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भारत की विदेश नीति के स्तंभ के रूप में सांस्कृतिक राजनयिकता तथा वसुधैव कुटुम्बकम

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) सुरेश कुमार गोयल
    Venue: कालीकट विश्वविद्यालय
    Date: जून 25, 2019

कुलपति महोदय, डॉ. सेबेस्टियन,
मुझे कोझकोड के इस ऐतिहासिक शहर में आकर अत्यंत प्रसन्नता हो रही है जिसे भारतीय मसालों के एक प्रमुख व्यापार स्थल के रूप में इसकी भूमिका के लिए 'मसालों के शहर' के नाम से जाना जाता है।
v मध्यकालीन युग में समूथिरिस (जोमोरिंस) द्वारा शासित स्वतंत्र साम्राज्य की राजधानी तथा बाद में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत तत्कालीन मालाबार जिले के रूप में यह भारतीय सामुद्रिक व्यापार और यात्रा का केन्द्र रहा है। व्यापारी भारत के समृद्ध सांस्कृतिक प्रभावों और इसकी उत्कृष्टता को लेकर दक्षिण-पूर्वी एशिया, अरब और एशिया से घिरे खाड़ी क्षेत्र तथा यूरोप तक पहुंचे। अरब के व्यापारियों ने सातवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही इस क्षेत्र के साथ व्यापार आरंभ कर दिया था तथा पुर्तगाली खोजी वास्को डि गामा ने 30 मई, 1498 को कोझिकोड में कदम रखे थे और इस प्रकार यूरोप और मालाबार के बीच व्यापार मार्ग का प्रारंभ हुआ। अंग्रेज यहां 1615 में, फ्रांसीसी 1698 और डच 1752 में आए।

छह बार कोझिकोड की यात्रा करने वाले इबन बतूता (1342-1347) ने कोझिकोड का वर्णन "मालाबार जिले के एक विशाल भाग" के रूप में किया है जहा "विश्व के सभी भागों के व्यापारी पाए जाते हैं। इस स्थान के मुस्लिम व्यापारी इतने समृद्ध हैं कि उनमें से कुछ तो वहां रखे ऐसे जलयानों का पूरा माल तक खरीद सकते थे तथा उनकी भांति अन्य भी तैयार कर सकते थे।"

जेहांग के अधीन इम्पीरियल चाइनीज़ बेड़े का एक चीनी नाविक मा हुआन (1403 ई.पू.) यहां आया था उसने इस शहर का वर्णन व्यापार के एक विशाल केन्द्र के रूप में किया है जहां पूरी दुनिया से व्यापार आया करते थे।

कोझिकोड सांस्कृतिक विरासत की एक वास्तविक स्थली है जो भारतीय सभ्यता की अनूठी विशेषता है।

कोझिकोड की सांस्कृतिक विविधता इसकी समृद्ध संगीत परंपराओं में परिलक्षित होती है जो त्यागराज परंपरा, गजल तथा हिन्दुस्तानी संगीत को जोड़ती है। कोझिकोड के स्वर्गीय फिल्म निदेशक और पार्श्व गायक एम.एस. बाबूराज गजल और हिन्दुस्तानी संगीत से प्रभावित थे।

कोलीकट विश्वविद्यालय विशेष रूप से इस सांस्कृतिक प्रभाव का एक गुंजायमान उदाहरण है।

अनेक प्रसिद्ध हिंदू विद्वान जैसे मेलपरहुर नारायण भर्तृहरि जिन्होंने संस्कृत में नारायणीयम की रचना की थी, पूनथमन नम्बूदिरी और थनचर्थु रामानुजन एजुथाचम मल्लापुरम से आए थे। प्राचीन केरल स्कूल ऑफ एस्ट्रोनॉमी एंड मैथेमेटिक्स, जो मुख्यत: केरल में स्थित था, मल्लापुरम से आने वाले नम्बूदिरी और नायर विद्वानों से परिपूर्ण था। आज इस जिले में थिरुनाबया जो वेदिक शिक्षा का श्रेण्य मध्यकालीन केन्द्र है, और कोट्टकल भी हैं जो आयुर्वेद औषधि का घर है।

सत्तर के दशक के दौरान प्रशा खाड़ी का तेल भंडार वाणिज्यिक उत्कर्षण के लिए खोला गया तथा हजारों अकुशल श्रमिक खाड़ी देशों को प्रवास कर गए। उन्होंने अपने घरों के लिए धनराशि प्रेषित की जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहयोग मिला और आज इस क्षेत्र में प्रथम सतरीय विश्व स्वास्थ्य मानक तथा लगभग-सार्वभौमिक साक्षरता विद्यमान है।

3. हितोपदेश, 1.3.71:
'अयामनिजाह परोवेतिगना नालाघुचेत्सम
उदारा चरितानामातु वसुधैव कुटुम्बकम'


"ये मेरे अपने हैं और ये अपरिचित हैं - ऐसा आकलन संकीर्ण मानसिकता वाले करते हैं। उदार हृदय वालों के लिए तो संपूर्ण विश्व एक परिवार की भांति है।"

अह्म ब्रह्मास्मि, बृहदरोन्याका उपनिषद
तत् त्वम असि , चंडोग्याल उपनिषद

एकम सत्य विप्र बहुदा वदंती

सर्वेशम स्वस्ति भवतु, सर्वेशम शांति भवतु
सर्वेशम पुरनाम भवतु, सवेशय मंगलम भवंतु.

इस प्रकार के महाकाब्य पारंपरिक और प्राचीन भारतीय बौद्धिकता, प्रेरणा और सभ्यात्मक प्रणाली के स्रोत हैं तथा यह भारतीय लोकाचार के आधार का वर्णन करते हैं, जो न केवल हमारी वैयक्तिक आस्थाओं को प्रशासित करता है बल्कि पारिस्थितिक प्रणाली के भीतर और उसके बिना हमारे संपर्कों का भी मार्गदर्शन करता है।

जब उपनिषदों ने भारत और विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा प्रदान की थी, तो स्वामी विवेकानंद ने 1893 को शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में 'एकम सत व्रिप बहुदा वदंति' का संदेश दिया था, तथा यह संदेश राजनीतिक विपथनों के सामंजस्य से परे विश्व की एकता अथवा वैश्विक सांस्कृतिक स्थल से संबंधित था जिसमें स्पष्ट रूप से भारत की ओर से शांति और एकता के संदेश को प्रतिबिंबित किया गया था।

यह स्पष्ट है कि सांस्कृतिक राजनयिकता भारत के लिए नई बात नहीं है। वस्तुत: इसके लिए बेहतर पदबंध सभ्यात्मक वार्तालाप होगा, जहां मानवीय संवेदनाओं की सामान्यता में आस्था राजनीतिक और आर्थिक विपथनों पर भारी पड़ती है।

सांस्कृति राजनयिकता अन्य राष्ट्रों को समृद्ध बनाने वाली भारतीय सामान्यता के विरुद्ध कार्य करने वाली उप-राष्ट्रीय विभाजनकारी ताकतों अथवा राष्ट्रीय लोकप्रियता के भ्रम में अवरोधकों के बिना राष्ट्रीय हित को संयोजित करने के लिए एक माध्यम है। ऐसे समाजों में जहां धार्मिक कट्टरवाद लोगों के मन-मस्तिष्क पर गहरी पैठ बना लेता है, धार्मिक रूप से उत्प्रेरित आंदोलनों द्वारा भारतीय सिनेमाघरों पर हमले अथवा फिजी या यूगांडा में भारतीय समुदाय द्वारा सामना की जाने वाली समस्याएं वहां भारतीय लोगों के राजनीतिक प्रभाव और उनकी आर्थिक सफलता द्वारा कारित की गई है। भारतीय प्रभाव की साफ्ट पावर उन मामलों में भारतीय लोगों को सुरक्षित बनाने में असफल रही जिसने हमें विभिन्न समुदायों के मध्य सांस्कृतिक वार्तालापों की आवश्यकता के बारे में जागरूक बनाया। अत: तर्क सांस्कृतिक एकीकरण के लिए समझ और वार्तालाप को प्रोत्साहित करने तथा नृजातीय पहचानों के संकीर्ण प्रदर्शन को दूर करने के लिए साफ्ट पावर के प्रयोग की हिमायत करने पर दिया जाना चाहिए।

'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना में सांस्कृतिक राजनयिकता वैश्विक सद्भावना के संदर्भ में 'हम' का वर्णन करती है। 'अहम् ब्रह्मास्मी तत त्वम असि' हमें दूसरों के बारे में जानना व सिखाता है जैसे मैं आपके विषय में सोचना हूं इसी प्रकार अन्य भी मेरे बारे में सोचते हैं और इस प्रकार यह विशिष्टता आगे बढ़ती है जो प्रतिस्पर्धा और परिणामत: कर्षण उत्पन्न करती है। यह सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व की हिमायत करती है, न कि वैमनस्यपूर्ण प्रतिस्पर्धा की। 'सर्वेशम स्वस्ति भवतु' प्रत्येक मानव के कल्याण का आह्वान करता है।

अत: मै सांस्कृतिक राजनयिकता को विश्व के लिए भारत का सभ्यात्मक उपहार के रूप में वर्णित करूंगा जैसे हमने शून्य अथवा अनंत की अवधारणा प्रदान की है। इस श्लोक से अधिक सुंदर शून्य अथवा अनंत का वर्णन किसी ने भी नहीं किया है, "पूर्णामिदम पूर्णामदा, पूर्णात्पूर्णाम उदाचयते, पूर्णस्य पूर्णामाद्य, पुतपर्णमेवल वशीष्ठयेत"।

हाल के समय में, सांस्कृतिक राजनयिकता भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गई है जिसका मुख्य कारण हमारे सांस्कृतिक मूल्य हैं।

भारत अपनी पांच सहस्राब्दि से भी प्राचीन सभ्यता के साथ अपने सभ्यात्मक व्यवहार की रणनीतिपूर्ण संस्कृति विकसित करने तथा समाजों के भीतर और समाजों के मध्य विभेद के प्रभावों को दूर करने के लिए संस्कृति के प्रयोग को विकसित करने में भाग्यशाली रहा है। महाभारत रणनीति की संस्कृति का ज्वलंत उदाहरण है जिसमें सत्ता और भू-भाग के लिए किए गए विशिष्ट प्रयास के फलस्वरूप एक ऐसे समाज का सृजन हुआ जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्रत्येक कृत्य को स्वयं उस व्यक्ति द्वारा विनिर्धारित उद्देश्यों के आधार पर ही वर्णित किए जाने की आवश्‍यकता थी। कुछ व्यक्तियों की निंदा की गई क्योंकि उनके उद्देश्यों को सीमित स्वार्थी लाभ पर केन्द्रित देखा गया जबकि अन्य जैसे पांडवों ने अपने उद्देश्यों को समाज की भलाई के वृहद् ढांचे में ढाला। गीता सहित संपूर्ण महाभारत किसी समूह की प्रगति अथवा व्यक्तियों के विकास के दृष्टिकोण को परिभाषित करने का उत्कृष्ट उदाहरण है। मेरी प्रेरणा का स्रोत 'भगवतगीता' ईश्वर के प्रति आस्था की एक पुस्तक मात्र ही नहीं है, बल्कि यह समाज में व्यक्तियों की भूमिका का अंतर्वेशी और स्पष्ट वर्णन भी है जिसमें व्यक्तियों अथवा समाज की भलाई के लिए समस्त संवेदनाओं अथवा भावनाओं का समावेश भी है।

दूसरी ओर संस्कृति का अध्ययन इसके संपूर्ण प्रारंभिक वैदिक साहित्य के दौरान भारतीय दर्शन का मार्गदर्शी अवयव रहा है तथा इसका प्रयोग भारतीय इतिहास की कम-से-कम तीन सहस्राब्दियों में लाभ के लिए ही किया गया है जैसा कि 2500 वर्ष पूर्व भारत में यूनानी उत्लेखों से स्पष्ट होता है, इस्लामिक वास्तुकला और विचारों का समामेलन न केवल भारतीय संस्कृति के दृश्यमान रूपों में विद्यमान है बल्कि इसकी राष्ट्रीय चेतना में भी निहित है, और यह भावना भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच धार्मिक, वास्तुकला और सांस्कृतिक प्रभावों के प्रसार से पूर्व भी विद्यमान थी। सिल्क रूट, जिसके माध्यम से न केवल लोगों बल्कि सामान की भी आवाजाही की गई, तथा साथ ही जो मध्य एशिया, भारत और चीन के बीच बौद्ध धर्म सहित सभ्यात्मक विचारों के प्रवाह के लिए माध्यम बन गया, पर्याप्त रूप से भिन्न समाजों को मानव उत्थान के केन्द्रों के रूप में साथ लाने के लिए संस्कृति की रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण बन गया है। वस्तुत: प्राचीन सिल्क रूट हमारे उत्तर और पश्चिम तक फैले शांतिपूर्ण, स्थिर और सौहार्दपूर्ण क्षेत्र की प्राप्ति करने में भारतीय सांस्कृतिक राजनयिकता की विजय का प्रतीक है जो भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और नवाचारों से गहनता के साथ प्रभावित हुआ और जिसने क्षेत्र में भारतीय उपस्थिति को पुन: स्थापित किया। विभिन्न अवसरों पर सहयोजित की जाने वाली अनेक पहचानों को आमेलित करने की अपनी अंतर्वेशी परंपराओं और क्षमता के साथ भारतीय संस्कृति ने एक सभ्यात्मक विशिष्टता हासिल की है जो बहु-सांस्कृतिक और बहु-नृजातीय है, लेकिन फिर भी यह विशिष्ट भारतीय है। आज हमारा सांस्कृतिक परिवेश न तो वैदिक है, न इस्लामिक और न ही ईसाई। यह आर्यन अथवा अन्य भी नहीं है। प्रत्येक और हर वस्तु जो कभी भी भारत में लाई गई है, पुन: उपमहाद्वीप के अस्पष्ट वर्णित आकार की भांति, अपनी मूल पहचान खोए बिना भारतीयता का भाग बन कर रह गई है।

यह हमारे अपने सांस्कृतिक लचीलेपन और अंतर्वेशिता का ही परिणाम है कि जो भी भारतीय है, वह अपनी मूल पहचान धारण करता है तथा साथ ही वह विशाल भारतीय परंपरा में समाहित हो जाता है। आधुनिक पश्चिमी सीमाएं जो समाजों को विभाजित करती हैं, भारत की पारंपरिक सोच का भाग नहीं है। अत: सभ्यात्मक वार्तालाप की हमारी परिकल्पना इस आधार पर विभिन्न पहचानों द्वारा सृजित व्यवधानों को समाप्त करने का उपयोगी साधन बन गई है कि सांस्कृतिक पहचान अकेले सभ्यात्मक पहचान को परिभाषित नहीं कर सकती है। सांस्कृतिक अंतर्वेशिता वैश्विक वार्तालाप का केन्द्र बननी चाहिए ताकि विभिन्न पहचानें अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को बाधित न करें बल्कि एक-दूसरे के साथ संपर्क बनाएं और एक गैर-अंतर्वेशी और गैर-प्रतिस्पर्धी तरीके से वार्तालाप को प्रोत्साहित करने के सामान्य विचार को एकीकृत करें ताकि एक सक्रिय रूप से जुड़े वैश्विक विश्व में विद्यमान त्रुटिपूर्ण व्यवस्था का रूपांतरण सुनिश्चित किया जा सके और समूचे विश्‍व को एक परिवार मानने का विचार वैश्विक ताकतों को संचालित करे। केवल तभी वार्तालाप की विवादों पर विजय होगी तथा राष्ट्र एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाते हुए सहयोग करेंगे। विभिन्न पृथक स्थानों के लिए प्रश्न करने तथा परस्पर प्रतिस्पर्धा करने के स्थान पर समझ, समायोजन और सहिष्णुता ही ऐसे विश्व के लिए आधारशिला बन जाएगी।

विदेश में प्रदर्शनों और समारोहों का आयोजन करने का विचार, जैसे आईसीसीआर द्वारा किया जाता है, न केवल भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करने पर आधारित है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विचारों और स्थानीय संस्कृतियों के बीच संपर्क को भी प्रोत्साहित करने पर आधारित है। इसी प्रकार, विदेशों में स्थित भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र न केवल भारतीय संस्कृति के निक्षेपागार हैं बल्कि ये ऐसे स्थान भी हैं जहां भारतीय सांस्कृतिक अवयव तथा मेजबान देशों के सृजनात्मक युवाओं को साथ आने का मौका मिलता है जिससे भारत और मेजबान देश के समाजों के गैर-सांस्कृतिक और गैर-प्रतिस्पर्धी वर्गों के बीच सहक्रियात्मक वार्तालाप का एक वास्तविक परिवेश तैयार होता है। किसी आदर्श सांस्कृतिक केन्द्र में स्थानीय लोगों के लिए आगे आने तथा न केवल भारतीय विषयों पर वरन् उनके हित के विषयों पर व्याख्यान संगोष्ठियां और कार्यशालाएं आयोजित करने के लिए अवसर उपलब्ध होता है। ये केन्द्र भारतीय और स्थानीय सृजनात्मक मस्तिष्कों के मध्य संपर्कों की व्यवस्था करते हैं। ये केन्द्र न केवल भारत के बल्कि स्थानीय चित्रकारों के लिए भी चित्रकारी प्रदर्शनियों का आयोजन करते हैं।

उन आदर्श तरीकों, जिनसे ऐसी वार्ताएं सतत् संचालित की जा सकती हैं, में केवल प्रदर्शन कलाएं ही शामिल नहीं है, बल्कि इनमें शिक्षा और विद्वतजनों को प्रोत्साहन प्रदान करना भी सम्मिलित है। विदेशी विश्वविद्यालयों में भारतीय चेयर केवल विदेश छात्र समुदाय को भारत से संबंधित कार्यक्रम पढ़ाने के लिए किसी भारतीय प्रोफेसर की नियुक्ति करना ही नहीं है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह भारतीय विद्वानों तथा विदेशी शिक्षण समुदाय के बीच भारत संबंधी संपर्कों और शोध सहयोग का केन्द्र है।

विभिन्न संस्कृतियों के बीच वार्तालाप को प्रोत्साहित करने का एक अन्य तरीका सम्मेलनों का आयोजन करना है। इसके लिए चुने गए विषय ऐसे होते हैं जो भारत और उस देश को ऐतिहासिक रूप से जोड़ते हैं; इसके लिए चुने गए छात्र न केवल मेजबान देश और भारत के होते हैं बल्कि मेजबान देश के पड़ोसी देशों के भी होते हैं ताकि वार्तालाप को द्विपक्षीय न होकर प्रादेशिक स्तर पर भी विस्तारित किया जा सके। उदाहरण के लिए, जब मैं महानिदेशक, आईसीसीआर था, तो मैंने वर्ष 2010 में आईसीसीआर की 60वीं वर्षगांठ को मनाने के लिए वैश्वीकरण और संस्कृति को सर्वाधिक आकर्षक विषयों में रूप में पाया था। हमने दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्धधर्म और टैगोर पर सम्मेलनों का आयोजन किया। हमने अमेरिका और मध्य एशिया में सूफीवाद पर सम्मेलन का आयोजन किया तथा फ्रांस के साथ सांस्कृतिक उदारवाद पर सम्मेलन आयोजित किया।

संयुक्त शोध कार्यक्रम एक अधिक गहन शैक्षिक और सांस्कृतिक स्तर पर सामान्य समझ को प्रोत्साहित करने का एक अन्य मंच है। इसका एक उदाहरण आईसीसी-एशिया परियोजना है जिसका निर्देशन प्रख्यात विद्वान डा. कपिला वास्त्यायन द्वारा किया गया है।

भारतीय सांस्कृतिक राजनयिकता की कतिपय सफलताओं में अंतर्राष्ट्रीय जैज़ समारोह का आयोजन, जिसका गठन मैंने 2011 में किया था, दिल्ली में भारतीय सूफी समारोह और कव्वाली का आयोजन किया जाना शामिल है। कश्मीरी बालिका समूह के विरुद्ध फतवा जारी होने के तत्काल उपरांत महिला ईरानी सूफी समूह के प्रदर्शन को मीडिया द्वारा व्यापक रूप से प्रचारित किया गया था ताकि धार्मिक कट्टरवाद की प्रक्रिया को चुनौती दी जा सके। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान के कव्वाली समूहों द्वारा मिलकर कव्वाली प्रदर्शन प्रस्तुत किया गया जिसमें मध्य में तुर्की के दरवेशी नृत्य कर रहे थे। मिलकर अल्लाहू गा रहे इन सभी समूहों को सुनना सांस्कृतिक राजनयिकता की एक अनूठी सफलता थी। मितुल सेन गुप्ता द्वारा निर्देशित 'दि स्वान लेक री विजिटेड' ने भारतीय सांस्कृतिक संगीत और एक विशिष्ट नृत्य चेकोव्स्की के साथ कथक, फ्लेमेंसो, रैप डांस और शास्त्रीय जैज, प्रस्तुत किया गया जहां नृत्य कलाएं और संगीत केवल उनके अपने स्थान तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि एक-दूसरे के साथ वार्तालापों में भी शामिल हो गया जिससे यह प्रदर्शित हुआ कि विभिन्न कलाएं परस्पर विलयित हो सकती है और साथ ही सांस्कृतिक विश्व में अपनी स्वयं की पहचान बना सकती हैं। रूकमिणी चटर्जी द्वारा प्रश्नोत्तरों ने यह दर्शाया कि ओडिसी के रुद्रों तथा नार्वे की काली धातु की गरजदार आवाज के बीच उत्कृष्ट संयोजन विद्यमान है। इन नृत्यों ने वस्तुत: ही विभिन्न समाजों के मध्य सीमाओं को समाप्त करने में सहायता प्रदान की।

इन समारोहों को प्रेरित करने के पीछे अनिवार्य विचार यह है कि सांस्कृतिक वार्ता के लिए न केवल भारतीय संस्कृति की भाषा अपेक्षित है बल्कि अन्य संस्कृतियों की भाषाओं की भी आवश्यकता है।

भारतीय सांस्कृतिक राजनयिकता की कतिपय सर्वाधिक उल्लेखनीय सफलताएं वर्ष 2012 में भारत-आसियान शिखर-सम्मेलन के संदर्भ में रही है। पटना में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सभ्यात्मक संबंधों पर संगोष्ठी के आयोजन ने ऐतिहासिक संबंध स्थापित किए जो अब संभवत: एक दीर्घकालिक परियोजना का मार्ग प्रशस्त करेंगे जिससे न केवल इन संबंधों का एक व्यापक और साकल्यवादी तरीके से मापन किया जा सकेगा बल्कि यह भी पता लगाया जा सकेगा कि ये संबंध भविष्य में किस दिशा में जा सकते हैं। भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच पुरातत्वीय संबंधों के प्रदर्शन ने प्रलेखीकरण के विपुल भंडार को प्रदर्शित किया जिसे पिछले 200 वर्षों में भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को एक-दूसरे के निकट किया है। सियाम रीप में एमजीसी वस्त्र संग्रहालय केवल एक भारतीय प्रदर्शनी ही नहीं थी बल्कि इसने पुन: उन सामान्यताओं को उजागर किया जो भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की वस्त्र परंपराओं में विद्यमान हैं। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच प्रदर्शनकारी कला परंपराओं की समानताओं पर निर्मित नृत्यकला अत्यंत सफल रही थी न केवल इसलिए क्योंकि इसने भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई संस्कृतियों के बीच वस्तुत: वार्तालाप सृजित किया था बल्कि इसलिए भी कि इसने उन देशों में भारत की संस्कृतियों के बीच सीमाएं समाप्त कर दी थीं। एक अन्य देश के साथ तत्काल ही तुलनाएं की गई जिसनसे उनकी स्वयं की संस्कृति की प्रधानता को प्रदर्शित किया गया।

इसके साथ-साथ हमें विशिष्ट पारंपरिक स्वरूपों में सांस्कृतिक राजनयिकता को स्थापित करने की गलती नहीं करनी चाहिए। मानव सभ्यता सुरक्षित नहीं है। मानव जाति के उद्भव और त्वरित प्रौद्योगिकीय क्रांति के साथ ही नए विचार तथा नई संरचनाएं स्थापित हो जाती हैं। रोबोटिक्स, एआई, साइबर सभी आज एक ऐसी वास्तविकता बन गए हैं मानो वे हमारी कल की पौराणिक परिकल्पनाओं के भाग हों। हमें आज के सांस्कृतिक वार्तालाप में अभिव्यक्ति तलाशने की आवश्यकता है। युवा आज के विचार-विमर्श में मात्र प्रतिभागी नहीं हैं। वे इस प्रक्रिया के प्रारंभकर्ता और सृजक हैं। वे चाहते हैं कि लोकप्रिय संस्कृति इस शाश्वत और निरंतर रूपांतरित होती सांस्कृतिक वार्ता का भाग होनी चाहिए। आज हमारे राजदूत केवल विदेश सेवा के अधिकारी नहीं है। परंतु वे सभी द्वितीय और प्रबंध वृत्तिकों, वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों और विभिन्न क्षेत्रों में सर्जकों के रूप में भारतीय वैश्विक स्वरूप बनकर उभरे हैं। योग पश्चिम और बालीवुड की एक नई परंपरा है जो समूचे विश्व में भारतीयवाद को प्रचारित करती है।

सांस्कृतिक राजनयिकता अथवा सभ्यात्मक वार्तालाप का लाभ केवल यह नहीं है कि यह एक अन्य स्थान का सृजन करता है जहां दो भिन्न राष्ट्रों के बीच गैर-वैमनस्य और गैर-अंतर्वेधी तरीके से वार्तालाप संचालित किया जा सके परंतु यह भी है कि यह प्रभावी लोकमत सृजित करता है जो विदेश नीति को तैयार करने के निरंतर महत्वपूर्ण होते जा रहे अवयव के रूप में उभर रहा है।

मैंने सांस्कृतिक राजनयिकता को सभ्यताओं के मध्य वार्तालाप अथवा विविध मूल्यों के समागम के रूप में वर्णित किया है। ब्रांड मान्यता आधुनिक संदर्भ में इस वार्ता में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है।

अत: इस वार्तालाप में एक गुंजायमान सकारात्मक और शक्तिशाली भारतीय ब्रांड को पक्षकार बनाने के लिए निर्मित करना अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। ऐसे अनेक महत्वपूर्ण कारक हैं जिन्होंने इस भारतीय ब्रांड के लिए योगदान किया है और मैं इसका वर्णन विभिन्न क्षेत्रों जैसे रणनीतिक, राजनीतिक आर्थिक आदि में हमारी ताकत को पुन: प्रवर्तित करने के लिए भारतीय सांस्कृतिक राजनयिकता की एक और सफलता के रूप में करूंगा।

अन्य कारकों में से कुछ का वर्णन नीचे किया गया है:

योग : 21 जून को मनाए गए विश्व योग दिवस ने उस ताकत का पर्याप्त प्रदर्शन किया जो योग ने भारत को समूचे विश्व में प्रमुख आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव वाले देशे के रूप में स्थापित करने के लिए हासिल कर ली है जिसके माध्यम से आधुनिक जीवन-शैली के दबावों का निवारण भी किया जा रहा है और इस प्रकार लोगों की मानसिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कुशलता के लिए एक विशिष्ट संसाधन उपलब्ध कराया जा रहा है। यह भारत को विश्व में एक शक्तिशाली आध्यात्मिक गुरु बनाने में सहयोग देगा। विश्व योग दिवस पर प्रधानमंत्री ने योग का वर्णन विश्व सौहार्द, शांति और खुशहाली के लिए मंत्र के रूप में किया है।

युवा : भारतीय युवाओं ने प्रौद्योगिकी के जानकारों, समस्या निवारकों और मेहनती कार्यबल के रूप में वैश्विक मान्यता हासिल कर ली है। इस प्रकार वे विश्व में किसी भी आर्थिक प्रणाली के लिए अत्यंत उपयोगी बन गए हैं। भारतीय युवा सुदृढ़ भारतीय ब्रांड का एक अन्य अभिन्न भाग बन गए हैं।

भारतीय फिल्में और सौंदर्य : सामाजिक मूल्यों पर आधारित मनोरंजन तथा विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं जैसे मिस वर्ल्ड, मिस यूनीवर्स, ऑस्कर आदि के माध्यम से रोमांच पैदा करते हुए वे अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य का भाग बन गए हैं।

क्रिकेट : आईपीएल तथा विश्व क्रिकेट कप की लोकप्रियता इसकी ब्रांड वैल्यू का स्पष्ट उदाहरण है।

विवाह : मुझे उदाहरण देने की कोई आवश्यकता नहीं है परंतु पिछले कुछ माहों के दौरान विभिन्न प्रख्यात भारतीय विवाहों पर व्यापक प्रेस कवरेज मेरे इस बिंदु का वर्णन करती है।

हमें इन 'ब्रांड ताकतों' पर आगे बढ़ने की आवश्यकता है ताकि ये भारत को आने वाले वर्षों में शीर्ष आर्थिक और राजनीतिक शक्ति बनाने के हमारे प्रयासों में सहायता प्रदान कर सकें।

निष्कर्ष के तौर पर, यह स्मरण रखना बेहतर होगा कि सॉफ्ट पावर सभ्यात्मक वार्तालाप को सहायता प्रदान करती है तथा सभ्यात्मक वार्तालाप अथवा सांस्कृतिक राजनयिकता हमारी पारंपरिक राजनयिकता की सफलता के लिए एक बड़ा मंच निर्मित कर सकती है। इसके साथ-साथ सावधानी बरते जाने की भी आवश्यकता है क्‍योंकि यह प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय हितों के लिए की जाने वाली कड़ी वार्ताओं का स्थान नहीं ले सकती है।

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