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भारत की विदेश नीति: 2014-19: प्रमुख घटनाएँ, उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ

  • Distinguished Lectures Detail

    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) अचल मल्होत्रा
    Venue: राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय
    Date: जुलाई 22, 2019

माननीय उपकुलपति महोदय, संकाय के गणमान्य सदस्यगण, प्रिय छात्रों

विशिष्ट अतिथिगण देवियों और सज्जनों

आरंभ में मैं भारत की विदेश नीति पर एक वार्ता आयोजित करने की पहल के लिए राजस्थान के केंद्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति को धन्यवाद देना चाहूँगा, यह हमारे देश में एक ऐसे विषय में रुचि पैदा करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करेगा, जिस पर बहुत कम बहस होती है। मैं इस प्रतिष्ठित व्याख्यान श्रृंखला कार्यक्रम के अंतर्गत वार्ता करने के लिए मुझे आमंत्रित करने के लिए विदेश मंत्रालय को धन्यवाद देता हूँ। मुझे दिया गया विषय है :

भारत की विदेश नीति: 2014-19: प्रमुख घटनाएँ: आगे की प्राथमिकताएँ और चुनौतियाँ

मैंने अपनी बात को तीन खंडों में विभाजित किया है: आरंभ में मैं संक्षेप में विदेश नीति और कूटनीति की परिभाषाओं और भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों और मौलिक सिद्धांतों पर बात करूँगा। इसके बाद मैं पिछले पाँच वर्षों में भारत की विदेश नीति के महत्वपूर्ण क्षेत्रों और स्थलों पर कुछ विस्तार में प्रकाश डालूँगा और अंत में मैं विदेश नीति की प्राथमिकताओं और चुनौतियों को सामने रखूँगा।


विदेश नीति और कूटनीति: परिभाषा: मैं प्रख्यात विद्वानों और प्रमुख राजनीतिक वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तावित विदेश नीति की जटिल परिभाषाओं से आपको बोझिल नहीं करना चाहता। एक पेशेवर के रूप में, मैं विदेश नीति को एक ऐसे ढांचे के रूप में देखता हूँ जिसमें किसी निर्दिष्ट देश की सरकार बाहरी दुनिया के साथ अपने संबंधों को विभिन्न स्वरूपों अर्थात् द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय या वैश्विक रूप में संचालित करती है।

कूटनीति,देश की विदेश नीति के उद्देश्यों को प्राप्त करने की दृष्टि से,दुनिया के बाकी हिस्सों के साथ देश के संबंधों को प्रबंधित करने का एक पेशा,कौशल और कला है। मोटे तौर पर, कूटनीति राजनीतिक,आर्थिक या सांस्कृतिक हो सकती है और आदर्श रूप से इन्हें साथ मिलकर क्रमबद्ध रूप से काम करना चाहिए। एक नियम के रूप में, कूटनीति का अनुसरण, स्थापित राजनयिक चैनलों और तंत्र के माध्यम से किया जाता है। यह हमेशा पारदर्शी और सार्वजनिक ज्ञान में हो सकती है या नहीं भी हो सकती है। कभी-कभी इसे पिछले द्वार के चैनलों के माध्यम से या अनौपचारिक ट्रैक 1.5/ट्रैक 2तंत्र के माध्यम से भी आगे बढ़ाया जा सकता है।


भारत की विदेश नीति: मुख्य उद्देश्य: राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करना और समावेशी विकास सुनिश्चित करना

किसी भी अन्य देश की तरह- भारत की विदेश नीति का मुख्य और पहला तथा सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यअपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करना है। "राष्ट्रीय हितों" का दायरा बहुत व्यापक है। उदाहरण के लिए, हमारे मामले में इसमें: क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के लिए हमारी सीमा को सुरक्षित करना,सीमा पार आतंकवाद का सामना करना, ऊर्जा सुरक्षा,खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा,विश्व स्तर के बुनियादी ढांचे का निर्माण, गैर-भेदभावपूर्ण वैश्विक व्यापार प्रथाएं, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए समान वैश्विक जिम्मेदारी, समकालीन वास्तविकताओं, निरस्त्रीकरण,क्षेत्रीय स्थिरता, अंतर्राष्ट्रीय शांति इत्यादि और इन्हें प्रतिबिंबित करने के लिए वैश्विक शासन के संस्थानों का सुधार शामिल है।


अपने विकास के प्रक्षेपवक्र को बनाए रखने के लिए, भारत को पर्याप्त बाहरी आदानों की आवश्यकता है। हमारे मेक इन इंडिया,स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटीज, बुनियादी ढांचे का विकास, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत आदि जैसे चल रहे कार्यक्रमों को सफल होने के लिए,विदेशी साझेदारों, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, वित्तीय सहायता और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की आवश्यकता है। हाल के वर्षों में इस पहलू पर भारत की विदेश नीति के अतिरिक्त ध्यान केंद्रित करने का परिणाम राजनीतिक कूटनीति के साथ आर्थिक कूटनीति को एकीकृत कर विकास के लिए कूटनीति करने के रूप में दृष्टिगोचर हैं।

दुनिया भर में भारत के अनिवासी भारतीय और भारतीय मूल के व्यक्तियों की संख्या 200 लाख है। हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक उन्हें जोड़ना और विदेशों में उनकी उपस्थिति से अधिकतम लाभ प्राप्त करना तथा इसके साथ-साथ जहाँ तक संभव हो उनके हितों की रक्षा करना है।


संक्षेप में, हमारी विदेश नीति के कम से कम चार महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं: 1. भारत को पारंपरिक और अपारंपरिक खतरों से बचाना,2. एक ऐसा बाहरी वातावरण बनाना जो भारत के समावेशी विकास के लिए अनुकूल हो ताकि देश में विकास का लाभ गरीबों तक पहुंच सके,3. यह सुनिश्चित करना कि वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज़ सुनी जाए और भारत आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, निरस्त्रीकरण,वैश्विक शासन के संस्थानों के सुधार जैसे विषयों पर वैश्विक राय को प्रभावित कर सके, और 4: भारतीय प्रवासियों को जोड़ना तथा उनकी रक्षा करना है।


गतिशील दुनिया: पूर्वसक्रिय और व्यावहारिक दृष्टिकोण

हम एक गतिशील दुनिया में रहते हैं। इसलिए भारत की विदेश नीति सक्रिय और लचीली होने के साथ-साथ व्यावहारिक होने के लिए तैयार है, ताकि विकसित स्थितियों पर प्रतिक्रिया देने के लिए इसमें त्वरित समायोजन किया जा सके। हालांकि, अपनी विदेश नीति के कार्यान्वयन में,भारत मूल रूप से बुनियादी सिद्धांतों के एक समूह का पालन करता है,जिन पर कोई समझौता नहीं किया जाता है।


विदेश नीति: मौलिक सिद्धांत और विशेषताएँ

इन मौलिक सिद्धांतों में शामिल हैं:

पंचशील
पंचशील, या पाँच सद्गुण, जिन्हें पहली बार चीन और भारत के बीच तिब्बत क्षेत्र में व्यापार पर हुए समझौते में स्थापित किया गया और 29 अप्रैल, 1954 को औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित किया गया था और बाद में ये विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संचालन के आधार के रूप में कार्य करने के लिए विकसित हुए। ये पाँच सिद्धांत हैं: एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के लिए पारस्परिक सम्मान, ii. पारस्परिक अनाक्रामकता, iii.पारस्परिक हस्तक्षेप न करना, iv. समानता और पारस्परिक लाभ, तथा v. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।


वसुधैव कुटुम्बकम (विश्व एक परिवार है) सबका साथ,सबका विकास, सबका विश्वास की अवधारणा इससे संबंधित है। दूसरे शब्दों में, संपूर्ण विश्व समुदाय एक बड़े वैश्विक परिवार का एक हिस्सा है और परिवार के सदस्यों को शांति और सद्भाव में साथ रहना चाहिए,काम करना चाहिए और साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए तथा पारस्परिक लाभ के लिए एक दूसरे पर भरोसा करना चाहिए।

भारत विचारधाराओं के निर्यात और व्यवस्था के बदलाव का विरोध करता है।

भारत लोकतंत्र में विश्वास करता है और उसका समर्थन करता है, हालाँकि,भारत विचारधाराओं के निर्यात में विश्वास नहीं करता। इसलिए भारत ने आज की सरकारों से समझौता करने का प्रयास किया है, चाहे वह लोकतंत्र हो,राजतंत्र हो या सैन्य तानाशाही हो। भारत का मानना है कि अपने नेताओं को चुनने या हटाने या शासन के रूप को बनाए रखने या बदलने का निर्णय देश के लोगों पर छोड़ देना सबसे अच्छा है। उपर्युक्त सिद्धांत के विस्तार से, भारत किसी अन्य देश या देशों के समूह द्वारा बल या अन्य माध्यमों से किसी विशेष देश में क्षेत्रीय उल्लंघन या शासन परिवर्तन के विचार का समर्थन नहीं करता है। (उदाहरण- इराक, लीबिया,सीरिया में अमेरिकी हस्तक्षेप या जॉर्जिया, यूक्रेन आदि में रूस का हस्तक्षेप।)

साथ ही, जहाँ भी संभावना हो, भारत वहाँ लोकतंत्र को बढ़ावा देने में कोई संकोच नहीं करता, यह कार्य संबंधित सरकार की स्पष्ट सहमति के साथ क्षमता निर्माण और लोकतंत्र की संस्थाओं को मजबूती प्रदान करने के लिए किया जाता है। (उदाहरण- अफ़ग़ानिस्तान)

भारत एकतरफा प्रतिबंध/सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं करता है-

भारत किसी अन्य देश या देशों के समूह द्वारा किसी भी देश के विरुद्ध प्रतिबंधों/सैन्य कार्रवाई को लागू करने के विचार का समर्थन नहीं करता, जब तक कि अंतर्राष्ट्रीय सर्वसम्मति के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र द्वारा इन प्रतिबंधों/सैन्य कार्रवाइयों को मंजूरी नहीं दी गई हो। इसलिए भारत केवल ऐसे शांति स्थापना सैन्य अभियानों में योगदान देता है, जो संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना बल का हिस्सा हैं।

(भारत ने लगभग 195,000सैनिकों का योगदान दिया है, जो किसी भी देश की तुलना में सबसे बड़ी संख्या है, 49 से अधिक मिशनों में भाग लिया और 168 भारतीय शांति सैनिकों ने संयुक्त राष्ट्र मिशनों में सेवा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र मिशनों के लिए प्रख्यात फोर्स कमांडर भी प्रदान किए हैं और कर रहा है।)


दखल अंदाजी: नहीं; हस्तक्षेप: हाँ

भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने में विश्वास नहीं करता है। हालाँकि, अगर कोई देश अनजाने में या जानबूझकर ऐसा कार्य करता है - जिसके भारत के राष्ट्रीय हितों से टकराने की संभावना है, तो भारत त्वरित और समय पर हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करता। इसे ध्यान में रखें: हस्तक्षेप गुणात्मक रूप से दखलअंदाजी से अलग है, खासकर तब, जब हस्तक्षेप संबंधित देश के अनुरोध पर किया जाता है। (उदाहरण: बांग्लादेश 1971, श्रीलंका में आईपीकेएफ (1987-90), मालदीव (1988)


आक्रामकता से अधिक रचनात्मक कार्यकलाप

भारत आक्रामकता के बदले रचनात्मक जुड़ाव की नीति की वकालत करता है। यह मानता है कि हिंसक प्रतिशोध और टकराव मामलों को केवल जटिल बनाते हैं। युद्ध कोई हल नहीं है, हर युद्ध के बाद परस्पर विरोधी पक्ष अंतत: वार्ता की मेज पर आते हैं,लेकिन तब तक बहुत नुकसान हो चुका होता है। यह बात विशेष रूप से पाकिस्तान पर लागू होता है- जो भारत को लक्षित कर राज्य प्रायोजित आतंकवाद की उत्पत्ति का स्रोत है।

जुड़ाव की नीति को भारत की कमजोरी समझने की गलती करने की अनुमति नहीं है। जब-जब हमारे धैर्य की परीक्षा ली जाती है, हर बार भारत से मजबूत और जोरदार संदेश निकलता है। सितंबर 2016में पाकिस्तान के कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र में आतंकवादी-लांच पैडों को निशाना बनाने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक एक ऐसा ही उदाहरण है। पुलवामा आतंकवादी हमले के प्रतिशोध में फरवरी 2019में बालाकोट में आतंकवादी शिविरों पर एयर स्ट्राइक इसका एक और उदाहरण है।


रणनीतिक स्वायत्तता: साझेदारी-हाँ, गठबंधन: नहीं

निर्णय लेने की स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। इस प्रकार भारत साझेदारियों में विश्वास करता है और गठबंधनों, विशेषकर सैन्य गठबंधनों से दूर रहता है।



वैश्विक आयाम के मुद्दों पर वैश्विक सहमति

भारत विश्व व्यापार व्यवस्था, जलवायु परिवर्तन,आतंकवाद, बौद्धिक संपदा अधिकार, वैश्विक शासन जैसे वैश्विक आयाम के मुद्दों पर एक वैश्विक बहस और वैश्विक सहमति की वकालत करता है।

विदेश नीति: कार्रवाई में: 2014-19 अभूतपूर्व कूटनीतिक पहुँच


विभिन्न महाद्वीपों और गोलार्द्धों में छोटे, मध्यम और बड़े देशों को शामिल करने वाली अभूतपूर्व कूटनीतिक पहुँच, पिछले पाँच वर्षों में भारत की विदेश नीति की विशिष्टताओं में से एक थी। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री,उपराष्ट्रपति, विदेश मंत्री और मंत्रियों के स्तर पर उच्च-स्तरीय आवक और बाहर जाने वाले दौरों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। हमारे पड़ोस सहित, कुछ मामलों में, दस से साठ वर्षों के अंतराल के बाद प्रधानमंत्री के स्तर पर यात्राएं हुईं। शीर्ष नेतृत्व ने समान समय वाले क्षेत्रों के पार दुनिया के लगभग सभी देशों से संपर्क किया। बड़े और छोटे, सभी देशों के साथ इस कूटनीतिक विस्तार ने "वसुधैव कुटुम्बकमअर्थात् "विश्व एक परिवार है" की भावना से बड़े और छोटे देशों के साथ संबंध बनाने की सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।


कुल मिलाकर, विगत पाँच वर्षों में भारत की बेजोड़ त्वरित कूटनीतिक व्यस्तता के कई सकारात्मक प्रभाव रहे। इसने मौजूदा द्विपक्षीय रिश्तों के गुणात्मक उन्नयन में सहायता की और क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर समन्वय बढ़ाया। इसने संबंधों को पुनर्जीवित किया और उन्हें मजबूत बनाया तथा इसके साथ-साथ कई क्षेत्रों में पारस्परिक रूप से पुष्ट साझेदारी के लिए नए दरवाजे खोले।


अब मैं भारत की विदेश नीति के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों पर ध्यान देता हूँ: भारत की पड़ोस पहले की नीति

भारत क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों के मामले में दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश है, भारत की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है और इसकी विकास दर इस क्षेत्र के अन्य देशों की तुलना में अधिक है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में भारत का कद बढ़ रहा है। एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति संपन्न राज्य के रूप में भारत की साख और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में इसकी प्रमाणित क्षमताएं विश्वव्यापी हैं। इन विषमताओं ने इस क्षेत्र में, भारत के प्रति विश्वास की कमी की भावना उत्पन्न की है। पड़ोसी देशों में निहित स्वार्थों ने गलत तरीके से बयानबाजी की है और भारत का "बड़े धमकाने वाले" या "बड़े भाई" के रूप में वर्णन किया है। कुछ देशों में समाज के ऐसे वर्ग हैं जो "भारत का विरोधी" होने को "देशभक्ति" के बराबर मानते हैं।

मई 2014 में प्रभावी जनादेश के साथ नई सरकार का पहला कार्य था अपनी "पड़ोस पहले नीति" का अनावरण करना। इसका मुख्य उद्देश्य विश्वास की कमी को दूर करना,संबंधों को फिर से स्थापित करना और मित्रता के पुलों का निर्माण तथा पूरी तरह से पारस्परिक रूप से लाभप्रद सहयोग की समझ बनाना था।


वास्तव में नई सरकार द्वारा हमारे पड़ोसियों तक पहुँचने की पहल श्री मोदी द्वारा औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री का पद संभालने से पहले ही आरंभ कर दी गई थी। सभी राष्ट्राध्यक्षों और सार्क सदस्यों को 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए निमंत्रण भेजा गया था। इस आमंत्रण ने एक प्रबल और स्पष्ट संदेश भेजा कि भारत ने नए राजनीतिक विस्तार में दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसियों के साथ अपने संबंधों और क्षेत्र के एकीकरण को बहुत महत्व दिया है। समारोह में इस क्षेत्र के सभी राष्ट्राध्यक्षों और सरकार के प्रमुखों की उपस्थिति ने भारत के इस संकेत के प्रति उनकी सहमति की पुष्टि की। इस अवसर ने प्रारंभिक संपर्कों को स्थापित करने का एक अच्छा अवसर प्रदान किया, इसके पश्चात् क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों की यात्राओं या बैठकों के आदान-प्रदान के माध्यम से इनका अनुसरण किया गया। प्रधानमंत्री ने अपने पहले कार्यकाल में, सभी सार्क देशों का दौरा किया (उस देश की राजनीतिक अस्थिरता के कारण मालदीव को छोड़कर, प्रधानमंत्री ने मार्च 2015 में हिंद महासागर/ब्लू इकोनॉमी की अर्थव्यवस्था वाले अन्य देशों का दौरा किया)।

हालांकि, मालदीव के राष्ट्रपति ने नवंबर, 2018 में पद संभालने के बाद से तीन बार भारत का दौरा किया और बाद में इस वर्ष अप्रैल में भारत की यात्रा के दौरान और बाद में प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक बार फिर भेंट की।

सार्क और बिम्सटेक

भारत सार्क प्रक्रियाओं के माध्यम से दक्षिण एशिया के एकीकरण के लिए प्रतिबद्ध है। हालाँकि, एक संगठन के रूप में सार्क परिणामों के मामले में अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। यह कई दशकों से अस्तित्व में है फिर भी दक्षिण एशिया दुनिया का सबसे कम एकीकृत क्षेत्र बना हुआ है। भारत-पाकिस्तान संबंधों की खराब स्थिति और पाकिस्तान की बाधा डालने की नीति का सार्क की प्रगति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।


वर्ष2014 में सार्क से आगे जाने की प्रक्रिया शुरू करना सरकार का एक और पहला कार्य था। वर्ष 2014में अपने पहले सार्क शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी का संदेश प्रबल और स्पष्ट था कि भारत सार्क के अन्य सभी सदस्यों के साथ मिलकर काम करना पसंद करेगा,लेकिन साथ ही उन सदस्यों के साथ काम करने के विचार से भी पीछे नहीं हटेगा जो कार्यक्रम को लागू करने के लिए सहमत हैं। परिणामस्वरूप, भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश आगे बढ़े और जून 2015में चार सार्क देशों के बीच सड़क यातायात के निर्बाध आवागमन के लिए एक विशेष मोटर वाहन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, पाकिस्तान और अन्य लोग इससे अलग हो गए। बाद में मई 2017 में, भारत ने दक्षिण एशिया उपग्रह - इसरो द्वारा निर्मित एक संचार उपग्रह लॉन्च किया, जो दक्षिण एशियाई क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की संचार सेवाएं प्रदान करता है, पाकिस्तान की आपत्ति के बावजूद उपग्रह को लॉन्च किया गया था। यह परियोजना स्वास्थ्य, शिक्षा,आपदा प्रतिक्रिया, मौसम पूर्वानुमान और संचार में व्यापक अनुप्रयोगों के माध्यम से हमारे क्षेत्र के दूरदराज के क्षेत्रों में भी लोगों के जीवन को स्पर्श करेगी।


इस बीच, पाकिस्तान द्वारा जारी राज्य के संरक्षण और सीमा पार आतंकवाद के प्रायोजन की पृष्ठभूमि में, भारत ने इस्लामाबाद में आयोजित होने वाले, 2016 के सार्क सम्मेलन का बहिष्कार करने का फैसला किया, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल ने स्वेच्छा से भारत का समर्थन करने का निर्णय लिया था।


सार्क के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए, भारत ने पाँच सार्क देशों (भारत, भूटान, बांग्लादेश,नेपाल और श्रीलंका) और दक्षिण पूर्व के दो देशों (म्यांमार और थाईलैंड) के बीच अंतर-क्षेत्रीय सहयोग के एक मंच, बिम्स्टेक (बंगाल की खाड़ी पहल के लिए बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग) पर स्पष्ट रूप से ध्यान केंद्रित किया है। भारत ने जानबूझ नवंबर 2016 में गोवा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में, ब्रिक्स और बिम्सटेक के साथ बैठकों को सार्क से अधिक प्राथमिकता दी है।


भारत की नीति बिम्सटेक से सार्क को स्थानांतरित करने की नहीं है, दोनों प्रासंगिक और पूरक हैं और एक दूसरे के पूरक बन सकते हैं।


पाकिस्तान और चीन

हमारे निकट पड़ोस में, अब मैं पाकिस्तान और चीन के साथ हमारे तनावपूर्ण संबंधों पर चर्चा करना चाहता हूँ।

पाकिस्तान

वर्ष 2014 में भारत के पाकिस्तान के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। अपनी पड़ोस पहले की नीति के अनुसार, भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों को सामान्य करने के लिए काफी प्रयास किए, वर्ष 2016 के आरंभ तक,यह पूरी तरह स्पष्ट था कि पाकिस्तानी डीप स्टेट (सेना और आईएसआई) बातचीत को फिर से शुरू करने में दिलचस्पी नहीं रखता और भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देना और उसका समर्थन करना जारी रखा था। प्रधानमंत्री मोदी के लाहौर में अनिर्धारित रूप से रुक कर (दिसंबर में काबुल से नई दिल्ली आते समय) संबंध सुधारने के संकेत के एक हफ्ते के भीतर पठानकोट एयरबेस पर हुआ हमला हर सीमा को पार कर गया। सितंबर 2016 में, जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले के उरी में एक आतंकवादी हमले में भारतीय सेना के 18 जवानों के मारे जाने से संबंधों को और झटका लगा था। भारत के पास धैर्य खोने और नियंत्रण रेखा के साथ जुड़ाव के नियमों को बदलने के कारण थे, इसने उरी हमले के एक सप्ताह के भीतर नियंत्रण रेखा के पार पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी शिविरों पर एक सफल "सर्जिकल स्ट्राइक" किया। इसी तरह, फरवरी, 2019 में पुलवामा हमले में 40 सीआरपीएफ जवानों की मौत हो गई थी, पाकिस्तानी क्षेत्र के भीतर बालाकोट में स्थित आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र पर भारतीय वायु सेना द्वारा हवाई हमला करके तुरंत इसकी जवाबी कार्रवाई की गई थी।
भारत ने "आतंकवाद और वार्ता एक साथ नहीं चल सकती" की दृढ़ नीति अपनाई है और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा वार्ता को फिर से शुरू करने के लिए बार-बार फोन करने के बावजूद, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस नीति में तब तककोई बदलाव नहीं किया जाएगा, जब तक पाकिस्तान में भारत के विरुद्ध लक्षित और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का समर्थन करने और कश्मीर में हस्तक्षेप को रोकने और समर्थित आतंकवाद रोकने के मूर्त प्रमाण नहीं मिल जाते।


चीन

सितंबर, 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी पिंग की भारत यात्रा के दौरान, भारत ने मित्रता का हाथ बढ़ाया और स्पष्ट संदेश दिया कि दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा ताकि 21वीं सदी एशिया की सदी हो। हालांकि भारत-चीन संबंध का प्रक्षेपवक्र भारत को पसंद आने वाले तरीके से विकसित नहीं हुआ। भारत, चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड पहल,विशेष रूप से पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरने वाले, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीसीई) का समर्थन नहीं करता है, जो संप्रभुता का मुद्दा उठाता है। चीन भारत के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी)की सदस्यता को भी रोक रहा है और आतंकवाद के मुद्दे पर, पाकिस्तान को आतंकवाद के शिकार के रूप में प्रस्तुत कर उसकी रक्षा करता है, चीन यह दावा करता है कि आतंकवाद से संबंधित मुद्दों को संबोधित करते हुए किसी भी देश को नहीं बख्शा जाना चाहिए। चीन भारत के, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हाथ मिलाने को लेकर आशंकित है कि भारत-प्रशांत क्षेत्र में उसका मुकाबला करने के लिए चीन विरोधी गठबंधन बनाया जा रहा है। व्यापार के विशाल संतुलन के चीन के पक्ष में होने से जुड़े मुद्दे और अनसुलझे सीमा विवाद भी हैं। सितंबर, 2017 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच लंबे समय तक डोकलाम में गतिरोध बना रहा जो द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक गंभीर खतरा था, लेकिन सौभाग्य से, कूटनीति के कुशल उपयोग से इसे हल कर लिया गया था। अप्रैल 2018 में चीन में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी पिंग के बीच अनौपचारिक शिखर सम्मेलन से जो समझ पैदा हुई है, उसे वुहान स्पिरिट के रूप में जाना जाता है, जिसका सार यह है कि दोनों पक्षों को अभिसरण करना चाहिए और शांतिपूर्ण चर्चा के माध्यम से अपने मतभेदों को संभालने के प्रयासों में वृद्धि करनी चाहिए। भारत और चीन के बीच शांतिपूर्ण, स्थिर और संतुलित संबंध वर्तमान वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच स्थिरता का एक सकारात्मक कारक होगा और द्विपक्षीय संबंधों का उचित प्रबंधन क्षेत्र के विकास और समृद्धि के लिए अनुकूल होगा तथा एशियाई शताब्दी के लिए स्थितियां बनाएगा।


दक्षिण पूर्व एशिया: आसियान और पूर्वी एशिया

भारत के विस्तारित पड़ोस के संदर्भ में, दक्षिण पूर्व एशिया के 10 आसियान देशों का अत्यधिक महत्व है। एशियाई बाघों के प्रति भारत के संपर्क की पहली शुरूआत 1990 के दशक के प्रारंभ में यूएसएसआर के पतन, शीत युद्ध की समाप्ति की पृष्ठभूमि में और अर्थव्यवस्था को उदार बनाने और इसे विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करने के हमारे अपने निर्णय से हुई थी। परिणामस्वरूप, भारत द्वारा लुक ईस्ट नीति की घोषणा की गई, एलईपी के तीन चरण हैं। भारत की लुक ईस्ट' नीति (1992-2002) का पहला चरण आसियान-केंद्रित और मुख्य रूप से व्यापार और निवेश की कड़ियों पर केंद्रित था। इस अवधि के दौरान भारत ने 1992में आसियान के साथ एक क्षेत्रीय संवाद साझेदारी में प्रवेश किया, जिसे 1996 में पूर्ण संवाद भागीदारी के स्तर पर उन्नत किया गया और भारत भी आसियान क्षेत्रीय मंच (एआरएफ) में शामिल हो गया। वर्ष 2002से भारत ने वार्षिक भारत-आसियान शिखर सम्मेलन स्तर की बैठकें शुरू कीं।

चरण-2 की शुरुआत 2003 में, तत्कालीन विदेश मंत्री श्री यशवंत सिन्हा (हार्वर्ड विश्वविद्यालय में; 29 सितंबर, 2003 को) ने सरकार की पूर्व की विस्तारित परिभाषा साझा की, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल हैं और इसके मूल में आसियान है। उन्होंने आगे कहा कि नए चरण में व्यापार से लेकर व्यापक आर्थिक और सुरक्षा मुद्दों पर भी बदलाव किया गया, जिसमें समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए संयुक्त प्रयास और आतंकवाद-रोधी गतिविधियों का समन्वय शामिल है। वर्ष 2012 में, 20 वर्ष की संवाद साझेदारी का सामरिक भागीदारी में उन्नयन हुआ।

वर्ष 2014 में, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने "लुक ईस्ट नीति (एलईपी)" का नाम बदलकर "एक्ट ईस्ट पॉलिसी (एईपी)" रखा गया; यह दुबारा ब्रांडिंग से अधिक था।

तब से सरकार ने आसियान के साथ संबंधों में अधिक "गतिशील" और "कार्रवाई-उन्मुख" दृष्टिकोण की मांग की है। आसियान के भीतर सीएमएलवी देशों के (कंबोडिया, म्यांमार, लाओस और वियतनाम)-एक उप-क्षेत्र के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने पर काफी ध्यान दिया जा रहा है, जिनकी भारत के उत्तर-पूर्व से निकटता का अंतर्निहित लाभ है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण पहल में से एक के रूप में, भारत सरकार ने क्षेत्र में भारतीय निवेश को बढ़ावा देने के लिए, वर्ष 2016 में निर्यात और आयात बैंक में 500 करोड़ रुपए (लगभग 71.5 मिलियन अमरीकी डॉलर) के कोष के साथ परियोजना विकास कोष की स्थापना की थी।


वर्ष 2018 के गणतंत्र दिवस समारोह में राष्ट्र और सरकार के प्रमुखों की उपस्थिति भारत की एक्ट ईस्ट नीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रदर्शन था। अब भारत को इस क्षेत्र के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक जुड़ाव में वृद्धि होने के अलावा इस क्षेत्र के एक संभावित सुरक्षा संतुलनकर्ता के रूप में उभरने की भी आशा है। भारत-अमरीका-जापान-ऑस्ट्रेलिया चतुष्कोण उस दिशा में एक संकेतक है।

दो बड़ी शक्तियां: संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस


हाल में द्विपक्षीय संबंधों में कुछ अड़चनें उभरने के अलावा कुल मिलाकर विगत कुछ वर्षों में अमेरिका के साथ संबंधों की गति बढ़ रही है। अमेरिका ने भारत को रक्षा साझेदार का दर्जा दिया है जो इसे अमेरिका के नाटो सहयोगियों के समकक्ष बनाता है। अमेरिका की प्राथमिकताओं में एक बाजार के रूप में भारत का महत्व होने के अलावा अमेरिका इस बात के लिए भी उत्सुक है कि एशिया में, भारत चीन के लिए एक प्रतिभार के रूप में कार्य करे। अमेरिका यह भी चाहेगा कि भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और इस क्षेत्र के अन्य देशों से हाथ मिलाने के साथ-साथ भारत-प्रशांत महासागर में समुद्री सुरक्षा, नौवहन की स्वतंत्रता, समुद्री डकैती और आपदा प्रबंधन जैसे मामलों में शुद्ध सुरक्षा प्रदाता के रूप में कार्य करे। इसका अनकहा उद्देश्य चीन के विस्तारवादी कार्यों पर अंकुश लगाना है, विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर में, जहाँ चीन विवादित द्वीपों पर निर्माण गतिविधियों का संचालन कर रहा है।


ईरान और रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों (सीएएटीएसए) (प्रतिबंध के माध्यम से अमेरिका के विरोध का मुकाबला करना) के भारत की रक्षा खरीद (रूस से एस 400मिसाइल रक्षा प्रणाली) और ईरान से तेल खरीदने में असमर्थता के कारण इसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए निहितार्थ हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने जीएसपी वापस ले लिया है जिसके कारण भारत को अमेरिका में 5.6 अरब अमरीकी डॉलर के निर्यात पर तरजीही शुल्क देना पड़ रहा है। भारत ने, भारत को किए जाने वाले कुछ अमरीकी निर्यात पर उच्च शुल्क लगाकर जवाबी कार्रवाई की है। इनमें से कुछ चिंताओं को अमेरिकी विदेश मंत्री की नई दिल्ली की यात्रा के समय और इस वर्ष जून में जी-20शिखर सम्मेलन के समय प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रपति ट्रम्प से भेंट के अवसर पर संबोधित किया गया था। भारत ने स्पष्ट और दृढ़ रूप से यह बता दिया है कि अंततः भारत देश के सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय हितों के लिए काम करेगा।


भारत द्वारा सोवियत संघ और उसके उत्तराधिकारी राष्ट्र रूसी संघ को विश्वसनीय और परीक्षित मित्र के रूप में वर्णित किया गया है। लंबे समय तक, रूस भारत के लिए रक्षा खरीद का प्रमुख स्रोत था, नए, आधुनिक रक्षा उपकरणों और पहले खरीदे गए उपकरणों के पुर्जों के लिए हम अब भी रूस पर काफी निर्भर हैं। वर्ष 2014 में अपना कार्यभार संभालने के बाद, नई सरकार ने भारत की रक्षा आवश्यकताओं में विविधता लाने के लिए तेज और आक्रामक रूप से कदम बढ़ाया। हमारा यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब रूस की अर्थव्यवस्था अमेरिका और यूरोपीय प्रतिबंधों और तेल की कीमतों में गिरावट के कारण एक कठिन दौर से गुजर रही थी। रक्षा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने की हमारी वास्तविक इच्छा को रूस द्वारा गलत समझा गया क्योंकि भारत रूस से दूर था। भारत स्थिति को सुधारने और आपसी विश्वास को बहाल करने में तेज था। रूस के साथ हमारे संबंध अब मजबूत हैं और रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और व्यापार व निवेश पर विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी पर ध्यान केंद्रित हैं।


विकास के लिए कूटनीति


अतीत में भी बाहरी दुनिया के साथ व्यापार और आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक कूटनीति का उपयोग किया गया है। हालांकि, विगत पाँच वर्षों में, कूटनीति और राष्ट्रीय आकांक्षाओं का अनूठा विकास हुआ है। इसलिए अब हमारे पास विकास के लिए कूटनीति की एक गतिशील अवधारणा है। विदेशी साझेदारों के साथ सघन जुड़ाव से लाभ में वृद्धि हुई है, यह विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी टाई-अप, कारखानों की स्थापना और नौकरियों के निर्माण के लिए अग्रणी है।वर्ष2022 तक नया भारत बनाने की कौशल भारत, स्मार्ट सिटीज, मेक इन इंडिया,डिजिटल इंडिया जैसी कई प्रमुख योजनाओं के लिए विदेशी सहयोग प्राप्त करना संभव हो गया है। कूटनीतिक पहुँच के परिणामस्वरूप विदेशी भागीदारों (यूएई: 75 अरब अमरीकी डॉलर, जापान 33 अरब अमरीकी डॉलर, चीन: 22 अरब अमरीकी डॉलर; दक्षिण कोरिया 10 अरब अमरीकी डॉलर) से पर्याप्त प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की प्रतिबद्धता हुई है, जापान कौशल विकास के लिए दस हज़ार भारतीयों को बुलाने पर सहमत हुआ है, जबकि अन्य 30000 को निर्माण की जापानी शैली में प्रशिक्षित किया जाएगा। बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में, जापान ने भारत की पहली बुलेट ट्रेन के निर्माण के लिए धन देने पर सहमति व्यक्त की है, यह ट्रेन मुंबई-अहमदाबाद के बीच यात्रा के समय को सात घंटे से कम करके दो घंटे कर देगी। फ्रांस, जर्मनी, जापान और यूरोपीय निवेश बैंक भारत में रेलवे और मेट्रो परियोजनाओं का वित्तपोषण करने पर सहमत हुए हैं। इसी तरह भारत में स्मार्ट सिटीज़ विकसित करने के लिए भी प्रतिबद्धताएँ की गई हैं।


अनिर्देशित विकास सहायता

भारत ने 1950 के दशक के आरंभ से अनिर्देशित विकास सहायता की नीति के रूप में अपनी व्यावहारिक शक्ति विकसित की है। बदले में भारत "सद्भावना" और "भारत के मित्र" चाहता है। यह सहायता परियोजना और कमोडिटी निर्यात से जुड़े एकमुश्त अनुदान और सॉफ्ट लोन का एक विवेकपूर्ण मिश्रण है। इसके अलावा,भारत यह सुनिश्चित करने के लिए विवेकपूर्ण रूप से काम कर रहा है कि "सद्भावना" को ठोस राजनीतिक और आर्थिक लाभांश में परिवर्तित किया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत की नीति चीन की "ऋण-जाल-नीति" से अलग है। चीन छोटे, गरीब और विकासशील देशों को उन देशों में बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए आसानी से भारी ऋण देता है, इन भारी ऋणों से ग्रस्त देशों के लिए इन ऋणों को चुकाना मुश्किल होता है और उन्हें अंततः चीन को संपत्ति का स्वामित्व सौंपना होता है। (उदाहरण: श्रीलंका हंबनटोटा पोर्ट) (दिसंबर 2017 में, एक ऋण का भुगतान करने में असमर्थ होकर,जिसका उपयोग श्रीलंकाई बंदरगाह को उन्नत करने के लिए किया गया था, श्रीलंका सरकार के पास चीन को 99 वर्षों के लिए बंदरगाह और 15,000 एकड़ भूमि को सौंपने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, जिससे इस राष्ट्र को अपने प्रतिद्वंदी, भारत के तट से कुछ सौ किलोमीटर दूर एक क्षेत्र का स्वामित्व प्राप्त हो गया, यह सबसे ज्वलंत उदाहरण है कि किस तरह से गरीब, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण, श्रीलंका जैसे देश अब गहराई से - चीन के ऋण जाल हैं।)


एशिया में, भूटान भारत से विकास सहायता का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता है। दिसंबर 2018 में, भारत ने भूटान की 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए 4500 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता की घोषणा की। जून 2015 में, भारत ने भूकंप प्रभावित नेपाल के पुनर्निर्माण के लिए 1 अरब अमरीकी डॉलर की सहायता का वादा किया। अक्टूबर, 2017 में, भारत ने बांग्लादेश में विकास परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए बांग्लादेश के साथ 4.5 अरब अमरीकी डॉलर की ऋण श्रृंखला के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।


अक्टूबर 2017 में भारत ने भारत-अफ्रीका विकास निधि (100मिलियन अमरीकी डॉलर) और भारत-अफ्रीका स्वास्थ्य कोष (10 मिलियन अमरीकी डॉलर) सहित 600 मिलियन अमरीकी डॉलर की अनुदान सहायता का वादा किया। इसके अलावा भारत ने अगले पाँच वर्षों में रियायती शर्तों पर 10 अरब अमरीकी डॉलर की ऋण श्रृंखला देने की प्रतिबद्धता जताई है।

वियतनाम 500 मिलियन अमरीकी डॉलर की ऋण श्रृंखला के रूप में भारत की विकास सहायता का एक और लाभार्थी है। भारत ने सीएमएलवी देशों (कंबोडिया,म्यांमार, लाओस, वियतनाम) में निर्माण केंद्रों के लिए 500 करोड़ रुपए का कोष अलग रखा है।

इसके अलावा, भारत अपने विविध नागरिक और सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया भर के कई विकासशील देशों में क्षमता निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।


प्राथमिकताएं और चुनौतियां


रूस, अमरीका, चीन जैसी नेतृत्व करने वाली शक्तियों, जापान, फ्रांस,ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों और सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, इज़राइल जैसे संसाधनों से संपन्न देशों के साथ स्थिर संबंध विशेष रूप से कच्चे माल प्राप्त करने, आधुनिक प्रौद्योगिकी,निवेश, परिष्कृत हथियार, समावेशी घरेलू विकास और मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटीज,स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों की सफलता और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संयुक्त उद्यम के संदर्भ में भारत के हित में हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका और रूस और ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष, विशेष रूप से प्रतिबंधों के क्षेत्र में चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध, (जैसे सीएएटीएसए), के परिणाम,जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, भारत के लिए हानिकारक हैं और इनमें से साफ बच निकलना एक चुनौती है।



कनेक्टिविटी (संपर्क)


भारत दक्षिण एशिया को एकीकृत करने और दक्षिण एशिया को अन्य क्षेत्रों विशेषकर दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य एशिया से जोड़ने के लिए भौतिक और डिजिटल कनेक्टिविटी पर बहुत जोर देता है। दक्षिण एशिया में, बांग्लादेश-भूटान-भारत-नेपाल (बीबीएन) मोटर वाहन समझौता चारों देशों के भीतर यात्री और मालवाहक वाहनों की आवाजाही के लिए निर्बाध कनेक्टिविटी प्रदान करता है।


कुछ परियोजनाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, उनमें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट का विकास शामिल है, जो अफगानिस्तान और भारत के साझे विरोधी पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए, एक तरफ भारत को ईरान और अफगानिस्तान से और दूसरी तरफ मध्य एशिया के साथ जोड़ता है। भले ही भारत ने 2003 में इस संदर्भ में ईरान से बात करना आरंभ कर दिया था, लेकिन भारत की ओर से इस पर वास्तविक जोर 2014 के मध्य में दिया गया था जिसके परिणामस्वरूप समझौतों पर हस्ताक्षर हुए और वास्तविक विकास आरंभ हुआ तथा दिसंबर 2017 में बंदरगाह के पहले चरण का उद्घाटन हुआ था। तब से भारत ने इस पर भौतिक रूप से अधिकार लिया है और यह पहला बंदरगाह है जो भारत से बाहर चलाया जा रहा है। अफगानिस्तान ने फरवरी 2019 में जरंज-चाबहार मार्ग का उपयोग करके भारत को अपनी पहली खेप भेजी। भारत ने इस समुद्री मार्ग का उपयोग करके 2017 के अंत में अफगानिस्तान को गेहूँ भेजा था। भारत ने जमीन से घिरे अफगानिस्तान के लिए विश्वसनीय वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों के रूप में दो प्रत्यक्ष एयर फ्रेट कॉरिडोर स्थापित किए हैं। दिल्ली-काबुल कॉरिडोर जून 2017 से चालू है और दिल्ली-हेरात कॉरिडोर का उद्घाटन मार्च 2019 में किया गया था।


भारत, म्यांमार थाईलैंड का 1360 किमी का त्रिपक्षीय राजमार्ग निर्माणाधीन है और अगले वर्ष तक इसके परिचालन योग्य बनने की संभावना है, यह भारत के उत्तर पूर्व को आसियान से जोड़ेगा। म्यांमार में सेगमेंट के निर्माण के लिए भारत वित्तपोषण कर रहा है। भारत ने कंबोडिया, लाओस और वियतनाम को जोड़ने का भी प्रस्ताव दिया है।


कलादान मल्टीमॉडल परिवहन परियोजना एक अन्य परियोजना है जो धीमी गति से आगे बढ़ रही थी और 2015 में पर्याप्त धनराशि के आवंटन से तेजी से आगे बढ़ी। यह परियोजना समुद्री, अंतर्देशीय-जल और टॉड प्रणालियों का उपयोग करके म्यांमार के माध्यम से भारत के जमीन से घिरे पूर्वोत्तर क्षेत्र को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ने का प्रयास करती है। केएमएमटी परियोजना जब पूरी हो जाएगी तब कोलकाता से मिजोरम तक अच्छे परिवहन का समय चार दिन तक कम हो जाएगा और लगभग 950 किमी दूरी कम हो जाएगी।


आतंकवाद: भ्रष्टाचार, काला धन, धन शोधन, भगोड़े आर्थिक अपराधी


अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक अभियान भारत सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर है। यह महसूस करते हुए कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर मसौदा व्यापक सम्मेलन (सीसीआईटी) पर बातचीत घोंघे की गति से आगे बढ़ रही है, भारत की अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने के लिए सीसीआईटी के सिद्धांतों के आधार पर एक स्वैच्छिक बहुपक्षीय "अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध राष्ट्रों की एकजुटता" का निर्माण करने की योजना है। पाकिस्तान के एक निहित संदर्भ के साथ भाजपा घोषणापत्र 2019में आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों और संगठनों को अलग-थलग करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सभी संभव कदम उठाने की भारत की प्रतिबद्धता की घोषणा की गई है। भारत की लॉबी बनाने की कोशिश के जारी रहने की संभावना है ताकि पाकिस्तान को "ग्रे" से "फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीए) की काली सूची" में डाला जाए।


आतंकवाद से संबंधित मुद्दों पर चीन द्वारा पाकिस्तान को बचाना और कुछ देशों का आतंकवाद के प्रति चयनात्मक दृष्टिकोण एक चुनौती है जिससे भारत को निपटना होगा।
भारत भ्रष्टाचार, काले धन,धन शोधन, भगोड़े आर्थिक अपराधियों जैसे मुद्दों को वैश्विक मंचों पर उठाने पर ध्यान केंद्रित करता है। विजय माल्या, नीरव मोदी,आदि जैसे आर्थिक अपराधियों का प्रत्यर्पण एक अन्य प्राथमिकता होगी।


भारत की वैश्विक आकांक्षाएँ


भारत राजनीतिक रूप से एक स्थिर देश है और इसकी अर्थव्यवस्था स्थिर है। भारत अपनी सैन्य ताकत को धीरे-धीरे लेकिन लगातार बढ़ा रहा है। एक बड़े बाजार के रूप में भारत विदेशी निवेश, संयुक्त उद्यम, वस्तु निर्यात के लिए एक आकर्षक गंतव्य है। हाल के वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भारत का कद वास्तव में काफी बढ़ा है। संभवतः भारत का समय आ गया है। भारत के अपने वजन के अनुसार प्रहार करता दिखाई देने के साथ, विगत पाँच वर्षों में विदेशी मामलों में मुखरता का एक निश्चित स्तर भी दिखाई दे रहा था।


मैं निम्नलिखित टिप्पणी के साथ समापन करना चाहूँगा: भारत अब यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि वह वैश्विक एजेंडा को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, कि यह "नियम का पालन करने" की बजाय "नियम बनाने" का हिस्सा है और यह बहु-ध्रुवीय दुनिया में एक मजबूत ध्रुव के रूप में उभरता है। इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने की आकांक्षा से जोड़ा जाता है जिसके लिए बड़ी संख्या में देशों ने पहले ही समर्थन करने का वादा किया है।

मैं आपके ध्यान और धैर्य के लिए आप सभी को धन्यवाद देता हूँ। मैं इस कार्यक्रम के आयोजन में उनके प्रयासों के लिए और मेरे प्रवास को यहाँ आरामदायक बनाने के लिए प्रोफेसर शुक्ला को धन्यवाद देता हूँ।


मुझे दर्शकों के प्रश्नों का उत्तर देने में खुशी होगी।