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ब्रेजिट की विवक्षाएं और भारत-यूके एफटीए की संभावनाएं

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) यशवर्धन कुमार सिन्हा
    Venue: राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, जोधपुर
    Date: सितम्बर 20, 2019

प्रस्तावना

यूके और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच आसन्न अलगाव हॉलीवुड की एक ऐसी उत्कृष्ट रचना में परिवर्तित हो गया है जिसमें नाटकीयता, रहस्य, रोमांच और पूर्वाभास की गहन भावना के अनिवार्य अवयव शामिल हैं जिसके फलस्वरूप एक पहले से ही अस्थिर और फसादपूर्ण मिश्रण तैयार हो गया है जिसका नाम ब्रेजिट है। इसकी उल्टी गिनती आरंभ हो गई है जिसके अंतर्गत केवल 41 दिन शेष रह गए हैं जब येके यूरोपीय संघ से बाहर हो जाएगा, जब तक कि यूके द्वारा इसके लिए आगे समय की मांग न की जाए और उसे ईयू द्वारा प्रदान न कर दिया जाए, जो एक ऐसी संभावना है, जिसे प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द्वारा हाल ही में यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि वे ईयू से इस बारे में विस्तार मांगने के स्थान पर 'कब्र में दफन हो जाना' पसंद करेंगे। संसद में इसके पश्चात् हुए घटनाक्रमों द्वारा इस दिशा में कोई विपरीत परिणाम होने के आसार दिखाई नहीं देते हैं, जब तक कि अगले महीने की समाप्ति से पूर्व चयनात्मक रूप से कोई पृथकीकरण सौदा न किया जाए।

यूके में 23 जून, 2016 को किए गए जनमत-संग्रह के परिणामों ने (5.1 प्रतिशत ने छोड़ने के पक्ष में और 48.1 प्रतिशत ने बने रहने के पक्ष में मतदान किया) इस द्वीपसमूह राष्ट्र को परेशान करना जारी रखा है तथा हाल की घटनाओं ने ग्रेट ब्रिटेन द्वारा सामना किए जा रहे संकटों के परिणाम में वृद्धि ही की है। ब्रेजिट के विषय में अनुमान लगाना तथा यूके और ईयू के बीच अब तक वार्ताओं की जटिलताओं को पहचानना एक अत्यंत दुष्कर कार्य ही रहा है। समस्त प्रक्रिया न केवल अनिश्चितता से घिरी है, बल्कि इसमें वास्तविकता और जमीनी हकीकत की मत पर संवेदनाएं भी भरी हुई हैं। ईयू से बहिर्गमन करने के पीछे तर्काधार के लिए हमें राजनीति और यूके के ऐतिहासिक निर्णय के इतिहास को समझने की आवश्यकता है।

पृष्ठभूमि

जबकि ब्रेजिट के पीछे के कारणों में पर्याप्त रिपोर्टिंग और विश्लेषण किए गए हैं, इस संदर्भ में स्वयं यूरोपीय परियोजना तथा इसके प्रति पारंपरिक ब्रिटिश उभयभाविता को संक्षेप में जान लेना उपयोगी रहेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरांत हुई इसकी उत्पत्ति के साथ ही, यूरोपीय परियोजना इस व्यापक धारणा के साथ आगे विस्तारित हुई कि एक अधिक एकीकृत यूरोप पुन: उस व्यापक पैमाने पर हुए विध्वंस और विनाश का शिकार नहीं बनेगा जिसने बीसवीं शताब्दी के दो भयावह विश्व युद्धों के फलस्वरूप इस महाद्वीप में तबाही ला दी थी। लेकिन, यूके ने, घरेलू तौर पर तो स्वयं को ईयू के एक अनिच्छुक सदस्य के रूप में ही प्रदर्शित किया है। आपको स्मरण होगा कि इसने यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय में शामिल होने से भी इंकार कर दिया था, जिसका स्थापना पेरिस की संधि द्वारा 1951 में की गई थी। इसके उपरांत, 1957 में रोम की संधि के अंतर्गत यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय (यूराटोम) और यूरोपीय आर्थिक समुदाय (ईईसी) की स्थापना के साथ ही इस सहयोग के संभावित लाभ स्पष्ट हो गए। इसके साथ, जर्मनी और फ्रांस में युद्ध के उपरांत की गई भरपाई के फलस्वरूप समस्त देशों में एक पुनर्चिंतन प्रारंभ हो गया। 1963 और 1967 में दो विफल प्रयासों के बावजूद, यूके 1973 में ईईपी में शामिल होने में सफल रहा। उस समय तक, यूरोपीय सहयोग प्रगति करते हुए एक प्रथागत संघ में परिवर्तित हो गया था, जिसने सदस्य राज्यों के मध्य समस्त सीमा-शुल्कों का उन्मूलन कर दिया। ईईसी की सदस्यता के एक वर्ष के भीतर यूके ने ईईसी की कृषि और फार्म नीतियों में व्यापक परिवर्तन करने की मांग करनी प्रारंभ कर दी जो फ्रांस जैसे देशों के लिए अधिक लाभदायक थे। इस अवस्था पर यह स्मरण करना उपयोगी होगा कि नार्वे ने सितम्बर, 1972 के जनमत-संग्रह के माध्यम से ईईसी की सदस्यता के लिए नार्वे के आवेदन को खारिज कर दिया। अत: जनमत-संग्रह का उदाहरण पहले ही विद्यमान था। इसने प्रधानमंत्री हैरोल्ड विल्सन को ईयू की सदस्यता पर 5 जून, 1975 को यूके के प्रथम जनमत-संग्रह को आयोजित करने के लिए प्रभावित किया तथा हालांकि ब्रिटिश जनता ने 67 प्रतिशत मतों के साथ ईयू में बने रहने तथा 33 प्रतिशत मतों के साथ उससे बहिर्गमन करने के परिणाम से, इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की, लेकिन ईईसी में शामिल होने के दो वर्ष के भीतर ही ब्रिटेन ने इससे बाहर होने के विकल्पों पर विचार करना प्रारंभ कर दिया। ईयू की इसकी सदस्यता के दौरान, इसने इसके विभिन्न मुद्दों से बाहर रहने का विकल्प चुना जैसे एक-समान मुद्रा, मानवाधिकार चार्टर, न्याय और गृह कानून आदि।

ब्रेजिट जनमत-संग्रह

आज हम वर्तमान दशक में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ईयू जनमत-संग्रह का विचार प्रधानमंत्री डेविड कैमरून द्वारा 23 जनवरी, 2017 को दिए गए 'उल्लेखनीय ईयू भाषण' (जिसे ब्लूमबर्ग भाषण के रूप में जाना जाता है) में तैयार किया गया था जो निगेल फैराज के अंतर्गत यूके स्वतंत्रता पार्टी (यूकेआईपी) की बढ़ती हुई लोकप्रियता को रोकने के लिए तथा 2015 के आम चुनावों से पहले यूरोसेप्टिक टोरी के अलग-थलग पड़े कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के लिए दिया गया था। डेविड कैमरून ने 2015 के आम चुनावों के लिए कंजर्वेटिव पार्टी के घोषणा-पत्र में यूके की ईयू की सदस्यता पर जनमत-संग्रह कराने का वायदा किया था। महाद्वीप से स्वच्छंद प्रवास से संबंधित मुद्दों का समाधान करने के कैमरून के प्रयास ईयू के विनियमों के चलते विफल होते प्रतीत हो रहे थे, इस तथ्य के बावजूद कि ईयू राष्ट्रिकों द्वारा मुक्त संचलन के परिकल्पित उल्लंघन के विरुद्ध यूके में लोकप्रिय संवेदनशीलता विद्यमान थी।

दक्षिण पंथियों और प्रवासविरोधी भावनाओं (ईयू और गैर-ईयू, दोनों) के विकास को भी नोट करना महत्वपूर्ण है जैसा कि 2010 और 2015 में यूके में आयोजित आम चुनावों के परिणामों में दिखाई देता है।

2015 के आम चुनावों ने यूके के प्रादेशिक और घरेलू राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन की संभावना के मुद्दों को सामने किया। एसएनपी के अच्छे प्रदर्शन का यह अर्थ था कि इस तथ्य के बावजूद 'स्कॉट स्वतंत्रता' अधर में रहेगी कि स्कॉटलैंड ने 2014 के स्कॉट जनमत-संग्रह के परिणाम के माध्यम से यूके के अंतर्गत रहने का निर्णय लिया था। यह भी स्मरण रखा जाना चाहिए कि स्कॉट जनमत-संग्रह के परिणामों ने स्वतंत्रता के मतों (45 प्रतिशत) के विरुद्ध यूके में रहने (55 प्रतिशत) की इच्छा को स्पष्ट रूप से विजयी बनाया। कुल मत अत्यंत उच्च संख्या में (83 प्रतिशत) दिए गए थे।

यूरो-संशयवादी तथा प्रवास-विरोधी भावनाओं में निरंतर वृद्धि होने तथा यूकेआईसी की तुलना में मतों को खो देने के भय को उस निर्णय का मुख्य कारण समझा जाता है कि कैमरून ने ईयू के सदस्यता पर यूके में जनमत-संग्रह करने के अपने आश्वासन को पूरा करने का वायदा क्यों किया।

मैंने 23 जून, 2016 के ऐतिहासिक जनमत-संग्रह का पूर्व में भी उल्लेख किया है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि इंग्लैंड (53 प्रतिशत) और वेल्स (53 प्रतिशत) ने ईयू को छोड़ने के पक्ष में मत किया जबकि स्कॉटलैंड (62 प्रतिशत) उत्तरी आयरलैंड (56 प्रतिशत) ने ईयू में रहने के पक्ष में मत किया। नागरिकों के मतों में भी अंतर था क्योंकि युवाओं ने बने रहने के पक्ष में तथा बुजुर्गों ने उसे छोड़ देने के पक्ष में मत दिया था तथा कुल मत काफी अधिक अर्थात 71.2 प्रतिशत थे। ब्रेजिट के घटनाक्रम में छोड़ने वाले पक्ष के 'नियंत्रण हासिल' करने के तर्क और अधिकाधिक आप्रवासन के भय ने उसमें बने रहने वालों के 'आर्थिक सर्वनाश' के तर्क पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर ली।

जनमत-संग्रह के उपरांत के वार्तालाप

जनमत-संग्रह के परिणामों से अधिकांशत: आश्चर्य की लहर व्याप्त हुई तथा उससे प्रधानमंत्री डेविड कैमरून का तत्काल ही बहिर्गमन हो गया। नए प्रधानमंत्री थेरेसा मे, जो उसमें बने रहने के लिए अनिच्छुक थी, को ईयू के साथ संबंधों को क्षीण करने का ऐतिहासिक निर्णय लेने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ा। लगभग छह माह पश्चात् ब्रेजिट के क्रियान्वयन पर यूके सरकार की नीति का पहला विचार सामने आया जब प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने 17 जनवरी, 2017 को लैंचेस्टर हाउस में दिए गए एक भाषण में ब्रेजिट के उपरांत 'वैश्वीकृत ग्रेट ब्रिटेन' के सरकार के दृष्टिकोण को रेखांकित किया और ईयू के साथ वार्तालाप की प्राथमिकताओं को भी उजागर किया। उनके उद्देश्यों में शामिल था - ईयू के साथ व्यापक मुक्त व्यापार करार को अंतिम रूप प्रदान करना, ईयू से आप्रवासन का नियंत्रण तथा यूके और आयरलैंड के बीच सामान्य यात्रा क्षेत्र को बनाए रखना। उन्होंने यह पुष्टि की कि यूके एकल बाजार तथा सीमा-शुल्क संघ को छोड़ देगा। उन्होंने वापसी के करार तथा एक नए मुक्त व्यापार करार पर समांतर वार्तालाप किए जाने पर भी बल प्रदान किया।

ब्रिटेन ने औपचारिक रूप से 29 मार्च, 2017 को अनुच्छेद 50 में संशोधन की बात को प्रस्तुत किया जब प्रधानमंत्री द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष डोनाल्ड टस्क को प्राप्त हुआ। इसके उपरांत संसद की दोनों सभाओं द्वारा अनुच्छेद 50 विधेयक को अनुमोदित किया गया।

ब्रेजिट घटनाक्रम के प्रति ईयू की प्रतिक्रिया यूरोपीय परिषद द्वारा ब्रेजिट वार्तालापों के लिए 31 मार्च, 2017 को मसौदा दिशा-निर्देश जारी करने के रूप में व्यक्त की गई। इन दिशा-निर्देशों अथवा वार्तालाप निर्देशों में अधिकारों और दायित्वों के संतुलन को अनुरक्षित करने, समान अवसर प्रदान करना सुनिश्चित करने (यूके को कर-आश्रय स्थली बनने में सहायता करना), ईयू को यूके की देयता का अंतिम रूप से वित्तीय समाधान करने, एकल बाजार की एकता को अनुरक्षित करने, 'चार स्वतंत्रताओं' की अदृश्यता का पता लगाने तथा यह सुनिश्चित करने कि वहां कोई 'वरीयता प्रदान न की जाए' के लिए मौखिक सिद्धांतों को निर्धारित किया गया था। यह भी समझ लिया गया था कि अनुच्छेद 50 के अंतर्गत वार्तालाप एक 'सिंगल पैकेज' के रूप में संचालित किए जाएंगे तथा एक चरणबद्ध दृष्टिकोण को अंगीकरण पहले एक करार को वापस लाने की सहमति होगा उसके बाद संक्रमणकालीन व्यवस्थाओं का निष्कर्ष निकाला जाएगा जिसके फलस्वरूप ईयू और यूके के बीच (एक तीसरे देश के रूप में) भावी संबंध का करार किया जाएगा।

ईयू के लिए प्राथमिकताएं दिशा-निर्देशों में प्रतिबिंबित की गई थीं जिनमें यूके में ईयू नागरिकों तथा ईयू में ब्रिटिश नागरिकों के अधिकारों और उनकी हैसियत के लिए अन्योन्य गारंटी, आयरलैंड में सीमा विवाद को दूर किए जाने की आवश्यकता, ईयू का देय ब्रिटिश वित्तीय प्रतिबद्धता के निपटान, विधिक निर्वात तथा ईयू व्यापारियों की अनिश्चितताओं का निवारण करने और यूके के साथ और उसमें किए जा रहे व्यापार को संगठित करने और साथ ही 29 मार्च, 2015 को यूके के औपचारिक बहिर्गमन के पश्चात् ईयू द्वारा यूके के साथ घनिष्ठ भागीदारी अनुरक्षित करने की आकांक्षा को भी शामिल किया गया था।

मैं अनुच्छेद 50 में संशोधन किए जाने के उपरांत यूके और ईयू के बीच संचालित किए गए विस्तृत वार्तालापों के विवरणों में नहीं जाना चाहता हूं। लेकिन, वार्तालापों में आए वर्तमान गतिरोध को समझने के उद्देश्य से कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर नज़र डालना प्रासंगिक प्रतीत होता है।

जून, 2017 में मध्यावधि चुनाव आयोजित कराने का निर्णय प्रधानमंत्री मे के लिए काफी नुकसानप्रद सिद्ध हुआ क्योंकि उन्होंने वह बहुमत खो दिया जो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री से हासिल किया था। इसके परिणामस्वरूप, उनकी ईयू के साथ वार्तालाप करने की रणनीति प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई और अंतत: वे इस संबंध में किसी 'सौदे' को प्रस्तुत करने और उसे अनुमोदित कराने के लिए संसद में समर्थन हासिल करने के लिए निरंतर संघर्ष करती रही।

ईयू के साथ वार्तालापों में यूके की स्थिति का पश्चातवर्ती विघटन 2018 के ग्रीष्मकाल के 'चेकर्स प्लान' के साथ सामने आया जिसने यूके और ईयू के बीच भावी संबंध का ऐसा प्रकार निर्धारित किया जिसे यूके ने ब्रेजिट वार्तालापों में हासिल करने की इच्छा व्यक्त की थी। मुख्य प्रस्तावों में निर्बाध व्यापार बनाए रखने के लिए वस्तुओं हेतु एक मुक्त व्यापार क्षेत्र शामिल किया गया था जिसे एक सामान्य नियम पुस्तिका और एक नई सुकर बनाई गई सीमा-सुरक्षा व्यवस्था द्वारा समर्थन दिया गया था परंतु केवल उन्हीं नियमों के लिए जो सीमा पर निर्बाध व्यापार को सुकर बनाने के लिए आवश्यक हों। ब्रेजिट के पंजीकरण सचिव डेविड डेविस और विदेश सचिव बोरिस जॉनसन के त्याग-पत्रों के अलावा, में को उनकी योजना को ईयू द्वारा अस्वीकार किए जाने के निर्णय का भी सामना करना पड़ा। ईयू ने यह पक्ष अपानाया कि यूरोपीय एकल बाजार की एकता का मोलभाव नहीं किया जा सकता है और बाजार की चार स्वतंत्रताओं अर्थात् लोगों, माल, सेवाओं और पूंजी का स्वतंत्र संचलन को चुनने में भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

दोनों पक्षों के बीच वार्तालापों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा आयरलैंड की सीमा के ब्रेजिट उपरांत व्यवहार से संबंधित था। ईयू की राय यह थी कि उत्तरी आयरलैंड के लिए तथाकथित बैक स्टॉप (आपातकालीन सतर्कता) विकल्प यूके के साथ किए गए दिसम्बर, 2017 चरण-एक करार का महत्वपूर्ण भाग था तथा यह तब तक लागू रहना जारी रखा जाना था 'जब तक कोई अन्य समाधान प्राप्त नहीं हो जाता।' मे ने ईयू बैक स्टॉप को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह अस्वीकार्य है क्योंकि यह विद्यमान भू-सीमा को प्रभावशाली रूप से आयरलैंड सागर में स्थानांतरित कर देगा जिससे यूके की संप्रभुता से समझौता करना पड़ेगा। तथापि, भौगोलिक संकेतकों, वैयक्तिक आंकड़ों, शासन, करार की वापसी के क्रियान्वयन तथा आयरलैंड की सीमा के ब्रेजिट उपरांत व्यवहार के क्षेत्रों में यूके और ईयू के बीच व्यापक मतभेद होने के बावजूद, आश्चर्यजनक रूप से दोनों पक्ष एक ही विचारधारा पर पहुंचे और ईयू से ब्रिटेन के बहिर्गमन को प्रशासित करने वाला 'प्रत्याहार करार' नवम्बर, 2018 को प्रकाशित हुआ और उसके उपरांत उसे यूरोपीय परिषद द्वारा अनुसमर्थित किया गया।

ब्रिटिश संसद में प्रत्याहार करार को पारित किया जाना एक बिल्कुल ही अलग कहानी थी। दिसम्बर, 2018 में अधूरा रह गया मतदान जनवरी, 2019 में पूर्ण हुआ जिसमें सरकार 230 मतों के व्यापार अंतर से पराजित हुई। फरवरी, 2019 के लिए देय आगामी मतदान मार्च तक स्थगित कर दिया गया जिसमें सरकार के प्रस्ताव के विरुद्ध 149 मतों से उसे पराजय का सामना करना पड़ा। इस दौरान, हाउस ऑफ कामंस ने किसी भी परिस्थिति में न केवल 'नो-डील ब्रेजिट' के विरुद्ध बल्कि द्वितीय जनमत-संग्रह के विरुद्ध भी मतदान किया। संसद में मतदानों की श्रृंखला ने सरकार को हैरान कर दिया था परंतु अंतत: अनुच्छेद 50 पर किए मतदान से वह पारित हो पाने में सफल रहा।

यह स्पष्ट था कि प्रधानमंत्री मे के हिस्से में कांटों भरा ताज आया था। विभाजित संसद तथा कंजवेटिव और लेबर दलों के बीच अत्यंत कड़ा मतभेद एक निरंतर ध्रुवीकृत होते राष्ट्र की दिशा में संकेत था। आयरलैंड का बैकस्टॉप एक अत्यंत निर्णायक गतिरोध सिद्ध हुआ। मे ने स्वयं को कुएं और खाई के बीच एक अत्यंत विषम परिस्थिति में पाया। अपने दल को और संसद को आश्वस्त कर पाने की उनकी असमर्थता के परिणामस्वरूप वे अंतत: जून में अनुदारपंथी नेता के रूप में पद छोड़ने के लिए विवश हुई और उन्होंने जुलाई, 2019 में प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया। कंजरवेटिव दल के बीच नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा में बोरिस जॉनसन को प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया। ब्रेजिट ने पहले ही दो प्रधानमंत्रियों को उनके पद से हटा दिया था तथा तीसरा प्रधानमंत्री ईयू से यूके से निकट भविष्य में अलग होने के दुरुह कार्य को, उसकी समस्त नकारात्मक प्रवृत्तियों के बावजूद, प्रबंधित करने का प्रयास कर रहा था। श्री जॉनसन ने 'नो-डील ब्रेजिट' पर इस माह संसद में निर्णायक मत हारने तथा संसद को विवादास्पदरूप से निलंबित कर अक्तूबर में नए चुनाव की घोषणा की उनकी योजना के पश्चात् स्वयं को एक अत्यंत विषम परिस्थिति में पाया जो एक ऐसा कदम है, जिसे यूके के उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है।

उनके इस कथन के बावजूद कि वे इस गतिरोध को समाप्त करने का कोई मार्ग तलाश लेंगे, यह स्पष्ट है कि 16 सितम्बर, को लक्जमबर्ग में यूरोपीय आयोग के प्रेजीडेंट जीन-क्लाउड जंकर के साथ हुई उनकी बैठक कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ पाई है। जैसे-जैसे ब्रेजिट निकट आता जा रहा है, आगामी 41 दिन ब्रिटेन और यूरोपीय इतिहास के अध्यायों के लिए अत्यंत निर्णायक बन गए हैं।

ब्रेजिट का प्रभाव

यूके और साथ ही ईयू पर ब्रेजिट के प्रभाव का परिमाण इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या यूके किसी सौदे के साथ उससे अलग होता है अथवा नहीं। किसी भी सौदे का यह अर्थ होगा कि यूके के हटने के पश्चात् कोई संक्रमणकालीन अवधि नहीं होगी तथा ईयू के कानून तत्काल ही यूके पर लागू होने प्रारंभ हो जाएंगे। जब तक इसके उपचार के लिए उपाय नहीं किए जाते हैं, इसके यूके के लिए अत्यंत गंभीर परिणाम हो सकते हैं जबकि ईयू पूर्णत: सुरक्षित बना रहेगा।

ऐसी किसी स्थिति में, अत्यंत निराशाजनक परिस्थितियों की परिकल्पना की गई है जिनका यूके के अधिकारित दस्तावेजों में भी उल्लेख किया गया है। मैं आपको पिछले वर्ष की एक रिपोर्ट का स्मरण कराना चाहता हूं जब मैं लंदन में था, जिसमें उस भयावह स्थिति के बारे में अधिकारिक रूप से अनुमान लगाया गया था जिसका सामना ब्रिटिश लोगों द्वारा ऐसी स्थिति में किया जाना था, यदि यूके बिना किसी सौदे के ईयू से बाहर हो जाता है। यह कल्पना की गई थी कि कुछ ही दिनों में डोवर पत्तन बंद हो जाएगा तथा माल यातायात संबंधों में व्यवधान उत्पन्न होगा। तीन दिन के भीतर स्कॉटलैंड में औषधि भंडारों में अनिवार्य जीवन-रक्षक दवाओं का अभाव हो जाएगा; खाद्य पदार्थों विशेष रूप से ताजी सब्जियों और फलों के मूल्यों में वृद्धि होगी तथा सुपर मार्केटों में सामान की कमी होगी और दामों में वृद्धि होगी; किसी समर्थकारी करार के अभाव में द्वीपीय राष्ट्रों और महाद्वीप के बीच हवाई यात्राएं बाधित होंगी; ईयू में पढ़ने वाले यूके के छात्र तथा यूके में पढ़ने वाले ईयू के छात्रों द्वारा अनिश्चितता की अवधि का सामना करना होगा; यूके के प्रवेश बिंदुओं पर आप्रवासन नियंत्रण तत्काल ही सुदृढ़ बनाए जाने की आवश्यकता होगी, जिसके साथ ही हीथ्रो जैसे विमानपत्तनों पर आप्रवासन काउंटरों में लगने वाली लंबी-लंबी कतारों में और भी वृद्धि हो जाएगी, आदि। यह उन गंभीर प्रतिकूल प्रभावों की पूर्ण सूची नहीं है जिनके 'नो-डील ब्रेजिट' द्वारा उत्पन्न होने की आशा है, बल्कि यह तो केवल उन व्यवधानों और विषम परिस्थितियों का एक संकेत मात्र है, जिनके उत्पन्न होने का अनुमान भर लगाया जा रहा है।

यदि किसी राष्ट्र के सम्मुख इतनी अधिक अनिश्चितताएं विद्यमान हो, तो किसी अन्य कार्य की योजना नहीं बनाई जा सकती है। डील के बिना ब्रेजिट यूके को अत्यंत विषम अवस्था में डाल देगा जिससे मंदी तक आने की संभावना है। सीबीआई, बैंक ऑफ इंग्लैंड तथा अन्य के चिंता के स्वरों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। विश्व के नेता भी एक विषम ब्रेजिट की चेतावनी दे रहे हैं।

सैकड़ों बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विशेष रूप से भारत, कोरिया, जापान और चीन की कंपनियों ने यूरोप तक स्वतंत्र पहुंच होने के कारण यूके में निवेश किया है। वे अपने भावी व्यवसाय को सुरक्षित करने तथा यूरोप में विकास करने के लिए कहीं और स्थापित होने पर विचार कर रही हैं। कुछ तो पहले से ही स्थानांतरित हो गई हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष के प्रारंभ में, 350 ब्रिटिश कंपनियां 'नो-डील ब्रेजिट' की स्थिति में अपने व्यवसायों को हालैंड लेकर जाने के लिए डच सरकार से पहले ही पर्याप्त वार्ताएं कर चुकी थीं। कुछ जापानी, जर्मन फ्रेंच और यहां तक कि ब्रिटिश बैंक भी फ्रैंकफर्ट स्थानांतरित होने की योजनाएं बना रहे हैं। सोनी और पैनासोनिक ने अपने मुख्यालय नीदरलैंड में स्थानांतरित कर दिए हैं। डब्ल्यूटीओ नियमों के अंतर्गत समस्त आडम्बरपूर्ण व्यापार ब्रिटिश निर्यातों को उद्भूत होने वाले अतिरिक्त शुल्कों को ध्यान में नहीं रखता है।

भारत पर प्रभाव तथा भारत-यूके एफटीए की संभावना

ब्रेजिट भारत के लिए अवसर उपलब्ध कराता है तथा भारत के लिए चुनौतियां भी प्रस्तुत करता है। भारत-यूके संबंध व्यापक और वृहद् हैं जिनमें द्विपक्षीय और वैश्विक संबंधों के लिए एक ठोस और व्यापक भावी मार्ग सहायता प्रदान करता है जिससे उन्हें भविष्य के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त होता है। हाल के समय में, दोनों पक्षों द्वारा किए गए उच्च स्तरीय दौरों ने हमारी भागीदारी को और भी दृढ़ बनाने का एक अवसर प्रदान किया है।

जबकि ईयू भारत के विशालतम व्यापार भागीदारों में एक है, जो माल के संबंध में भारत के वैश्विक व्यापार का 13 प्रतिशत का योगदान देता है, यूके को भारत के श्रेष्ठ 25 व्यापार भागीदारों की सूची में 17वें स्थान पर रखा गया है जिसमें 2017-18 में यूके के साथ भारत का वाणिज्यिक व्यापार लगभग 14.5 बिलियन यूएस डॉलर था, जिसमें सेवाओं में व्यापार में 7 बिलियन यूएस डॉलर का अतिरिक्त आंकड़ों भी शामिल है। भारत यूके के साथ उपयुक्त व्यापार संतुलन स्थापित करता है। जब निवेश की बात आती है, तो यूके को मारीशस, सिंगापुर और जापान के बाद भारत में चौथे विशालतम भावक निवेशक के रूप में स्थान दिया जाता है जिसका अप्रैल, 2000 के बाद से संचयी साम्या निवेश 26 बिलियन यूएस डॉलर का था, जो भारत में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का लगभग 6 प्रतिशत था। भारत भी यूके में एक प्रमुख निवेशक है (चौथा विशालतम)। लगभग 800 भारतीय कंपनियों ने यूके में 105,000 रोजगारों का सृजन किया है जिनका कुल समेकित राजस्व 47.5 बिलियन जीबीपी है। प्रौद्योगिकी और दूरसंचार क्षेत्र इस राजस्व में 31 प्रतिशत भाग का योगदान देता है तथा भेषजी और रसायन क्षेत्र का योगदान 24 प्रतिशत है।

ब्रेजिट न केवल ईयू के साथ यूके के व्यापार और निवेश को प्रभावित करेगा बल्कि अपने अन्य व्यापार और निवेश भागीदारों को भी प्रभावित करेगा। भारतीय कंपनियों, जिनमें से अधिकांश ने यूके में भारी निवेश किया है, के 'नो-डील ब्रेजिट' द्वारा प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की संभावना है, विशेष रूप से वे कंपनियां जो यूके को यूरोपीय संघ और फ्रांस के द्वार के रूप में प्रयोग करती हैं। यहां तक कि वे कंपनियां, जिनका ईयू के प्रति अधिक योगदान नहीं है, भी इसका प्रभाव महसूस करेंगी क्योंकि 'नो-डील ब्रेजिट' के फलस्वरूप यूके में एक संभावित आर्थिक गिरावट आएगी। प्रमुख निवेशक जैसे टाटा ग्रुप पहले से ही अपनी निवेशों को सीमित कर रहे हैं तथा विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।

ब्रेजिट चाहे सख्ती से हो या नरमी से, यूके ने स्पष्ट रूप से भारत की पहचान एक प्रमुख भागीदार के रूप में की है, विशेष रूप से ब्रेजिट उपरांत युग में। क्रमिक ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों तथा अन्य प्रमुख मंत्रियों द्वारा भारत पर दिया गया विशेष ध्यान एक प्रमुख व्यापार और निवेश भागीदार के रूप में भारत को दिए गए महत्व का साक्षी है। मार्च, 2017 में द्विपक्षीय निवेश संधि के समाप्त होने तथा मुक्त व्यापार नीति के अभाव में, विशेष रूप से ब्रेजिट के उपरांत भारत-यूके एफटीए निष्पादित किए जाने की अनिवार्यता स्पष्टत: दिखाई देती हैं। दोनों पक्षों ने उच्चतम राजनीतिक स्तर पर यथासंभव शीघ्र एफटीए निष्पादित किए जाने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध किया है। तथापि, ऐसा कोई एफटीए केवल तभी हस्ताक्षरित किया जा सकता है जब यूके ईयू को छोड़ दे और जबकि दोनों ही देशों की अपनी-अपनी प्राथमिकताओं की सूची है, द्विपक्षीय एफटीए के मापदण्डों पर ईयू से यूके के बहिर्गमन के निबंध और शर्तों के आधार पर तय किए जाएंगे।

संभावित द्विपक्षीय एफटीए के आयामों का अन्वेषण करने के लिए एक संयुक्त कार्यकारी समूह पहले ही स्थापित किया गया है। भारत-यूके संयुक्त आर्थिक और व्यापार समिति (जेटको) की 13वीं बैठक इस वर्ष जुलाई में लंदन में आयोजित की गई थी। जबकि दोनों पक्षों ने पिछले तीन वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में 27 प्रतिशत की वृ‍द्धि को नोट किया, उन्होंने ऐसे निर्माणात्मक क्षेत्रों की तलाश करने की संभावना व्यक्त की, जो भविष्य में अधिक महत्वाकांक्षी व्यापार व्यवस्थाओं की अनुमति प्रदान करते हों। एक क्षेत्र-चालित दृष्टिकोण, जिसने महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की, जैसे प्रगत विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, आईसीटी, जीवन-विज्ञान, स्वास्थ्य देखरेख, खाद्य और पेय, पशुपालन, डेयरी, मात्यिस्की आदि, द्विपक्षीय आर्थिक व्यवस्थाओं पर अधिक केन्द्रित दृष्टिकोण प्रदान करता है। जनवरी, 2018 में लंदन में 12वीं जेटको में सहमत की गई भारत-यूके संयुक्त व्यापार समीक्षा की सिफारिशों के क्रियान्वयन पर हासिल की गई प्रगति दोनों पक्षों के लिए ऐसे प्रमुख क्षेत्रों और उत्पाद विकल्पों की पहचान करने में सहायता प्रदान करेगी जिन पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। यह समीक्षा ऐसे नीतिगत और प्रक्रियात्मक अवरोधों का उन्मूलन करने में भी सहायता प्रदान करेगी जिनकी पहचान की गई है। इससे एफटीए के प्रति एक अनिवार्य निर्माणात्मक खंड का गठन होगा।

दोनों ही अर्थव्यवस्थाएं पर्याप्त रूप से अपने सेवा क्षेत्रों पर निर्भर करती हैं और जबकि दोनों देश उने उत्पादों और सेवाओं के लिए बाजार की संवर्धित पहुंच पर ध्यान-केन्द्रित करेंगे, भारत के लिए कुशल वृत्तिकों और साथ ही छात्रों के लिए वृहद और सरल पहुंच का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। यूके का हालिया निर्णय एक स्वागतयोग्य घटनाक्रम है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए दो-वर्षीय अध्ययनोत्तर कार्य वीजा पुन: प्रारंभ किया गया है। तथापि, विशेष रूप से भारतीय वृत्तिकों जैसे चिकित्सकों, आईसीटी क्षेत्र में कार्यरत इंजीनियरों आदि के लिए आसान पहुंच के संबंध में और अधिक कार्य किए जाने की आवश्यकता है। भारत यूके के साथ एफटीए पर वार्तालाप करने में मोड IV पहुंच प्रदान करने पर बल प्रदान करना जारी रखेगा। यूके की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए यह कार्य आसान नहीं होगा।

ब्रेजिट के उपरांत भारतीय कंपनियों के लिए मुख्य अवसर खाद्य और कृषि से खाद्य और खाद्य उत्पाद का एक निवल आयातक है। यह घरेलू उपभोग के लिए लगभग 25 प्रतिशत फल और सब्जियों का उत्पादन करता है। जबकि इसके फलों की खपत 30 प्रतिशत भाग यूरोप से आता है, यूके में उपभोग की जाने वाली लगभग 80 प्रतिशत सब्जियां यूरोप से आयात की जाती हैं। भारतीय निर्यातकों को विनियामक ढांचे का तथा उसके साथ जुड़ी पादप-स्वच्छता अपेक्षाओं का अनुपालन करने की आवश्यकता है जो स्वाभाविक रूप से इस बात पर निर्भर है कि यूके किस ढांचे को अपनाता है। मैंने सेवा क्षेत्र का पहले ही उल्लेख कर दिया है जहां भारतीय फर्में उस खालीपन को भरने में सहायक हो सकती है जो ब्रेजिट के उपरांत उत्पन्न हो सकता है, विशेष रूप से यूरोप के कम होते प्रभावों के साथ।

जबकि लंदन निसंदेह ही एक अग्रणी वैश्विक वित्तीय केन्द्रों में से एक है तथा ब्रेजिट से इस पर कोई परिवर्तन आने की संभावना नहीं है, यह उस स्थिति में गंभीर चुनौती का सामना करेगा यदि ब्रेजिट क उपरांत पूंजी का प्रवाह होता है। अनेक संख्या में भारतीय कंपनियों, जिनमें विशेष रूप से सरकारी क्षेत्र के उपक्रम शामिल हैं, ने लंदन के स्टॉक एक्सचेंज में रुपए-अंकित बांडों में निवेश किया है जिन्हें मसाला बांडों के नाम से जाना जाता है। यूके की क्रेडिट रेटिंग में गिरावट आई है तथा इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इन बांडों के अधिकांश क्रेता ईयू के हैं, इन बांडों को जारी किए जाने के संबंध में चिंता का माहौल व्याप्त है।

यूके के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय व्यवसाय की उपस्थिति विद्यमान है जिसमें शामिल है- ऑटोमोबाइल, ऑटो अवयव, भेषजिक पदार्थ, हीरे और आभूषण, शिक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी समर्पित सेवाएं। इनमें से अधिकांश क्षेत्र मांग और मुद्रा के मूल्यों में होने वाले परिवर्तनों के प्रति अत्यंत सुभेद्य होंगे।

भारत ईयू में ऑटो अवयवों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। यह क्षेत्र भारत के कुल ऑटो अवयवों के निर्यात के लगभग 36 प्रतिशत भाग का योगदान देता है, जबकि यूके का भाग लगभग 5 प्रतिशत है। यूके का यात्री वाहन बाजार में अत्यंत निर्यातोन्मुखी है तथा इस क्षेत्र के ईयू ऑटोमोटिव बाजार के साथ घनिष्ठ संबंध हैं। यूके और ईयू क्षेत्र में प्रत्याशित मंदी तथा आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान इस क्षेत्र के लिए प्रतिकूल प्रभाव पैदा कर सकता है। इसके अलावा, पाउंड के मूल्य में कमी आने वाली अवधि में कंपनियों के राजस्व को प्रभावित करेगी।

भारत आईटी-समर्थित सेवाओं के एक बड़े निर्यातकों में से एक है तथा इस क्षेत्र की यूरोपीय बाजार विशेष रूप से यूके में उल्लेखनीय पहुंच है। यूके भारत के कुल आईटी निर्यातों में लगभग 17 प्रतिशत भाग का योगदान करता है। इस प्रकार, आईटी कंपनियों द्वारा ब्रेजिट के परिप्रेक्ष्य में समस्याओं का सामना करने की आशा है। यूके और ईयू में विकास के भावी नियंत्रण के जोखिम को ध्यान में रखते हुए, इस बात की काफी संभावना है कि कंपनियां उनके आईटी बजट में कमी करेंगी (जो विवेकशील व्यय होगा)। इसका घरेलू साफ्टवेयर कंपनियों पर प्रभाव पड़ेगा। अधिकांश बड़ी भारतीय कंपनियां सेवा क्षेत्र में प्रचालन करती हैं जो गंभीर रूप से प्रभावित होगा। यूके के व्यवसायों से ईयू द्वारा तीसरे देशों के सेवा प्रदाताओं के रूप में व्यवहार किया जाएगा जिससे बाजार पहुंच में संभावित हानि होगी और गैर-टैरिफ बाधाओं में वृद्धि होगी।

2019 में ईयू से ब्रिटेन का निर्गम इस्पात उद्योग को भी अस्थिर बनाएगा जो ईयू कर्मकार विधि और सुरक्षा मानकों का संरक्षण हासिल किए हुए है। यदि एक सख्त ब्रेजिट निष्पादित होता है, तो ये संरक्षण लागू होने बंद हो जाएंगे।

रेडीमेड वस्त्र भारत से यूके को भेजी जाने वाली प्रमुख निर्यात मदों में से एक हैं। यह यूके को भारत के कुल निर्यात में लगभग 20 प्रतिशत का योगदान देती है। आधुनिकीकरण के मांग में आने के कारण इस क्षेत्र के प्रभावित होने की भी आशा की जा रही है। फिर भी, कुछ गार्मेंट निर्यातक यह महसूस करते हैं कि वे उस स्थिति में संरक्षित रह सकते हैं यदि ब्रेजिट के उपरांत यूके के साथ मुक्त व्यापार करार पर बातचीत की जाती है।

जबकि इस स्थिति में अनेकानेक चुनौतियां हैं, वहीं भारतीय कंपनियों के लिए व्यापक अवसर भी मौजूद हैं। ब्रेजिट मतदान के पश्चात् राष्ट्रमंडल सचिवालय द्वारा संचालित एक अध्ययन ने 13 नए उत्पादों की पहचान की है। इसने इन उत्पादों के लिए लगभग 2 बिलियन डॉलर की बाजार पहुंच का अनुमान लगाया है। यूके और भारत के बीच एक बेहतर तरीके से वार्तालाप की गई द्विपक्षीय व्यापार व्यवस्था में द्विपक्षीय व्यापार में 26 प्रतिशत वृद्धि करने की संभावना है। वस्तुत: यह रिपोर्ट कहती है कि यूके और भारत एक दूरगामी सौदे पर भी समझौता कर सकते हैं जिसमें भारत के लिए ब्रिटिश निर्यात का मूल्य 4.2 बिलियन जीबीपी से बढ़कर 6.3 बिलियन जीबीपी हो जाएगा जिसमें 2.1 बिलियन जीबीपी अथवा 33 प्रतिशत की वृद्धि होगी। यूके की ओर से भारत में आयात में भी लगभग 1 बिलियन जीबीपी की वृद्धि होगी। यूके के व्यापार संतुलन में भी सुधार आएगा, हालांकि यह तब भी भारत के पक्ष में ही रहेगा।

निष्कर्ष के तौर पर, मैं इस बात पर बल प्रदान करता चाहता हूं कि ब्रेजिट यूके के साथ भारत के व्यापार और आर्थिक संबंधों का‍ विस्तार करने का अवसर प्रदान करता है। ब्रेजिट के अंतिम मसौदे और भावी वार्ताओं पर काफी कुछ निर्भर करता है। ब्रेजिट द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली चुनौतियों का भारत-यूके एफटीए को मूर्तरूप प्रदान कि जाने से पूर्व ही मिलकर समाधान किए जाने की आवश्यकता होगी। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रेजिट-उपरांत यूके में एक बेहतर स्थिति में होगी, हमें अपनी सुदृढ़ता का पूर्णत: उपयोग करने की आवश्यकता होगी ताकि हमारी अर्थव्यवस्थाओं में विद्यमान संपूरणताओं का उपयोग किया जा सके। हमें दोनों ही देशों के लिए लाभ की स्थिति प्राप्त करने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है ताकि हम पारस्परिक समृद्धि के लिए विपरीत परिस्थितियों को अवसरों में परिवर्तित कर सकें।

ब्रेजिट की भविष्य में उजागर होने वाली गाथा ने केवल हमारी भावी आर्थिक व्यवस्थाओं के आयामों का निर्धारण करेगी बल्कि उसकी गति और विषय-वस्तुत को भी निर्धारित करेगी। ब्रिटिश लोगों के लचीलापन और संसाधन-बहुलता की प्रवृत्ति जगजाहिर है, तथा इसे कभी भी कम नहीं आंका जाना चाहिए। आगामी कुछ सप्ताह यूके के लिए और साथ ही इसके सभी भागीदारों के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे।

20 सितम्बर, 2019

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