विशिष्ट व्याख्यान विशिष्ट व्याख्यान

भारत के बदलते और चुनौतीपूर्ण पड़ोसी

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    By: राजदूत (सेवानिवृत्त) अनिल त्रिगुनायत
    Venue: एनआईटी, वारंगल
    Date: अगस्त 22, 2019

माननीय निदेशक एनआईटी, प्रतिष्ठित संकाय सदस्य, प्रिय छात्रों

मैं वस्तुत: यहां मौजूद रहकर अत्यंत प्रसन्न हूं। आपके इस खूबसूरत शहर में मेरी यह पहली यात्रा है। मैं अतिथि सत्कार के लिए एनआईटी का तथा इस प्रतिष्ठित व्याख्यान के लिए मुझे यहां भेजने के लिए विदेश मंत्रालय के एक्सपीडी प्रभाग का अत्यंत अभारी हूं।

पड़ोसी भू-राजनीतिक भावना में भूगोल का उपहार होते हैं। उनकी अनुकूल समस्याएं होती हैं तथा वे मानवों की ही भांति पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता होती है और वे ऐतिहासिक पृष्टभूमि अथवा बाहरी उत्प्रेरणाओं और षड़यंत्रों द्वारा उनके द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय संबंधों में जटिल होते हैं। प्राय: भूमि और प्रादेशिक मुद्दे संप्रभुता आयाम के साथ विलयित हो जाते हैं जो देश और क्षेत्र की संरचित घरेलू राजनीति के साथ संश्लिष्ट बन जाते हैं। महाद्वीप के अनुपात और आकार का देश भारत भी इसमें अपवाद नहीं है। इसके अनेक पड़ोसियों ने इसके साथ ऐतिहासिक संबंध रखे हैं तथा वे समग्र के भाग के रूप में सह-अस्तित्व में थे और वे 200 वर्ष के उपनिवेशवाद को भी अपने मस्तिष्क का श्रेय देते हैं। इतिहास और भूगोल तथा विस्तारित पड़ोस ने विशेष रूप से छोटे देशों को उनके विकास, सुरक्षा और प्रभाव के लिए आधुनिक समय की प्रतिस्पर्धा द्वारा उन्हें और अधिक बल प्रदान किया। वे उनके सुदृढ़ और अधिक बड़े आर्थिक पड़ोसियों के बारे में भी सतर्क थे और उन्होंने ऐसे अधिमानिक करार और संधियां करते हुए, जो कभी-कभी तो उनके स्वयं के लिए भी लाभप्रद नहीं होती हैं, क्षेत्रीय शक्तियों अथवा अन्य बड़ी शक्तियों से प्रति-संतुलन प्राप्त करते हुए उस क्षेत्रीय असंतुलन को तटस्थ बनाने का प्रयास किया। परंतु ऐसा हमेशा से होता रहा है। और हम एक गतिशील लेकिन कभी-कभी सृजनात्मक तनाव को भी देखते हैं जो इस बात पर निर्भर करती है कि हम उस स्थिति को किस दृष्टि से देखते हैं।

भारत ने निरंतर ऐसी नीति का पालन किया है कि एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ पड़ोस इसकी स्वयं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। परन्तु इसे किसी न किसी समय पर अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को आरामदेह स्तर तक बनाए रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। चूंकि पड़ोस आपके पसंद के अनुसार नहीं होता है, तथा एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ एक सुदृढ़ पड़ोस किसी भी देश के लिए एक पूर्वापेक्षा होती है, भारत ने एक गैर-पारस्परिक नीति का अनुपालन किया है जिसमें अधिकतम संभव सहायता प्रदान की गई है विशेष रूप से अधिमान्य बाजार पहुंच, क्षमता निर्माण एवं निवेश तथा सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी मेट्रिक के माध्यम से। भारत एक प्रथम प्रतिक्रियादाता और प्राय: एक सुरक्षा प्रदाता के रूप में भी उभरा है, चाहे वह मालदीव्स में जल अभाव हो या विद्रोह के प्रयास, नेपाल में आया भयावह भूकंप हो या श्रीलंका में हुआ हाल का आतंकवादी हमला या फिर बांग्लादेश में हाल ही में आई बाढ़ की स्थिति हो।

एकमात्र अपेक्षा यह बनी हुई है कि वे ऐसी किसी उत्कंठा से दूर रहेंगे जो भारत को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है चाहे वह आतंकवाद हो अथवा इससे संबंधित कोई ऐसी आर्थिक परियोजनाएं जो भारत की सुरक्षा के लिए प्रतिकूल हों। हम "गुजरात सिद्धांत" अथवा व्यापक और अनुकूल निवेशों तथा ऋणों और अनुदोनों के प्रावधान को अथवा इसी दिशा में प्रधानमंत्री मोदी की वस्तुत: ध्यान-केन्द्रित "पड़ोसी प्रथम नीति" को देख सकते हैं। परंतु चीन ने अपनी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं और बेल्ट एवं रोड पहलकदम (बीआरआई) तथा साथ ही दक्षिण एशियाई क्षेत्र में अपनी "स्ट्रिंग ऑफ दि पर्ल्स" रणनीति के कारण भारत के लिए पर्याप्त चुनौतियां सृजित की हैं जिसमें उसने अपनी चेकबुक राजनयिकता और त्वरित परियोजना निष्पादन शैली का खासा प्रयोग किया है। इन दोनों ही मामलों में, भारत को पर्याप्त मशक्कत करनी पड़ती है क्योंकि भूटान के अपवाद को छोड़कर उसके अधिकांश पड़ोसी देश चीन के विशेष रूप से बीआरआई के झांसे में आ गए हैं जहां भारत की संप्रभुता संबंधी चिंताएं विद्यमान हैं। वस्तुत: पिछले सप्ताह ही प्रधानमंत्री मोदी ने पुन: भूटान का दौरा किया तथा दक्षेस उपग्रह के लिए लैंड ट्रैकिंग उपग्रह का उद्घाटन किया जिसका वायदा भारत ने किया था तथा उसे पाकिस्तान के बहिर्गमन के विकल्प के बावजूद रिकार्ड समय में प्रारंभ किया। यह स्पष्ट है कि इन नई रणनीतियों के साथ अधिक कार्य किए जाने की आवश्यकता है।

चूंकि दक्षेस पाकिस्तान की भारत के विरुद्ध राज्य नीति के रूप में आतंकवाद को दिए जाने वाले उसके सतत् प्रश्रय के मद्देनजर भारत-पाक प्रतिद्वंद्विता में घिरकर रह गया है, पड़ोसी की नई परिभाषाएं तैयार करने की आवश्यकता सामने आई। अत: 'एक्ट ईस्ट नीति' तैयार की गई जिसमें उप-क्षेत्रीय सहयोग पर बल प्रदान किया गया है जैसे बीसीआईएम, बीबीआईएन, बिमस्टेक, आईओआर आदि। इसके अलावा 'लुक एंड एक्ट वेस्ट नीति' जिसमें विशेष रूप से जीसीसी देशों और इजराइल के साथ राजनीतिक रूप से संबंध बनाने और सहयोग मेट्रिक्स का विस्तार करने को महत्व प्रदान किया गया था, ने भी अभूतपूर्व पकड़ हासिल कर ली है तथा यह संभवत: मोदी सरकार की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता है। प्रधानमंत्री मोदी हमारे पड़ोसी देशों की गई अनेक यात्राओं तथा अपने साथी देशों के साथ उनके 'व्यक्तिगत संबंधों' के फलस्वरूप एक अत्यंत असामान्य सुविधाजनक स्तर और ऐसी मजबूत समझ प्राप्त हुई है जो उनके मध्य संबंधों को द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संदर्भ से सुदृढ़ करेगा तथा यह विशेष रूप से खाड़ी से आने वाले संवर्धित रणनीतिक निवेश तथा सुरक्षा, रक्षा और आतंकवाद-रोधी पहलों में निरंतर विस्तृत होते सहयोग से स्पष्टत: दिखाई पड़ता है। इजराइल भी भारत के लिए एक प्रमुख प्रौद्योगिकीय और सुरक्षा भागीदार के रूप में उभरा है जबकि भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर फिलीस्तीन का मुद्दे का निरंतर समर्थन किया है तथा वास्तविक-राजनीति के आदेश के बावजूद द्विपक्षीय वैविध्यपूर्ण सहायता के माध्यम से भारत ने अपने अन्य अरब पड़ोसियों की ही भांति इजराइल बनाम फिलीस्तीन नीति को पुन: तैयार किया है। इसके साथ ही हमें भारत-प्रशांत ढांचे के अंतर्गत विद्यमान क्षमता को भी देखना चाहिए। यह समझना महत्वपूर्ण है कि 'पड़ोस प्रथम नीति' की एक विस्तारित पहुंच बनाई गई थी तथा यह केवल निकटवर्ती पड़ोस तक ही सीमित नहीं थी। परंतु हमें अपने तात्कालिक पड़ोस पर चर्चा करनी चाहिए क्योंकि हमारे स्वयं की प्रगति और विकास हमारे पड़ोस के विकास पर निर्भर करता है और यही भारत की सतत् नीति रही है।

पड़ोस प्रथम नीति

भारत को तात्कालिक पड़ोस को दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहायोग संघ परिदृश्य) के आयामों के भीतर अर्जित किया जा सकता है, हालांकि दक्षेस की स्थापना 1985 में तत्कालीन बांग्लादेशी राष्टप्रति जिया-उर-रहमान की घनिष्ठ क्षेत्रीय एकता और सहयोग में वृद्धि करने के पहल पर की गई थी। हालांकि दक्षिण एशिया को आमतौर पर छोटे द्वीपों वाले देश जैसे मालदीव्स से लेकर महाद्वीपीय अनुपात के देश, जैसे भारत तक के रूप में वर्णित किया जाता है। इसमें वैश्विक जनसंख्या का 23 प्रतिशत भाग निवास करता है, 15 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि है, 6 प्रतिशत क्रय शक्ति है और वैश्विक व्यापार का 2 प्रतिशत भाग निहित है। अफगानिस्तान, भूटान और नेपाल स्थलरूद्ध है तथा अपनी बाहरी पहुंच के लिए अन्य देशों पर निर्भर करते हैं जिनमें भारत भी शामिल है। इसके अल्प छह अथवा सात दशक प्राचीन राजनीतिक और स्वतंत्र इतिहास ने भारत में विशाल लोकतंत्र के आश्चर्यजनक कार्यकरण से लेकर भूटान और नेपाल में साम्राज्यों को और समूह के कुछ देशों में निरंतर होने वाले विद्रोहों तथा नेपाल में लोकतांत्रिक साम्यवाद के पुनरूत्थान तक के घटनाक्रम को देखा है। इसके अलावा, दोनों बड़े देशों के पास परमाणु समक्षताएं भी हैं जिसे इस व्यापक पड़ोस में पहले से ही परमाणु-समर्थ चीन ने और भी गंभीर बना दिया है जो पाकिस्तान के माध्यम से छद्म रूप से अपने आडम्बरपूर्ण संतुलन को बरकरार रखने का प्रयास कर रहा है। सबसे ऊपर, लगभग सभी देशों ने उग्रवाद और आतंकवाद को पनपते देखा है और वे उससे पीड़ित भी रहे हैं जो प्रायः बाहर से और प्रायः सीमा पार से निर्यातित होता है, हालांकि इनमें से कुछ देश इस प्रक्रिया में आतंकवादी समूहों और शिविरों के आश्रयदाता भी बन गए हैं ताकि वे अपनी संकीर्ण गैर-विवेकपूर्ण नीति के लक्ष्यों और उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें। आपने सही पहचाना, मैं पाकिस्तान की बात ही कर रहा हूं। क्षेत्र में स्थित देशों में और देशों के बीच गरीबी, शासन संबंधी मुद्दों, अल्पविकास और गहरे सामाजिक, आर्थिक मतभेदों और आकस्मिक प्रादेशिक विवादों का विद्यमान रहना संबंधित नेतृत्वों के लिए प्रमुख चुनौती बन गया है। हिंद महासागर और अरब सागर में अत्यंत अनिवार्य सामुद्रिक व्यापार मार्गों के साथ इसकी भू-राजनीतिक और भू-रणनीतिक अवस्थिति को ध्यान में रखते हुए देशों ने एक-दूसरे के साथ युद्ध किया है तथा उनके एक-दूसरे के साथ समस्याएं भी रही हैं अथवा उन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध छद्म युद्ध और विवाद भी जारी रखे हैं तथा दशकों तक शीत-युद्ध प्रतिद्वंद्विता भी कायम रखी है, जहां चीन और भारत जैसी नई शक्तियों के पुनरुत्थान होने वाले भावी परिणामों को स्थिर बनाए रखने के प्रयास भी किए गए। इस पर बहस की जा सकती है क्योंकि इक्कीसवीं शताब्दी एशियाई शताब्दी बनती जा रही है परंतु इसका मार्ग काफी कड़ा और कठिन होने की आशा है जिसमें कभी-कभी अलघंनीय बाधाएं भी विद्यमान होंगी क्योंकि नव उपनिवेशवादी शक्ति के प्रतिमानों का लाभ उठाने वाले देश इस नई व्यवस्था को इतनी आसानी से लागू होने की अनुमति नहीं देंगे। इसके अलावा, दक्षिण एशिया के संघटकों के मध्य विश्वास का अभाव भी निरंतर वैसा ही बना हुआ है। कोई भी देश अपनी शक्ति को छोड़ना नहीं चाहता है जैसा कि राजनीतिक सैन्य इतिहास से पता चलता है। परंतु निश्चित रूप से आर्थिक शक्तियां सामान्य तौर पर एशिया की ओर और विशेषत: पूर्व एशिया की ओर बढ़ रही है जिसके अंतर्राष्ट्रीय केन्द्रबिंदु और संबंधों पर अधिपत्य जमाने की संभावना है।

सीमितकारी द्विपक्षीय विवादों और असंगतियों वाला प्रादेशिक सहयोग शांति, वृद्धि, स्थायित्व और विकास के लिए वांछनीय है। एकपक्षवाद भी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में बहुपक्षवाद को अपना स्थान देता जा रहा है। बीसवीं शताब्दी में, अनेक क्षेत्रीय प्रयास प्रारंभ किए गए। इसके बाद से, ब्रेजिट के बावजूद ईयू संभवत: श्रेष्ठ और सर्वाधिक सफल प्रयोग था जहां सर्व-क्षेत्रीय संस्थाओं ने पर्याप्त अवरोधों तथा द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के संकटों के बावजूद अपने 27 सदस्यों के मध्य एकता के उच्च स्तर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चिंता और विकासात्मक खामियों को पार करना तथा वैयक्तिक संघटकों के संवंर्धित सहयोग की मांग की पूर्ति करना सदैव ही किसी भी क्षेत्रीय समूह की मौजूदा चुनौतियों में शामिल रहा है। ऐसी अनेक व्यवस्थाएं हैं जो एकीकरण के विभिन्न स्तरों पर संघर्ष कर रही हैं और आगे बढ़ रही हैं जैसे नाफ्टा, मेरकोसर और आसियान उनमें प्रमुख हैं। दक्षेस भी इस विभाजन और विरोधाभास से अछूता नहीं रहा है।

5.12 मिलियन वर्ग किमी के संयुक्त भू-भाग, 1.65 बिलियन की कुल जनसंख्या जिसमें से 60 प्रतिशत से अधिक 30 वर्ष की आयु से कम है तथा पीपीपी के संदर्भ में 86 ट्रिलियन यूएस डॉलर से अधिक की सकल जीडीपी के साथ आठ सदस्यों वाले दक्षेस संगठन से नई एशियाई शताब्दी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती थी, बशर्ते कि यह निष्कृष्ट घरेलू शासन, कुछ देशों द्वारा आतंकवाद को प्रश्रय देने, नृजातीय, सांप्रदायिक और पंथवादी विवादों के यदाकदा उत्पन्न होने और उपनिवेशी अतीत द्वारा प्रदत्त अनसुलझे सीमा विवादों की समस्याओं से बाहर निकल पाता। दुर्भाग्यवश यह सबसे कम एकीकृत क्षेत्र ही बना रहा।

चालीस के दशक में अपनी स्वतंत्रता के बाद से दक्षिण एशियाई देशों ने संरक्षणवादी नीतियों का अनुपालन किया जिसमें आर्थिक क्रियाकलापों पर राज्य का नियंत्रण था, तथा टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं के माध्यम से विदेश निवेश पर कम निर्भरता के साथ आत्मनिर्भरता पर ध्यान-केन्द्रित किया गया था। श्रीलंका ने सत्तर के दशक में उदारवादी दृष्टिकोण दर्शाते हुए आर्थिक सुधारों का नेतृत्व किया तथा अन्य देशों ने अस्सी और नब्बे के दशक में नए वैश्वीकरण मार्ग को अपनाया। अधिकांश देशों में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया विविध गतियों के साथ जारी रही। यह एक अर्थपूर्ण क्षेत्रीय सांस्थानिक तंत्र हासिल करने के लिए पूर्वापेक्षा भी थी। अत: सात दक्षिण एशियाई राष्ट्रों जिनमें बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव्स, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल थे, ने 1985 में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) नामक व्यापार ब्लॉक के सृजन पर तथा सार्क चार्टर के लिए प्लेटफार्म उपलब्ध कराने पर सहमति व्यक्त की जिसका पहला अनुच्छेद ही यह कहता था :

हम, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव्स, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका राज्य अथवा सरकार के प्रमुख;

"संयुक्त राष्ट्र चार्टर और गुट-निरपेक्ष के सिद्धांतों का सख्ती से अनुपालन करने के माध्यम से क्षेत्र की शांति, स्थायित्व, एकता और प्रगति को संवर्धित करने के लिए इच्छुक हैं जिसमें विशेष रूप से संप्रभु समानता, प्रादेशिक एकता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता, बल का प्रयोग न करने तथा अन्य राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और सभी विवादों का शांतिपूर्ण तरीके से हल करने के सिद्धांतों के प्रति सम्मान भी शामिल है तथा दक्षिण एशिया के लोग मैत्री, भरोसे और समझ की भावना के साथ मिलकर कार्य करने के इच्छुक हैं।" दक्षेस चार्टर यह भी निर्धारित करता है कि समस्त दक्षेस मंचों पर निर्णय सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाएंगे। द्विपक्षीय और वैमनस्यपूर्ण मुद्दों को इसके विचार-विमर्श से स्पष्ट रूप से निकाला जाएगा तथा सहयोग संप्रभु समानता, प्रादेशिक एकता, राजनीतिक स्वतंत्रता और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने पर आधारित होगा। दुर्भाग्यवश इन उपबंधों की अपनी जटिल गाथा रही तथा इन्होंने दक्षेस के कार्यकरण में प्रभावी अवरोध उत्पन्न किया क्योंकि उन्हें अनुपालन के स्थान पर उल्लंघन के रूप में अधिक देखा गया।

नवम्बर, 2005 में 13वें दक्षेस शिखर-सम्मेलन की ढाका घोषणा में अफगानिस्तान को इसके आठवें नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया। वर्तमान में दक्षेस में 9 प्रेक्षक हैं (चीन, ईयू, ईरान, कोरिया गणराज्य, आस्ट्रेलिया, जापान, मारीशस, म्यामांर और अमेरिका)।

दक्षेस की स्थापना के एक दशक बाद 1995 में दक्षिण एशियाई अधिमान्य व्यापार करार (साफ्टर) नामक क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग करार अस्तित्व में आया जिसके फलस्वरूप सदस्य देशों में अंतरा-क्षेत्रीय व्यापार उदारीकरण और आर्थिक सहयोग के उच्च स्तर स्थापित हुए। साफ्टा ने क्षेत्र में न्यूनतम विकसित देशों के लिए विशेष और सर्वाधिक अनुकूल व्यवहार सुनिश्चित करते हुए पात्र मदों पर आयात टैरिफों की कटौती के माध्यम से अधिमान्य व्यवहार सुनिश्चित किया। क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को और सुदृढ़ बनाने के लिए दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार करार (साफ्टा) 2006 में अस्तित्व में आया। तथापि, अधिकांश सदस्य देशों ने साफ्टा की कीमत पर अन्य द्विपक्षीय व्यवस्थाओं तथा अधिक उदारवादी मुक्त व्यापार करारों को तरजीह देना जारी रखा जिसने आकर्षण को सीमित किया और आगे क्षेत्रीय एकीकरण में व्यवधान पैदा किया। इसके अलावा, क्षेत्र में व्यापार मार्ग का प्रभावी प्रयोग करने के लिए उत्पाद वैविध्यीकरण और सदस्य देशों की निर्यात संरचना भी नदारद रही है। साफ्टा का उद्देश्य दस वर्ष की अवधि में टैरिफ को 0 से 5 प्रतिशत तक कम करना था। इसने अपेक्षा की कि सदस्य देश जैसे भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका 2013 तक अपने सीमा-शुल्क टैरिफ को 5 प्रतिशत से नीचे निर्धारित कर देंगे जबकि इसने अल्प विकसित देशों जैसे अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव्स और नेपाल को 2016 तक टैरिफ कम करने अथवा समाप्त करने के लिए अधिक समयावधि की अनुमति दी। दक्षेस देशों के मध्य अंतरा-क्षेत्रीय व्यापार क्षेत्र के लिए निम्नतम रहा है। साफ्टा दक्षेस की स्थापना के तीस वर्ष के पश्चात् और व्यावहारिक लाभों के विद्यमान होने के बावजूद कुल क्षेत्रीय व्यापार के मात्र लगभग 10 प्रतिशत का ही योगदान देता है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत के लिए पाकिस्तान की तुलना में ब्राजील के साथ व्यापार करना 20 प्रतिशत किफायती है। यह यूरोपीय संघ के कुल व्यापार के लगभग 65 प्रतिशत; उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार करार (नाफ्टा) क्षेत्र में 51 प्रतिशत; दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) में 26 प्रतिशत तथा लातिन अमेरिकी ब्लॉक मेर्को सर में 16 प्रतिशत के अंतरा-क्षेत्रीय व्यापार की तुलना में है। यही स्थिति एफडीआई के साथ भी है। हालांकि दक्षेस देशों द्वारा प्राप्त एफडीआई में तीन दशकों की अवधि में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, 84 प्रतिशत से अधिक एफडीआई केवल भारत द्वारा प्राप्त हुआ है। दक्षिण एशियाई देशों को न केवल आर्थिक कारकों का समाधान करने की आवश्यकता है जैसे व्यापार सुविधा प्रदान करना और अवसंरचना विकास बल्कि उन्हें कुछ गैर-आर्थिक कारकों की भी जरूरत है जैसे राजनीतिक इच्छा-शक्ति का सृजन और आत्मविश्वास निर्माण ताकि साप्टा को साफ्टा में परिवर्तित करने तथा आगे दक्षिण एशियाई सीमा-शुल्क यूनियन में और अंतत: वर्ष 2020 तक दक्षिण एशियाई आर्थिक यूनियन में बदलने के लिए भावी मार्ग तय किया जा सके जो भारत और पाकिस्तान के बीच वर्तमान विवादों को देखते हुए एक दु:स्वप्न ही प्रतीत होता है।

अपने आकार, जनसंख्या और केन्द्रीय अवस्थिति को ध्यान में रखते हुए भारत वस्तुत- दक्षेस का नेतृत्वकर्ता और संचालक है। इसकी दक्षेस के सात अन्य सदस्यों में से छह के साथ साझी भूमि/जल सीमाएं हैं जो इसे नि:संदेह ही नेतृत्वकारी भूमिका प्रदान करती है। दुर्भाग्यवश, इन्हीं कारणों से भारत अपने ही दक्षेस पड़ोसियों के लिए यदा-कदा प्रताड़ना का लक्ष्य बन जाता है, जो इसकी नेतृत्वकर्ता की भूमिका से संतुष्ट नहीं होते हैं।

मई, 2014 में भारत में नई एनडीएन सरकर के सत्ता में आने के उपरांत दक्षेस के अंतर्गत क्षेत्रीय सहयोग को अत्यधिक प्राथमिकता प्रदान की गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और नई सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में सभी दक्षेस नेताओं की उपस्थिति एक अभूतपूर्व और स्वागतयोग्य परिवर्तन था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह स्पष्ट किया कि क्षेत्र को शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध बनाए रखना उनके प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। उन्होंने क्षेत्र में व्याप्त गरीबी को समाप्त करने के लिए सभी दक्षेस देशों द्वारा साथ मिलकर कार्य करने की आवश्यकता पर भी बल प्रदान किया। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही अफगानिस्तान, बांग्लादेश, म्यामांर, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव्स की यात्रा कर चुके हैं तथा उन्होंने पाकिस्तान और चीन की यात्रा भी कर ली है। भारत ने हमारे पड़ोस के अनेक नेताओं की मेजबानी भी की है। जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 में उनकी विजय के उपरांत मालदीव्स और भूटान की यात्रा की, विदेश मंत्री श्री जयशंकर हाल ही में बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की यात्रा कर चुके हैं। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री अक्तूबर में भारत के अपने चौथे दौरे पर आएंगी।

प्रमुख परियोजनाओं के प्रति पाकिस्तान के 'नकारात्मक वीटो और दृष्टिकोण' का सामना करने के लिए भारत समांतर उप-दक्षेस और व्यापक क्षेत्रीय पहलकदमों पर कार्यवाही कर रहा है जैसे बिमस्टेक और बीबी आईएन जो अंतत- भारत के अन्य पड़ोसी देशों जैसे चीन और म्यांमार को अन्य दक्षेस देशों जैसे बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका के साथ जोड़ते हुए दक्षेस सहयोग प्रक्रिया में तेजी लाने पर आधारित है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक कदम और उठाया तथा 18 महीने से भी कम समय में पांच बार प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से भेंट कीं जो कि अभूतपूर्व कदम है जिसमें 25 दिसम्बर, 2015 को प्रधानमंत्री शरीफ को उनके जन्मदिवस पर बधाई देने तथा उनकी पुत्री के विवाह में लाहौर जाना भी शामिल है। इसके साथ ही वरिष्ठ अधिकारी स्तर पर किए जाने वाले वार्तालापों ने यह आशा दर्शाई कि हमारी इन पहलों का दोनों देशों के बीच शांति और मित्रता पर सकारात्मक और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा परंतु ऐसा होना इतना सरल नहीं था क्योंकि पाकिस्तानी नेतृत्व ने भारतीय कार्यवाही के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने और साथ ही उसकी धरती से भारत को लक्ष्य बनाने वाले अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादियों के समूह के विरुद्ध कोई कार्रवाई करने के प्रति रुचि नहीं दर्शाई। वस्तुत: भारत द्वारा सद्भावना का भाव प्रदर्शित करने के तत्काल बाद ही भारत को आश्चर्य में डालते हुए पाकिस्तान से संचालित होने वाले आतंकवादियों ने पठानकोट और उरी हमलों को अंजाम दिया और साथ ही 26/11 के मुंबई हमलों के समाधान में भी कोई प्रगति नहीं हुई जिससे अत्यंत निराशा की स्थिति उत्पन्न हुई है। भारत द्वारा अनुच्छेद 370 और 35क को समाप्त करने से, जोकि पूर्णत: हमारा आतंरिक मामला है, पाकिस्तान भारत के विरुद्ध और भी कठोर रुख प्रदर्शित करने के लिए प्रवृत्त हो गया है परंतु इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के उसके प्रयासों को सफलता नहीं मिल पाई है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 'वार्तालाप और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सके हैं।"

भारत दक्षेस के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ और प्रतिबद्ध बना हुआ है तथा उसने इस असममित संबंध के लिए उल्लेखनीय योगदान किया है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार उनमें से कुछ महत्वपूर्ण योगदान इस प्रकार हैं:

· भारत अपने भौगोलिक, आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय महत्व तथा क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के कारण दक्षेस का केन्द्र-बिंदु है। दक्षेस क्षेत्र में शांति संतुलन अत्यंत सममित है क्योंकि भारत क्षेत्र की जीडीपी का 25 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या धारण करता है जिससे भारत पर प्रादेशिक निर्भरता अत्यंत उच्च हो जाती है तथा इसके पास क्षेत्र के अन्य देशों की तुलना में अत्यधिक सैन्य शक्ति है। भारत की क्षेत्र में भौगोलिता तथा अपनी अर्थव्यवस्था के आकार के कारण विशेष जिम्मेदारी भी बनती है। हमारी प्रगति और समृद्धि की यात्रा में क्षेत्र को भी साथ लेकर चलने में आर्थिक और जनसांख्यिकी, दोनों ही कारक अनिवार्य हैं। भारत ने सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अब तक दक्षेस संस्थाओं को 530 मिलियन यूएस डॉलर प्रदान किए हैं।

· नवम्बर, 2014 में काठमांडू में आयोजित XVIII में शिखर-सम्मेलन में दक्षेस के साथ प्रधानमंत्री मोदी की पहली ही भेंट में भारत ने अनेक एकपक्षीय प्रस्ताव पेश किए जिनमें उल्लेखनीय थे - दक्षेस उपग्रह तैयार करना, पोलियो-मुक्त देशों की निगरानी करना तथा दक्षिण एशिया के बालकों को पोलियो और पंचसंयोजक टीकाकरण प्रदान करना, व्यापार और चिकित्सा वीजा प्रणालियों को उदार बनाना, अंतरा-क्षेत्रीय पर्यटन में वृद्धि करना, सौर ऊर्जा के प्रयोग को प्रोत्साहित करना, सीमापार से भौतिक, डिजिटल और ज्ञान संयोजनता में वृद्धि करना, आपदा प्रबंधन और इसके शमनीकरण में विशेषज्ञता को साझा करना आदि।

· काठमांडू में आयोजित 18वें शिखर-सम्मेलन में भारत ने दक्षेस देशों के लिए समर्पित एक उपग्रह के विकास और प्रेक्षपण का प्रस्ताव किया जिसे पाकिस्तान के उससे बाहर रहने के बावजूद प्रक्षेपित कर दिया गया है। भारत ने एक प्रादेशिक हवाई सेवा करार का आह्वान भी किया तथा संयोजनता में सुधार करने के लिए दूरसंचार लागतों को कम करते हुए एक समर्थकारी परिवेश का सृजन करने में सहायता की पेशकश की। यह प्रस्तावित मोटर वाहन करार और रेलवे करार का प्रमुख पेशकर्ता भी रहा है। भारत दक्षेस ऊर्जा सहयोग फ्रेमवर्क करार के क्रियान्वयन में सक्रिय रूप से भागीदार रहा है जो दक्षेस क्षेत्र के भीतर सीमापार विद्युत व्यापार को सुकर बनाने के लिए अनुकूल परिवेश उपलब्ध कराता है।

· भारत का दक्षिण एशिया के साथ व्यापार इसके वैश्विक व्यापार का लगभग 5.5 प्रतिशत है। हम करारों पर यथाशीघ्र वार्ता करने/उन्हें क्रियान्वित करने, निवेश और व्यापार को संवर्धित करने, क्षेत्र में आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की हिमायत भी कर रहे हैं। साफ्टा के अंतर्गत भारत ने दक्षेस के अल्पतम विकसित देशों (एलडीसी) को सभी मदों के अंतर्गत एकपक्षीय शुल्क-युक्त पहुंच उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया है तथा गैर'एलडीसी के लिए चरण-II की प्रतिबद्धताओं को पूर्ण किया है। इसका एलडीसी से आने वाले माल के लिए शून्य टैरिफ है। हम एलडीसी के लिए हमारी संवेदनशील सूचियों में 480 टैरिफ लाइनों में से 455 को समाप्त कर रहे हैं।

· भारत दक्षेस सेवा व्यापार करार (सैटिस) के शीघ्र प्रचालन के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं के साथ पूरी तरह से तैयार है। हमारा दृष्टिकोण यह है कि हम एक अंशांकित परंतु प्रगतिशील तरीके से टैरिफ कटौती करने और संवेदनशील सूचियों को समाप्त करने का नेतृत्व करें।

· परिपक्व दक्षेस विकास निधि (एसडीएफ) अपने सामाजिक, आर्थिक और अवसंरचनात्मक आयामों के अंतर्गत परिकल्पित उप-क्षेत्रीय परियोजनाओं का वित्त-पोषण करती है। भारत ऐसा एकमात्र देश है जिसने 89.9 मिलियन यूएस डॉलर के अपने आकलित योगदान (पूर्ण 5 वर्ष की अवधि के लिए) का भुगतान कर दिया है तथा 100 मिलियन यूएस डॉलर का स्वैच्छिक अंशदान भी दिया है।

· भारत की ओर से प्रदान किए गए 2 बिलियन यूएस डॉलर के आधारभूत कोष के साथ क्षेत्र के लिए उपलब्ध मुद्रा विनिमय व्यवस्था सदस्य राज्यों की अल्पावधिक विदेश मुद्रा द्रव्यता आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

· भारत द्वारा दक्षेस देशों के लिए प्रारंभ की गई दूरस्थ-शिक्षा परियोजना लक्षित छात्र समुदाय को लाभान्वित करती है।

· भारत दक्षेस के संदर्भ में क्षेत्रीय एकीकरण के लिए कार्य करने वाले अनेक केन्द्रीय संगठनों को वित्तीय सहयोग प्रदान करता रहा है। दक्षेस बैंड समारोह, साहित्यिक समारोह और शिल्प समारोह, लोककथा समारोह वार्षिक आयोजन बन गए हैं। नई दिल्ली में दक्षेस वस्त्र और हस्तशिल्प संग्रहालयतथा प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना भी की जा रही है।

· भारत द्वारा अफगानिस्तान में प्रस्तावित टेली-मेडिसिन परियोजना भी सफलतापूर्वक चल रही है। भारतीय चिकित्सा वीजा की प्रणाली को दक्षेस राष्ट्रिकों के लिए उदार बनाया गया है।

· भारत क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से उत्पन्न चिंताओं को समझता है। इसने पर्यावरण संबंधी परियोजनाओं का वित्त-पोषण करने के लिए 25 करोड़ रुपए के कोष के साथ 'जलवायु परिवर्तन बंदोबस्त' स्थापित किया है। भारत ने सौर ग्रामीण विद्युतीकरण, वर्षा जल संचयन, बीज परीक्षण आदि के क्षेत्र में एकपक्षीय रूप से अनेक क्षेत्रीय परियोजनाएं संचालित की हैं।

· पड़ोस में स्थित देशों के लिए इसके नए दृष्टिकोण के भाग के रूप में भारत का 2004 से प्रारंभ किया गया अतिसक्रिय पक्ष अपने घोषणात्मक से लेकर क्रियान्वयन तरीके तक संगठन का शनै-शनै और अपरिवर्तनीय रूपांतरण सुनिश्चित करने में एक रूपांतरणकारी कारक रहा है। भारत द्वारा एक असममित और गैर-अन्योन्य तरीके से अपने आकलन से अधिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते हुए दर्शाई गई प्रतिबद्धता क्षेत्र के अनुरूप अत्यंत कारगर सिद्ध हुई है।

दक्षेस के क्षेत्राधिकार के अलावा, भारत ने बिना किसी अपवाद के सभी सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में सुधार करने के लिए अनेक पहलकदम उठाए हैं। भारत की भूटान और नेपाल के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार व्यवस्थाओं का विस्तार करते हुए उसमें श्रीलंका के साथ एफटीए को शामिल किया गया है तथा बांग्लादेश के प्रधान निर्यात अर्थात् वस्त्रों के लिए बाजार तक पहुंच में भारी शिथिलता प्रदान की गई है। भारत ने पाकिस्तान को 1996 में एमएफएन दर्जा प्रदान कर दिया था तथा इसने दशकों तक प्रतीक्षा की कि पाकिस्तान इसे गैर-भेदभावपूर्ण बाजार पहुंच प्रदान कर दे जिसे डब्ल्यूटीओ के प्रथम अनुच्छेद में ही निर्दिष्ट किया गया था। भारत अफगानिस्तान के आर्थिक विकास के प्रति भी प्रतिबद्ध है और इसने अन्य के साथ-साथ ऊर्जा और राजमार्ग क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं पर 2 बिलियन यूएस डॉलर भी पहले ही आबंटित कर दिए हैं। पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान को पारेषण पहुंच प्रदान करने से इंकार किए जाने पर भारत ने अफगानिस्तान और मध्य एशियाई गणराज्यों, दोनों ही के लिए पहुंच प्रदान करने के प्रयोजनार्थ चाबहार पत्तन सुविधा विकसित कर दी है। भारत ने "सबका साथ - सबका विकास' की भावना के साथ अपने पड़ोसी देशों को बिलियनों डॉलर की ऋण की राशि भी उपलब्ध कराई है।

पाकिस्तान द्वारा अव्यवस्था


दक्षेस के कार्यकरण और‍ विकास में सबसे बड़ी बाधा इसके दो विशाल सदस्यों, भारत और पाकिस्तान के बीच निरंतर टकराव की स्थिति रही है, जो इसकी कुल भूमि क्षेत्र के 80 प्रतिशत, जनसंख्या के 85 प्रतिशत और जीडीपी के 90 से अधिक प्रतिशत भाग पर नियंत्रण करते हैं। मैं भूतपूर्व भारतीय सुरक्षा सलाहकार एस.एस. मेनन की बात से सहमत हूं कि दक्षेस में सौहार्द का अपवाद पाकिस्तान है, "केवल इसलिए नहीं कि वह पश्चिमी और दक्षिण एशिया के बीच शीर्ष पर स्थित है, बल्कि पाकिस्तान स्थापना द्वारा सोच-समझकर उनके द्वारा किए जाने वाले राज्य और समाज के निर्माण के कारण, उनके उग्रवादी संगठनों के कारण जैसे राजनीतिक इस्लाम और जेहादी तंजीम और आतंकवादी तथा उनके तत्काल पड़ोसी देशों भारत, अफगानिस्तान और ईरान के साथ उनके संबंधों में तनाव के परिकलित प्रयोग के कारण।" वे आगे कहते हैं, "पाकिस्तान कमजोर राज्य संरचना, राजनीति में धर्म और अति-राजनीति से पीड़ित है तथा वह प्राचीन और विनिर्मित वैमनस्य, पंथवादी हिंसा और अति व्यापक सेना के आधार पर राष्ट्रवाद का निर्माण करता है (इसकी राजनीतिक भूमिका के संदर्भ में, राष्ट्रीय संसाधनों पर इसके दावों तथा वास्तविक सुरक्षा चुनौतियों से संबंधित अन्य कारकों का आज देश सामना कर रहा है), लोकप्रिय प्रतिभागिता और राजनीतिक प्रणाली में विश्वास करने के अभाव, कमजोर आर्थिक संभावनाओं आदि से पीड़ित है। इसके साथ-साथ पाकिस्तान चीन द्वारा हासिल की गई आर्थिक समृद्धि और पूर्वी एशिया के समेकन का लाभ उठाने का प्रयास भी कर रहा है। चीन-पाकिस्तान गलियारा, जो ग्वादर पत्तन से लेकर काराकोरम पर्वतों के माध्यम से जिनजियांग तक जाता है, ऐसा ही एक प्रयास है।" तथापि, यह माना जाता है कि पाकिस्तान भयंकर आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है तथा भारी कर्जों और ऋणों से दबा हुआ है।

यह विडंबना है कि पाकिस्तान एशिया में विशेष रूप से अफगानिस्तान में बदलती हुई स्थिति से लाभान्वित हुआ है जिसके लिए उसने स्वयं को विशेषत: अमेरिका तथा अन्य राज्यों के लिए लाभप्रद बनाया है, ठीक वैसे ही, जैसा इसने शीत युद्ध के दौरान किया था तथा उसके उपरांत चीन क्षेत्रीय और वैश्विक भूमिका हासिल करना चाहता है और पाकिस्तान इसके लिए तैयार तथा इसका जरूरतमंद भी है। जैसा कि प्राय: दावा किया जाता है, यदि अमेरिका को वस्तुत: अफगानिस्तान से पीछे हटना भी पड़े तो उन्हें उस तालिबान के साथ अपने संबंध समाप्त किए जाने की आवश्यकता होगी जिसकी स्थापना के लिए पाकिस्तान द्वारा ही सहायता प्रदान की गई थी तथा अब वह इस सौदे में मध्यस्थता करने की पेशकश भी कर रहा है। सउदी अरब और ईरान के बीच शिया और सुन्नी के विषम विवाद में, (आईएसआईएस) दाएश के विरुद्ध संघर्ष में पाकिस्तान को एक अन्य उपकरण प्राप्त हो गया है। यह सउदी अरब के नेतृत्व वाले उप-सदस्यीय सुन्नी गठबंधन में शामिल हो गया है जिसके लिए पूर्व सेना प्रमुख जनरल शरीफ को इसका नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया गया है।

पिछले अनेक वर्षों में भारत ने एक बेहतर पड़ोसी राज्य के दृष्टिकोण के साथ स्वयं के और क्षेत्र के हित में पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के निरंतर प्रयास किए हैं। तथापि, हमें इसके बदले में पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी संगठनों द्वारा महत्वपूर्ण भारतीय ठिकानों पर किए गए हमलों से ही उत्तर दिया गया है। यह एक ऐसा पैटर्न है जो उनकी नैसर्गिक प्रवृत्ति का अभिन्न भाग बन गया है। पाकिस्तानी भू-भाग से सरकार के सहयोग से उत्पन्न होने वाले आतंकवाद का निवारण करने में उनकी असफलता के कारण ही भारत ने इस्लामाबाद में आयोजित दक्षेस शिखर-सम्मेलन में भाग नहीं लिया जिससे यह संगठन ही अंतत: समाप्त हो गया। यह क्षेत्रीय प्रयासों के लिए निसंदेह एक भारी धक्का है।

जब कोई विकल्प नहीं रह गया, तो भारत ने आगे कार्यवाही करते हुए बीबीआईएन, बिमस्टेक और आसियान के संदर्भ में उप-क्षेत्रीय सहयोग को विकसित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को पृथक करने के प्रयास प्रारंभ कर लिए जिनके अत्यधिक बेहतर परिमाण मिलने प्रारंभ हो गए हैं। यह न केवल बिमस्टेक शिखर-सम्मेलनों के आयोजन से स्पष्टत: दिखाई पड़ रहा है बल्कि गणतंत्र दिवस 2017 में मुख्य अतिथियों के रूप में सभी 10 आसियान राष्ट्र प्रमुखों की प्रतिभागिता से भी सिद्ध होता है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी के 2019 में आयोजित द्वितीय शपथ-ग्रहण समारोह में भारत ने दक्षेस और आसियान के चुनिंदा राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित किया था जिनमें मध्य एशिया के राष्ट्र प्रमुख भी शामिल थे, जिससे पड़ोस की परिभाषा को प्रभावशाली रूप से विस्तारित किया गया। इस दौरान, भारत ने दक्षेस के पाकिस्तान महासचिव की नियुक्ति को निवारित नहीं किया। सांस्कृतिक क्षेत्र में, भारत से कराची साहित्यिक समारोह का भी प्रायोजन किया। करतारपुर साहेब गलियारे पर बातचीत जारी रही। तथापि, भारत ने अब पाकिस्तान को यह कहते हुए और अधिक ताकत के साथ उप-क्षेत्रीय और द्विपक्षीय विकल्पों का अन्वेषण करना प्रारंभ कर दिया है कि "आप होते तो बेहतर होता, परंतु अब हम आपके बिना आगे बढ़ना जारी रखेंगे"। इसके साथ ही, भारत और पाकिस्तान, दोनों ने ही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के ढांचे में भागीदारी की, जिसमें अनेक दक्षेस कार्यकारी समूहों में योगदान देने के साथ-साथ रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र शामिल है। भारत ने पाकिस्तान पर निरंतर अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक दबाव बनाया हुआ है कि वह अपनी छवि को साफ करे तथा वह पुलवामा और बालाकोट की घटनाओं के बाद पाकिस्तान को कुछ हद तक अलग-थलग करने में सफल भी हुआ है जब अन्य महाशक्तियों की ही भांति भारत द्वारा भी 'सर्जिकल स्ट्राइकों' के माध्यम से आतंकवाद का सामना करने के लिए नए प्रतिमानों को क्रियान्वित किया गया। इसे अनुच्छेद 370 और 35क को भारत द्वारा समाप्त किए जाने पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया द्वारा स्पष्टत: देखा जा सकता है तथा पाकिस्तान इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप कराने में विफल रहा।

अब मैं सभी भारतीयों के लिए विद्यमान लाभों को कश्मीरी लोगों तक पहुंचाने तथा अवसंरचना, उद्योग और रोजगार के साथ व्यापक प्रगति और विकास करने का उन्हें भरपूर मौका प्रदान करने के लिए भारत द्वारा अनुच्छेद 370 और 35क की समाप्ति को ध्यान में रखते हुए कश्मीर के मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने के पाकिस्तान के प्रयासों पर अपनी बात कहूंगा। 16 जून को चीन की मदद से, पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में औपचारिक परामर्श कराने में सफल रहा था परंतु वह कोई समर्थन जुटा पाने में असफल रहा जो भारत के वैध तथा संवैधानिक और विधिक दृष्टि से उपयुक्त 'आंतरिक मामले' की स्वीकरोक्ति है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत दृढ़ता से खड़ा है, परंतु अनेक चुनौतियां अभी भी भीतर और बाहर से प्रस्तुत की जा रही हैं, जिनके लिए हमें पूरी तरह से तैयार रहना है तथा अत्यंत तीव्र वेग से राजनयिक प्रयास किए जाने रहने चाहिए परंतु उनमें पर्याप्त संयम रखा जाना चाहिए।

राष्ट्र के नाम अपने संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने एक स्पष्ट दृष्टिकोण, भावी मार्ग और अनेक विकल्पों का उल्लेख किया जिन्हें अवसंरचना और रोजगार सृजन तथा दोनों संघ राज्यक्षेत्रों के विकास के लिए बड़े पैमाने पर निवेश द्वारा समर्थित किया जाएगा। उन्होंने यह आश्वासन दिलाया कि शीघ्र ही वहां चुनाव आयोजित किए जाएंगे और कश्मीरी लोग एक पारदर्शी तरीके से अपने स्वयं के प्रतिनिधियों का चयन करेंगी। उन्होंने यह भी वायदा किया कि जम्मू और कश्मीर की वर्तमान 'संघ राज्यक्षेत्र' की स्थिति पूर्णत: अस्थायी है और इसे शीघ्र ही राज्य के स्तर तक पुन: उन्नयित किया जाएगा। बड़ी संख्या में कश्मीरियों की यही इच्छा है तथा वे आगामी पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन की आकांक्षा रखते हैं, हालांकि घाटी में कुछ लोग अभी भी आश्वस्त नहीं है, जो पूर्व के हालातों के आदि हो चुके हैं। यह भावना तभी सकारात्मक बन सकती है यदि शेष भारत, विशेष रूप से राजनीतिक दल इस कार्यवाही सीना ठोककर अनावश्यक प्रशंसा न करें, इस पर गैर-जिम्मेदाराना बयान न दें और इस पर जीत का जश्न न मनाएं। सामान्य स्थिति बाहल करने का पूर्ण प्रयास किया जाना चाहिए ताकि "जीवन यापन में सरलता" को वहां के लोगों के लिए सुनिश्चित किया जा सके। धार्मिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा एनजीओ के सहयोग से कट्टरवाद को समाप्त करने और उग्रवाद से निपटने के लिए इस अवधि के दौरान समस्त अंतर्वेशी प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए। यह प्रक्रिया जितनी संभव हो सके, मानवीय तरीके से संचालित की जानी चाहिए। सशस्त्र बलों ने वहां पहले ही शिक्षा के क्षेत्र में तथा जनता की अधिप्राप्ति के लिए स्थानीय आपूर्ति संसाधन विकसित करने के लिए लोगों की सहायता करने में लीक से हटकर सहयोग दिया है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान का एकमात्र उद्देश्य अपने आतंकवाद उपकरणों और नेटवर्क माध्यम से अपने परोक्ष उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभाजनकारी दरारों का सृजन करना और भारत को अस्थिर बनाना है। चूंकि यह न तो अपने घृणित हस्तक्षेपों से पीछे हटेगा और न ही इस मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीय करने के प्रयासों में कमी रखेगा, हमें आंतरिक और सैन्य दृष्टि से सभी विकल्पों के लिए तैयार रहना होगा तथा इसके साथ-साथ राजनीतिक प्रयासों के माध्यम से पाकिस्तान और इसके आतंकी तंत्र का पर्दाफाश करने पर निरंतर काम करते रहना होगा। हम यूएनजीए आयोजित होने तक पाकिस्तान की ओर से किसी भी बड़ी कार्यवाही का संचालन देख सकते हैं। अब तक अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से उठने वाली प्रतिक्रिया मोटेतौर पर भारत के पक्ष में ही रही है जिसमें इसे भारत का 'आंतरिक मामला' माना गया है और जो वास्तव में यह है भी। वस्तुत: हमें पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के अवैध कब्जे (पीओके) के मुद्दे को भी उठाना चाहिए और उन्हें इसे खाली करने के लिए कहा जाना चाहिए, जिसे सभी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाया जाना चाहिए। बड़ी शक्तियां मुदृदे को समझती हैं तथा यह आग्रह करते हुए 'तटस्थ' रुख अपनाती हैं कि पक्षकारों को मामले को अत्यधिक भड़कने नहीं देना चाहिए।

संबंधों की मौजूदा स्थिति

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि अपने पड़ोसियों के साथ हमारे संबंध उस अवधि विशेष में विद्यमान नेताओं और शासक वर्ग पर भी निर्भर करते हैं तथा यह नीतिगत अनिच्छा के अध्यधीन भी होते हैं क्योंकि भारत उनकी घरेलू राजनीति में एक प्रमुख कारक बना रहता है। वे इस क्षेत्रीय 'ताज के खेल' के संबंध में अपने रणनीतिक समीकरणों और महत्व को निरंतर पुन: परिभाषित करना जारी रखेंगे। यह बांग्लादेश के लिए भी सत्य है क्योंकि प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के साथ संबंध इर्शाद अथवा खालिदा जिया के कार्यकाल की तुलना में अपनी श्रेष्ठतम अवस्था में हैं। नेपाल की भी समस्या समान है क्योंकि इसकी साम्यवादी सरकार मिश्रित संकेत प्रदान करती है और संभवत: चीन के साथ सुदृढता के साथ कार्य कर रही है। चिंताजनक दो वर्षों के बाद, जब मालदीव्स पूरी तरह से चीन के साथ जुड़ा हुआ था, अब वह भारत के साथ संतुलनकारी संबंधों पर वापस आ गया है क्योंकि उसने चीनी ऋणजाल को भांप लिया है। श्रीलंका के संबंध में, हमने भारत और चीन के प्रति उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन को देखा है, जब से उनके नेतृत्व में परिवर्तन आया है। डोकलाम के बाद भूटान ने चीन के साथ घनिष्ठ संबंधों के प्रति झुकाव तो दर्शाया है, परंतु वह भारत का घनिष्ठ पड़ोसी बना हुआ है। अपनी सेना और गुप्तचर एजेंसियों तथा भारत-केन्द्रित आतंकवाद के साथ पाकिस्तान क्षेत्र में शांति के लिए एक सतत् चुनौती बना हुआ है। तथापि, विभिन्न कारकों के कारण संबंधों में उतार-चढ़ावों पर विचार करते हुए, हम राजदूत सतीश चन्द्रा के साथ सहमत हो सकते हैं कि "वर्ष 2019 के प्रारंभ में, यह सुझाव देना उचित ही होगा कि भारत के अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान और मालदीव्स के साथ संबंध उत्कृष्ट हैं, श्रीलंका के साथ अच्छे हैं, नेपाल के साथ ठीक-ठाक है तथा पाकिस्तान के साथ वैमनस्यपूर्ण हैं।" परंतु लोक राजनयिकता के माध्यम से तथा उनकी वास्तविक चिंताओं का समाधान करते हुए संबंधों में आई दरारों को भरने के लिए प्रयास निरंतर किए जाते रहने चाहिए भले ही सिंधु और ब्रह्मपुत्र से काफी पानी ही क्यों न बह गया हो। उन्हें भी भारत की आवश्यकता है तथा हम भी उनके बिना नहीं चल सकते हैं।

पड़ोस में असंबद्ध चीन

हम चीन के साथ अनेक पड़ोसी देशों को साझा करते हैं। पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और म्यांमार की चीन के साथ सीमाएं लगती हैं अत: संबंधों की प्रमुखता का दावा करना कठिन है। परंतु चीन के साथ भारत के संबंध प्रतिस्पर्धा और सहयोग से ओत-प्रोत हैं। चीन अनिच्छा के साथ यह स्वीकार करता है कि क्षेत्र में भारत ही ऐसा देश है जो उसे चुनौती दे सकता है। हालांकि किसी अन्य देश की ही भांति चीन भी अपने पड़ोसियों के साथ संबंध विकसित करना चाहता है तथा यह बात सामान्य है, परंतु चूंकि वे एक 'समावेशन संदर्श' में उपयुक्त बैठते हैं, जहां तक भारत का संबंध है, यह समस्या बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए भारत के अमेरिका, जापान और आसियान देशों के साथ घनिष्ठ संबंध तथा दक्षेस में प्रधानता को चीन द्वारा उसके हितों के लिए प्रतिकूल समझा जाता है। यही बात भारत पर भी लागू होती है जब वह चीन की आक्रामक परियोजनाओं को देखता है जैसे सीपीईसी, बेल्ट एवं रोड पहल अथवा इसी दृष्टिकोण से आईओआर (हिंद महासागर रिम) में सामुद्रिक विस्तार, तो ये सभी भारतीय प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति' में भारत के अमेरिका के साथ घनिष्ठ सहयोग को चीन की पहुंच को सीमित करने के रूप में देखा जाता है। यह स्थिति चीन की पाकिस्तान के साथ विशिष्ट, रणनीतिक और बारहमासी मैत्री के चलते और भी विषम हो जाती है जो एक 'किराए' के देश की भांति है तथा चीन के प्रत्येक प्रस्ताव के प्रति इच्छुक भागीदार है चाहे वह सीपीईसी के अंतर्गत प्रस्तावित 36 बिलियन यूएस डॉलर की परियोजनाएं हो अथवा अत्यंत घनिष्ठ सैन्य और रक्षा सहयोग हो अथवा इसी संदर्भ में पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों के प्रति आंखे बंद कर लेने संबंधित हो, ये सभी प्रथम दृष्टया भारत के शांति संबंधी लाभों को सीमित करते हैं। इसके अलावा, हालांकि हम आपस में दो परिपक्व देशों के रूप में संपर्क करते हैं, चीन भारत के लगभग 4000 वर्ग किमी से अधिक भाग पर तथा पाकिस्तान द्वारा उन्हें प्रदत्त कश्मीर के भाग को कब्जाए बैठा है तथा साथ ही उसने हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में भारतीय भू-भाग पर भी अपने खोखले दावे किए हैं और महामहिम दलाई लामा के दौरे के दौरान भी काफी शोर-शराबा किया है। यदि चीन सौम्य होता तथा उसके कोई विषम उद्देश्य नहीं होते, तो हमारे लिए चिंता की कोई बात नहीं थी। चूंकि इन संबंधों में अनेक प्रधान वैमनस्यता की गांठे व्याप्त हैं, हमारी चिंताएं बिल्कुल वैध प्रतीत होती हैं। चीन वर्तमान में दक्षेस में एक प्रेक्षक है तथा पाकिस्तान के और संभवत: क्षेत्र में इसके द्वारा दिए गए उदार दान के लाभार्थियों के माध्यम से इसमें पूर्ण सदस्यता का लक्ष्य बनाए हुए है। चीन ने पाकिस्तान के प्रवेश तक भारत की सदस्यता को रोके रखा है तथा अब यही खेल एनएसजी में भारत की सदस्यता के साथ खेला जा रहा है। इसी प्रकार, आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भी, इसने पाकिस्तान को संरक्षित करने का प्रयास किया है चाहे यह कुख्यात आतंकवादी मसूद अजहर के समाप्त होने तक उसे सूचीबद्ध करना हो अथवा एफएटीएफ द्वारा पाकिस्तान को काली सूची में डालने की कार्यवाही हो। चीनी प्रभावशाली तरीके से भारत-पाक प्रतिद्वंद्विता का अपने लाभ के लिए प्रयोग में ला रहा है तथा वह भारत को अपने निकटवर्ती पड़ोस में अलग-थलग करना चाहता है। इस घृणित दुष्चक्र को तोड़े जाने की आवश्यकता है तथा हमें चीन को यह समझाने के लिए दबाव बिंदुओं का प्रयोग करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि भारत भी उसका इसी प्रकार से उत्तर दे सकता है।

अपने सामुद्रिक मार्ग अथवा सिल्क रूट आकांक्षाओं को तथा 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' उद्देश्यों की पूर्ति करने के लिए चीन हमबनतोता पत्तन के निर्माण तथा कोलम्बो पत्तन के विस्तार के लिए सक्रिय रूप से संविदाओं पर कार्यवाही कर रहा है। ब्रिक्स शिखर-सम्मेलन के लिए भारत आने से पूर्व 14 अक्तूबर, 2016 को जी की बांग्लादेश की यात्रा 1986 में राष्ट्रपति ली की यात्रा के उपरांत किसी चीनी राष्ट्र प्रमुख द्वारा की गई प्रथम बांग्लादेश यात्रा थी। जी के दौरे के दौरान उन्होंने 27 करारों पर हस्ताक्षर किए जिनके तहत बांग्लादेश की सहायता और निवेश के लिए 24.45 बिलियन डॉलर की राशि शामिल थी। इसके अलावा, 13 चीनी कारपोरेटों ने बांग्लादेशी कंपनियों के साथ 13 बिलियन डॉलर के संयुक्त उद्यम करारों पर हस्ताक्षर किए जिसने वस्तुत: ढाका के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए भारत के प्रयासों का विरोध किया। जी ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में एक भागीदार के रूप में चीन के लिए बांग्लादेश के महत्व पर बल प्रदान किया इससे चीन के एक तीर से दो शिकार के मंसूबे को भी स्पष्टत: देखा गया और साथ ही बांग्लादेश, मालदीव्स, नेपाल अथवा श्रीलंका के लिए ऋण का जाल भी क्षितिज पर प्रतीत हुआ। पाकिस्तान को एक अलग श्रेणी में रखा गया था। सितम्बर, 2014 में राष्ट्रपति जी जिनपिंग ने मालदीव्स का दौरा किया। चीन ने मालदीव्स का संयुक्त रूप से निर्मित 21वीं शताब्दी के सामुद्रिक सिल्क रूट में स्वागत किया। बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव्स ने परियोजना का समर्थन किया जिसमें चित्तगांव, कोलम्बो और हम्बनतोता पत्तन शामिल थे तथा मालदीव्स में एक संभावित ठिकाना भी स्थापित कर लिया गया था जो भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती बन गया था। सौभाग्यवश मालदीव्स की नई सरकार ने इस दिशा में एक संतुलनकारी दृष्टिकोण अपनाया है।

छोटे देशों के लिए यह सामान्य और आसान बात होती है कि वे एक बड़े देश को दूसरे देश के साथ बराबर में खड़ा करते हुए दोनों ही से लघु अथवा मध्यम अवधियों में राजनीतिक और आर्थिक लाभ हासिल कर लें। हमारा पड़ोस भी 'बिग ब्रदर संलक्षण' से ग्रसित है। जहां तक भारत का संबंध है, अपनी पहचान स्थापित करने के लिए वे बड़े देशों की प्रतिद्वंद्विता का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं जिसके लिए वे चीन को अपने संबंधित रणनीतिक लाभ प्रदान करते हैं और हमारे साथ 'चीनी कार्ड' खेलते हैं। भारत के लिए यह कठिन होता है कि वह उनके प्रत्येक चीनी युवान डॉलर की तुलना कर पाए क्योंकि उसकी आर्थिक स्थि‍ति काफी सुदृढ़ है। परंतु भारत का लोकतांत्रिक लाभ तथा विशिष्ट गैर-नवउपनिवेशी लाभ, जिसे उसकी आर्थिक सुदृढ़ता और उत्कृष्ट साख के साथ प्रयोग में लाया जाता है, पड़ोसियों के साथ हमारे संबंधों में ऐसे प्रलोभनों को तटस्थ करने में सफल रहते हैं। संभवत: एक सकारात्मक विचारधारा ऐसी लुभावनी राजनीति पर हावी रहती है।

सितम्बर, 2014 में भारत की अपनी यात्रा के दौरान आईसीडब्ल्यूए में बोलते हुए राष्ट्रपति जी ने चीन के दृष्टिकोण को यह कहते हुए अभिव्यक्त किया कि भारत के साथ उसका संबंध चीन के वृहद् दक्षिण एशियाई लक्ष्यों के भारत के रूप में है। जी ने शपथ ली कि चीन दक्षिण एशियाई देशों के साथ कार्य करते हुए द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाते हुए 150 बिलियन यूएस डॉलर तक लाएगा, दक्षिण एशिया में अपने निवेश को बढ़ाकर 30 बिलियन डॉलर करेगा तथा आगामी पांच वर्षों में क्षेत्र को रिआयती ऋण के रूप में 20 बिलियन डॉलर उपलब्ध कराएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इसके अतिरिक्त चीन 10,000 छात्रवृत्तियां प्रदान करने, 5000 युवाओं के लिए प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करने तथा 5000 युवाओं के लिए विनिमय और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने तथा आगामी पांच वर्षों में दक्षिण एशिया के लिए 5000 चीनी भाषा के शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की योजना भी रखता है। उन्होंने उल्लेख किया कि चीन दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा पड़ोसी है तथा वहां भारत एक विशाल देश है। जी ने कहा कि बीजिंग नई दिल्ली के साथ मिलकर कार्य करने के लिए तैयार है तथा वह क्षेत्र के विकास के लिए और भी बड़ा योगदान देने के लिए तैयार है - "ताकि हिमालय के दोनों ओर रहने वाले तीन बिलियन लोग शांति, मित्रता, स्थायित्व और समृद्धि का आनंद उठा सकें।" परंतु कहने और करने में काफी अंतर होता है क्योंकि वास्तविकता काफी भिन्न है। तथापि, पारस्परिक हितों और भारत की बढ़ती हुई साख को ध्यान में रखते हुए, प्रधानमंत्री मोदी तथा राष्ट्रपति जी जिन पिंग के बीच औपचारिक शिखर वार्ता के फलस्वरूप "वुहान भावना" विकसित हुई ताकि मुद्दों को शांत रखा जाए और उन्हें "प्रतिस्पर्धा और सहयोग" की नीति पर निरंतर कार्य करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया जाए, जो कि दोनों ही पक्षों के लिए बेहतर सिद्ध हुई है और दोनों नेताओं के बीच अक्तूबर, 2019 में होने वाली औपचारिक शिखर-वार्ता के दौरान इस पर पुन: बल प्रदान कया जा सकता है। दुर्भाग्यवश दक्षिण एशिया में चीन भारत को प्रभाव जमाने के मामले में एक वास्तविक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है और स्वाभाविक रूप से वह पाकिस्तान के एकपक्षीय दृष्टिकोण से भी देखता है जो कि पूर्णत: भेदभावपूर्ण है। "वुहान भावना" सहित इन्द्रधनुष के बाकी रंगों को देखते हुए यही लगता है कि इससे उसका ही अधिक लाभ होगा।

निष्कर्ष के तौर पर, हम दक्षिण एशिया और दक्षेस को आधे भरे हुए गिलास के रूप में देख सकते हैं जबकि निराशावादी इसे आधे खाली गिलास के रूप में देखते हैं। यथार्थवादी गिलास में से पानी पीते हैं और समझदारी के साथ अपनी प्यास बुझाते हैं। हमें जनसंख्या के मुद्दे पर, असमान गरीबी स्तरों पर वाद-विवाद नहीं करना है और साथ ही हमेशा ही इतिहास की गलतियों पर निरंतर अवसाद नहीं करना है। इसके स्थान पर हमें अपने क्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित करना है क्योंकि इसके बड़ी संख्या में युवा जो परिवर्तन लाने मे सक्षम है और शक्ति से परिपूर्ण है तथा कर सकने का दृष्टिकोण, वर्तमान में चल रहे सुधार कार्य और इसके प्रभावी और बृहद् बाजार लाभ सभी मिलकर दक्षेस को इसका उचित स्थान दिला जाने में सक्षम हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी के उस दृष्टिकोण से भी मेल खाता है जिसका उल्लेख पूर्व विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर द्वारा इस प्रकार किया गया था "मोदी की विदेश नीति के व्यावहारिक पहलू साझी समृद्धि, सुरक्षा, आतंकवाद की भारी हार, विस्तारित वैश्विक संबंधों तथा विकास परियोजनाओं के संवर्धन में परिलक्षित होता है जो लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने में सहायता करता है।" परंतु यह दृष्टिकोण हमारे पड़ोसियों द्वारा विफल किया जा सकता है जिनका एजेंडा भारत के साथ चीनी कार्ड खेलते हुए अधिकतम लाभ हासिल करना है और जब तक वे भारत की चिंताओं का निराकरण करने के प्रति गंभीर नहीं होंगे, एक पारस्परिक दृष्टि से लाभप्रद गैर-अन्योन्य नीतिगत मेट्रिक्स अनुरक्षित करना कठिन होगा। परंतु फिलहाल तो भारत की पड़ोस की परिभाषा निश्चित रूप से विस्तारित हो रही है।