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भारतीय विदेश नीति की बदलती गतिशीलता –विज्ञान और प्रौद्योगिकी आयाम

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) भास्कर बालकृष्णन
    Venue: सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ भटिंडा, पंजाब
    Date: सितम्बर 02, 2019

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। यहाँ आना और पंजाब के केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित शैक्षणिक समुदाय से बात करने का अवसर प्राप्त करना वास्तव में एक सम्मान की बात है। यह विदेश मंत्रालय के आउटरीच कार्यक्रम का हिस्सा है, जो विश्वविद्यालयों के साथ-साथ स्कूलों में पढ़ रहे देश के युवाओं से बातचीत करने का इच्छुक है। इसलिए हमारे राजनयिक देश भर में वर्तमान रुचि के विषयों पर व्याख्यान देते हैं। मुझे उस कार्यक्रम के हिस्से के रूप में यहाँ आने पर बहुत प्रसन्नता हो रही है।

आज मैं भारत की विदेश नीति और सामान्य रूप से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में बात करने जा रहा हूँ। मुझे कुछ बुनियादी अवधारणाओं के साथ आरंभ करना चाहिए। आप में से कुछ जानते हैं कि विज्ञान प्रकृति का मूल ज्ञान है और प्रौद्योगिकी उस ज्ञान का व्यावहारिक अनुप्रयोग है। यह कभी-कभी इतना स्पष्ट नहीं होता है। उदाहरण के लिए हम जानते थे कि पेनिसिलिन बैक्टीरिया के बिरुद्ध काम करता है लेकिन ऐसा क्यों करता है यह पता नहीं था। समझ के प्रत्येक स्तर पर नया विज्ञान उन्मोचित होता है और नई तकनीक लागू होती है। शासन एक अन्य अवधारणा है। किसी भी देश में शासन का पहला लक्ष्य राष्ट्रीय सुरक्षा है और दूसरा अपने सभी लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना। अब केवल समाज पर ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी का बहुत गहरा प्रभाव है। हम इसके मोबाइल फोन और स्मार्टफोन जैसे कई उदाहरण देख सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के देशों को, जो नए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की खोज और उपयोग करते हैं, उन्हें आर्थिक और सैन्य दोनों का लाभ मिलता है। इस कारण वश सभी सरकारों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी से उचित तरीके से निपटना चाहिए।

विज्ञान अनुसंधान अब छोटी प्रयोगशालाओं और मैडम क्यूरी जैसे व्यक्तिगत शोधकर्ताओं से दूर चले गए हैं, जो गैरेज के आकार के लैब प्रोसेसिंग में एक टन पिचब्लेंड और एक रेडियम निकालने के लिए अकेली काम करती थीं। आज, वैज्ञानिक अनुसंधान बड़े पैमाने पर होता है, जिसमें बड़े बजट और कई देशों में फैले हुए कई शोध और सुविधाएं शामिल हैं। सरकारों ने इस उद्देश्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान को वित्तपोषित किया है और वैज्ञानिक अनुसंधानों को प्रोत्साहित और समर्थित करने के लिए नई नीतियाँ बनाई हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक विघटनकारी प्रभाव भी है जो राज्यों के बीच शक्ति के संतुलन के साथ-साथ राज्यों के भीतर बढ़ती असमानता को भी बदल सकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने वाले समृद्ध होंगे, जबकि जो ऐसा नहीं करेंगे वे पीछे रह जायेंगे।

देश आर्थिक और सैन्य शक्ति की खोज में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञान को नियंत्रित करने और उसे प्रतिद्वंद्वियों तक जाने से रोकने की कोशिश करते हैं। विभिन्न प्रौद्योगिकी नियंत्रण प्रशासन और बौद्धिक संपदा अधिकारों की एक प्रणाली है जो प्रौद्योगिकी तक पहुँच को नियंत्रित करती है और प्रौद्योगिकी तक पहुँच से लाभ को सक्षम करती है। कुछ देशों को प्रौद्योगिकी से वंचित करने के मामले हैं और भारत खुद भी परमाणु प्रौद्योगिकी से वंचित रहा है। जिन देशों को प्रौद्योगिकी तक पहुँच से वंचित रखा गया है, वे इसकी प्रतिक्रिया में इसे स्वदेशी रूप से विकसित करने या खुले या गुप्त साधनों द्वारा हासिल करने की कोशिश करेंगे। आज अमेरिका और चीन के बीच मुख्य मुद्दा प्रौद्योगिकी के अवैध और गुप्त अधिग्रहण से संबंधित है। परमाणु प्रौद्योगिकी से इंकार करने के परिणामस्वरूप भारत, ईरान, उत्तर कोरिया जैसे देश इस तकनीक को प्राप्त करने के लिए स्वदेशी प्रयास कर रहे हैं, या पाकिस्तान की तरह गुप्त रूप से इसे प्राप्त कर रहे हैं। जैसे-जैसे नई तकनीक विश्व के नीति निर्माताओं के सामने आएगी और नागरिक समाज चुनौतियों का सामना करता रहेगा।

विज्ञान कूटनीति एक शब्द है जिसे लगभग 10 साल पहले गढ़ा गया है। यह आर्थिक कूटनीति, सांस्कृतिक कूटनीति या खेल कूटनीति के अनुरूप है। इस अवधारणा को परिभाषित करने के प्रयास किए गए हैं - उदाहरण के लिए रॉयल सोसायटी ऑफ यू. के. के द्वारा। विज्ञान कूटनीति को देखने का एक लोकप्रिय तरीका यह है कि इसे तीन घटकों - कूटनीति में विज्ञान, विज्ञान के लिए कूटनीति और कूटनीति के लिए विज्ञान से युक्त माना जाए। कूटनीति में विज्ञान का अर्थ है, कूटनीति और विदेश नीति बनाने में वैज्ञानिक आदान। विज्ञान के लिए कूटनीति का अर्थ है विज्ञान और प्रौद्योगिकी में लाभ प्राप्त करने के लिए- द्विपक्षीय रूप से और साथ ही बहुपक्षीय और विश्व स्तर पर कूटनीति का उपयोग करना। कूटनीति के लिए विज्ञान का अर्थ उन देशों को साथ लाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग का उपयोग करना है जिनके बीच मतभेद हैं। विज्ञान कूटनीति को देखने का एक और तरीका इरादों पर आधारित है – पक्ष लेना, प्रचार, और प्रभाव। एक अन्य दृष्टिकोण भौगोलिक दायरे पर आधारित है - घरेलू, सीमा पार और वैश्विक। हमारे उद्देश्य के लिए कूटनीतिक और विदेश नीति के ढांचे में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एकीकरण एक अच्छी कामकाजी परिभाषा होगी। यह अवधारणा मानती है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के निर्धारण में भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं, जहाँ ज्ञान आधारित उद्योगों की भूमिका लगातार गंभीर होती जा रही है।

आइए हम इसके पहले पक्ष पर विचार करें - कूटनीति में विज्ञान। सामूहिक विनाश के हथियार, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य, ऊर्जा और पर्यावरण, बाहरी अंतरिक्ष, आदि तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौतियों को समझने और उनसे निपटने के लिए वैज्ञानिक आदान की आवश्यकता होती है। ये चुनौतियां पार-सीमा प्रकार की हैं और इन्हें सुलझाने के लिए सामान्य राजनयिक प्रयासों के अलावा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग की आवश्यकता है। इसके लिए यह आवश्यक है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों की नीति निर्माताओं के साथ एक अच्छी बातचीत हो ताकि नीति निर्माताओं को वैश्विक चुनौतियों के वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में अच्छी तरह से जानकारी हो और विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों द्वारा राजनयिक चुनौतियों का आकलन किया जाए। कई उन्नत देशों ने लंबे समय से इसे मान्यता दी है और अपने नीति निर्धारण निकायों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों को एकीकृत किया है। चुनौती यह है कि नीति निर्माताओं को वैश्विक चुनौतियों से संबंधित बुनियादी विज्ञान को समझना चाहिए और वैज्ञानिक समुदाय को इसे स्पष्ट और सरल शब्दों में समझाने में सक्षम होना चाहिए जिसमें वैज्ञानिक मुद्दे भी शामिल हैं। इसलिए वैज्ञानिक समुदाय और नीति निर्माताओं के बीच घनिष्ठ समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से विकासशील देशों को इस संबंध में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और अक्सर उनके प्रतिनिधिमंडल अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए अच्छी तरह तैयार नहीं होते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्नत देशों ने पहल की और विकासशील देश कभी-कभी अपने हितों की रक्षा के लिए भी तैयार नहीं होते।

चित्र 1 विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों को इंगित करता है जो अंतर्राष्ट्रीय चर्चाओं में उत्पन्न हुए हैं और इसमें शामिल होने वाले मुद्दे और बातचीत भी शामिल हैं। मूल रूप से सरकारें नई तकनीक के उद्भव पर देर से प्रतिक्रिया करती हैं, आमतौर पर यह रोजगार, पर्यावरण आदि पर कुछ नकारात्मक या हानिकारक प्रभाव दिखाई देने के बाद ही दिखाई देती है। यह तकनीक और ज्ञान के वैज्ञानिकों से देश की अर्थव्यवस्था और जीवन में फैलने के काफी देर बाद होता है।

आर्थिक कूटनीति कई मायनों में विज्ञान के लिए कूटनीति के समान है, जहाँ हम अपने निर्यात का विस्तार करने और आवक निवेश बढ़ाने की कोशिश करते हैं। विज्ञान के लिए कूटनीति राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और क्षमता को मजबूत करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञान को प्राप्त करने और अंतर्राष्ट्रीय चर्चाओं में, जहाँ विज्ञान और प्रौद्योगिकी शामिल हैं, वहाँ अधिक प्रभावी ढंग से भाग लेने का प्रयास करती है। इसलिए विशेष रूप से उन्नत देशों के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में बाहरी सहयोग और बड़ी अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक परियोजनाओं में संलग्न होना महत्वपूर्ण हो जाता है। साथ ही अन्य विकासशील देशों और सामान्य रूप से सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की हमारी क्षमता और ज्ञान का उपयोग करना भी महत्वपूर्ण है।

मेगा या बड़े पैमाने पर की जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परियोजनाएं तुलनात्मक रूप से कम लागत के साथ सीमांत वैज्ञानिक अनुसंधान में भाग लेने का एक अच्छा अवसर है। विज्ञान अनुसंधान तेजी से महंगा होता जा रहा है और अलग-अलग देशों के लिए, यहाँ तक कि अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी क्षमता से परे है। अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग बढ़ रहा है और इस क्षेत्र में अधिक से अधिक परियोजनाएँ आ रही हैं। भारत ने इस तरह की सर्न, आईटीईआर, तीस मीटर दूरबीन, वर्ग किलोमीटर सरणी और एलआईजीओ आदि परियोजनाओं में भाग लिया है। हम मानव जीनोम परियोजना और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में भाग लेने का अवसर चूक गए। अब जब भारत ने मानवयुक्त अंतरिक्ष अन्वेषण को प्राथमिकता दी है तो संभव है कि हम मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान से जुड़ी बड़े पैमाने की अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं में भाग लें।

कुछ अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाएँ, जहाँ भारत ने पहल की है, उनमें अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) जिसे 2015 में फ्रांस के साथ मुख्य भागीदार के रूप में आरंभ किया गया था और 1983 में इटली के साथ मिलकर आरंभ की गई आईसीजीईबी शामिल हैं। आईसीजीईबी का उद्देश्य विकासशील देशों को जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी के नए उभरते क्षेत्र तक पहुँच बनाने में मदद करना था और इसे उनके सामने आने वाली समस्याओं के लिए लागू करना था। आईएसए एक वैश्विक मंच है जो सौर ऊर्जा को लागू करने के लिए प्रौद्योगिकी और वित्त को एक साथ लाने और सदस्य राज्यों में परियोजनाएं आरंभ करने का प्रयास करता है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी में बड़े पैमाने पर अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं और गतिविधियों को समझौते तक पहुंचाने और उन्हें लागू करने के लिए विस्तृत चर्चा की आवश्यकता थी। राजनयिकों और वैज्ञानिकों को इस प्रक्रिया में एक साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। ऐसी परियोजनाओं में भागीदारी के माध्यम से महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए सर्न में भारत की भागीदारी सबकी जीत के आधार पर है जहाँ भारत घटकों और उपकरणों की आपूर्ति करता है, जिसका मूल्य सर्न में काम करने वाले भारतीय शोधकर्ताओं पर वित्त पोषण करता है। हम विज्ञान के मोर्चे पर जैसे-जैसे अधिक गहराई में जाते हैं, अनुसंधान करने और सुविधाओं को स्थापित करने की लागत उच्च और उच्चतर होती जाती है। इस शोध को वित्तपोषित करना किसी एक देश की क्षमता से परे हो सकता है। उदाहरण के लिए अमेरिका ने टेक्सास में एक बड़े कण त्वरक की परियोजना को आरंभ किया था, लेकिन उच्च लागत के कारण इसे त्यागना पड़ा, जिसके बाद सर्न इस क्षेत्र में अग्रणी प्रयोगशाला बन गया था। अब चीन 2022 तक एक बड़ा त्वरक बनाने की भी कोशिश कर रहा है और यह देखा जाना बाकी है कि क्या वे इसका निर्माण कर पाएंगे। इसलिए भविष्य में हम अधिक से अधिक बड़े पैमाने की अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परियोजनाओं की आशा करते हैं जो चरित्र में बहुराष्ट्रीय होंगी। इस तरह की बड़ी परियोजनाएं दो प्रकार की हो सकती हैं - एक एकल बड़ी इकाई जैसे सर्न; या एलआईजीओ की तरह दुनिया भर में फैले अनेक संस्थानों का एक नेटवर्क। यहाँ तक कि सर्न के मामले में, प्रयोगों से उत्पन्न डेटा को एक विश्व व्यापी नेटवर्क (सर्न ने विश्व व्यापी वेब का आविष्कार किया था) से दुनिया भर में सहयोग करने वाली संस्थाओं के माध्यम से साझा किया जाता है जो डेटा पर विश्लेषण और शोध करते हैं। मुझे यकीन है कि भविष्य में, आपके संस्थान जैसे संस्थान अनुसंधान समूहों के साथ सहयोग करके इस तरह की बड़े पैमाने की अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परियोजनाओं में भाग ले सकेंगे।

विज्ञान के लिए कूटनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र विकास, विशेषकर सतत विकास पर ध्यान केंद्रित करना है। विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी महत्वपूर्ण है। विकास को इसके व्यापक संदर्भ में देखना होगा। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने 2015 में 17 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के एक सेट पर सहमति व्यक्त की है, सभी देशों ने इसे 2030 तक हासिल करने का प्रयास करने का संकल्प लिया है।इस प्रयास का समर्थन करने के लिए संयुक्त राष्ट्र और सदस्य राज्यों ने एक प्रौद्योगिकी सुविधा तंत्र (टीएफएम) की स्थापना की है। यह तंत्र विकासशील देशों को एसडीजी हासिल करने के लिए आवश्यक तकनीक तक पहुंचने में सक्षम करने के लिए है। यह देखते हुए कि एसडीजी उन विषयों को आवृत करते हैं जो भारत में संघ के कई मंत्रालयों और राज्यों से संबंधित हैं, नीति आयोग को एसडीजी लागू करने के लिए प्रमुख समन्वय एजेंसी के रूप में नामित किया गया है। विकासशील देशों को एसडीजी हासिल करने के लिए उस तकनीक का साझा करना बहुत जरूरी है जिसका उन्होंने इस्तेमाल या विकास किया है। इसलिए इस क्षेत्र में दक्षिण दक्षिण सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है। विकासशील देश नवाचार कर रहे हैं जो बहुत ही लागत प्रभावी और उनकी आवश्यकताओं के लिए प्रासंगिक हैं। उदाहरण के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों के परिवहन के लिए एक साइकिल एम्बुलेंस विकसित की गई है। इस तरह के मितव्ययी नवाचारों को बढ़ावा देने और इनका समर्थन करने की आवश्यकता है।

एसडीजी को 2015में अपनाया गया था और आज हम इस मार्ग पर पाँच साल पीछे हैं। हर साल एक सतत विकास रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है जो एसडीजी लक्ष्यों के अनुसार देशों के प्रदर्शन को रैंक करती है। चित्र 2 इस संबंध में कुछ देशों के प्रदर्शन और रैंकिंग को दर्शाता है। 2019में डेनमार्क ने शीर्ष रैंकिंग हासिल की है जबकि भारत 115 के रैंक पर है। जापान 15वें स्थान के साथ एशिया में सबसे ऊपर है। दक्षिण एशिया में, मालदीव, भूटान और श्रीलंका ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। दक्षिण एशिया में और विशेष रूप से बड़े देशों से एसडीजी को प्राप्त करने में उप-सहारा अफ्रीका के प्रदर्शन में काफी सुधार करने की आवश्यकता है।

विकास की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत में विकसित विज्ञान और प्रौद्योगिकी समाधान अन्य विकासशील देशों के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं क्योंकि कई विकासशील देशों की स्थितियां भारत की स्थितियों के समान हैं। वास्तव में विकास की चुनौतियाँ जो कहीं भी मिल सकती हैं, भारत में भी मौजूद हैं। इसलिए भारत के पास विकास चुनौतियों से निपटने और विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग करने का बहुत बड़ा अनुभव है जो अन्य विकासशील देशों के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। इसलिए भारत सरकार के पास एक भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (आईटीईसी) है, जिसके माध्यम से भारत अन्य विकासशील देशों को क्षमता निर्माण में सहायता और उनके कर्मियों को प्रशिक्षण प्रदान करता है। विदेशों में स्थित भारतीय मिशन इस कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी एक निर्वात वातावरण में कार्य नहीं करते। यह देश के बड़े पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है। मानव संसाधन या मस्तिष्क शक्ति इस पारिस्थितिकी तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। पारिस्थितिक तंत्र के अन्य तत्वों में शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थान, वित्त पोषण एजेंसियां, आईपीआर और व्यवसायीकरण करने वाली एजेंसियां, नियामक ढांचे, व्यवसाय और नागरिक समाज शामिल हैं। कई विकासशील देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र में विशेष रूप से शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों की क्षमता और अनुसंधान के लिए धन की कमी है। यह तथाकथित ब्रेन ड्रेन या विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कुशल कर्मियों के प्रवास के परिणामस्वरूप उन्नत देशों में अधिक अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र के साथ होता है। उन्नत देशों में काम करने वाले विज्ञान और प्रौद्योगिकी कार्मिकों में विकासशील देशों के पर्याप्त प्रवासी शामिल हैं, स्वदेश की क्षमता को मजबूत करने में इनकी भागीदारी लाभदायक हो सकती है। कई देशों ने अपने प्रवासी विज्ञान और प्रौद्योगिकी कर्मियों को आकर्षित करने और अपने देश के साथ जुड़ने के लिए अभिनव कार्यक्रम विकसित किए हैं। भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी कर्मचारी बहुत बड़ी संख्या में उन्नत देशों में काम कर रहे हैं और यह एक महत्वपूर्ण संसाधन है।

उच्च कुशलता वाले विज्ञान और प्रौद्योगिकी कर्मियों को साथ रखना भी एक चुनौती है। प्रतिस्पर्धी दुनिया में, नीतियों को कुशल विज्ञान और प्रौद्योगिकी श्रमिकों की विशेष जरूरतों के लिए लचीला, यथार्थवादी और उत्तरदायी होना चाहिए। पर्याप्त सुविधाएं, बुनियादी ढांचा और वित्तपोषण भी जरूरी है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को आकर्षित करने के लिए एक वैश्विक प्रतियोगिता जारी है और शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों को इस चुनौती का सामना करना चाहिए। भारत के संस्थानों में बहुत अच्छे विज्ञान और प्रौद्योगिकी स्नातक हैं, लेकिन देश के भीतर काम करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं पाने के कारण वे इस पेशे को छोड़ देते हैं या ऐसे देश में चले जाते हैं जहाँ एक बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र होता है। अमेरिका के अलावा, जो विदेशी विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा को आकर्षित करता है, कनाडा, यूरोपीय संघ और चीन भी विदेशी विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा को आकर्षित करना चाहते हैं।

अनुसंधान आउटपुट का व्यावसायीकरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस कारण से कई विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों ने स्टार्ट-अप की सुविधा के लिए व्यावसायिक इनक्यूबेटरों और तंत्र को संबद्ध किया है। भारत में शैक्षणिक अनुसंधान संस्थान उच्च गुणवत्ता युक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा का उत्पादन करते हैं। हालांकि अनुसंधान संस्थानों के पास पर्याप्त क्षमता की कमी और अनुसंधान के सीमित वित्तपोषण के साथ-साथ व्यावसायीकरण करने वाली एजेंसियों का सीमित विकास एक कमजोरी है। हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में इन कमियों के परिणामस्वरूप भारत को तथाकथित ब्रेन ड्रेन की समस्या का सामना करना पड़ता है, जहाँ से विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा बेहतर अवसरों की तलाश में उन्नत देशों में चली जाती है। इसलिए भारत को अपने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी में पर्याप्त क्षमता को मजबूत करना और बनाना है ताकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रतिभाओं को भारत में काम करने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

चित्र 3 भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र के कुछ आंकड़े प्रस्तुत करता है। अनुसंधान और विकास पर सकल व्यय (जीईआरडी) सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7% है जो कई अन्य देशों से बहुत नीचे है। यूनेस्को ने जीईआरडी के लिए जीडीपी के 2% के बेंचमार्क का सुझाव दिया है। हमें भी यही लक्ष्य रखना चाहिए। हमारे मामले में प्रति मिलियन आबादी पर शोधकर्ताओं की संख्या काफी कम है। अनुसंधान और विकास व्यय में निजी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थानों की हिस्सेदारी लगभग 40% है जो कि कुछ उन्नत देशों की तुलना में काफी कम है जहाँ यह लगभग 60%है। दुर्भाग्य से हमारे कई शैक्षणिक संस्थान और विश्वविद्यालय, विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा का उत्पादन कर रहे हैं लेकिन अनुसंधान और विकास की पर्याप्त गतिविधि नहीं है। भविष्य में इसे ठीक करना आवश्यक होगा।

भारत में सरकारी क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास व्यय पर (चित्र 4 देखें) विज्ञान के 8 विभागों का प्रभुत्व है। व्यय में सबसे बड़ी हिस्सेदारी तीन विभागों अर्थात् डीएई, डीओएस और डीआरडीओ की है, जो नागरिक और रक्षा से संबंधित दोनों तरह के अनुसंधान और विकास का कार्य कर रहे हैं। विज्ञान के 5 अन्य विभाग हैं जिनका खर्च अपेक्षाकृत कम है। कई अन्य मंत्रालय भी हैं जिन्हें वैज्ञानिक मंत्रालय नहीं माना जाता है, लेकिन वे अनुसंधान एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मोटे तौर पर यह सरकारी क्षेत्र की अनुसंधान एवं विकास गतिविधि की एक तस्वीर है।

जीई, माइक्रोसॉफ्ट आदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इजरायल और भारत जैसे प्रतिभा संपन्न देशों में स्थापित किए जा रहे बड़े अनुसंधान केंद्रों को देखना और यह जांचना दिलचस्प है कि वे मेजबान अर्थव्यवस्था के साथ कैसे व्यवहार करते हैं। चित्र5 में इसे सरल रूप में दर्शाया गया है। परिष्कृत पारिस्थितिकी तंत्र के साथ एक उन्नत अर्थव्यवस्था भारत और इजरायल जैसे देशों के पारिस्थितिक तंत्र के साथ संबंध विकसित करती है ताकि बाद के उन्हें वहाँ मौजूद मानव विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा का लाभ मिल सके। मूल रूप से संपर्क के दो तरीके हैं। पहले में अधिक उन्नत देशों के अनुसंधान और विकास संस्थानों में काम करने के लिए कम उन्नत देश की विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रतिभा की भर्ती शामिल है। जहाँ उन्नत देश में अनुसंधान और विकास सुविधाओं और बुनियादी ढांचे के लिए भौतिक निकटता आवश्यक है, वहाँ यह तरीका महत्वपूर्ण है। दूसरे तरीके में कम उन्नत देश में अनुसंधान केंद्रों की स्थापना शामिल है जहाँ प्रतिभाशाली विज्ञान और प्रौद्योगिकी पेशेवरों को काम करने और ज्ञान उत्पन्न करने के लिए काम पर रखा जा सकता है। यह तरीका वहाँ अधिक लागत प्रभावी है जहाँ बड़ी अनुसंधान और विकास भौतिक इकाइयों की आवश्यकता नहीं है, उदाहरण के लिए सॉफ्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी के उत्पादों में। इन दोनों विधियों में उन्नत अर्थव्यवस्था द्वारा अपने संस्थानों और उद्यमों के माध्यम से अनुसंधान और विकास के परिणामों पर बड़े पैमाने पर कब्जा कर लिया जाता है। वे उत्पन्न ज्ञान का दोहन करने और बड़े और वैश्विक बाजारों में इसका व्यवसायीकरण करने में सक्षम हैं। अनुसंधान और विकास गतिविधि के इन तरीकों के लाभों का एक छोटा हिस्सा कम उन्नत अर्थव्यवस्था के साथ साझा किया जा सकता है। हमें इसे एक सामान्य और अपरिहार्य घटना मानना चाहिए लेकिन इसके परिणामों के बारे में पता होना चाहिए और सर्वोत्तम परिणामों पर बातचीत करनी चाहिए।

आइए हम विभिन्न देशों के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हमारे द्विपक्षीय सहयोग की जांच करें। भारत के द्विपक्षीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी समझौते संरचना में काफी सरल हैं। वे लागत साझाकरण, संयुक्त कार्यान्वयन, सहयोग गतिविधियों के सहमत कार्यक्रम और आवधिक समीक्षा बैठकों पर आधारित हैं। डीएसटी के 80से अधिक देशों के साथ ऐसे समझौते हैं। इनमें से 44 समझौतों को सक्रिय माना जाता है। डीएई और डीओएस के विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते भी हैं। विज्ञान के विभिन्न विभागों के बाहरी जुड़ाव का बेहतर समन्वय लाभकर सिद्ध हो सकता है।

हमारा वर्तमान नेटवर्क विज्ञान कूटनीति के लिए छोटा है। हमारे पास रूस, अमेरिका, जर्मनी और जापान में हमारे मिशनों में स्थित विज्ञान परामर्शदाता हैं। इसके अलावा कुछ मिशनों में डीएई, डीओएस और डीआरडीओ के कुछ कर्मी हैं। अन्य सभी देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग कार्य को भारत से संभाला जाता है। यह कार्य प्रासंगिक और अधिकतर घटना संचालित है। हमारे कई महत्वपूर्ण देशों के मिशनों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग से निपटने की क्षमता होनी चाहिए। यह हमारे राजनयिकों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग गतिविधियों को संभालने के लिए प्रशिक्षित करके प्राप्त किया जा सकता है। विज्ञान कूटनीति के लिए अन्य देशों द्वारा संचालित नेटवर्क काफी विविधता पूर्ण हैं। यूके में एक स्वतंत्र विज्ञान नवाचार नेटवर्क है जिसमें 30देशों में स्थित कर्मी हैं। अमेरिका अपने कैरियर राजनयिकों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग कार्य में प्रशिक्षण देता है और उन्हें विदेशों में तैनात करता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारत की बढ़ती भूमिका को देखते हुए यह स्पष्ट है कि भारत को अपने बाहरी विज्ञान कूटनीति नेटवर्क का और अधिक उपयुक्त तरीके से विस्तार करना होगा। राजनयिकों के विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने के लिए आर्थिक कूटनीति के समान संचालन संबंधी दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकते हैं।

अब कूटनीति के लिए विज्ञान के क्षेत्र पर चर्चा करते हैं। इसमें उन देशों के बीच पुलों के निर्माण के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग का उपयोग करना शामिल है जिनके बीच अच्छे संबंध नहीं है। अतीत में इसके कई उदाहरण मिल सकते हैं। अमेरिका ने शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ जैसे देशों के चीन, उत्तर कोरिया, क्यूबा और ईरान के साथ पुलों के निर्माण के लिए विज्ञान सहयोग का उपयोग किया है। अंतर्निहित सिद्धांत यह है कि वैज्ञानिक अधिक उद्देश्य वाले देशों के लिए सामान्य हित की समस्याओं पर एक साथ काम कर सकते हैं और यदि आवश्यक हो तो वे संचार के एक चैनल के रूप में सेवा कर सकते हैं। दक्षिण एशियाई देशों में वायु प्रदूषण, मौसम पूर्वानुमान, ऊर्जा और पर्यावरण, स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण जैसी सामान्य समस्याओं से निपटने के उद्देश्य से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के एक प्रयास की परिकल्पना की जा सकती है। क्षमता तो है लेकिन अभी तक इसका दोहन होना बाकी है।

एसईएसएएमई परियोजना कूटनीति के लिए विज्ञान का दिलचस्प मामला है। (चित्र 6 देखें) यह अम्मान, जॉर्डन में स्थित एक अनुसंधान सुविधा है। त्वरक व्यापक रूप से बदलती ऊर्जाओं की एक्स किरणों के बीम का उत्पादन करता है जो वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए उपयोगी होते हैं। यह सुविधा 2017 में आरंभ हुई। इसके 8 सदस्यों में इजरायल, ईरान, फिलिस्तीनी प्राधिकरण और पाकिस्तान शामिल हैं। कई देशों के बीच राजनीतिक संबंधों के ठीक न होने पर भी, उनके वैज्ञानिक एक साथ काम करने का प्रबंधन कर रहे हैं। लगभग 20अन्य पर्यवेक्षक देश इस परियोजना का समर्थन कर रहे हैं।

यूरोपीय संघ की होराइजन यूरोप (2021-27) एक महत्वपूर्ण आगामी परियोजना है, जिसमें लगभग 100 बिलियन यूरो का वित्तपोषण शामिल है। यह परियोजना भारत के विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के लिए विभिन्न अनुसंधान गतिविधियों में यूरोपीय संघ के समकक्षों के साथ भाग लेने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। मैं आपको होराइजन यूरोप से जुड़े घटनाक्रमों का ध्यान से अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित करूँगा। आशा की जाती है कि भारत के शोधकर्ताओं को भाग लेने के लिए वही अवसर मिलेंगे जो यूरोपीय संघ के पिछले कार्यक्रमों- होराइजन 2020 और फ्रेमवर्क प्रोग्राम 7 में उपलब्ध थे।

आइए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कुछ ऐसे क्षेत्रों पर विचार करें जहाँ भारत को कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इस तरह का पहला क्षेत्र परमाणु तकनीक है। भारत ने भेदभाव युक्त परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए और अपनी स्वतंत्र सामरिक परमाणु क्षमता विकसित की है। इसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ तक परमाणु तकनीक, उपकरण और सामग्री का संबंध है, भारत को एक परमाणु निषेध पर रखा गया। इसलिए भारत को परमाणु क्षेत्र में अपनी क्षमता विकसित करने के लिए एक बड़ा स्वदेशी प्रयास करना पड़ा। अंत में 2005-08के दौरान, अमेरिका, आईएईए और अन्य देशों के साथ कठिन चर्चा के माध्यम से भारत अपने जिम्मेदार परमाणु आसन की पहचान कराने में सक्षम रहा और एनएसजी से छूट प्राप्त किया जो इसके सामान्य परमाणु वाणिज्य को सक्षम करता था। यह हमारे वैज्ञानिकों और राजनयिकों के साथ काम करने के मामले में विज्ञान कूटनीति के एक बड़े प्रयास का परिणाम था। जहाँ तक परमाणु प्रशासन का संबंध है आज भारत को एक वास्तविक परमाणु हथियार संपन्न राज्य माना जाता है। भारत ने एक महत्वाकांक्षी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम भी आरंभ किया है जिसमें स्वदेशी रिएक्टर और आयातित रिएक्टर और एक अद्वितीय थोरियम आधारित ईंधन चक्र शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा के क्षेत्र में भारत एक प्रमुख स्थान रखता है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए भारत और चीन जैसे बड़े देशों के समर्थन की आवश्यकता है। भारत ने अपने सकल घरेलू उत्पाद की कार्बन तीव्रता को कम करने की प्रतिबद्धता स्वीकार की है और फ्रांस के साथ अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) - की एक बड़ी पहल भी आरंभ की है। भारत जीवाश्म आधारित ऊर्जा उत्पादन से दूर जाने के लिए एक बड़ा प्रयास कर रहा है। हालांकि इसकी आर्थिक विकास की जरूरतें बहुत बड़ी हैं और इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। भारत और अन्य विकासशील देशों के कम कार्बन वाले मार्ग पर जाने के लिए प्रौद्योगिकी और वित्त दोनों महत्वपूर्ण हैं। कुछ देशों की ओर से प्रतिबद्धता की कमी के बावजूद, भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी संभव प्रयास करना जारी रखेगा। हाल ही में आरंभ किया गया आईएसए, सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए प्रौद्योगिकी और वित्त को एक साथ लाने के लिए एक वैश्विक मंच है। अब संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य इसकी सदस्यता में शामिल हो सकते हैं। सौर फोटोवोल्टिक प्रौद्योगिकी और ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकी में तेजी से प्रगति हुई है, जिससे सौर ऊर्जा की लागत में काफी कमी आई है और भविष्य के विकास आशाजनक दिख रहे हैं।

सूचना और संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में, भारत ने अच्छी प्रगति की है और यह पूरी दुनिया के लिए आईटी से संबंधित सेवाओं का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। इस क्षेत्र में तेजी से बदलाव और तकनीकी विकास हुआ है जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल विनिर्माण, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, आदि क्षेत्रों में जारी है। विशेष रूप से रोजगार पर इन प्रौद्योगिकियों के विघटनकारी प्रभाव पर चिंता है। साइबर अपराध के उद्भव के अलावा, साइबर आतंकवाद, साइबर युद्ध और सोशल मीडिया के दुरुपयोग ने नई समस्याएं पैदा की हैं जिनके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता है। कृत्रिम बुद्धि को हथियार प्लेटफार्मों में एकीकृत करने वाले, घातक स्वचालित हथियार तेजी से विकसित हो रहे हैं। इस तरह के "हत्यारे रोबोट" के उपयोग को लेकर इन हथियारों के उपयोग को विनियमित करने के तरीके पर अंतर्राष्ट्रीय चर्चा हुई है। इन वैश्विक चुनौतियों को विज्ञान कूटनीति के माध्यम से सुलझाना होगा।

जीवन विज्ञान में तेजी से प्रगति ने विज्ञान की कूटनीति के लिए नई चुनौतियों को भी जन्म दिया है, जिनके संबंध में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चर्चाएं चल रही हैं। आज हम जीवों के जीनोम को तेजी से अनुक्रमित कर सकते हैं, उन्हें उच्च परिशुद्धता के साथ संशोधित कर सकते हैं और यहाँ तक कि कृत्रिम जीन को भी शामिल कर सकते हैं। स्वास्थ्य, कृषि, खाद्य, पर्यावरण, ऊर्जा और उद्योग के लिए इसमें अत्यधिक संभावनाएं हैं। लेकिन आनुवंशिक रूप से संशोधित कृषि और खाद्य उत्पादों के उपयोग, मानव प्रजनन, मानवों के आनुवंशिक संशोधन और घातक जैव-शस्त्रों के निर्माण और जीवनी-शक्ति के निर्माण की संभावनाओं सहित कई चिंताएं सामने आई हैं।

महासागरों के प्रबंधन ने भी विज्ञान कूटनीति की चुनौतियों को जन्म दिया है। अधिक दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरों में समुद्री जैव विविधता खतरे में है। अंतर्राष्ट्रीय संधि को लेकर एक नए व्यापक समझौते पर बातचीत चल रही है जो राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे के क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता की रक्षा करेगा। चर्चाओं से संकेत मिलता है कि इसमें कई विभाजनकारी मुद्दे शामिल हैं जिनके लिए कठिन वार्ता की आवश्यकता होगी। भारत के मामले में, दो बड़े समुद्री पारिस्थितिक तंत्र (एलएमई) - बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों उच्च जोखिम में हैं, जिनसे हम चिंतित हैं और उनकी जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता है।

बाहरी अंतरिक्ष में विज्ञान कूटनीति की कई चुनौतियां हैं। तथ्य यह है कि उपग्रहों का उपयोग नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। इसने उपग्रह-विरोधी हथियार प्रौद्योगिकी को जन्म दिया है। पहले ही अमेरिका, रूस, चीन और अब भारत जैसे देशों द्वारा इसका परीक्षण किया जा चुका है। बाह्य अंतरिक्ष के अस्त्रीकरण और सैन्यीकरण का खतरा है। दशकों से पृथ्वी के चारों ओर जमा हुआ अंतरिक्ष मलबा, अब अंतरिक्ष उड़ान के लिए खतरा बन गया है। चूँकि हम चंद्रमा और मंगल के अन्वेषण से आगे बढ़ रहे हैं, अतिरिक्त स्थलीय निकायों पर खनिज होने और अन्य अधिकारों के बारे में प्रश्न (मानव जाति की सामान्य विरासत के सिद्धांत बनाम पहले आओ पहले पाओ) उठने की संभावना है।

जैसा कि हम देख सकते हैं, विज्ञान कूटनीति के भविष्य के एजेंडे के तेजी से जटिल और चुनौतीपूर्ण होने की संभावना है। भविष्य में नए घटनाक्रम वैज्ञानिकों, राजनयिकों और नीति निर्माताओं के लिए नई चुनौतियां उत्पन्न करेंगे। इसलिए विकासशील देशों के लिए इन चुनौतियों से निपटने और अपने हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त रूप से तैयार होना महत्वपूर्ण है। विकासशील देशों को उत्तर के इच्छुक साझेदारों के साथ सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता होगी।

धन्यवाद।