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भारत की विदेश नीति में हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्व

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) एम. गणपति
    Venue: सिक्किम विश्वविद्यालय
    Date: सितम्बर 18, 2019

विदेश मंत्रालय के पीडी प्रभाग के अतिविशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला के तहत आयोजित व्याख्यान राजदूत (सेवानिवृत्त) एम. गणपति पूर्व सचिव, विदेश मंत्रालय भारत की विदेश नीति में हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्व सिक्किम विश्वविद्यालय, गंगटोक; 19 सितम्बर, 2019

संकाय प्रमुख और समन्वयक, सिक्किम विश्वविद्यालय
प्रिय छात्र और मित्रगण,


मैं विदेश मंत्रालय की अतिविशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला के तत्वावधान में यह व्याख्यान देने हेतु आमंत्रित करने के लिए सिक्किम विश्वविद्यालय प्रशासन का धन्यवाद देना चाहूंगा। मैं अपने इस दौरे में सहायता देने और योजना बनाने के लिए विदेश मंत्रालय के प्रति कृतज्ञ हूं।

मैं इस उत्कृष्ट व्यवस्था के लिए सिक्किम विश्वविद्यालय को धन्यवाद करता हूं। मैं इस कुशलजिम्मेदारी के साथ सभी बातों का ध्यान रखने के लिए प्रो. दीपमाला रोका के प्रति मेरी विशेष कृतज्ञता।

सिक्किम का यह मेरा दूसरा दौरा है। मैंने 1977 में गंगटोक का दौरा किया था। 1977 से इस खूबसूरत राज्य में कई प्रकार के विकास कार्य हुए। 42 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस स्थान की सुंदरता में लगातार बढ़ोतरी होती रही है।

प्रो. दीपमाला रोका के साथ मेरे दौरे के विभिन्न घटकों पर चर्चा करते हुए हम सहमत हुए कि मैं ‘’भारत की विदेश नीति में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की महत्ता’’ पर बोलूंगा। यह क्षेत्र सुर्खियों में रहा है और वैश्विक रणनीति व वैश्विक आर्थिक कारणों से सुर्खियों में बना रहेगा।

1900 की शुरूआत से न केवल भौगोलिक बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की रूपरेखा को पुन: आकार प्रदान करने के लिए विश्व में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। कई देशों का निर्माण दो विश्व युद्धों के बाद हुआ है, अब सोवियत संघ जैसे संघ अस्तित्व में नहीं है। तत्कालीन औपनिवेशिक शक्तियों के बीच समझौते ने विश्व के मानचित्र को फिर से आकार प्रदान किया। उनकी विरासत आज भी अंतर राज्जीय संबंधों को सता रही है। इन सैन्य गुटों से निपटने के लिए भारत के साथ अपने संस्थापकों सहित गुट निरपेक्ष आंदोलन ने आकार लिया। और जिस गुट निरपेक्ष आंदोलन को 1961 में हम जानते थे, वह अब अस्तित्व में नहीं है।

इतिहास की दिशा का निर्धारण यूरोपीय शक्ति द्वारा हुआ था और बाद में गत सदी के अंत तक इसका निर्धारण अमेरिकी ताकत द्वारा निर्धारित हुआ। यूरोप के मानचित्र में बहुत बड़ा बदलाव हुआ है। शीत युद्ध के बाद शीत शांति आयी है। ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका अपनी कई वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक प्रतिबद्धता से प्रकट रूप से पीछे हट रहा है। तथापि, केवल अनाड़ी ही यह मानेंगे कि अमेरिकी प्रभुत्व के बहुत कम दिन बचे हैं- अमेरिका वित्तीय और रणनीतिक संदर्भों में मजबूत बने रहेंगे। चीन के आर्थिक अभ्युदय ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नए प्रतिमान का सृजन किया है। कठोर चीनी नेतृत्व द्वारा खड़ी की गयी चुनौती प्रत्येक मंच पर चर्चा का विषय है। रूस ताकत के क्षेत्र में पिछड़ गया था किंतु अब वह वापस ताकतवर बन कर उभर रहा है। ब्रेक्जिट ने ब्रिटेन को भ्रमित कर दिया है। नयी और अनिश्चित समस्याओं ने समाधान को चुनौती दी है; संपूर्ण विश्व कई ज्ञात और अज्ञात समस्याओं में फंसा है।

मानचित्रों के पुन: खींचे जाने और नए देशों के उभरने के साथ वैश्विक समुदाय के समक्ष चुनौतियों में भी बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्र मंडल के समक्ष नए खतरे हैं। परंपरागत शत्रुता और परंपरागत समस्याओं ने असंयमित और जटिल समीकरणों को खड़ा किया है। विकास ने नए विरोधाभासों का सृजन किया है। उत्पन्न होने वाले खतरों का अकेले और संयुक्त रूप से सामना किया जाना होगा।

अमेरिका-चीन व्यापार वाद-विवाद ने समाधान से अधिक अनिश्चित्ता पैदा की है। वैश्विक शक्तियां उन चुनौतियों पर वाद-विवाद कर रही हैं जो चीनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से उत्पन्न हुई हैं। रूस और इसके नेताओं के प्रति पश्चिमी देशों द्वारा जबरदस्त प्रतिक्रिया के कारण मजबूत रूस-चीन साझेदारी का जन्म हुआ है। पश्चिमी एशिया में स्थिति में लगातार परिवर्तन आ रहा है। वैश्विक आतंकवाद का मुख्य केन्द्र हमारा पड़ोसी देश है। अंतरराष्ट्रीय संबंध और विदेश नीति पेचिदगी भरी है।

नयी साझेदारी और गठबंधन आज के विश्व के मानदंड बन गए हैं। वैश्विक विकास के यूरो-अटलांटिक आयाम पूर्व की ओर खिसक गया है। एशिया-प्रशांत और हिंद-प्रशांत क्षेत्र अब वैश्विक सुर्खियां बन चुकी हैं। ईक्कीसवीं सदी भारत-प्रशांत क्षेत्र जो अफ्रीका से लेकर प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग तक फैला हुआ है, का है। भविष्य में यही स्थान शक्ति का केन्द्र होगा।

हिंद-प्रशांत शब्द हाल की शब्दावली नहीं है। यह कुछ समय से प्रचलन में है।

अपने राष्ट्रीय हितों को साधने में भारत की विदेश नीति का जोर विभिन्न वैश्विक घटनाक्रमों की प्रतिक्रिया में निरंतर कार्य करते रहने पर है। सामान्यत: कुछ भेदभाव को छोड़कर हमारी विदेश नीति पर जोर देने पर व्यापक राजनीतिक सहमति है।

हमारी विदेश नीति का पड़ोसी देश प्रथम का आयाम हमारी रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक सुरक्षा के संबंध में अतिक्रमण करते हुए प्राथमिकता का एक क्षेत्र है। आसियान के देश और जापान हमारी एक्ट ईस्ट नीति के दायरे में आते हैं। पश्चिमी एशिया के देश और खाड़ी के देश हमारी थिंक वेस्ट थ्रस्ट नीति के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी पांच देशों और यूरोपीय संघ के देशों को महत्व प्रदान करते हैं। अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी देश तथा कैरेबियाई व ओसनीया देशों पर अब अधिक ध्यान दिया जा रहा है। हमारे नेताओं ने इन क्षेत्रों के देशों का दौरा किया है जिन्होंने कभी भी इसे पूर्व भारतीय वीवीआईपी को नहीं देखा था।

इस अभिप्राय में भारत की हिंद-प्रशांत क्षेत्र के प्रति नीति क्या है? इस क्षेत्र को 1994 में लुक ईस्ट पॉलिसी; 2016 में एक्ट ईस्ट पॉलिसी की घोषणाओं और हाल की घोषणा में हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर जोर देने के साथ भारत की विदेश नीति में बेहतर तरीके से जोड़ा गया है। 1994 और 2018 में शांग्रिला वार्ता इस क्षेत्र तक भारत की पहुंच के महत्वपूर्ण पहलुओं को बतलाने का एक साक्षा मंच था।

भारत इंडियन ओसन रिम एसोसिएशन (आईओआरए) का संस्थापक सदस्य रहा है। इसने इंडियन ओसन नवल सिम्पोजियम (आईओएनएस) की पहल ही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सागर, इस क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास, का विचार आदर्श रूप में भारत की हिंद-प्रशांत नीति के साथ जोड़ता है।

और अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए विदेश मंत्रालय ने हिंद-प्रशांत प्रभाग की स्थापना की है।

भारत का पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों और उसके परे देशों के साथ सदियों से व्यापक संबंध रहे हैं। भारतीय कला, संस्कृति और धर्म का प्रभाव इनमें से कई देशों में रहा है। बौद्ध धर्म ने इस क्षेत्र में अपनी जड़ें मजबूत की हैं जबकि कुछ देशों में हिंदु धर्म का प्रभाव देखा गया है। इन कई देशों के साथ कलिंग राजाओं का व्यापारिक संबंध रहा तथा पल्लव और चोल राजाओं ने राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कार्य किया। इन्हें भारत की लुक ईस्ट – एक्ट ईस्ट – हिंद-प्रशांत नीति के विकास का प्रथम गतिविधि मानी जा सकती है। एशियाई संबंध सम्मेलन और बांगडंग सम्मेलन के कारण इस क्षेत्र के देश और नजदीक आए।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए भारत का विजन जून, 2018 में शांग्रिला वार्ता में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा व्यक्त किया गया। इस विजन के मुख्य तत्वों में शामिल हैं:

1. हिंद-प्रशांत क्षेत्र अफ्रीका के समुद्र तटों से लेकर अमेरिका के समुद्र तटों तक में भारत का अनुबंध समावेशी होगा।

2. एक मुक्त, खुला, समावेशी क्षेत्र जिसमें सभी देश प्रगति और समृद्धि के साझा उद्देश्य शामिल हैं।

3. इसके केन्द्र में दक्षिणपूर्व एशिया है। और आसियान इसके भविष्य के केन्द्र में है और रहेगा।

4. इस क्षेत्र की साझा समृद्धि और सुरक्षा के लिए वार्ता के माध्यम से साझा नियम आधारित व्यवस्था को तैयार करने की आवश्यकता होगी। और इसे सभी देशों पर व्यक्तिगत रूप से और वैश्विक रूप में समान रूप से लागू होना चाहिए।

5. समुद्र और वायु क्षेत्र के साझा इस्तेमाल के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सबको समान पहुंच होनी चाहिए जिसके लिए नौवहन, अबाधित व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की स्वतंत्रता होगी।

6. इस क्षेत्र को वैश्विकरण से लाभ मिला है। किंतु वस्तुओं और सेवाओं के प्रति संरक्षणवाद बढ़ रहा है। संरक्षणवाद से नहीं बल्कि बदलाव को संमिलित कर इनका समाधान ढ़ूंढ़ा जा सकता है।

7.हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित, मुक्त, संतुलित और स्थायी व्यापार माहौल को समर्थन। क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) से यही उम्मीद है। आरसीईपी व्यापक होना चाहिए, जैसा की नाम बतलाता है और इसके घोषित सिद्धांत हैं। व्यापार, निवेश और सेवाओं में एक संतुलन होना चाहिए।

8. संपर्क महत्वपूर्ण है। यह संवर्धित व्यापार और समृद्धि से अधिक महत्वपूर्ण कार्य करता है। यह किसी क्षेत्र को आपस में जोड़ता है। इस क्षेत्र में संपर्क संबंधी कई पहलें हुईं। इसकी सफलता के लिए न केवल अवसंरचना खड़ी की जानी चाहिए बल्कि विश्वास बहाली भी होनी चाहिए। और इसके लिए ये पहलें संप्रभुताऔर क्षेत्रीय अखंडता, परामर्श, बेहतर शासन व्यवस्था, पारदर्शिता, अर्थक्षमता और धारणीयता के प्रति सम्मान पर आधारित होनी चाहिए। उन्हें राष्ट्रों को सशक्त बनाना चाहिए न कि उन पर असंभव ऋण बोझ डाल देना चाहिए।

9. प्रतिस्पर्धा सामान्य बात है। किंतु यह प्रतिस्पर्धा विवाद में नहीं बदलना चाहिए; मतभेदों को विवादों में बदलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

10. यह सब संभव है यदि हम महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के युग में न लौटें। एशियाई देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता से हम सभी पीछे छूट जाएंगे, वहीं एशियाई देशों के बीच सहयोग से यह सदी आकार लेगा।

जून, 2019 में मालदीव में मजलिस अथवा संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र हमारा साझा क्षेत्र हैं, यह क्षेत्र जहां विश्व की 50 प्रतिशत जनसंख्या रहती है और यहां धर्म, संस्क़ृति, भाषा, इतिहास और राजनीतिक व आर्थिक प्रणालियों की व्यापक विविधता है। किंतु यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां कई अनुत्तरित प्रश्न और अनसुलझे विवाद हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विश्व भू क्षेत्र का 44 प्रतिशत हिस्सा है; इसमें विश्व जनसंख्या का 65 प्रतिशत हिस्सा; विश्व जीडीपी का 62 प्रतिशत भागहै और यह विश्व के 46 प्रतिशत व्यापारिक माल के व्यापार में योगदान देता है। माना जाता है कि दक्षिण चीन सागर/ प्रशांत महासागर के रास्ते लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार होता है। सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं और भारत के व्यापारिक साझेदार अमेरिका, चीन, कोरिया और जापान का समग्र व्यापार दक्षिण चीन सागर/ प्रशांत क्षेत्र से होता है। भारत के व्यापार का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में केंद्रित है। हिंद महासागर में भारत का 90 प्रतिशत कारोबार होता है और इसका 90 प्रतिशत ऊर्जा स्रोत है।

जून, 2019 में आसियान ने हिंद-प्रशांत के संबंध में अपना आउटलुक जारी किया जिसमें निम्नलिखित संघटक शामिल हैं:

आसियान हिंद – प्रशांत क्षेत्र में एक केंद्रीय और रणनीतिक भूमिका निभाना जारी रखेगा।

एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्रों को एक समीपस्थ भूभाग के रूप में ही बल्कि एक निकटस्थ समेकित और अंतर्संबंधित क्षेत्र के रूप में देखने का परिप्रेक्ष्य।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र को प्रतिद्वंद्विता के बदले वार्ता और सहयोग के रूप में देखना।

सभी के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र का विकास और समृद्धि।

क्षेत्रीय संरचना को विकसित करने में समुद्री दबदबा और परिप्रेक्ष्य का महत्व।

उप-क्षेत्रीय ढ़ांचे यथा आईओआरए, बहु क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग हेतु बंगाल की खाड़ी पहल (बिम्स्टेक), ब्रुनेई दारूसलाम-इंडोनेशिया-फिलिपीन्स पूर्व आसियान विकास क्षेत्र (बीआईएमपी-ईएजीए), मेकॉंग उप क्षेत्रीय सहयोग ढ़ांचा आदि के साथ संभावित सहक्रियाओं की खोज।

भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के संबंध में आसियान आउटलुक का स्वागत किया। भारत की स्थिति और आसियान आउटलुक बहुत हद तक उनके विचारों को अभिसरित किया।

हिंद – प्रशांत के संबंध में अमेरिकी रणनीति में खुला और मुक्त हिंद-प्रशांत का आह्वान किया गया है और इसमें हिंद-प्रशांत निकाय बनाने की मांग की गयी है जहां संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता की रक्षा हो सके।‘’इसमें समावेश को व्यक्त नहीं किया गया है। यह आसियान और इसकी संस्थाओं को केन्द्र में रखे जाने का समर्थन करता है और इसने हिंद-प्रशांत संबंधी आसियान आाउटलुक का स्वागत किया है। तथापि, अमेरिका जिस प्रकार से हिंद-प्रशांत क्षेत्र को देखता है, उसमें ‘’बॉलीवुड से हॉलीवुड’’ शामिल है।

चीन इस क्षेत्र को एशिया प्रशांत क्षेत्र मानता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के विचार को मान्यता नहीं प्रदान करता है। दक्षिण चीन सागर में अपने हितों को आक्रमक रूप से साधते हुए चीन हिंद महासागर क्षेत्र को अपनी बेल्ट और रोड पहल में एक महत्वपूर्ण संघटक के रूप में देखता है।

जापानी प्रधानमंत्री ने वर्ष 2007 में भारती संसद में अपने संबोधन में हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के महत्व पर बात की थी। जापान की हिंद-प्रशांत नीति में यह नोट किया जाता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र उत्तरोत्तर वैश्विक आर्थिक केन्द्र बन रहा है और आशा है कि यह मुक्त, खुले और नियम आधारित वैश्विक साझा आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन जाएगा। जापान आसियान को हिंद –प्रशांत क्षेत्र का केन्द्र और इसकी एकता के महत्व को भी स्वीकार करता है।

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के मुहाने पर अवस्थित इंडोनेशिया की हिंद-प्रशांत क्षेत्र के भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका है। यह पूरी तरह से मलक्का, लोमबोकऔर सुंदा जलडमरूमध्य का निरीक्षण करता है। जून, 2018 में इंडोनेशिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे के दौरान भारत और इंडोनेशिया ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के संबंध में अपने साझा दृष्टिकोण को जारी किया था।

रूस हिंद-प्रशांत क्षेत्र के विचार को नहीं मानता है और वह इस क्षेत्र को एशिया-प्रशांत क्षेत्र कहता है।

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में आधिपत्य के साथ फ्रांस स्वयं को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की शक्ति के रूप में देखता है।

ऑस्ट्रेलिया के 2017 के श्वेत पत्र में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के महत्व को स्वीकार किया गया है। इसमें इस क्षेत्र में आसियान की केन्द्रीय भूमिका को मान्यता प्रदान की गयी है।

आसियान ने अगस्त, 2017 में अपनी 50वीं वर्षगांठ मनायी है। यह सबसे सफल और सामंजस्यपूर्ण क्षेत्रीय समूह है। भारत ने 2012 में अपनी साझेदारी के बीस वर्ष और आसियान के साथ वार्षिक शिखर सम्मेलन के दस वर्ष का स्मरणोत्सव मनाया। इसने 2018 में आसियान के साथ अपने संबंध के 25 वर्ष को एक ‘’ऐतिहासिक मील के पत्थर’’के रूप में देखा। एक समूह और दस देशों में से प्रत्येक देश के साथ द्विपक्षीय रूप से आसियान के साथ भारत के संबंध में इन पच्चीस वर्षों में मजबूती आयी है। आसियान के रणनीतिक साझेदार के रूप में भारत आसियान संबंधी विभिन्न रक्षा और रणनीतिक संस्थाओं के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा रहा है। इनमें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, आसियान क्षेत्रीय मंच (एआरएफ), आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक प्लस (एडीडीएम+) और विस्तारित आसियान समुद्री मंच शामिल हैं।

वर्ष 2017-18 में भारत-आसियान व्यापार 81.34 बिलियन डॉलर (भारत के संपूर्ण व्यापार का लगभग 10.6 प्रतिशत) और वर्ष 2018-19 में यह व्यापार 96.79 बिलियन (भारत के संपूर्ण व्यापार का लगभग 11.5 प्रतिशत) का रहा। आसियान भारत का पांचवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत आसियान का 8वां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अप्रैल 2000 से मार्च 2018 तक आसियान से भारत में संचयी एफडीआई अंतर्प्रवाह 68.91 बिलियन अमेरिकी डॉलर था और अप्रैल, 2007 से मार्च, 2015 तक संचयी एफडीआई बहिर्प्रवाह लगभग 38.67 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।

कुछ उप क्षेत्रीय बहुपक्षीय मंच हैं यथा मेकॉंग-गंगा सहयोग (एमजीसी) और बिम्सटेक, जिसने भारत और आसियान के बीच अनुबंध के लिए एक अतिरिक्त मंच प्रदान किया है। भारत राजनीतिक-सुरक्षा और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आसियान के साथ एक वार्षिक ट्रेक 1.5 कार्यक्रम, दिल्ली वार्ता का आयोजन करता रहा है। भारत ने एक नए मंच का भी प्रस्ताव किया है, दक्षिण एशिया उप क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग (एसएएसईसी), जिसमें म्यान्मारशामिल है।

जापान और भारत के प्रधानमंत्रियों के बीच घनिष्ठ संबंध भारत-जापान विशेष रणनीति और वैश्विक साझेदारी के लिए शुभ है। जापान का भारत के व्यापारिक साझेदार के रूप में 11वां स्थान है और वह निवेश का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। एशिया-अफ्रीका विकास गलियारे के भारत-जापान प्रस्ताव में द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय सहयोग के लिए एक नवोन्मेषी अवसर प्रदान करता है। भारत ने जापान के साथ रक्षा संबंधी सहयोग को अंतिम रूप प्रदान किया है और एक असैन्य परमाणु समझौता किया है।

दक्षिण कोरिया के साथ भारत के संबंध में व्यापार और आर्थिक सहयोग की प्रबलता बनी रहेगी- दक्षिण कोरिया भारत के दस शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में से एक है। भारत की एक्ट ईस्ट नीति और दक्षिण कोरिया की न्यू सदर्न पॉलिसी में आपसी हितों के कई परस्पर व्याप्त क्षेत्र हैं।

राजनीतिक, आर्थिक और रक्षा क्षेत्रों में भारत-आस्ट्रेलियाई रणनीतिक साझेदारी विशेष रूप से मजबूत हुई है और यह महत्वपूर्ण है।

प्रशांत द्वीप देशों के साथ भारत के अनुबंध को भारत-प्रशांत द्वीपसमूह सहयोग मंच (एफआईपीआईसी) के माध्यम से औपचारिक रूप प्रदान किया गया है।

रूसी संघ के साथ भारत का संबंध उत्कृष्ट साझेदारियों में से एक है। यह विशेष और सिद्धांत आधारित रणनीतिक साझेदारी व्यापक है और इसमें सब कुछ समाहित है। सितम्बर, 2019 में व्लादिवोस्टोक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे के दौरान इसकी ताकत परिलक्षित हुई।

भारत का अफ्रीका के साथ स्थायी और बढ़ती साझेदारी है। भारत-अफ्रीका मंच सम्मेलन इसे मजबूती और अस्तित्व प्रदान करता है। भारत अफ्रीका की चिंता को मान्यता प्रदान करता है और अफ्रीकी जरूरतों को सम्मान देता है।

भारत-अमेरिकी संबंध ने संकोच के इतिहास पर विजय प्राप्त कर लिया है। अमेरिका भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखता है। वर्ष 2018-19 के दौरान 87.95 बिलियन डॉलर के कुल व्यापार के साथ अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था। यह व्यापार 16.86 बिलियन डॉलर के साथ भारत के पक्ष में था। प्रतिकूल व्यापार संतुलन के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से कटु प्रतिक्रिया हुई और प्रशुल्कों को बढ़ा दिया व अन्य कदम उठाए गए। आशा है कि इस मुद्दे पर चर्चा करने और सुलझाने के लिए जल्द ही दोनों देशों के वाणिज्य मंत्रियों के बीच मुलाकात होगी।

ऐसी रिपोर्टें हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप वांशिगटन में अधिक विस्तारित चर्चा की संभावना के साथ 21 सितम्बर से शुरू होने वाले प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिकी दौरे के दौरान ह्युस्टन नहीं भी जा सकते हैं।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-अमेरिकी रक्षा और सुरक्षा सहयोग असाधारण है। अमेरिका ने इसे हिंद-प्रशांत कमान के रूप में पैसेफिक कमान नाम दिया है। भारत और अमेरिका ने संभारतंत्र आदान-प्रदान समझौता (एलईएमओए); और संचार, अनुकूलता और सुरक्षा समझौता (सीओएमसीएएसए) पर हस्ताक्षर किये हैं।

भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका में इस क्वैड दायरे में अधिकारियों और नेताओं के बीच बैठक हुई। चीनी वक्तव्यों पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने यह कहा कि क्वैड का मुख्य फोकस एक दूसरे के साथ और अन्य साझेदारों के साथ उत्तरोत्तर अंतर्संबंध वाले इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए विजन व मान को अभिसरित करने वाले सदस्यों पर आधारित सहयोग पर है।

भारत ने फ्रांस के साथ एक द्विपक्षीय सैन्य संभार तंत्र समझौता किया है। यह ऑस्ट्रेलिया के साथ भी ऐसे ही समझौते की प्रक्रिया में है।

चीन के साथ भारत का संबंध कई परतों वाला है। दोनों ही देशों ने शांति और समृद्धि के लिए एक रणनीतिक और सहयोगात्मक साझेदारी के प्रति सहमति व्यक्त की है। भारत और चीन में दो मजबूत नेताओं के साथ इस संबंध को और स्थिर और सुरक्षित होना चाहिए।

डोकलाम मुद्दे को निपटाने में भारत की युक्ति इसकी परिपक्वता को दर्शाता है, इस विषय को आसियान के नेताओं ने ध्यान पूर्वक देखा। भारत ने चीन से कहा है कि उनके बीच मतभेद विवाद में नहीं बदलने चाहिएं। भारत ने इस पर भी जोर दिया है कि चीन के साथ प्रतिस्पर्धा अनावश्यक है क्योंकि विश्व में दोनों देशों के लिए पर्याप्त स्थान है। यह संदेश जून, 2018 का वुहान सम्मेलन का था और माना जाता है कि भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के बीच वार्षिक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में यही संदेश रहेगा। भारत अगले महीने किसी तिथि को इस दूसरे अनौपचारिक सम्मेलन की मेजबानी करेगा।

वर्ष 2018-19 में कुल 87.07 बिलियन डॉलर के व्यापार के साथ चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था। व्यापार का संतुलन 53.56 बिलियन डॉलर के साथ चीन के पक्ष में था। भारत ने चीनी बाजारों में अपने उत्पादों के लिए अधिक बाजार पहुंच की मांग की है। चीन से निवेश में बढ़ोतरी हो रही है। चीन ने भारत से कहा है कि वे अपने 5जी परीक्षण में हुवेई को शामिल करने पर उचित निर्णय लें।

दोनों देशों के बीच सीमा विवाद अभी भी प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। पांच प्रमुख सीमा संबंधी दस्तावेजों और विशेष प्रतिनिधियों के बीच 20 दौर की बातचीत होने के बावजूद कोई समाधान नहीं दिखायी पड़ता है। चीन इस विवाद के समाधान में आगे बढ़ने के प्रति अनिच्छुक दिखता है। चीनी पक्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा के संबंध में अपने मानचित्र संस्करण देने को इच्छुक नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय माहौल के आधार पर लक्ष्यों में बदलाव आ रहा है। विगत सप्ताह पेंगोंग झील संघर्ष के साथ जहां उकसावे की कार्रवाई जारी है, वहीं सीमा क्षेत्रों में गुस्से में कोई गोली नहीं चली है। धारा 370 और अनुच्छेद 35 क को समाप्त करने के भारत के निर्णय पर चीन की प्रतिक्रिया पर हमारे प्रवक्ता ने सावधानी पूर्वक प्रतिक्रिया दी है। हमारी बातचीत में चीन से जुड़े विभिन्नमुद्दों पर हमारी प्रतिक्रिया नपी तुली होनी चाहिए किंतु अधिक महत्वपूर्ण है कि यह आत्मविश्वासपूर्ण होनी चाहिए।

चीन-पाकिस्तान के संबंधों की निकटता से निगरानी की जानी होगी। चीन-भारत संबंधों के और मजबूत होने की कीमत पर सदाबहार दोस्त के रूप में पाकिस्तान का चीन का स्पष्ट समर्थन जारी है और इसमें कोई कमी नहीं आयी है। चीन की क्षतिपूर्ति पाकिस्तान को आतंकवाद संबंधी और विशेषकर भारत के प्रति राष्ट्र प्रायोजित आतंकवाद संबंधी वैश्विक चिंता के विरूद्ध कार्रवाई करने की निरापदता प्रदान करती है। चीन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता के प्रति अपनी आपत्ति के लिए स्पष्ट है। यह संयुक्त राष्ट सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की उम्मीदवारी के संबंध में उभयभावी रहा हे।

चीन और भारत आरआईटी का हिस्सा हैं जो रूस, भारत और चीन को एकसाथ जोड़ता है। वे ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के भी सदस्य हैं।

नवम्बर, 2012 के अपने नोम पेंह शिखर सम्मेलन में आसियान देशों के राष्ट्र प्रमुखों और आसियान के मुक्त व्यापार समझौता साझेदार ने अगस्त, 2012 में सिएम रीप, कंबोडिया में उनके आर्थिक मंत्रियों द्वारा अंगीकृत ‘’क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी संबंधी समझौते के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत और उद्देश्य’’ने समर्थन किया। इस आरसीईपी का उद्देश्य ‘’आधुनिक, व्यापक, उच्च गुणवत्ता वाला और परस्पर लाभकारी आर्थिक साझेदारी को प्राप्त करना; क्षेत्रीय व्यापार और निवेश के विस्तार को सुकर बनाने के लिए मुक्त व्यापार और निवेश माहौल की स्थापना करना और वैश्विक आर्थिक वृद्धि और विकास में योगदान देना; और आर्थिक वृद्धि व न्यायसंगत आर्थिक विकास, संवर्धित आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाना तथा आरसीईपी के माध्यम से इस क्षेत्र में सामंजस्य को व्यापक और गहरा बनाना है।‘’ माना गया कि इससे साझेदारों के बीच विद्यमान आर्थिक संबंधों का निर्माण होगा।

आरसीईपी के सदस्यों में आसियान के 10, आसियान+3, चीन, जापान और रिपब्लिक ऑफ कोरिया एवं तीन वार्ता साझेदार यथा भारत, ऑस्ट्रेलियाऔर न्यूजीलैंड शामिल हैं। इस समझौते का लक्ष्य वस्तु, सेवा, निवेश, आर्थिक और तकनीकी सहायता, प्रतिस्पर्धा और बौद्धिक संपदा अधिकारों को शामिल करना है। आरसीईपी सदस्यता से 47.4 प्रतिशत विश्व जनसंख्या, 32.2 प्रतिशत वैश्विक अर्थव्यवस्था, 29.1 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और 32.5 प्रतिशत वैश्विक निवेश प्रवाह होगा। आरसीईपी मंत्रियों ने नोट किया है कि ''यह इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण व्यापार एजेंडा है जो एक मुक्त, समावेशी, और नियम आधारित व्यापार प्रणाली व समर्थकारी व्यापार एवं निवेश माहौल के लिए सहायक है।''

सहमति वाले दस्तावेजों पर सहमति के लिए आरसीईपी सदस्यों के बीच 26 दौर की बातचीत हो चुकी है। जुलाई, 2019 में मेलबर्न में हुई 26वीं दौर की बैठक में भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने कहा, ''भारत आरसीईपी को अपनी एक्ट ईस्ट नीति के तार्किक विस्तार के रूप में देखता है और इसमें संपूर्ण क्षेत्र के लिए आर्थिक विकास और स्थायित्व हेतु पर्याप्त क्षमता है।''

अगस्त, 2019 में बीजिंग में हुई 8वीं आरसीईपी अंत:सत्रीय मंत्री स्तरीय बैठक में भारत ने व्यापार घाटे को कम करने के लिए अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त चीनी, चावल और भेषज जैसे उत्पादों हेतु चीन के बाजारों की अधिक पहुंच की मांग की। भारतीय कामगारों हेतु चीन द्वारा कारोबारी वीजा व्यवस्था की शर्तों में छूट दिए जाने संबंधी विषय पर भी चर्चा हुई। आसियान के साथ भारत ने वस्तु और सेवा में आसियान के प्रस्तावों में सुधार पर भी चर्चा की।

बीजिंग बैठक के बाद घटनाक्रमों की समीक्षा करने के लिए 7वीं आरसीईपी मंत्री स्तरीय बैठक के लिए सितम्बर, 2019 में बैंकॉक में आरसीईपी के भागीदार देशों (आरपीसी) के मंत्रियों ने मुलाकात की। उन्होंने माना कि ''यह समझौता एक महत्वपूर्ण स्तर तक पहुंच चुका है क्योंकि समझौते की समय-सीमा नजदीक आ रही है।'' मंत्रियों ने नोट किया कि जहां इस समझौते के दौरान व्यक्तिगत आरपीसी स्थिति को वैश्विक व्यापार माहौल में कुछ घटनाक्रम प्रभावित कर सकते हैं, वहीं आरपीसी को आरसीईपी में मूल्य श्रृंखला को और गहरा करने और विस्तार देने के दीर्घकालिक विजन को नहीं छोड़ना चाहिए और साथ में यह भी जोड़ा गया कि आरसीईपी इस बाजार के लिए अत्यधिक आवश्यक स्थिरता और निश्चितता प्रदान करेगा जो बदले में इस क्षेत्र में व्यापार और निवेश को बढ़ाएगा।"मंत्रियों ने इसे रेखांकित किया कि आरपीसी उन लंबित मुद्दों को दूर करने पर कार्य कर रहा था जो मुद्दे नेताओं द्वारा यथा अधिदेशित नवम्बर, 2019 तक इस समझौते को करने के लिए मूलभूत मुद्दे हैं।

जून, 2019 में बैंकॉक में 34वें आसियान शिखर सम्मेलन में मलेशियाई प्रधानमंत्री महातीर मोहम्मद ने सुझाव दिया कि वे कुछ समय में लिए कुछ सदस्यों विशेषकर भारत के बिना भी इस समझौते को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। भारत ने कहा कि वह भी बैंकॉक में अगले 35वें शिखर सम्मेलन द्वारा समझौते को करने के प्रति इच्छुक है किंतु वह चाहेगा कि तब तक उनकी चिंताओं को पर्याप्त रूप से दूर कर दिया जाए। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की भी आरसीईपी दस्तावेज के संबंध में कुछ आशंकाएं हैं और अभी भी विद्यमान हैं।

जून, 2018 में शांग्रिला वार्ता में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरसीईपी समझौते के साथ आगे बढ़ने के लिए भारत की दृढ़ता को रेखांकित किया। उन्होंने अपने पहले निष्कर्ष का समर्थन किया और वे नहीं चाहते थे कि भारत को प्रतिरोध करने वाले देश के रूप में देखा जाए। तथापि, उन्होंने कहा कि भारत को एक ऐसे आरसीईपी समझौते की आवश्यकता है जो परस्पर विश्वास के आधार पर सबसे हित में हो।

वस्तुओं हेतु बाजार पहुंच समझौते में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। सेवाओं के संबंध में भी समझौते में प्रगति के लिए ऐसे प्रयासों का आह्वान किया गया है क्योंकि यह अधिकांश आरसीईपी देशों के जीडीपी के 50 प्रतिशत से अधिक है। भविष्य में सेवा क्षेत्र सेएक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने की आशा है।

भारत की मुख्य चिंताओं में अन्य बातों के साथ-साथ कतिपय साझेदार देशों में कारोबार करने में पारदर्शिता की कमी; वस्तु व्यापार में भारत का बढ़ता घाटा (2018-19 में भारत को 11 आरसीईपी सदस्य देशों के साथ व्यापार में घाटा हुआ; चीन और आरसीईपी सदस्यों के साथ 2018-19 में व्यापार घाटा क्रमश: 53.6 बिलियन डॉलर और 105 बिलियन डॉलर है।); उद्गम नियमों के प्रावधानों में कमियों का फायदा उठाना; बाजार में पहुंच में कठिनाई; सेवा संबंधी भारत की चिंताओं को संतोषजनक तरीके से दूर करने में साझेदारों द्वारा रूचि का न होना शामिल है। आरसीईपी सदस्यों ने विशेषकर वर्क वीजा के मामले में सेवाओं में किसी व्युत्क्रमी प्रतिबद्धताओं के बिना ही वस्तुओं से प्रशुल्क को समाप्त करने पर जोर दिया है। सेवाओं में मोड 4 के प्रस्ताव आसन्न नहीं है। भारत ने अपने समझौते वाले साझेदारों से आह्वान किया था कि वे नवम्बर, 2012 के आसियान शिखर सम्मेलन में यथा रेखांकित आधुनिक, व्यापक, संतुलित और परस्पर लाभकारी समझौते पर सहमत हों।

सर्वमान्य आरसीईपी की प्रतीक्षा करते हुए भारत यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि यह समझौता न केवल वस्तु, सेवा व्यापार और निवेश जैसी मुख्य बातों में संतुलित हो बल्कि अन्य बातों में भी यह संतुलित समझौता हो। भारत ने कहा है कि वस्तु और सेवा क्षेत्र में प्रशुल्क की कमी के असमान संतुलन नहीं होना चाहिए – साझेदारों को बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं के साथ सेवाओं और वस्तुओं में प्रशुल्क की कमी के समान उच्च स्तर को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। अभी आसियान ने वस्तुओं में एक साझा रियायत देने का प्रस्ताव किया है यथा 92 प्रतिशत तक प्रशुल्क छूट, 7 प्रतिशत प्रशुल्क कमीऔर अपवर्जन सूची में 1 प्रतिशत। भारत निवेशक –राष्ट्र विवाद निपटान प्रक्रिया (आईएसडीएस) के कुछ प्रावधानों पर भी चिंतित है। कई उद्योग समूहों ने यह नोट करते हुए आरसीईपी में भारत में शामिल होने के संबंध में अपनी चिंताओं को उद्धृत करते हुए सरकार को एक ज्ञापन सौंपा है कि पूर्व मुकत व्यापार समझौते का अपेक्षित परिणाम नहीं निकला है। यह उद्योग पर्याप्त सुरक्षा दिए बिना अथवा व्युत्क्रमी पस्ताव के बिना भारतीय बाजार में चीन की पहुंच को बढ़ाने के प्रति भी चिंतित है।

सितम्बर, 2019 में बैंकॉक में मंत्री स्तरीय वार्ता के बाद वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने कहा ''प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुझे निदेश दिया है कि अपने घरेलु उद्योग की रक्षा करने के लिए सभी कदम उठाते हुए आरसीईपी समझौता करें। साथ ही, हमें नयी प्रौद्योगिकी की कारोबारी गतिविधि को बढ़ाने, नए विदेशी निवेश लाने और सेवा क्षेत्रों को खोलने, भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजार तक पहुंच के अवसर को ध्यान में रखना है। अन्यथा भारतीय निर्यातक को हानि होगी।'' ... उन्होंने यह भी जोड़ा ''एक या दो क्षेत्रों से राष्ट्रीय हितों को समाप्त नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय हित को समग्र संदर्भ में देखा जाना होता है। ऐसा कह कर किहम उन उद्योगों में भी संतुलन लाएंगे जो यह महसूस करते हैं कि चीनी कंपनियों को अनुचित लाभ मिल सकता है और यह सुनिश्चित करना है कि हम जो भी समझौता करें, वह सुविधा संतुलन में भारत के लिए बेहतर हो। किंतु आप निश्चय ही मानेंगे कि यदि मुझे सभी क्षेत्रों को देखना हो तो कभी भी कोई समझौता नहीं हो सकता है।'' उन्होंने यह भी कहा ''घरेलु उद्योग को पर्याप्त सुरक्षा के साथ जितनी जल्दी आरसीईपी समझौता होगा, भारत के लिए उतना ही बेहतर होगा।''

बैंकॉक की बैठक के बाद भारत ने ''इसे और मजबूत तंत्र बनाने के भारत के सुझाव'' पर चर्चा करने के लिए 14-15 सितम्बरको नई दिल्ली में हुई एक बैठक में आरपीसी के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था। नवम्बर की समय-सीमा तक आरसीईपी में भारत के शामिल होने की संभावना पर संदेश व्यक्त करते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की चिंताओं को पर्याप्त रूप से दूर नहीं किया गया है।

साथ ही ये भी सुझाव आए हैं कि भारत को आसियान का भारत के साथ अपने व्यापार समझौते की समीक्षा करने के लिए कुछ देशों के साथ एफटीए की समीक्षा पर विचार करना चाहिए। भारत ने जापान और कोरिया से अनुरोध किया है कि वे भारत के साथ अपने एफटीए की समीक्षा करें।

कनेक्टिविटी प्रदान करना भारत की आर्थिक कूटनीति का एक मुख्य संघटक है। यह प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है। समुद्री लाइनों में यह फैला हुआ है किंतु भारत ने संपूर्ण स्थिति में कनेक्टिविटी के मुद्दे को दूर किया है।

आसियान-भारत कनेक्टिविटी भारत और आसियान के देशों के लिए भी प्राथमिकता है। वर्ष 2013 में भारत आसियान कनेक्टिविटी समन्वय समिति-भारत के बीच बैठक को शुरू करने के लिए आसियान का तीसरा वार्ता पक्षकार बना। भारत की म्यान्मार से होते हुए आसियान देशों के साथ अखंड सीमा है। कनेक्टिविटी को उन्नत बनाने और मजबूत करने में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में विकास और प्रगति के लिए संभावनाएं होनी चाहिए।

चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री रास्ते की हाल की घोषणा भारत को हिंद-प्रशांत के भौगोलिक दायरे के निकट लाता है। इससे भारत को आकर्टिक क्षेत्र में सहज पहुंच मिलेगी और भारत की ऊर्जा सुरक्षा में उल्लेखनीय मदद मिलेगी। अमेरिका के पश्चिमी तट से भारत के संबंध का ध्यान रखा गया है। भारत का अफ्रीका के पूर्वी भाग के साथ नियमित समुद्री कनेक्टिविटी है।

चीन का वर्ष 2013 में वन वेल्ट वन रोड पहल (बीआरआई) के प्रस्ताव को नव उपनिवेशवाद दृष्टिकोण के रूप में देखा गया है जो ऋण ग्रस्त विकासशील देशों में उनकी आस्तियों पर आधिपत्य जमाने की दिशा में एक नीति है। बेल्ट एंव रोड पहल से 65 देशों के जुड़ने की आशा है और इसकी कुल लागत परिव्यय 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। आसियान में बीआरआई परियोजनाओं के लिए लगभग 750 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए गए हैं (2017 में आसियान-चीन व्यापार 441 बिलियन डॉलर पहुंच गया अथवा आसियान के कुल व्यापार का 17.1 प्रतिशत है। चीन से आसियान देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) वर्ष 2017 में 11.3 बिलियन डॉलर का है अथवा कुल आसियान एफडीआई का 8.2 प्रतिशत)। पाकिस्तान को लगभग 69 बिलियन डॉलर मिलेगाजिसमें अधिकांश वित्तपोषण पाक अधिकृत कश्मीर के लिए होगा। हाल ही में यूरोपीय देशों, यूनान और विशेष रूप से इटली ने बीआरआई में अपनी रूचि दिखायी है। जर्मनी में कुछ निवेश की संभावना है। साथ ही कतिपय देशों ने इन कुछ परियोजनाओं के बारे प्रश्न पूछना शुरू कर दिया है। फुसलाना, धमकी देना और बल प्रयोग करने का पुराना चीनी पैटर्न से छोटे देश चीन के दबाव में आ जाएगा।

बीआरआई के संबंध में भारत की आशंका सर्वविदित है- इसमें अन्‍य बातों के साथ पारदर्शिता और जिम्‍मेदारी, संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता के प्रति सम्‍मान का न होना है। पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर से होकर रास्‍ते का गुजरना अस्‍वीकार्य है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति और इस क्षेत्र में बीआरआई के तहत इसकी अग्र सक्रिय दृष्टिकोण गंभीर आशंका पैदा करता है। हिंद महासागर क्षेत्र यथा जिबूती, ग्‍वादर और अन्‍य पत्‍तनों में चीनी बेसों के संभावित विकास ने हिंद महासागर में चीन की आगे बढ़ने की नीति को और समेकित करती है।

दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रमक रूख को इसके पड़ोसी देशों और साथ ही इस क्षेत्र व इसके परे देशों ने बड़े आशंकित तरीके से देखा है। फिलिपीनो द्वीपसमूह के विषय पर अंतरराष्‍ट्रीय विवाचन न्‍यायालय के निर्णय के प्रति चीन की घृणास्‍पद प्रतिक्रिया इस बात को रेखांकित करने के लिए एक साक्ष्‍य है कि जिसे विश्‍लेषक अंतरराष्‍ट्रीय कानून कहता है वह शक्तिशाली के विरूद्ध कितना शक्तिहीन और शक्तिहीन के विरूद्ध कितना शक्तिशाली है।

बीआरआई पर चीनी जोर का प्रतिकार करने के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति ट्रंप अक्‍तूबर, 2018 में विकास हेतु निवेश की बेहतर उपयोगिता (बीयूआईएलडी) अधिनियम लेकर आए। माना जाता है कि इस कानून से अमेरिकी विकास वित्‍त क्षमताओं में सुधार और मजबूत होकर एक नयी संघीय एजेंसी बनेगी ताकि अमेरिका की विकास संबंधी चुनौतियों और विदेश नीति की प्रा‍थमिकताओं के समाधान में सहायता मिलेगी। ''अमेरिकी अंतरराष्‍ट्रीय विकास वित्‍त निगम (डीएफसी) एक आधुनिक, समेकित एजेंसी होगी जो विकासशील विश्‍व के लिए बेहतर निजी पूंजी हेतु नए और नवोन्‍मेषी वित्‍तीय उत्‍पादों को लाते हुए विदेशी निजी निवेश निगम (ओपीआईसी) और यूएसएआईडी के विकास ऋण प्राधिकरण की क्षमताओं को एकसाथ लाएगी।'' अमेरिका आशा करता है कि इसमें और अधिक लचीलापन आएगा ताकि विकासशील देशों में निवेश को सहायता मिले जिससे कि वे आर्थिक विकासकर सके, स्थिरता आए और आजीविका में सुधार हो। डीएफसी 1 अक्‍तूबर, 2019 से कार्य करना शुरू करेगा।

90 के दशक की शुरूआत में इस संगठन द्वारा घोषित अधिस्‍थगन के कारण भारत एपीईसी को स्‍वीकार करने में असमर्थ रहा है। इस संगठन के कुछ अग्रणी सदस्‍यों द्वारा एपीईसी में भारत को शामिल करने का आह्वान किया गया है। कुछ अन्‍य सदस्‍यों ने भारत की सदस्‍यता पर अपनी आशंका जाहिर की है।

भारत और इसके साझेदारों के समक्ष उत्‍पन्‍न चुनौतियों के कारण अंतरराष्‍ट्रीय आतंकवाद, पायरेसी, संगठित अपराध, नशीली पदार्थों की तस्‍करी और हथियारों के व्‍यापार के अनिष्‍टकारी प्रभावों से निपटने में संयुक्‍त सहयोग में बढ़ोतरी होनी चाहिए। आशा है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र में अंतरराष्‍ट्रीय आतंकवाद पर व्‍यापक सम्‍मेलन से संबंधित भारतीय प्रारूप दस्‍तावेज पर साझेदारों की ओर से अधिक समर्थन मिलेगा। नौवहन और मुक्‍त वायु क्षेत्र में उड़ने की स्‍वतंत्रता का प्रश्‍न चर्चा का विषय बना रहेगा। हिंद- प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ भारत के सहयोग की सुरक्षा के आयाम उल्‍लेखनीय रूप से बेहतर और परस्‍पर लाभकारी हैं।

एक क्षेत्र जहां भारत ने बहुत ही बेहतर कार्य किया है, वह है हिंद –प्रशांत क्षेत्र के देशों साथ वहां के लोगों के बीच संपर्क में बढ़ोतरी और अपनी उदार शक्ति का प्रदर्शन। विदेश में बसे भारतीयों की भूमिका इस संबंध में एक अतिरिक्‍त आस्ति रही है।

आसियान और इसके अन्य हिंद-प्रशांत साझेदारी देशों के साथ भारत के संबंध से बेहतर लाभ हुआ है और हमें इस दिशा में इस गति को बनाए रखने की आवश्यकता है। भारत और इसके साझेदारों को इस जटिल क्षेत्र में एक दूसरे की आवश्यकता है जहां एक महाशक्ति को पीछे हटते हुए और उस क्षेत्र में अधिक लड़ाकू और अत्यधिक महत्वाकांक्षी शक्ति को इस क्षेत्र में आते हुए देखा जा रहा है। जहां राजनीति और सुरक्षा, सांस्कृतिक और लोगों के बीच भारत की साझेदारी में बढ़ोतरी हुई है, वहीं इस संबंधों को और पनपने में सहायता के लिए व्यापार, अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता होगी। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन ऐसी चुनौतियां हैं जिनमें संयुक्त कार्रवाई की आवश्यकता है। क्षेत्रीय और द्विपक्षीय साझेदारी को अधिक सहमति बनाने और मजबूत करने के लिए सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। इससे भारत और समग्र रूप से हिंद प्रशांत क्षेत्र के देशों के लिए संवृद्धि, विकास और सुरक्षा के लिए ट्रैक्शन मिलेगा।

हमें इन मुद्दों को अधिक ऊर्जा और प्रतिबद्धता के साथ उठाने के आवश्यकता है ताकि भारत संवृद्धि और विकास में समर्थ हो सके और 2024 तक इसकी अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सके।

अपनी बात समाप्‍त करने से पूर्व मैं इस बात का स्‍वागत करूंगा कि आपमें से कुछ लोग भारतीय विदेश सेवा में शामिल होने की संभावना पर विचार करें। विदेश मंत्रालय युवा अधिकारियों का स्वागत करेगा और उन्हें इस वैश्विकृत दुनिया में उन्हें कल के नेताओं के रूप में तैयार करेगा।

मुझे उन प्रश्नों का उत्तर देने में खुशी होगी जो न केवल भारत की हिंद-प्रशांत नीति से संबंधित हो बल्कि भारत की संपूर्ण विदेश नीति से संबंधित हो।

आपका धन्यवाद!