बल देना जारी रखेगा।

यूके की अर्थव्यवस्था यूरोपीय संघ के बिना एक मध्यम स्तरीय अर्थव्यवस्था को प्रस्तुत करता है जो भारत की लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से बहुत कम है। भारत के लिए इस समझौते को आकर्षक बनाने के लिए यूके को और अधिक रियायत देने की आवश्यकता होगी क्योंकि यूरोपीय संघ के साथ यह बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यह एक कठिन समझौता प्रतीत होता है।

अब यूके भारत के साथ एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने को बड़ा इच्छुक है क्योंकि ब्रेक्जिट अलगाव की तिथि नजदीक आ रही है। इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए कि भारत और यूके कितनी जल्दी मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर समझौते को शुरू कर सकते हैं, यूके उच्चायुक्त सर डोमिनिक एस्किथ ने अप्रैल, 2019 को नोट किया कि जब तक यूके यूरोपीय संघ का हिस्सा बना रहेगा, दोनों देश प्रशुल्क पर चर्चा नहीं कर सकते हैं, इसलिए बाजार पहुंच और विनियामक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर बातचीत की अनुमति नहीं दी गयी और ये चीजें हो रही थीं। उन्होंने कहा: "नि:संदेह जब तक हम बाहर निकलने की इस प्रक्रिया को पूरा नहीं करते हैं तब तक हम भारत के साथ एफटीए समझौता नहीं कर सकते हैं और यह अभी भी स्पष्ट नहीं है क्या होगा। किंतु मेरी टीम और मंत्री गण भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में अपने समकक्षों के साथ बातचीत कर रहे हैं।”

जून, 2016 में ब्रेक्जिट जनमत संग्रह के एक महीने पूर्व यूके सत्तापक्ष ने पूर्वानुमान लगाया था: "इस संघ को छोड़ने के लिए एकमत से हमारी अर्थव्यवस्था को तत्काल और भयंकर झटके का सामना करना पड़ेगा।” जैसे-जैसे ब्रेक्जिट समय-सीमा नजदीक आ रही है, ऐसे मनहूस संकेत हैं कि ब्रिटेन का विश्व का सबसे बड़े व्यापारिक ब्लॉक को छोड़ने का निर्णय का क्षति होना शुरू हो गया है। 11 फरवरी, 2019 को प्रकाशित सरकारी आंकड़े ने दर्शाया कि दिसम्बर, 2018 में जीडीपी में 0.4 प्रतिशत की कमी आयी। 2018 की चौथी तिमाही ने केवल 0.2 प्रतिशत के जीडीपी बढ़ोतरी को दर्शाया। बैंक आफ इंग्लैंड ने अभी अर्थव्यवस्था के संकुचन की संभावना और इसमें 13 प्रतिशत से 22 प्रतिशत तक की कमी को संशोधित किया है।

‘ब्रेक्जिट प्रभाव’ उद्योगों में विशेष रूप से स्पष्ट है जो व्यापार करते हैा अथवा यूरोपीय संघों के कामगारों पर निर्भर हैा यथा इंजीनियरिंग और वाहन क्षेत्र और होटल एवं रेस्टुरेंट उद्योग। इस मंदी का उस समय यूके और यूरोपीय संघ दोनों पर प्रभाव पड़ेगा जब यूरो जोन कमजोर है और मंदी से बाहर आ रहा है।

यूके को इसे स्वीकार करना चाहिए कि यह जबर्दस्त तरीके से एकपरिपक्व, सेवा आधारित अर्थव्यवस्थाहै। भारत, जिसकेआर्थिक क्रियाकलापों का लगभग 60 प्रतिशत सेवा क्षेत्र है, के साथ बहुत पीछे नहीं है। इस प्रकार एक मुक्त व्यापार समझौते में यूके में भारतीय कामगारों को अनुमति देने के संबंध में एक भिन्न प्रवृत्ति अंतर्ग्रस्त होगी। एक कठोर सच्चाई जिसे एक नए यूके प्रधानमंत्री को स्वीकार करना होगा वह यह कि यूरोपीय संघ की तरह भारत की अर्थव्यवस्था यूके की अर्थव्यवस्था से बहुत अधिक है, जो यूरोपीय संघ के साथ उसी कारण से स्वाभाविक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर सौदेबाजी की स्थिति है। भारत को अपने पूर्व उपनिवेशक को एक कठिन संदेश देना होगा कि यूके को भारत की उसकी अपेक्षा अधिक आवश्यकता है। भारत को यूरोपीय संघ की अधिक आवश्यकता है।

भारत यूरोपीय संघ की तरह उसी मुद्दे पर यूके से लचीलेपन की उम्मीद होगी जिसके परिणामस्वरूप पहली बार ब्रेक्जिट हुआ – सीमा पार लोगों और पेशेवरों की मुक्त आवाजाही। अंततोगत्वा भारत और यूरोपीय संघ की जरूरतें एक समान हैं: एक समझौता युक्त उदार ब्रेक्जिट।

यह गतिरोध वाला समझौता यूरोपीय संघ के कार्यकरण में एक अंत:राष्ट्रीय सत्ता के रूप में मूलभूत कमी को दर्शाता है। एक डच दार्शनिक लुक वेन मिडेलार ने हाल ही में नोट किया: "कानूनों और विनियमों की संस्था के रूप में यूरोपीय संघ ने सर्वप्रथम व्यापार पर ध्यान केंद्रित करते हुए यूरोप के लिए ब्रिटेन के रणनीतिक और भूराजनीतिक महत्व पर बहुत थोड़ा ध्यान दिया जहां ब्रुसेल्स ने व्यवसाय को सुरक्षा से अधिक माना।”

भारत में इन घटनाक्रमों को सतर्क और अपशकुन के साथ देखा जा रहा है। ऐसी रिपोर्टें हैं कि विधि और न्याय मंत्रालय ने भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को सावधान किया है कि बिना समझौता वाला ब्रेक्जिट भारत के व्यापार और उद्योग के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है और सरकार को डब्लूटीओ के माध्यम सहित इस प्रक्रिया के दौरान भारत के हितों की रक्षा करने के लिए कानूनी सहारा लेना चाहिए।

फ्रांसीसियों और जर्मनों ने इस प्रकार से यूरोपीय संघ के ढ़हने की स्थिति में यूरोपीय संघ के एक सबसे महत्वपूर्ण सदस्य देश की अंतर्ग्रस्तता और भूराजनैतिक पहलुओं को बहुत देश से महसूस करते हुए बिना समझौते वाले ब्रेक्जिट के लिए आकस्मिक योजनाओं को तैयार करना शुरू कर दिया है। इसे एक ‘रणनीतिक अंगोच्छेदन’ से तुलना की जा रही है।

फ्रेंस टिमर्मंस, नीदरलैंड के सबसे सफल विदेश मंत्रियों में से एक और यूरोपीय आयोग के प्रथम उपाध्यक्ष ने रॉलिंग स्टोन का भावानुवाद किया: "आपको सदा वह नहीं मिलता जो आप चाहते हैं, किंतु यदि आप कभी कोशिश करते हैं, तो आपको वह मिल सकता है जिसे आपको आवश्यकता है।”

इस स्थिति में ब्रुसेल्स या भारत के लिए यह स्पष्ट नहीं होता कि यूके अपनी जरूरत के अलावा और क्या चाहता है। एक समझौता कभी बहुत दूर नहीं प्रतीत हुआ है।

निष्कर्ष झलक

ब्रेक्जिट पर लगातार गतिरोध अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, चाहे वह उत्तर आयरलैंड हो अथवा उत्तरी कोरिया, को प्रभावित करते हुए लोकवाद और लोकवादी नीतियों के खतरे को दर्शाता है। ब्रेक्जिट उत्तरी आयरलैंड में अस्थायी शांति के लिए खतरा है। ब्रेक्जिट के कट्टर समर्थक ब्रिटेन की एकता तथा यूरोप से सदा के लिए मुक्त होने के चक्कर में स्काउटलैंड और उत्तरी आयरलैंड को खोने के जोखिम के लिए जुआ खेलने के इच्छुक हैं। जैसा कि एक प्रमुख यूरोपीय संघ के राजनीति द्वारा बतया गया कि थेरेसा मे का समझौता करने का प्रयास ऐसा है मानो अंडों को निकाल कर ऑमलेट बनाने का प्रयास है!

ब्रेक्जिट के इर्द गिर्द घटनाक्रम स्थापित लोकतांत्रिक व्यवस्था की क्षणभंगुरता को भी दर्शाता है जब वैश्विकरण, नई प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के परिणामस्वरूप चुनौतियों का सामना हुआ। एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है। इसे उदारवाद, लोकतंत्र, सहिष्णुता और बहुसंस्कृतिवाद के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।

दूसरी ओर, जो इसका पूर्वानुमान लगाते हैं कि यूरोप क्षरण की ओर है जो लिस्बन संधि में दिए गए नियंत्रण और संतुलनों को नजरअंदाज करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि लोकवादियों सहित प्रत्येक चुनौती के बावजूद यूरोपीय मूल्य बने हुए हैं। यूरोप के पूर्वी और पश्चिमी किनारों के बीच एक बौद्धिक और राजनीतिक सहक्रिया भी है जो स्वयं ही राजनीतिक मंथन को प्रदर्शित करता है।

यूरोपीय संघ के पश्चिमी छोर जो जबरदस्त तरीके से उदार और प्रगतिशील है और पूर्वी यूरोप जो आधुनिकता, उदारता मूल्यों को खारिज कर रहा है और लिस्बन संधि में दिए गए सिद्धांतों को चुनौती दे रहा है, के बीच एक मूलभूत विवाद विद्यमान है। यह विवाद भविष्य के लिए यूरोपीय विजन के दो संस्करणों के बीच है। पश्चिमी यूरोपीय संघ में यह वाद-विवाद व्यक्तिगत संप्रभुता के बारे में है। पूर्वी यूरोप में यह राष्ट्र की संप्रभुता के बारे में है। विचारधारा और आर्थिक रूप से पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के बीच बढ़ती खाई को देखते हुए यह वाद-विवाद उत्तरोत्तर जहरीला होता जा रहा है।

भारतीय परिदृश्य से भारतीय उद्योगपति शिशिर बजोरिया, बजोरिया समूह के अध्यक्ष ने इस मुद्दे पर भारत की स्थिति की उपयुक्त व्याख्या की: "हमारे यहां 800 मिलियन युवा भारतीय हैं जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है। हम यूके साथ ब्रेक्जिट या बिना ब्रेक्जिट व्यापार करेंगे। और हम यूरोपीय संघ के साथ ब्रेक्जिट या बिना ब्रेक्जिट व्यापार करेंगे।” (2016)

पंकज मिश्रा ने ‘’ब्रिटिश शासक वर्ग की अहितकर अक्षमता’’ (न्यूयार्क टाइम्स 19) में पूर्वाभासी रूप से प्रश्न पूछा कि यदि अंतत: यूके को अलग होना है, तोयह "आयरलैंड में धमकी भरा खुनखराबा और स्काउटलैंड में संबंध विच्छेद” और आम ब्रिटिश लोगों को बिना समझौते वाले ब्रेक्जिट के कल्पनातीत अव्यवस्था के लिए छोड़ने जैसा होगा। उन्होंने निष्कर्ष तौर पर कहा: "अधिक कुरूप ऐतिहासिक विडम्बनाएं अभी ब्रेक्जिट तक पहुंचने के टेढ़े मेढ़े रास्ते में ब्रिटेन के लिए है।”

स्पष्टत:, यह वर्णन अभी भी सभी के लिए यथा भारत, यूके और यूरोप के लिए बड़े दांव पर है।