विशिष्ट व्याख्यान विशिष्ट व्याख्यान

भारत में आर्थिक कूटनीति का महत्व

  • Distinguished Lectures Detail

    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) दीपा गोपालन वाधवा
    Venue: भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), बोधगया
    Date: जून 18, 2019

विदेश मंत्रालय की विशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत आईआईएम, बोधगया के छात्रों और संकाय को संबोधित करना मेरे लिए सम्मान की बात है। मैं युवा, प्रतिभावान दर्शकों के समक्ष हूँ जो अपनी बुद्धिमत्ता, कड़ी मेहनत और अपने जीवन के आख्यानों को बदलने की आकांक्षाओं के बल पर यहाँ हैं और हमारा राष्ट्र भी इसी प्रक्रिया में है। मैंने सोचा कि मैं अपने पेशेवर अनुभव के क्षेत्र के एक विषय के बारे में बात करूंगी, जो भविष्य में आप जो कर सकते हैं उसके लिए प्रासंगिक होगा।

आज की दुनिया में संचार प्रौद्योगिकी के विस्फोट के साथ, जहाँ सूचना वस्तुतः किसी की अंगुली की पोर पर उपलब्ध है, आप सभी को भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की प्रमुख बातों के बारे में पता होना चाहिए, जैसे कि 30 मई को प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक देशों के नेताओं की उपस्थिति या अपना पद संभालने के तुरंत बाद उनकी मालदीव और श्रीलंका की यात्रा, या एससीओ शिखर सम्मेलन में उनकी भागीदारी, जहाँ उन्होंने आतंकवाद के वैश्विक खतरे के बारे में स्पष्ट रूप से बात की और चीन और रूस के राष्ट्रपतियों जैसे नेताओं से भेंट की। अधिकांश लोग, विदेश नीति और कूटनीति को, जो विदेश नीति का साधन है, उन्हें मुख्य रूप से राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों के संदर्भ में देखते हैं।

इसके बारे में भी कुछ अस्पष्टता है कि विदेश मंत्रालय और विदेश में स्थित इसके राजनयिक कार्यालयों की क्या भूमिका है और पासपोर्ट और वीजा जारी करने के दृश्यमान कांसुलर कार्यों और हाई प्रोफाइल विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की यात्राओं से संबंधित प्रोटोकॉल के अलावा भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों के कार्य और दायित्व क्या हैं। इसलिए मैंने सोचा कि मैं आपसे बात करने के इस अवसर का उपयोग विदेशी संबंधों के अपेक्षाकृत कम ज्ञात पहलू- आर्थिक कूटनीति के बारे में बोलने और इसे दिलचस्प बनाने के लिए करूँगी, मैं इसे जापान और भारत के संबंधों के संदर्भ में उदाहरण के साथ प्रस्तुत करूँगी, क्योंकि मुझे 2012 से 2015 तक जापान में भारतीय राजदूत के रूप में सेवा करने का सौभाग्य मिला।

मुझे अनुमति दें कि पहले मैं आर्थिक कूटनीति के गठन के संबंध में विस्तार से बताऊँ। एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से, कई सहस्राब्दियों से चल रहे व्यापार और वाणिज्यिक आदान-प्रदान को विनियमित और सुविधान्वित करना आवश्यक है, जो राजनयिक मिशनों के अग्रणी स्थापना के लिए प्राथमिक आवेग थे, जिनके द्वारा स्थानीय अधिकारियों की अनुमति के साथ और निश्चित रूप से, अपने व्यापारियों और व्यापारिक हितों का समर्थन करने के लिए विदेशी धरती पर किसी राज्य की स्थायी उपस्थिति की स्थापना की गई थी। उपनिवेशवाद के इतिहास में भी, यह कहा गया है कि ध्वज ने व्यापार का अनुसरण किया। इस प्रकार, अतीत में आर्थिक संबंध और उनके परिणामस्वरूप आर्थिक कूटनीति, कई मामलों में, दो देशों के बीच के राजनीतिक संबंधों के अग्रदूत थे। वहाँ से यह विश्वास पनपा कि अच्छे राजनीतिक संबंधों से आर्थिक क्षेत्रों में निकट सहयोग होगा और इसक एक स्वाभाविक परिणाम कि राजनीतिक रिक्तता में आर्थिक सहयोग इष्टतम रूप से विकसित नहीं हो सकता। इस स्पष्ट सहजीवन का एक अन्य पक्ष यह है कि मजबूत आर्थिक संबंधों का राजनीतिक संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है, जैसा कि आज बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) की भौगोलिक पहुंच और साझेदारी को व्यापक बनाने में चीन की सफलता में देखा जा सकता है, जहाँ वह अपने आर्थिक संबंधों के राजनीतिक और रणनीतिक लाभ प्राप्त कर रहा है।

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के अंतर्संबंधों और सरकारों की इस समझ के साथ कि उन्हें विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने के लिए उद्योग और नागरिक समाज के साथ मिलकर काम करना होगा और राष्ट्रीय आर्थिक लाभ प्राप्त करना होगा, आर्थिक कूटनीति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के बाद की दुनिया में अत्यधिक प्रमुखता प्राप्त कर ली है। विदेश मंत्रालय के एक दस्तावेज़ में कहा गया है कि भारत की विदेश नीति का प्राथमिक उद्देश्य "शांतिपूर्ण और स्थिर बाहरी वातावरण को बढ़ावा देना और बनाए रखना है जिससे समावेशी आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के घरेलू कार्यों में तेजी से प्रगति हो सकें"। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हमारी विदेश नीति का लक्ष्य हमारे नागरिकों का आर्थिक सशक्तिकरण है और आगे यह आंतरिक रूप से बाहर की दुनिया से जुड़ा हुआ है क्योंकि हम संसाधनों, बाजारों और प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहते हैं, भोजन और ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करते हैं, और अपने नागरिकों के लिए रोजगार और कौशल सुनिश्चित करते हैं। अतएव, हमारी विदेश नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आर्थिक कूटनीति एक महत्वपूर्ण साधन है। परिणामस्वरूप, विदेशों में हमारे कई दूतावासों के लिए, हमारे आर्थिक हित मेजबान देश के साथ और हमारे संबंधों के प्रमुख प्रस्तावक बन गए हैं।

आर्थिक कूटनीति के कई आयाम हैं। अतीत में, विशेष रूप से विकसित दुनिया में, आर्थिक कूटनीति व्यापार कूटनीति का पर्याय हुआ करती थी, क्योंकि देश अपने निर्मित सामानों के लिए आक्रामक रूप से बाजार की मांग कर रहे थे। आज, आर्थिक कूटनीति की परिभाषा बहुत व्यापक है। इसमें प्राथमिक वस्तुओं के हमारे निर्यात को बढ़ावा देना (जैसे कि जब हमारे पास अतिरिक्त खाद्यान्न हो), आईटी और आईटी सक्षम सेवाओं जैसी विनिर्मित वस्तुओं और सेवाओं को स्थापित बाजारों में पहुंचाना, साथ ही हमारे बाजारों के विविधीकरण की तलाश करना; विदेशी सरकारों के साथ समझौतों और अधिग्रहण, जैसे कि नए तेल क्षेत्रों में निवेश के माध्यम से खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना; प्रौद्योगिकियों और कच्चे माल तक पहुंच बनाना, जो हमारे औद्योगिक विकास या बढ़ती कृषि उत्पादकता के लिए आवश्यक हैं; विश्व स्तरीय बुनियादी ढाँचे और लॉजिस्टिक नेटवर्क के विकास और 'मेक इन इंडिया' के लक्ष्यों को साकार करने पर ध्यान केंद्रित करने के साथ एफडीआई और विकास सहयोग दोनों परियोजनाओं में विदेशी निवेश को आकर्षित करना, जिसका उद्देश्य भारत को एक विनिर्माण केंद्र और क्षेत्रीय औरवैश्विक मूल्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना है; विदेशों में भारतीय कंपनियों द्वारा अधिक से अधिक ईपीसी परियोजनाओं को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना जो मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका में बढ़ती हुई प्रवृत्ति है; मेजबान कंपनियों और अधिकारियों के साथ विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियों का समर्थन करना; भारत में पर्यटन बढ़ाने के लिए काम करना और साझेदार देशों में विकास सहयोग परियोजनाओं को वितरित करने के लिए उनकी पहचान करना, योजना बनाना और काम करना आदि शामिल हैं। यह भारत की विदेश नीति का अंतिम उल्लिखित पहलू और हमारी आर्थिक कूटनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है। मुख्य रूप से उदार ऋण के रूप में बाहरी सहायता प्राप्त करने के बावजूद, भारत निर्यात ऋण, ऋण और अनुदान के माध्यम से एक दाता के रूप में उभरा है, जो इसके बदले में भारतीय कंपनियों के लिए व्यापार, सेवाओं और निवेश के अवसरों का लाभ प्रदान करता है। इसके अलावा, आर्थिक कूटनीति एफटीए के रूप में द्विपक्षीय संदर्भ में और साथ ही ईसीईपी और डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय और बहुमुखी शासनों में माल और सेवाओं में अनुकूल विनियामक वातावरण और व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी और श्रम के प्रवाह आदि पर बातचीत करने के लिए बाध्य करती है।

आपको आश्चर्य होना चाहिए कि इस बहुत विस्तृत सीमा में, उद्योग, निर्यात संवर्धन निकाय, वाणिज्य मंडल, व्यापार और निवेश से संबंधित मामलों के विशेषज्ञ और सरकार के विषय विशिष्ट मंत्रालयों जैसे कई प्रमुख कार्यकर्ता हैं, जो विदेश मंत्रालय और विदेश में हमारे राजनयिक कार्यालयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विदेश मंत्रालय के पास संरचनात्मक रूप से कई विभाग, या प्रभाग हैं, जो आर्थिक कूटनीति के विभिन्न पहलुओं के लिए समर्पित है, यहाँ तक कि आर्थिक संबंध विशिष्ट देशों और भौगोलिक क्षेत्रों से निपटने वाले सभी क्षेत्रीय प्रभागों द्वारा संभाला जाने वाला एक सामान्य विषय है। विदेश मंत्रालय का आर्थिक प्रभाग एक एकल बिंदु चाहता है जहाँ कोई भी भारत की अर्थव्यवस्था, सांख्यिकीय डेटा, नीतियों, कार्यक्रमों, कानूनों, विनियमों, प्रक्रियाओं आदि के किसी भी पहलू पर जानकारी मांग सकता है। इसके अलावा, हमारे बहुपक्षीय आर्थिक संबंधों के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि विश्व व्यापार संगठन और व्यापार से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के अन्य निकायों में हमारे हितों के साथ-साथ हमारे आर्थिक हितों की अनुरूपता के कारण बिम्सटेक, सार्क, आईओआरए जैसे अन्य समूहों के साथ व्यवहार स्थापित किए गए हैं। हाल ही में जोड़ा गया एक प्रभाग हमारे राज्यों के आर्थिक जुड़ाव को विदेशों से जोड़ता है, जो केंद्र से शक्तियों के विचलन के कारण आया है।

दूतावास और वाणिज्य दूतावास, सभी में बहु-आयामी आर्थिक संबंधों के साथ काम करने वाले अधिकारियों की समर्पित शाखा हैं, राजदूत स्वयं इनका समन्वय और बारीकी से देखरेख करते हैं। ये आर्थिक शाखाएं स्थानीय उद्योग, सरकारी विभागों और व्यापार निकायों के साथ मिलकर काम करती हैं और विदेश मंत्रालय के प्रासंगिक प्रभागों, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, वित्त, आईटी, कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, रेलवे जैसे संबंधित मंत्रालयों को अवसरों और चुनौतियों के बारे में जानकारी देती हैं। संगोष्ठियों, व्यापारिक बैठकों, व्यापार प्रतिनिधिमंडलों को साथ लाने, सभी संभावित चैनलों के माध्यम से सूचना प्रसारित करने जैसी प्रचार गतिविधियों और विदेशी वाणिज्यिक संस्थाओं के भारत से बातचीत करने के पहले बिंदु के रूप में सतर्क और उत्तरदायी होने के नाते जहाँ वे स्थित हैं उन देशों में भारत के ब्रांड को स्थापित करना दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों की बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। हमारे राजनयिक मिशन व्यापार वीजा जारी करने का कार्य भी करते हैं और जिस आसानी से यह किया जाता है वह भारत के साथ व्यापार करने में आसानी का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक संकेत है।

मैं अपने निकटतम संबंधों में से एक, जापान से संबंधित उदाहरणों के साथ आर्थिक कूटनीति के कामकाज का वर्णन करूंगी, जिसके साथ हमारी "विशेष सामरिक और वैश्विक साझेदारी" है। वर्ष 2000 से 27 अरब अमरीकी डॉलर के संचयी निवेश के साथ एफडीआई के तीसरे सबसे बड़े निवेशक और सबसे बड़े ओडीए साझेदार के रूप में उभरने वाले जापान के साथ आर्थिक जुड़ाव, साझेदारी का एक प्रमुख आयाम है, यह विशेष रूप से बुनियादी ढाँचे और परिवहन के प्रमुख क्षेत्रों में परिवर्तनकारी परियोजनाओं का समर्थन करता है। व्यापारिक मोर्चे पर, भारत और जापान ने 2011 में एक मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की, जिसे व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता, सीईपीए कहा गया। यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश को उत्प्रेरित करने वाला था। हालाँकि, 2017-18 में लगभग 15.7 अरब अमरीकी डॉलर का व्यापार क्षमता से बहुत कम है और हमारी आर्थिक कूटनीति की कई चुनौतियों में से एक है। भारत में विकास के एक नये क्षेत्र में जापान की रुचि है, जापानी निजी इक्विटी और उद्यम पूंजी कोष द्वारा निवेश के साथ पारिस्थितिकी तंत्र शुरू हुआ है, जो 2015 के लगभग 2 अरब अमरीकी डॉलर से बढ़कर 2017 में 5.9 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया है। ई-कॉमर्स, ऑटोमोटिव, रियल एस्टेट, बायोटेक, ट्रांसपोर्ट, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी 2018 में सौदों की संख्या 32 हो गई है। सॉफ्ट बैंक के नेतृत्व में, जो ओला, पेटीएम और ओयो में भागीदारी के साथ भारतीय स्टार्टअप्स के सबसे बड़े निवेशकों में से एक है, अन्य जापानी वीसी और निवेश घरानों ने भी भारतीय स्टार्टअप में निवेश किया है। 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे के बीच शिखर सम्मेलन की बैठक में लिए गए एक फैसले के बाद, 2018 में बैंगलोर में एक भारत-जापान स्टार्टअप निवेश केंद्र की स्थापना की गई है।

जापान में स्थित भारतीय दूतावास आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए जापानी उद्योग के प्रमुखों, व्यापार मंडलों और प्रमुख सरकारी मंत्रालयों के साथ निकट संपर्क बनाए रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। इस प्रकार, टोक्यो में मेरे कार्यकाल के दौरान सॉफ्ट बैंक के सीईओ श्री मासायोशी सोन ने, 2014 में जापान की यात्रा पर गए प्रधानमंत्री मोदी से पहली बार भेंट की और सौर ऊर्जा परियोजनाओं के साथ भारत में मेगा निवेश परियोजनाओं में अपनी रुचि व्यक्त की। हमारे नेतृत्व के साथ उनकी बैठकों को सुविधाजनक बनाने के अलावा, दूतावास सूचना प्रदान करने, प्रतिनिधि यात्राओं का आयोजन करने और मुद्दों को हल करने में मदद करने के लिए एक महत्वपूर्ण वाहक था, क्योंकि वे हमेशा आते रहते थे। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, इस शुरुआती बैठक से, सॉफ्ट बैंक, भारत के क्षेत्रों के परिदृश्य के सबसे बड़े निवेशकों में से एक बन गया है।

एक अन्य उदाहरण में, मैंने पाया कि जापान में कपड़ा के सबसे बड़े खुदरा विक्रेताओं में से एक, एक प्रभावशाली वैश्विक पदचिह्न के साथ, अपने 80% से अधिक उत्पाद चीन से मंगाता है। मुझे कंपनी के स्व-निर्मित सीईओ के साथ, जिसे अब जापान के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक माना जाता है, बैठक की व्यवस्था करने और उन्हें भारत की ताकत के बारे में और यह समझाने में कि उन्हें भारत से आपूर्ति लेने के साथ-साथ हमारी युवा, शहरी जनसांख्यिकी की गति को देखते हुए खुदरा दुकानों में निवेश करने, दोनों के बारे में सोचना चाहिए, एक वर्ष का समय लग गया। प्रारंभिक बैठक में, जहाँ मुझे कुछ संदेह का सामना करना पड़ा, सीईओ ने कहा कि वे इस शर्त पर भारत आने पर विचार कर सकते हैं कि बैठकें निर्णय लेने के उच्चतम स्तर के साथ तय की जाएं ताकि लालफीताशाही के नुकसान से बचा जा सके और सरकार के समर्थन के प्रति आश्वस्त रहा जा सकेI मैं उनके लिए दिल्ली की यात्रा का आयोजन करने में सक्षम रही, इस यात्रा में वे प्रधानमंत्री से मिले और आज, लगभग 5 वर्ष बाद, मुझे यह देखकर खुशी है कि कंपनी भारत से केवल आपूर्ति ही नहीं ले रही है, बल्कि उसने हमारे परिधान निर्यातकों को जापान के उच्च सटीक मानकों तक उन्नत होने के लिए बाध्य किया है और जल्द ही हमारे राजधानी शहर में कंपनी का पहला खुदरा आउटलेट खुलेगा। आर्थिक कूटनीति के इस उपयोग के माध्यम से, हमने विदेशी निवेश प्राप्त करने में सक्षम होने के साथ-साथ मेक इन इंडिया के लक्ष्यों को भी पूरा किया और इस प्रक्रिया में, हमने विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए मानक भी प्राप्त किए। अतएव, आर्थिक कूटनीति में अवसरों की पहचान करना और वैश्विक कंपनियों के भारत में प्रवेश की सुविधा प्रदान करना शामिल है। निश्चित रूप से, इसके लिए विदेश मंत्रालय और अन्य संबंधित संस्थानों का सक्रिय समर्थन आवश्यक है।

व्यापार संवर्धन के क्षेत्र में भी, हमारे राजनयिक मिशन बहुत कुछ कर सकते हैं। वे भारत के निर्यात रुझानों और स्थानीय बाजारों की मांगों का व्यवस्थित विश्लेषण करते हैं। इस विश्लेषण में तीसरे देशों से आयात किए जाने वाले उन तुलनीय उत्पादों का अध्ययन, जिनकी भारतीय निर्यातक भी आपूर्ति कर सकते हैं, और प्रत्येक वस्तु की व्यापार संरचना की समझ, नियमों, मानकों, आयातों के लिए प्रासंगिक प्रक्रियाओं आदि का अध्ययन भी शामिल है। यह जानकारी भारत में उद्योग, निर्यात संवर्धन बोर्ड और बड़े निर्यातक घरानों के शीर्ष निकायों को दी जाती है। तत्पश्चात, दोनों पक्षों के व्यापार प्रतिनिधिमंडलों की यात्राओं की व्यवस्था की जाती है, महत्वपूर्ण व्यापार मेलों, बी-बी द्वारा आयोजित बैठकों में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और व्यापार संबंधी शिकायतों के उत्पन्न होने पर उन्हें सुलझाया जाता है।

समस्या के समाधान का एक उदाहरण मुझे याद है, वह हमारे जमे हुए झींगों में एथोक्सिक्विन नामक एंटीऑक्सिडेंट का उच्च स्तर होने के आधार पर 2012 में भारत से जापान जाने वाले झींगा निर्यात पर अचानक प्रतिबंध से संबंधित है। यह एक प्रमुख अवरोध था क्योंकि जापान एक महत्वपूर्ण बाजार था, जिसका निर्यात 300 मिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक था और स्वाभाविक रूप से इसका भारत में एक व्यापक प्रभाव था जो पूर्वी तट के झींगा किसानों तक पहुंच रहा था। दूतावास को दिल्ली में वाणिज्य मंत्रालय के समुद्री उत्पाद निर्यात विकास एजेंसी द्वारा जापान में संबंधित मंत्रालयों के साथ तत्काल हस्तक्षेप करने के लिए कहा गया था। यह अचानक प्रतिबंध अस्पष्ट आधार पर था क्योंकि स्वीकार्य एथोक्सीक्विन अवशेषों के स्तर को मनमाना तय किया गया था और वह स्वीकार्य अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुरूप नहीं था। तदनुसार, इस मामले को जोरदार और दृढ़ तरीके से उठाया गया और टोक्यो में मंत्रिस्तरीय स्तर के साथ-साथ व्यापारिक निकायों को भी अग्रेषित किया गया। हमारे प्रयासों का परिणाम तब मिला, जब कई महीनों के बाद प्रतिबंध में ढील दी गई और दोनों देश परस्पर सहमत मानकों और परीक्षण प्रक्रियाओं के लिए सहमत हुए। हमें बाद में एहसास हुआ कि यह वास्तव में भारत से बढ़ते निर्यात से चिंतित, घरेलू कंपनियों के दबाव के कारण शुरू की गई एक गैर-शुल्क बाधा थी। इस मुद्दे को हल करने में टोक्यो के दूतावास द्वारा निभाई गई भूमिका अमूल्य थी और हमारे सीटू में होने और उन प्रमुख लोगों को बैठक करने और उन्हें संवेदनशील बनाने से लाभ हुआ जो प्रतिबंध को पलट सकते थे।

भारतीय राज्यों और प्रशासक प्रांत कहे जाने वाले जापानी समकक्षों के बीच साझेदारी समझौतों की पहचान करना और बढ़ावा देना एक अन्य क्षेत्र था, जिसमें जापान में स्थित दूतावास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय राज्य अब विदेशी निवेश के लिए एक-दूसरे के साथ सक्रिय रूप से जुड़ते हैं, तथा विदेशी भागीदारों के साथ प्रतिस्पर्धी राज्यों द्वारा प्रस्तावित सर्वोत्तम शर्तों और सुविधाओं की मांग करते हैं। राज्य सरकारें मुख्यमंत्रियों के स्तर पर प्रायः प्रतिनिधिमंडल के साथ-साथ स्थानीय उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर बुनियादी ढांचा बनाने और उनके द्वारा स्थापित समर्पित औद्योगिक भागों में निवेश करने के लिए कंपनियों की तलाश करती हैं। चूंकि जापानी उद्योग, विशेष रूप से एसएमई जापान के आसपास फैले हैं और प्रशासक प्रांत भी विदेशों में निवेश को बढ़ावा देने और बाजारों की तलाश में लगे हैं, लेकिन भारत के कथित आकार और जटिलता के कारण संकोच करते हैं, इसलिए राज्य-प्रशासक प्रांत स्तर पर भागीदारी समझौते स्थापित करना ऐसी कंपनियों के लिए भारत में अवसरों का पता लगाने का एक आदर्श तरीका हो सकता है। साझेदार राज्य सरकारों द्वारा इसकी सुविधा प्रदान की जाती है। जापान में अपने प्रवास के दौरान हमने कई राज्य स्तरीय प्रतिनिधिमंडलो का स्वागत किया और 5-6 ऐसी साझेदारियाँ शुरू करने में सक्षम हुए जो अच्छी तरह से काम कर रही हैं। यहाँ भी मुख्य उद्देश्य विशुद्ध रूप से आर्थिक था।

मैं ऐसे कई उदाहरणों का हवाला दे सकती हूँ, जहाँ साझेदारी के लिए दूतावास द्वारा शुरू किए गए विचारों ने परिपक्वता के विचारों को बढ़ावा दिया और फिर सुविधादाता और समस्या का समाधान करने वाले दोनों के रूप में कार्य करते हुए उनकी निगरानी की। चूँकि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच वार्षिक शिखर बैठकें होती हैं, अतएव हम पर सहयोग के नए क्षेत्रों का पता लगाने और सुझाव देने के लिए लगातार दबाव था। मीथेन हाइड्रेट के विकास में सहयोग, जो ऊर्जा के एक नए स्रोत का पता देता है और भारत के चारों ओर समुद्र में पाया जाता है, तथा स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकियों और संयुक्त रूप से दुर्लभ मृदा के विकास के लिए सहयोग के साथ ये विज्ञान और प्रौद्योगिकी से संबंधित क्षेत्रों में भी विस्तारित हुए। भारत-जापान संबंधों के संदर्भ में, उच्च गति रेल के समझौते पर हस्ताक्षर करना, जो इन देशों के नेताओं का निर्णय था, लेकिन इसमें भारत में निवेश और कंपनियों की मात्रा बढ़ाने में विदेश मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी या दिल्ली मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर और औद्योगिक गलियारों के विकास के लिए जापानी प्रतिबद्धताएं आर्थिक कूटनीति के परिणामों के कई बड़े उदाहरण हैं। आर्थिक कूटनीति आज जापान और भारत के लिए द्विपक्षीय संरचना से आगे बढ़ चुकी है, यह अफ्रीका में आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने की मांग कर रही है, या दक्षिण पूर्व एशिया में संयुक्त रूप से कनेक्टिविटी परियोजनाएं विकसित कर रही है, जिनके रणनीतिक उद्देश्य भी हैं।

इसलिए, मैं यह कहकर समाप्त करूंगी कि मेरा मानना है कि आप में से कई एक दिन खुद को उन पदों पर पाएंगे जहाँ आपको देश के आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के लिए हमारी विदेश नीति की स्थापना के साथ मिलकर काम करने का अवसर मिलेगा। सबसे अधिक स्पष्ट है कि यदि आप में से कोई विदेश सेवा में शामिल होने का विकल्प चुनता है, तो इसमें काम करने के लिए कई विकल्प और क्षेत्र उपलब्ध हैं। लेकिन अगर आप कॉरपोरेट दुनिया में शामिल होते हैं या उद्यमी बनते है, तब भी इस वैश्वीकृत दुनिया में विदेशी एक्सपोजर के साथ काम के कई क्षेत्र होंगे, जहाँ आप विदेश में हमारे राजनयिक दूतावास या विदेश मंत्रालय के साथ काम कर सकते हैं। मैं आशा करती हूँ कि जब आप इस तरह के पद पर होंगे, तो आपको याद रहेगा कि आपके पास जो प्रौद्योगिकी, वित्त, क्षेत्र का ज्ञान और जानकारी है, सूचना का उपयोग खाई को पाटने और राष्ट्रीय हितों की सेवा के लिए किया जा सकता है।