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भारत की विदेश नीति की बदलती गतिशीलता

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) देबनाथ शॉ
    Venue: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), बीएचयू, वाराणसी
    Date: अगस्त 23, 2019

प्रस्तावना

क्या परिवर्तन अपरिहार्य है? क्या भारत की विदेश नीति बदलती रहती है??
ऐसे स्पष्ट प्रश्नों का उत्तर देने के पहले हम यह पता लगाने और सुनिश्चित करने के लिए एक संक्षिप्त विरति लेंगे कि यहाँ उपस्थित हम सभी का एक साझा रुझान हैं। मुझे यकीन है कि अत्यधिक प्रतिभावान और जानकार छात्रों के रूप में, आप इस तथ्य से अवगत हैं कि भारत सहित किसी भी देश की विदेश नीति, विस्तृत विश्व और अंतर्राष्ट्रीय सौजन्य में राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए बनाई जाती है। इंजीनियरिंग और विज्ञान के छात्रों के रूप में, आप सभी 'डायनेमिक' शब्द से परिचित हैं, यह किसी विशेष प्रक्रिया या प्रणाली के निरंतर परिवर्तन, गतिविधि या प्रगति की क्षमता का वर्णन करता है।

मुझे जब भी विदेश मंत्रालय द्वारा अपनी 'विशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला' कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है, जैसा कि आज वाराणसी में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी (बीएचयू) में आपने आयोजित किया है, तब-तब मेरे मन में एक प्रश्न कौंधता है कि क्या भारत की विदेश नीति और प्रथाएं और हमारे बाहरी संबंधों का विषय दर्शकों के लिए प्रासंगिक है, या यह कुछ ऐसा है जो अनिश्चित और अस्पष्ट तथा क्षणिक तौर पर आकर्षक है, लेकिन हमारे दैनिक जीवन के लिए उपयोगी नहीं है। हम विदेश नीति के प्रभाव का अपनी आंतरिक नीति में परिवर्तन होने की तरह सीधे अनुभव नहीं भी कर सकते हैं, उदाहरण के लिए, जब एक लीटर पेट्रोल पर कर बढ़ता है तो मोटरबाइक चलाना अधिक महंगा हो जाता है। हालाँकि, भारत और यूरोपीय संघ के बीच एक समझ बनी है, जो शेंगेन वीज़ा के लिए आवेदन करना और इसे प्राप्त करना आसान बनाती है। हो सकता है कि आपको यह समझ में न आये कि ऐसा भारत की विदेश नीति के परिणामस्वरूप हुआ है, लेकिन निश्चित रूप से यह शेंगेन देशों से हमारे सही तरीके से सौदेबाजी का परिणाम है। यह मुझे उन प्रश्नों के उत्तर तक ले जाता है जो हमने पहले किए थे। हाँ, हम हमेशा परिवर्तन का सामना करते हैं और भारत की विदेश नीति की गतिशीलता एक ऐसी चीज है जिसमें हम सभी को दिलचस्पी होनी चाहिए, क्योंकि यह किसी न किसी रूप में हमें अर्थात् भारत के नागरिकों और निवासियों को प्रभावित करती है।

आंतरिक नीति के विपरीत, आमतौर पर किसी भी देश की विदेश नीति को क्रांतिकारी परिवर्तन के अधीन न मानकर स्थिर और अचल माना जाता है। विदेश नीति स्थिर और गतिशील दोनों है। हम विदेश नीति में 'राज्यवाद' से क्या समझते हैं? मूल रूप से, यथास्थिति को बनाये रखना, उदाहरण के लिए, केवल संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव और आदेश के अंतर्गत, संघर्षरत क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के लिए भारतीय सैनिकों को भेजना। स्थिर विदेश नीति के तत्व जोखिम को कम करते हैं। हम विदेश नीति में गतिशीलता से क्या समझते हैं? विदेश नीति की गतिशीलता के बदलने का अर्थ होगा- नीति को देश के बाहरी वातावरण में परिवर्तन या देश के आंतरिक राजनीतिक परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव के अनुसार बदलना या ढालना। नवंबर 2018 में, मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलीह के पदग्रहण समारोह में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति ऐसी गतिशीलता का एक ठोस उदाहरण होगा, जो भारत के हितों के प्रतिकूल माने जाने वाले मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के कार्यकाल में, पिछली सरकार की मालदीव के लिए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के स्तर की यात्राओं से बचने की पूर्व नीति के विपरीत है। एक गतिशील विदेश नीति जोखिम लेने के लिए अधिक तत्परता दिखाती है। भारत सहित किसी भी देश की विदेश नीति में स्थिरता और गतिशीलता दोनों विशेषताएं विद्यमान हैं।

भारत की विदेश नीति का विकास

इसके बाद, हम संक्षेप में यह जांच करेंगे कि क्या कोई कह सकता है कि वैश्विक राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था और उसकी प्रतिक्रिया में भारत की विदेश नीति के तीन मुख्य चरण हैं।

वर्ष 1947 से 1991 तक की पहली अवधि में, अमेरिका और सोवियत संघ की दो प्रतिद्वंद्वी महाशक्तियाँ दुनिया पर हावी थीं। लीग ऑफ नेशंस मृतप्राय हो गया था और संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ। इसे द्वितीय विश्व युद्ध के विजयी सहयोगियों अर्थात् अमेरिका, सोवियत रूस, ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा आकार दिया गया था। वैश्विक आर्थिक और वित्तीय शक्ति पर पश्चिमी विकसित देशों, मुख्य रूप से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों द्वारा कब्जा कर लिया गया था, जिन्होंने विश्व बैंक और आईएमएफ की जोड़ी के साथ वैश्विक वित्तीय प्रणाली और वैश्विक व्यापार को आकार देने वाले जीएटीटी/डब्ल्यूटीओ को नियंत्रित करने के लिए ब्रेटन-वुड्स व्यवस्था विकसित की थी। भारत द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाना इसकी प्रतिक्रिया थी। गुटनिरपेक्ष होने का मतलब किसी महाशक्ति से जुड़े बिना दोनों ही शिविरों से राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक सहायता प्राप्त करना था, ताकि औपनिवेशिक शासन के दो शताब्दियों के बाद युवा राष्ट्र अपने गंभीर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तनाव एवं गिरावट को दूर कर सके। यह भारत की विदेश नीति का अचल और स्थिर चरण था, जो शायद उस समय के लिए सबसे उपयुक्त था।

वर्ष 1991 से 2008 तक के दूसरे चरण में, 1991 में हुई दो बड़ी घटनाओं ने बदलाव की प्रक्रिया आरंभ की। पूर्व सोवियत संघ ध्वस्त हो कर कई स्वतंत्र देशों में परिवर्तित हो गया। रूस, उनमें सबसे बड़ा था और वह संयुक्त राष्ट्र में सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बन गया। दूसरा, भारत द्वारा विदेशी मुद्रा संकट का सामना किया जाना था, जिसे हमने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। हमने एक बदलती विश्व व्यवस्था देखी, जिसमें केवल एक देश, संयुक्त राज्य अमेरिका प्रमुख राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में बचा रहा। इस अवधि के बाद से यूरोपीय संघ, रूस, चीन, जापान और भारत सहित गतिशील एशिया और दक्षिण अमेरिका, विशेष रूप से ब्राजील में वैश्विक शक्ति के कई अन्य कम प्रभावशाली ध्रुव अंकुरित होने लगे। भारत ने इन भयावह परिवर्तनों का उत्तर गुटनिरपेक्षता से दूर एक बहुध्रुवीय संरेखण द्वारा दिया, इसने शेष बची प्रमुख शक्ति, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने पिछले, अक्सर प्रतिकूल रहने वाले संबंधों को समायोजित किया, वैश्वीकरण को अपनाया और अपने करीबी पड़ोसियों पर अधिक ध्यान दिया।

तीसरी अवधि 2008 से वर्तमान समय तक है। वर्ष 2008 में, अमेरिका और वैश्विक बैंकिंग एवं वित्तीय प्रणालियों को गंभीर झटका लगा था, जिसकी शुरुआत लीमैन ब्रदर्स के पतन के साथ हुई थी। इससे दुनिया की उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में एक गंभीर आर्थिक मंदी आई और इसने दक्षिण कोरिया, ताइवान और थाईलैंड जैसी तत्कालीन उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से अधिकांश को प्रभावित किया। इस अवधि में, संयुक्त राज्य की आर्थिक और सैन्य श्रेष्ठता छीनी जा रही है, जिसमें अधिकांश पर चीन द्वारा कब्जा किया गया है, जो कुछ विकासशील देशों के लिए एक अधिक आकर्षक राजनीतिक मॉडल भी बन रहा है। पिछली अवधि की तुलना में बहुत तेजी से यूरोपीय संघ, आसियान, रूस, जापान, भारत, ब्रिक्स, आईबीएसए, एससीओ, आदि कई ध्रुवों का उदय हुआ है। वैश्विक शक्ति का आधार धीरे-धीरे, लेकिन निश्चित रूप से पश्चिम से पूर्व, विशेष रूप से एशिया में स्थानांतरित हो रहा है। भारत की विदेश नीति ने गुटनिरपेक्षता को पूरी तरह से छोड़कर इन परिवर्तनों का प्रबलता से उत्तर दिया है।

आज, भारतीय कूटनीति मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, पी-5 के अन्य सदस्य देशों और हमारे पड़ोस पर केंद्रित है। लुक ईस्ट को एक्ट ईस्ट में विस्तारित कर दिया गया है। अफ्रीका पर ध्यान केंद्रित किया गया है और लैटिन अमेरिका भी अब दूर नहीं दिखता है। आर्थिक कूटनीति ने राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों से ऊपर उठकर भारत की विदेश नीति में ध्रुवीय स्थिति प्राप्त कर ली है।

पूरे विश्व में प्रमुख स्थैतिक और गतिशील कारक

तीनों चरणों में, राष्ट्रीय संप्रभुता के मुद्दों के कुछ कमजोर पड़ने और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों द्वारा स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने के बावजूद वैश्विक रूप से संप्रभु राष्ट्र राज्य की पश्चिमी अवधारणा स्थिर बनी हुई है। हालाँकि, अधिकांश मामलों में, राष्ट्र राज्य के हित संयुक्त राष्ट्र जैसे किसी भी सामूहिक राजनीतिक समूह से प्रबल रहे हैं। पिछले सत्तर वर्षों में अपने प्रभाव में अचल रहे अन्य कारकों में निम्नलिखित शामिल हैं (क) ब्रेटन-वुड्स वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, (ख) कुल वैश्विक जनसंख्या आंकड़ों में निरंतर वृद्धि, हालांकि कुछ विकसित देश नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि के संकेत दे रहे हैं, (ग) भूमि, जल, वायु, सूर्य के प्रकाश और खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, जो परिमित हैं, मनुष्य को पृथ्वी के वातावरण से परे, अन्य ग्रहों में ऐसे संसाधनों की खोज करने के लिए प्रेरित करते हैं, और (घ) अलग-अलग समय पर येन, यूरो और हाल ही में चीनी रेनमिनबी जैसी अन्य मुद्राओं को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद अमेरिकी डॉलर के प्रति वैश्विक वरीयता।

पिछले सात दशकों में अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के सबसे गतिशील पहलू रहे हैं:

- हमारे दैनिक जीवन में तकनीकी परिवर्तन का प्रभाव, आज के छोटे इंटरनेट से जुड़े हाथ में उठाये जाने वाले मोबाइल उपकरण, पिछले दो दशकों में हुए भारी बदलाव का एक उदाहरण है;

- भारत सहित वैश्विक गरीबी और संकट के स्तर में उल्लेखनीय कमी;

- संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों की संख्या में वृद्धि, जिसमें दक्षिण सूडान और तिमोर लेस्ते जैसे नए संप्रभु राज्य शामिल हैं

- जलवायु परिवर्तन और हमारे जीवन पर पर्यावरणीय गिरावट के नकारात्मक प्रभाव के बारे में बढ़ती चिंता; तथा

- सैन्य व्यय में वृद्धि, हालांकि भारत सहित सभी देशों में, देश के सकल आंतरिक उत्पाद के प्रतिशत की दृष्टि से, रक्षा बजट में गिरावट आ रही है।

भारत की विदेश नीति के क्षेत्र में स्थिरता और गतिशीलता

अब हम अपना ध्यान भारत की ओर करते हैं, निम्नलिखित कारक भारत की विदेश नीति में स्थिरता लाने में योगदान करते हैं:

- विशेष रूप से दक्षिण एशिया में भारत के पड़ोसियों की तुलना में, देश की सापेक्ष राजनीतिक स्थिरता;

- भारत के संस्थापकों द्वारा 1950 में किए गए संवैधानिक विकल्पों से प्रभावित सामाजिक-धार्मिक संतुलन;

- निरंतर राज्य के नेतृत्व वाले प्रयास से गरीबी में कमी और इसका उन्मूलन;

- विदेश नीति और व्यवहार में रणनीतिक स्वतंत्रता की मांग की जाती है जिसे इस तथ्य से रेखांकित जाता है कि नीति उपकरण के रूप में गुटनिरपेक्षता को त्यागने के बावजूद, भारत विशेष रूप से सतर्क रहा है कि उसे किसी तीसरे देश या देशों के समूह के लिए निर्देशित किसी भी शिविर या गठजोड़ से संबंधित नहीं माना जाए;

- भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) द्वारा प्रदान की जाने वाली निरंतरता जो विदेश मंत्रालय और विदेशों में स्थित सभी भारतीय राजनयिक मिशनों और विशेष कार्यालयों में अधिकांश पदों पर काम करने वाली जनशक्ति प्रदान करती है।

भारत की विदेश नीति की प्रक्रिया को कौन गतिशील और उत्तरदायी बनाता है? ये कारक हैं:

- भारत की भूराजनीतिक क्षमता। भारत स्पष्ट रूप से दक्षिण एशिया की एक प्रमुख शक्ति है और हिंद महासागर क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी है;

- भारत की सेना, जो विश्व स्तर पर तैनात जनशक्ति के मामले में दूसरी सबसे बड़ी सेना है और हमारे वार्षिक रक्षा बजट के मामले में तीसरी सबसे बड़ी सेना है – यह एक ऐसा कारक है जो हमारी राजनयिक मुद्राओं के लचीलेपन में योगदान देता है;

- वर्तमान में भारत को प्राप्त जनसांख्यिकीय लाभांश भारत की सहस्राब्दी की महत्वाकांक्षा और अभियान पर आधारित है, जो आम तौर पर यथास्थिति और गतिशील हैं;

- विदेशी संबंधों की स्थापना पर चीन के दबाव का मुकाबला करना भारत में हर स्तर पर नवाचार सुनिश्चित करता है;

- राष्ट्र राज्यों के बीच, विशेष रूप से वैश्विक संसाधनों और तकनीकी प्रगति के लिए प्रतिद्वंद्विता, नीतिगत मुद्दों और कूटनीतिक प्रथाओं को संभालने में लोच उत्पन्न करती है;

- डिजिटलीकरण के प्रति असंबद्ध गतिविधि राजनयिकों के एक दूसरे के साथ और जनता के साथ संपर्क करने के तरीके में बदलाव की शुरुआत कर रही है; पासपोर्ट और वीजा जैसी सार्वजनिक सेवाएं अब तेजी से डिजिटल हो रही हैं;

- दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों की संख्या 20 से 25 मिलियन के बीच है, जो केवल चीनी प्रवासियों के बाद दूसरे स्थान पर हैं, ये भारत के विदेशी संबंधों और उपलब्धियों में गतिशीलता जोड़ते हैं;

- बढ़ते भारतीय बाजार का आकार केवल देश-आधारित उद्यमियों के लिए ही अच्छी खबर नहीं है, बल्कि भारत के कूटनीतिज्ञों के लिए भी बात करने का एक अच्छा अवसर है, जो कठिन मुद्दों, विशेष रूप से व्यापार और आर्थिक कूटनीति के संबंध में, बातचीत करते समय प्रतिदान पर बात करने का अवसर देता है।

भारत की विदेश नीति को आकार देने वाली प्रमुख घटनाएं

भारत की विदेशी और बाहरी सुरक्षा नीतियों में प्रमुख वर्ष और प्रासंगिक घटनाएँ निम्नलिखित हैं:

1947 –पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर आक्रमण

1962 - भारत-चीन युद्ध

1965 –भारत-पाकिस्तान युद्ध

1971 –बांग्लादेश की मुक्ति

1991 –यूएसएसआर का पतन; भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी कमी

1998 –पोखरण में भारत का परमाणु परीक्षण; पाकिस्तान द्वारा जवाबी कार्रवाई में परीक्षण

1999 –पाकिस्तान द्वारा कारगिल में घुसपैठ

2001 –न्यूयार्क में ट्विन टावर्स पर बमबारी सहित अमेरिका में 9/11 को हुए आतंकवादी हमले, भारतीय संसद पर आतंकी हमला;

2008- पाकिस्तान द्वारा मुंबई में आतंकवादी हमले; अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स का पतन और अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक मंदी का आरंभ

2014 –प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने भारतीय विदेश नीति में नई जान फूंकी - भारत की 'महान शक्ति' बनने की महत्वाकांक्षा के बारे में अटल रहना

विदेश नीति के लक्ष्य और भारत की राजनयिक पहुँच

प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत की प्रमुख विदेश नीति के लक्ष्यों की दिशा पर प्रभाव डालने वाली घटनाओं के कालक्रम से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान, चीन, पूर्व यूएसएसआर (अब रूस) और अमेरिका ऐसे देश हैं जो हमारी नीतियों को आकार देने में बाकी देशों की तुलना में अधिक प्रभावी हैं। इसलिए हमारी राजनयिक व्यस्तता का इन देशों पर केंद्रित होना और हमारे कुछ सबसे बड़े दूतावास और राजनयिक प्रतिनिधित्व का इन देशों में स्थित होना आश्चर्य की बात नहीं है।

स्पष्ट है कि, दक्षिण एशिया और क्षेत्र में हमारे निकट पड़ोसियों के साथ लगभग दैनिक आधार पर संबंध बन रहे हैं। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के साथ यह बहुत हद तक गंगा नदी के जल स्तर के बढ़ने या घटने जैसे मुद्दों पर, क्योंकि गंगा बांग्लादेश में भी बहती है और भारत में लगभग 10,000 बांग्लादेशी आगंतुकों के दैनिक आवागमन और तस्करों और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के बीच नियमित झड़पों पर आधारित है, क्योंकि मवेशियों और अन्य वस्तुओं को अवैध रूप से सीमा पार ले जाया जाता है। भारत की विदेश नीति पिछले अनुच्छेद में सूचीबद्ध चार देशों के अलावा, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, अफगानिस्तान, श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस जैसे हमारे निकटस्थ पड़ोसी देशों की ओर बहुत ज्यादा लक्षित है। शेष पी-5 देश, फ्रांस और ब्रिटेन और जापान, जर्मनी, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी प्रमुख शक्तियां भी हमारे राजनयिक जुड़ाव के रडार पर बहुत अधिक प्रमुखता रखती हैं। राजनयिक मिशनों के हमारे दूसरे पायदान इन्हीं देशों में स्थित हैं और भारतीय राजदूत और इन देशों के उच्चायुक्त, भारत सरकार के सचिव और अतिरिक्त सचिव के स्तर के बहुत वरिष्ठ रैंक के हैं।

विभिन्न देशों के साथ भारत के विदेशी संबंधों की ऐसी श्रेणीबद्ध रैंकिंग केवल संदर्भ के उद्देश्यों के लिए है, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत 'बी' या 'सी' देशों के साथ अपने संबंधों को 'ए' श्रेणी के देशों से हीन मानता है। यह केवल देश के द्विपक्षीय संबंधों की गहराई को दर्शाता है। चूंकि राजनयिक अधिकारियों सहित कूटनीति को आगे बढ़ाने के लिए सीमित संसाधन हैं, भारत सहित किसी भी देश को अपनी उपलब्ध जनशक्ति और उपलब्ध बजट को आवंटित करने की आवश्यकता होती है, जो विभिन्न देशों के साथ इसके व्यवहार की आवृत्ति पर निर्भर करता है, जिस पर विदेशों में हमारे दूतावासों का बड़े, मध्यम और छोटे आकार का होना निर्भर है। ऐसे कार्यालयों की संख्या संबंध की गहराई और मानव और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता पर भी निर्भर करती है। आज, 129 देशों में भारत के निवासी राजनयिक मिशन भौतिक रूप से मौजूद है और 2019 और 2020 तक हम अफ्रीकी देशों में कम से कम 11 अन्य निवासी मिशन खोलने की ओर अग्रसर है। इस प्रकार, 2020 तक, संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 140 देशों में भारत का प्रतिनिधित्व एक राजदूत या उच्चायुक्त (जैसा कि राष्ट्रमंडल सदस्य देशों में राजनयिक मिशन के प्रमुख के रूप में जाना जाता है) और अपने स्वयं के कार्यालयों द्वारा किया जाएगा। शेष 50+ देशों में, जहाँ वर्तमान में हमारे निवासी दूतावास या वाणिज्य दूतावास नहीं हैं, पड़ोसी या निकट के देश में रहने वाले भारत के राजदूत या उच्चायुक्त, भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं और एक प्रमुख स्थानीय निवासी के माध्यम से काम करते हैं, जिन्हें उस देश में भारत के 'मानद राजनयिक' के रूप में जाना जाता है। दुनिया भर में जिन देशों के साथ हमारे राजनयिक संबंध हैं, उन सभी देशों में भारत की मौजूदगी, आकार, शक्ति या दूरी में अंतर के बावजूद हमारे द्वारा द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े देशों को दिए जाने वाले महत्व को दर्शाती है।

यह वैश्विक कूटनीतिक उपस्थिति भारतीय प्रवासी - विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों (जिन्हें अनिवासी भारतीय भी कहा जाता है), भारत से अस्थायी आगंतुकों जैसे व्यापारी, पर्यटक, रिश्तेदार, आदि, और ओसीआई कार्ड रखने वाले भारतीय मूल के लोग, जिनके अपने जन्म या अपने पूर्वजों की भूमि के साथ भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक जुड़ाव है, उन सभी के हितों का भी ध्यान रखती है। चूंकि 20-25 मिलियन भारतीय प्रवासी कई भौगोलिक, क्षेत्रों और देशों में बिखरे हुए हैं, इसलिए भारत के व्यापक कूटनीतिक नेटवर्क और पहुंच के माध्यम से उनके राजनयिक, व्यवसायिक और अन्य आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। इस नेटवर्क ने दक्षिण एशिया में भारत के मित्र पड़ोसी देशों की भी सेवा की है, जिनके नागरिकों को कुछ वर्ष पहले यमन से और एक दशक पहले लेबनान में संकट के समय राजनयिक पहुंच, बचाव और निकासी प्रदान की गई थी। भारत ने इन युद्धग्रस्त क्षेत्रों से भारतीयों की निकासी के साथ-साथ नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के नागरिकों को भी निकालने की व्यवस्था की। ऐसे संकेतों का हमारे छोटे पड़ोसी देशों के लोगों और सरकारों पर एक अच्छा, सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति के लक्ष्यों की चुनौतियाँ

अब हमारे पास भारत की विदेश नीति को आकार देने वाले स्थिर और गतिशील कारकों और विदेश में हमारे प्रतिनिधित्व के माध्यम से कूटनीति के काम करने के तरीके और यह किसकी सेवा करता है, इसके बारे में काफी अच्छी जानकारी है, तो आइए हम विदेश नीति के निर्माण और व्यवहार में सामने आने वाली चुनौतियों को देखें।

परमाणु अस्त्र, परमाणु निरस्त्रीकरण एवं अस्त्रों पर नियंत्रण ऐसे मुद्दे हैं, जो आमतौर पर उत्तर कोरिया द्वारा विषम परमाणु सक्षम मिसाइल लॉन्च करने के अलावा, समाचारों की सुर्खियाँ नहीं बनते। हालांकि, परमाणु हथियार प्रौद्योगिकी के प्रसार सहित तेजी से हथियारबंद हो रही दुनिया द्वारा उत्पन्न खतरा एक चुनौती है जिसका कोई तत्काल उपचार नहीं है। अमेरिका-रूस का परमाणु हथियार हटाने का कार्यक्रम और ईरानी परमाणु समझौता अव्यवस्थित हैं। कहीं भी गैर-जिम्मेदार राज्यों और गैर-राज्य पक्षों के हाथों से इस तरह के हथियारों और इसकी तकनीक को प्रतिबंधित करने का प्रयास भी नहीं चल रहा है। ऐसे परिदृश्य में, भारत के पास अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम और नीति की समीक्षा के लिए कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा एक ऐसी चीज है जिसके लिए आपको पेट्रोल और डीजल पंप की कीमतों के बारे में पता होना चाहिए। हालाँकि आज भी ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन कोयला और कच्चे तेल जैसे हाइड्रोकार्बन स्रोतों पर भारत की बहुत अधिक निर्भरता है। हमारे पास कोयले के पर्याप्त भंडार हैं, पर तथ्य यह है कि यह ऊर्जा का बहुत साफ स्रोत नहीं है और हमारे पास स्टील बनाने जैसे महत्वपूर्ण उद्योगों के लिए पर्याप्त मात्रा में उच्च कैलोरी मूल्य के कोयले की कमी है, इससे हमें तेल और गैस जैसे अन्य उपलब्ध स्रोतों की ओर झुकना पड़ता है। दुर्भाग्य से, देश में पर्याप्त उपलब्धता के अभाव में, तेल और गैस के आयात पर भारत की निर्भरता पिछले वर्षों में और बढ़ी है। आयात पर इस तरह की निर्भरता ने हमारी अर्थव्यवस्था को समय-समय पर होने वाले तेल की कीमत और उपलब्धता के झटके से अवगत कराया है। भारत ने सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं, और देश के भीतर अधिक मात्रा में तेल और गैस की निकासी की है, लेकिन हम इन लक्ष्यों तक पहुंचने से कई वर्ष दूर हैं। इस बीच, विदेश नीति को सावधानी से चलाना है ताकि मध्य पूर्व और ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित न हो। ईरान और वेनेजुएला के तेल के स्रोतों पर अमेरिका का मौजूदा एकतरफा प्रतिबंध विशेष रूप से कठिन साबित हुआ है, अतएव भारत को अमेरिका पर अपनी रणनीतिक निर्भरता के प्रति सचेत रहने और ईरान के साथ अपने सदियों पुराने संबंधों और वेनेजुएला के साथ अपने मित्रतापूर्ण संबंधों को और भी दृढ़ बनाए रखने की जरूरत है।

जल, कहा जाता है, यह इस सदी में संघर्ष का मुख्य स्रोत होगा। दुनिया भर में पानी की तनावपूर्ण स्थिति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, भारत जैसी उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में समस्या बढ़ रही है और इसकी बढ़ती आबादी के कारण पानी की मांग भी बढ़ रही है। विदेश नीति और कूटनीति यह सुनिश्चित करती है कि बहुपक्षीय या वैश्विक जल साझाकरण समझौतों पर बातचीत करते समय भारत के वैध दावों की अनदेखी नहीं की जाती है। इससे पहले, मैंने उदाहरण दिया था कि गंगा नदी में पानी के स्तर में कमी या वृद्धि बांग्लादेश के साथ हमारे संबंधों को कैसे प्रभावित करती है।

खाद्य सुरक्षा एक ऐसा शब्द है जिससे आप सभी परिचित हैं।1970 के दशक के उत्तरार्ध तक, जब हम पड़ोस की राशन की दुकान पर हर साप्ताह कतारबद्ध होते थे या 'खाद्य नियंत्रण आदेश' से विवाह जैसे सार्वजनिक कार्यों में कुछ वस्तुओं की खपत को सीमित किया गया था, तब तक आप में से बहुत से लोग या तो पैदा भी नहीं हुए थे या इतने छोटे थे कि भोजन की कमी को याद नहीं कर सकते। सौभाग्य की बात है कि भारत ने उस बाधा को पार कर लिया है, लेकिन वैश्विक आबादी में लगातार वृद्धि, भूमि और पानी जैसे संसाधनों का परिमार्जन और भविष्य में खाद्य उत्पादकता में कमी की आशंका बढ़ रही है, इसका मतलब है कि हमें इस समस्या के प्रति सचेत रहना होगा और हो सकता है कि भविष्य में भोजन के लिए वैश्विक हाथापाई हो।

आतंकवाद शायद ही कभी अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान करता है। राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रयास के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के बिना, इस वैश्विक खतरे को समाप्त करना असंभव है। खुफिया जानकारी साझा करना, हथियारों, प्रौद्योगिकी और वित्त पोषण के स्रोतों को बंद करना, अपराधियों को न्याय के अंतर्गत लाना, आदि कुछ ऐसे उपाय हैं जो क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय वार्ता के माध्यम से किए जाने चाहिए। यह तीन या चार दशकों से भारतीय विदेश नीति और कूटनीति में बहुत सक्रिय है।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट किसी के भी हित में नहीं है। हालाँकि, अत्यधिक औद्योगीकृत देश जिनके विकास और समृद्धि के मार्ग सदियों पहले शुरु हुए थे, वे आज की स्थिति के प्रमुख कारण हैं। भारत अभी अपनी आर्थिक वृद्धि के आरंभिक चरण में है। दुर्भाग्य से, पारंपरिक प्रदूषक बिना कूटनीति के, शमन उपायों को लागू करके उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के विकास पथ पर अंकुश लगाना चाहते हैं, जो देर से औद्योगिकीकरण शुरू करने वाले देशों के लिए अनुचित हैं। भारत जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट के नकारात्मक पहलुओं को हल करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है, लेकिन इसे उन शर्तों को स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो अधिक विकसित देशों पर लगाए गए हैं।

महामारी, मादक पदार्थों की तस्करी और मानव तस्करी अन्य प्रमुख समस्याओं में से एक हैं जिन पर अंकुश लगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। इन समस्याओं के खिलाफ वैश्विक युद्ध में हमारी भूमिका को ध्यान में रखते हुए भारत की विदेश नीति को संशोधित किया गया है और हमारे राजनयिक इस मोर्चे पर बहुत सक्रिय हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकारों की विदेश नीति की अनूठी विशिष्टताएँ

अब आपको 1991 के बाद की भारत की विदेश नीति की बदलती गतिशीलता की एक व्यापक तस्वीर मिल चुकी है, तो हम मई 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के मुख्य तत्वों पर एक नज़र डालकर इस व्याख्यान को समाप्त कर सकते हैं।

अपने 2014 के चुनाव घोषणापत्र में, भाजपा ने एक परिकल्पना की थी, और मैं उसे उद्धृत कर रहा हूँ, "यह दृष्टिकोण मौलिक रूप से विदेशी नीति लक्ष्यों, सामग्री और प्रक्रिया को इस तरीके से पुनः आरंभ और पुनर्विन्यासित करने का है, जो एक नए प्रतिमान में भारत के वैश्विक रणनीतिक जुड़ाव और एक व्यापक कैनवस पर आधारित है…”, [मोदी सिद्धांत, संपादक, अनिर्बान गांगुली, विजय चौथाइवाले, उत्तम कुमार सिन्हा, पृष्ठ 4]। राजनीतिक कूटनीति का उपयोग करते हुए, भारत के क्षेत्रीय और वैश्विक दोनों प्रकार के आर्थिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए, ऐसी विदेश नीति के प्रतिमान का लक्ष्य, समानता और पारस्परिकता के सिद्धांतों के आधार पर, भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और यह सुनिश्चित करना है कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इसकी आवाज सुनी जाती है।

प्रधान मंत्री मोदी के कार्यकाल के विशेष तत्व, जो पिछले प्रशासन से अलग हैं:

- पड़ोसी पहले नीति (नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी) - 2014 के शपथ ग्रहण समारोह में सभी सार्क नेताओं और 2019 में बिम्सटेक नेताओं की उपस्थिति; सार्क उपग्रह; एक्ट ईस्ट नीति;

- व्यापार, एफडीआई और भारत के आर्थिक विकास एवं विकास में योगदान देने वाले मेक इन इंडिया को निरंतर आगे बढ़ाना;

- मात्र एक 'संतुलन कर्ता बल' की बजाय विश्व स्तर पर, अपने बल पर एक "ध्रुव" के रूप में भारत की ‘प्रमुख भूमिका,

- सैन्य और रक्षा कूटनीति की एक बड़ी भूमिका - वैश्विक हथियार बाजार में केवल एक प्रमुख खरीदार की बजाय आपूर्तिकर्ता के रूप में भाग लेने की इच्छा रखना,

- कनेक्टिविटी, वाणिज्यिक संबंध और सांस्कृतिक जुड़ाव के तीन ‘सी’ मोदीजी की विदेश नीति के मंत्र हैं - प्रवासियों के साथ संबंधों में भारी वृद्धि अभूतपूर्व है;

- मोदी जी के अनुसार, तीन ’डी' अर्थात् लोकतंत्र, जनसांख्यिकी और मांग, दुनिया भर के देशों के साथ भारत के संबंधों के वाहक हैं;

- व्यक्तिगत मित्रता और संबंधों की बड़ी भूमिका, जिसे 'मोदी आलिंगन' द्वारा रेखांकित किया गया है, और कुछ वर्गों से बहुत कटु टिप्पणियों के बावजूद हमने इसे बार-बार देखा है; तथा

- वर्ष 2014 से, विदेश मंत्रालय में एक अलग ‘राज्य प्रभाग’ की स्थापना के बाद से भारत में विदेश नीति के निर्माण और व्यवहार में राज्यों की एक सक्रिय भूमिका देखी गई है।

निष्कर्ष

अब हमारे पास तीन ऐतिहासिक चरणों में भारत की विदेश नीति के विकास का एक व्यापक चित्र है। यह नीति पिछले सत्तर वर्षों में, आमतौर पर स्थिर गति से, लेकिन कभी-कभी तेजी से बदलते वैश्विक या क्षेत्रीय परिदृश्य पर प्रतिक्रिया देने के लिए विकसित हुई है। सौभाग्य से, विदेश नीति पर पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में अधिक आम सहमति व्यक्त की जाती है इसलिए, इसे ढालना और बदलना आंतरिक नीति की तुलना में, जिस पर तत्कालीन सरकारों विरोध का सामना करना पड़ा है, आसान हो गया है।

विदेश नीति केवल ईतनी ही दूर तक जा सकती है और कूटनीति किसी देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्वास्थ्य की सीमा तक प्रभावी हो सकती है। भारत पिछले तीन दशकों से अच्छी वृद्धि और समृद्धि का आनंद ले रहा है। कूटनीति ने भारत की विदेश नीति का अधिक लाभ पहुंचाया है, और दुनिया भर में हमारी राजनयिक उपस्थिति को ठोस और मजबूत बनाने सहित कूटनीति के संचालन के लिए अधिक से अधिक संसाधनों को आवंटित करने की अनुमति दी है।

वर्तमान सरकार के अंतर्गत, भारत ने स्पष्ट रूप से वैश्विक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने की अपनी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है और इसे अपने आप में, ‘ध्रुव’ के रूप में गिना जाता है। देश में निरंतर स्थिरता और समृद्धि, विदेश नीति के व्यापक मापदंडों पर राजनीतिक सहमति, इस लक्ष्य तक पहुंचने में भारत की सहायता करेगी।

आपके धैर्य के लिए आप सबको धन्यवाद देता हूँ। यह आवश्यक नहीं है कि इस व्याख्यान में व्यक्त विचार विदेश मंत्रालय या भारत सरकार के हों।