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रियो डि जेनरियो में प्रधानमंत्री जी की द्विपक्षीय बैठकों तथा रियो+20 सम्‍मेलन पर विदेश सचिव और संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि की प्रेसवार्ता

जून 21, 2012

सरकारी प्रवक्‍ता (श्री सैयद अकबरुद्दीन) नमस्‍कार मित्रो। इस प्रेस वार्ता में आने के लिए आप सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद। आज हमारे साथ यहां विदेश सचिव महोदय हैं जो हमें प्रधानमंत्री जी की द्विपक्षीय बैठकों की जानकारी देंगे। तदुपरांत यदि आप चल रहे शिखर सम्‍मेलन के बारे में कोई जानकारी चाहेंगे तो हमारे साथ संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि श्री मंजीव पुरी जी भी हैं जो पिछले कई महीनों से रियो+20 सम्‍मेलन की संपूर्ण प्रक्रिया से जुड़े रहे हैं।

इसी के साथ मैं विदेश सचिव महोदय से प्रधानमंत्री जी की द्विपक्षीय बैठकों के बारे में आप सबको जानकारी देने का अनुरोध करता हूं।

विदेश सचिव (श्री रंजन मथाई) : प्रधानमंत्री जी की नेपाल के प्रधानमंत्री श्री बाबूराम भट्टाराई और श्रीलंका के प्रधानमंत्री श्री महिंदा राजपक्षे के साथ द्विपक्षीय बैठक हुई। सत्र के दौरान कल उन्‍होंने मालदीव के राष्‍ट्रपति श्री वहीद के साथ भी संक्षिप्‍त वार्ता की थी।

इस बात की संभावना है कि आज दोपहर के सत्र के दौरान मालदीव के राष्‍ट्रपति और भूटान के प्रधानमंत्री श्री थिनले के साथ प्रधानमंत्री जी की पूरी चर्चा होगी। जैसे ही इन बैठकों के संबंध में मेरे पास जानकारी आती है, मैं आप सबसे बात करूंगा। परंतु उपर्युक्‍त दो बैठकों के बारे में मैं अभी जानकारी देना चाहता हूं। पहली बैठक नेपाल के साथ थी।

भारत के प्रधानमंत्री और नेपाल के प्रधानमंत्री श्री भट्टाराई ने नवंबर माह में अड्डू में आयोजित सार्क शिखर सम्‍मेलन के दौरान अतिरिक्‍त समय में और प्रधानमंत्री श्री भट्टाराई की पिछले वर्ष की भारत यात्रा के दौरान हुई बैठकों का स्‍मरण किया। प्रधानमंत्री श्री भट्टाराई ने उल्‍लेख किया कि इन दो उपयोगी बैठकों के बाद नेपाल ने घरेलू राजनीति ने जोर पकड़ लिया था।परंतु उन्‍होंने कहा कि वे भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण मानते हैं।

नेपाल में आतंरिक सुरक्षा का उल्‍लेख करते हुए प्रधानमंत्री भट्टाराई ने नोट किया कि शांति प्रक्रिया एवं एकीकरण की दिशा में पर्याप्‍त प्रगति हुई है और इस मुद्दे का लगभग समाधान कर लिया गया है। परंतु 27 मई की निर्धारित समय सीमा तक संविधान का प्रारूप तैयार करने का कार्य पूरा नहीं हो सका और उनके पास कोई विकल्‍प नहीं था क्‍योंकि सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कहा था कि संविधान सभा की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती, इसलिए दूसरा चुनाव कराने का निर्णय लिया गया।

जहां तक हमारे प्रधानमंत्री जी का संबंध है, उन्‍होंने दोहराया कि वे नेपाल में लोकतंत्र की सफलता चाहते हैं। उन्‍होंने आशा व्‍यक्‍त की कि सभी पार्टियां मिलकर कार्य करने का विवेक प्रदर्शित करेंगी ताकि संविधान निर्माण की प्रक्रिया समय से पूरी करने के लिए स्‍वीकार्य व्‍यवस्‍थाएं की जा सकें।

द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में प्रधानमंत्री जी ने कहा कि नेपाल के मित्र के रूप में भारत नेपाल की विकास प्रक्रिया का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है और हम नेपाली लोगों की इच्‍छा के अनुरूप उन्‍हें सहायता देने के लिए तैयार हैं। भारत नेपाल के साथ मिलकर कार्य करना चाहता है।

नेपाल के प्रधानमंत्री ने बिजली परियोजनाओं के संबंध में भारतीय कंपनियों से हुई बातचीत का उल्‍लेख किया। हमारे प्रधानमंत्री जी ने कहा कि वे इस बात को समझते हैं कि यह क्षेत्र हमारे संबंधों में विशेष रूप से महत्‍वपूर्ण है। परंतु फिलहाल हम नेपाल की विकास चुनौतियों का समाधान करने में सहायता कर रहे हैं, जिनमें भारत से नेपाल के लिए विद्युत आपूर्ति भी शामिल है। इस बात पर सहमति हुई कि दोनों विदेश मंत्रियों की सह-अध्‍यक्षता वाले संयुक्‍त आयोग की बैठक यथासंभव शीघ्र होनी चाहिए, जिसमें बिजली, रेलवे तथा हमारे कार्यकलापों के अन्‍य क्षेत्रों को शामिल किया जाना चाहिए।

भारत के प्रधानमंत्री और नेपाल के प्रधानमंत्री श्री भट्टाराई ने सुरक्षा मामलों और सुरक्षा सहयोग से संबंधित हमारे तंत्रों के कार्यकरण की भी समीक्षा की । प्रधानमंत्री श्री भट्टाराई ने स्‍मरण किया कि उन्‍होंने प्रधानमंत्री को नेपाल आने का न्‍योता दिया है और भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्‍हें पारस्‍परिक रूप से सहमत तिथियों को नेपाल की यात्रा करने में खुशी होगी।

दोनों नेताओं ने यहां चल रहे शिखर सम्‍मेलन पर भी चर्चा की और कहा कि आमतौर पर इसके निष्‍कर्ष दोनों देशों के लिए अनुकूल हैं।

श्रीलंका के राष्‍ट्रपति श्री महिन्‍दा राजपक्षे के साथ प्रधानमंत्री जी ने पहले अकेले में बात की और फिर प्रतिनिधिमण्‍डल स्‍तरीय बैठक हुई। चर्चा में समग्र द्विपक्षीय संबंधों को शामिल किया गया। सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उन्‍होंने नोट किया कि राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री शिवशंकर मेनन की 29 जून की कोलंबो यात्रा के दौरान इस संवाद को आगे बढ़ाया जाएगा। हमारे आर्थिक संबंधों पर भी ठोस चर्चा हुई और श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने सामपुर विद्युत परियोजना पर अद्यतन जानकारी दी जो सिलोन पावर बोर्ड और एनटीपीसी के बीच एक संयुक्‍त उपक्रम के रूप में श्रीलंका में चलाई जा रही एक बड़ी विद्युत परियोजना है।

जहां तक समग्र संबंधों का संबंध है, उन्‍होंने महसूस किया कि इसमें प्रगति की अपार संभावनाएं हैं और हमें अब उन क्षेत्रों पर ध्‍यान देना चाहिए, जिनमें हम अच्‍छी प्रगति कर सकते हैं।

राष्‍ट्रपति महोदय ने श्रीलंका के भीतर की स्‍थिति का उल्‍लेख करते हुए विकेन्‍द्रीकरण के मुद्दे पर जारी चर्चा की जानकारी दी। परंतु मुख्‍य रूप से श्रीलंका में आंतरिक रूप से विस्‍थापित लोगों के पुनर्वास पर ध्‍यान केन्‍द्रित किया गया। उन्‍होंने कहा कि अभी लगभग 3,000 लोग शिविरों में रह रहे हैं जबकि युद्ध समाप्‍त होने के तत्‍काल बाद 3,00000 लोग इस प्रकार की सीमा में रह रहे थे।

उन्‍होंने यह भी नोट किया कि पुनर्वास की प्रक्रिया चल रही है तथा वहां उपस्‍थित विद्युत मंत्री ने उत्‍तरी क्षेत्र के विद्युतीकरण पर चर्चा करते हुए कहा कि इसमें अच्‍छी प्रगति हो रही है। उन्‍होंने कहा कि जाफना में लगभग 95 प्रतिशत बिजली बहाल कर दी गई है जबकि उत्‍तरी प्रांत के अन्‍य क्षेत्रों में 50 से 70 प्रतिशत बिजली आ चुकी है।

प्रधानमंत्री जी ने एक बार फिर कहा कि वह श्रीलंका के समान नागरिकों के रूप में सम्‍मानित जीवन जीने की तमिल लोगों की योग्‍यता में विश्‍वास करते हैं। हमने अपने सहायता कार्यक्रमों को जारी रखने की अपनी मंशा व्‍यक्‍त की।

भारत द्वारा चलाई रही आवासन परियोजना के अंतर्गत वस्‍तुत: अगले माह श्रीलंका में आवासों के लिए लाभार्थियों को राशि का वितरण आरंभ कर दिया जाएगा, क्‍योंकि .....(अश्रव्‍य)... हम आर्थिक क्षेत्र में अपने सभी द्विपक्षीय सहायता कार्यक्रमों को जारी रखने की अपनी मंशा दोहराते हैं।

बस इतना ही है। यदि आप कोई विशेष प्रश्‍न पूछना चाहते हैं तो मैं उनका उत्‍तर दूंगा अन्‍यथा मंजीव आप सबको इस सम्‍मेलन के बारे में बताएंगे।

प्रश्‍न: महोदय, एक प्रश्‍न। जल प्रौद्योगिकी के जरिए नेपाल में बिजली उत्‍पादन की खासी संभावनाएं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 40,000 मेगावाट से अधिक बिजली का उत्‍पादन किया जा सकता है, इसलिए बिद्युत के संबंध में भी हमारे प्रधानमंत्री और नेपाल के प्रधानमंत्री के बीच अच्‍छी चर्चा हुई है। क्‍या विद्युत उत्‍पादन के लिए नेपाल में संयुक्‍त उद्यम परियोजना का निर्माण करने की संभावना पर कोई चर्चा हुई है? हम रियो+20 के लिए रियो में हैं। हम हरित अर्थव्‍यवस्‍था की बात कर रहे हैं और हम परमाणु ऊर्जा पर बल दे रहे हैं। ये संसाधन वस्‍तुत: आसान हैं और इन्‍हें आसानी से प्राप्‍त किया जा सकता है।
विदेश सचिव : मैं आपसे बिल्‍कुल सहमत हूं। इन्‍हें असीम संसाधन कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि विशेष परियोजना प्रस्‍तावों के संबंध में पहले भी भारत की कुछ कंपनियों के साथ चर्चा आरंभ हो चुकी है। आपको इस बात की जानकारी होगी कि कुछ वर्ष पूर्व भी भारत के निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ कंपनियां वहां गई थीं और उन्‍होंने बातचीत आरंभ की थीं। परंतु सुरक्षा स्‍थिति और अनिश्‍चित राजनैतिक वातावरण के बारे में इस संबंध में कोई प्रगति नहीं हो पाई।

प्रधानमंत्री जी ने कहा कि उन्‍हें आशा है कि चूंकि संविधान निर्माण की प्रक्रिया अग्रिम चरण में आ चुकी है इसलिए निवेश के वातावरण में भी सुधार आएगा। यह भी नोट किया गया कि भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय निवेश संवर्धन करार और दोहरे कराधान के परिहार से संबद्ध करार भी संपन्‍न किया गया है।ये करार पिछले वर्ष संपन्‍न किए गए, जिनका अनुसमर्थन भी किया जा चुका है। अत: इससे संभावित निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।अत: इस क्षेत्र में कुछ प्रगति होने की संभावना है परंतु विशेष परियोजना का उल्‍लेख नहीं किया गया।

प्रश्‍न : प्रधानमंत्री जी और श्री भट्टाराई के बीच हुई दो बैठकों, खासकर श्री भट्टाराई की दिल्‍ली यात्रा के दौरान कई बातों पर सहमति हुई थी। चूंकि मधेशिया पार्टी और माओवादियों में उनके प्रारंभिक घटकों के तहत बिखराव हो गया है। इसलिए श्री भट्टाराई की सरकार के गिरने का खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है। क्‍या इस संबंध में किसी प्रकार की चिंता है और क्‍या इस आशय का आश्‍वासन दिया गया है कि श्री भट्टाराई के साथ हमने जो करार संपन्‍न किये हैं और जो वायदे किए हैं उन्‍हें उनकी सरकार के गिरने के बाद भी निभाया जाएगा?
विदेश सचिव : जैसा कि मैंने बताया द्विपक्षीय निवेश संरक्षण करार और दोहरे कराधान के परिहार से संबद्ध करार के अतिरिक्‍त अन्‍य करारों का विशेष उल्‍लेख नहीं किया गया। ये करार विद्यमान हैं और आशा है कि बने रहेंगे। बात यह है कि वे ऐसे दौर में हैं कि प्रधानमंत्री जी द्वारा नवंबर में चुनाव की घोषणा कर दी गई है। चुनाव का आयोजन उक्‍त तारीख को किया जाएगा, इसकी पुष्‍टि की अभी की जानी है क्‍योंकि सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने 27 मई की तारीख ही संविधान सभा के समापन के लिए निर्धारित की थी और न्‍यायालय में एक याचिका के जरिए इस मामले को उठाया गया हैकि अंतरिम संविधान, जिसके अंतर्गत वे कार्य कर रहे थे, के तहत इस प्रकार का चुनाव कराए जाने का कोई उपबंध नहीं है। इस संबंध में न्‍यायालय द्वारा निर्णय लिया जाएगा। इसलिए मैं जो कहना चाह रहा हूं वह यह है कि अभी वहां राजनैतिक अनिश्‍चितता है और समय बीतने के साथ इसे दूर करने की आवश्‍यकता है। जहां तक आधिकारिक स्‍तर पर द्विपक्षीय तंत्रों का संबंध है, ये अभी भी विद्यमान हैं। जहां तक हमारा संबंध है, जिन करारों पर दोनों सरकारों के बीच हस्‍ताक्षर किए गए हैं, उन्‍हें कायम रखा जाएगा।

सरकारी प्रवक्‍ता : चूंकि अब और प्रश्‍न नहीं है, इसलिए मैं श्री मंजीव पुरी जी से आरंभिक टिप्‍पणी देने का अनुरोध करूंगा और यदि कुछ प्रश्‍न हैं तो वे उनका उत्‍तर भी देंगे।
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि (श्री मंजीव सिंह पुरी): धन्‍यवाद अकबर।

मैं समझता हूं कि समूह के अधिकांश सदस्‍यों को कल परिणाम दस्‍तावेज की प्रमुख विशेषताओं के बारे में माननीय पर्यावरण राज्‍य मंत्री द्वारा जानकारी दी गई थी। इस संबंध में यदि आप कुछ और पूछना चाहते हैं तो मैं उनका उत्‍तर देने के लिए तैयार हूं।

मैं समझता हूं कि यह नोट करना भी उपयोगी होगा कि यदि आपने ब्राजील के राष्‍ट्रपति के वक्‍तव्‍यों को ध्‍यान से पढ़ा होगा तो कल पूर्ण सत्र का उद्घाटन करते समय उन्‍होंने कहा था कि इस सम्‍मेलन में यह नोट करना भी बहुत महत्‍वपूर्ण है कि विकासशील देश न सिर्फ रियो सिद्धांतों पर बल देने में अपितु इस बात पर भी जोर देने में भी सफल रहे हैं कि वर्ष 2012 में गरीबी उन्‍मूलन हमारी आवश्‍यक प्राथमिकता बनी रहेगी और यह कि हमें सहस्‍त्राब्‍दि विकास लक्ष्‍यों एवं भावी विकास लक्ष्‍यों की प्राप्‍ति के संदर्भ में हमें इस विषय का समाधान करने के लिए यथासंभव सभी प्रयास करने की आवश्‍यकता है।

मैं समझता हूं कि यह नोट करना भी बहुत महत्‍वपूर्ण है कि हमने ऐसा करार संपन्‍न किया है जो अच्‍छा और संतुलित है और शायद यह विश्‍व के समकक्ष विद्यमान परिस्‍थितियों के तहत शायद सर्वोत्‍तम संभव करार है, जिसके बारे में आप सब जानते ही हैं।

यहां मैं रुकना चाहूंगा। यदि कोई ऐसी बात है, जिस पर कल माननीय मंत्री जी ने चर्चा नहीं की, तो उस पर आप प्रश्‍न पूछ सकते हैं। आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

प्रश्‍न : प्रश्‍न इस विषय से संबंधित है कि क्‍या विकासशील देशों को वित्‍त पोषण उपलब्‍ध कराने के आरंभिक लक्ष्‍यों पर चर्चा हुई है। अभी किसी प्रकार का वित्‍त पोषण नहीं है। पूर्व की प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की जा सकी हैं। इसलिए हम किस आधार पर यह मानकर चल रहे हैं कि हमें अच्‍छी सफलता मिल गई है क्‍योंकि विकसित देश की रिपोर्टों में वस्‍तुत: इस पूरे अभियान की निंदा की जा रही है?
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि: मैं समझता हूं कि हमें इस बात को स्‍वीकार करना चाहिए कि हमारी यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब विश्‍व के समक्ष गंभीर आर्थिक चुनौतियां हैं। आप सब इस बात को समझते हैं कि विकसित देशों में अभी किस प्रकार की परिस्‍थितियां चल रही हैं। पूर्व में, अर्थात 1992 में आयोजित रियो सम्‍मेलन में भी कुछ सिद्धांतों एवं तंत्रों की पुष्‍टि की गई थी। इस सम्‍मेलन में हमने दो तंत्रों की स्‍थापना करने के लिए परिणाम दस्‍तावेज के प्रारूप में सहमति व्‍यक्‍त की है। पहला वित्‍त पोषण के क्षेत्र से और दूसरा प्रौद्योगिकी अंतरण क्षेत्र से संबंधित है। वर्तमान परिस्‍थितियों को देखते हुए यह एक महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि है। ये कुछ ऐसे तंत्र हैं जो वांछित आंकड़ों को प्राप्‍त करने के तौर तरीकों का सुझाव देंगे।

अत: यह एक ऐसा दस्‍तावेज है, जिसमें काफी हद तक संतुलन है और जो काफी हद तक आज के विश्‍व की हकीकतों से जुड़ा हुआ है। परंतु यह एक ऐसा दस्‍तावेज भी है जिसमें स्‍पष्‍ट रूप से स्‍वीकार किया गया है कि यदि विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी के साथ-साथ धन भी उपलब्‍ध कराया गया तो वे इस समस्‍या का समाधान करने के लिए काफी कुछ कर सकते हैं।

आप जो फिलहाल विकासशील देशों से सुन रहे हैं उसे भी मेरे विचार में आपको स्‍वीकार करने की जरूरत है। मैं आपको बताऊं कि कुछ मिनट पूर्व डॉ. पचौरी मुझे कॉरिडोर में मिले थे और उन्‍होंने कहा कि जब उनके पास धन था तब वे इस संबंध में कुछ करना नहीं चाहते थे और अब उनका बहाना है कि उनके पास धन नहीं है। ऐसा पचौरी साहब ने मुझसे कहा है परंतु जैसा मैंने बताया आप उसे उसी रूप में उद्धृत न करें।

प्रश्‍न :हम ऐसा क्‍यों कह रहे हैं कि इस दस्‍तावेज में विकसित देशों की ओर से राजनीतिक इच्‍छा शक्‍ति के अभाव की झलक मिलती है जबकि दस्‍तावेज में कहा गया है कि इस समस्‍या का समाधान करने के लिए विकसित देश अपने सकल राष्‍ट्रीय उत्‍पाद का 0.7 प्रतिशत उपलब्‍ध कराएंगे।? इसमें यह भी कहा गया है कि दक्षिण-दक्षिण सहयोग से उत्‍तर-दक्षिण सहयोग को संपूरित किया जाएगा और यह उसकी जगह नहीं लेगा।? क्‍या सहस्‍त्राब्‍दि विकास लक्ष्‍यों के समान ही एसडीजी का भी विशिष्‍ट लक्ष्‍य होगा?
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि:मैं समझता हूं कि आपके सहयोगी ने अभी-अभी जो प्रश्‍न पूछा है शायद उसमें राजनैतिक इच्‍छा की कमी सबसे अधिक प्रतिबिंबित होती है। मैं समझता हूं कि अभी इस दस्‍तावेज पर चर्चा हो रही है। इन वार्ताओं में 0.7 प्रतिशत से संबंधित पुरानी प्रतिबद्धता के पैराग्राफों को शामिल करना ही एक बड़ा कार्य था। इसलिए इन बातों को मात्र दोहराया गया है। विकसित देशों को उनकी पुरानी प्रतिबद्धताओं की याद दिलाना ही विकासशील देशों एवं जी-77 देशों के लिए महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि थी।

जहां तक राजनैतिक इच्‍छा शक्‍ति का संबंध है, प्रौद्योगिकी अंतरण के संबंध में सहायता प्रदान करने अथवा धन मुहैया कराने का वायदा करके राजनैतिक इच्‍छा शक्‍ति का प्रदर्शन किया जा सकता था। इस समय तंत्रों की स्‍थापना करना ही सबसे बड़ी उपलब्‍धि हो सकती थी। इसके कारण बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट हैं और आप देख सकते हैं कि इसकी जड़ें आज की वास्‍तविकताओं में निहित हैं। इसलिए यह एक संतुलन की कार्रवाई है। परंतु मैं समझता हूं कि विकासशील देशों के विचार में यह संतुलन की अच्‍छी कार्रवाई थी क्‍योंकि विकासशील देशों के लिए नीतिगत कार्रवाइयों की स्‍पष्‍ट रूप से पहचान कर ली गई है।समानता तथा भिन्‍न दायित्‍वों के सिद्धांत को स्‍पष्‍ट रूप से स्‍वीकार किया गया है और अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग के एक तंत्र की भी पहल की गई है। अब हमें इस प्रक्रिया को यहां से आगे बढ़ाने की आवश्‍यकता है।

एसडीजी के संबंध में यही हुआ है कि एक प्रक्रिया शुरू हुई है, जिसमें संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा एक विशेषज्ञ समिति गठित करेगी और हम एसडीजी के स्‍वरूप पर चर्चा आरंभ करेंगे। यदि दोबारा वहीं से आरंभ किया जाए तो सहस्‍त्राब्‍दि विकास लक्ष्‍य का प्रारूप विशेषज्ञों और महासचिव द्वारा बनाया गया था और वस्‍तुत: इन्‍हें कभी भी अंगीकार नहीं किया जा सका, हालांकि आमतौर पर इसे स्‍वीकार कर लिया गया और हम सब इसे प्राप्‍त करने की दिशा में कार्य भी कर रहे हैं।

सतत विकास लक्ष्‍यों के संदर्भ में हमारा मानना है कि हम पश्‍च 2015 विकास कार्यसूची के लिए इस पर कार्य करेंगे परंतु यह कार्य अंतर-सरकारी स्‍वरूप के तहत किया जाएगा। इसलिए सरकार सहित हम सब संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा की रूपरेखा के अंतर्गत इस पर विचार करेंगे। इस समय यह कहना कठिन होगा कि उनकी क्‍या योजना और वे इस विषय पर किस प्रकार कार्य करेंगे। इस संबंध में स्‍वाभाविक रूप से खाद्य सुरक्षा एवं ऊर्जा पहुंच जैसे व्‍यापक क्षेत्र शामिल हैं। ये हम सबके लिए सतत विकास हेतु सबसे महत्‍वपूर्ण क्षेत्र हैं।

प्रश्‍न : मेरा प्रश्‍न आप से या विदेश सचिव महोदय से है। क्‍या आप हमें इस शिखर सम्‍मेलन में भारतीय उद्योग जगत की भावनाओं के बारे में बता पाएंगे? वे विभिन्‍न विषयों की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे थे। चूंकि अब उद्योग जगत भी खासा महत्‍वपूर्ण है और वे गरीबी उन्‍मूलन, वित्‍त पोषण तथा अन्‍य बातों की चर्चा कर रहे हैं, इसलिए क्‍या आप बता सकते हैं कि किन प्रमुख उद्योगपतियों ने इसमें भाग लिया है और उन्‍होंने क्‍या प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है और उनका यहां किस प्रकार का प्रतिनिधिमण्‍डल आया है?
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि:उद्घाटन के दौरान आपने श्री क्रिस गोपालकृष्‍णन को सुना होगा, जिन्‍होंने वैश्‍विक उद्योग जगत की ओर से संबोधन दिया और वे यहीं हैं। जिस प्रकार से यह सम्‍मेलन कार्य करता है, उसमें विभिन्‍न प्रमुख समूहों को बोलने का अवसर दिया जाता है और निजी क्षेत्र उन्‍हीं में से एक है। इसलिए यहां हमारे साथ उद्योग जगत के अनेक सम्‍मानित सदस्‍य थे, जिन्‍होंने उद्योग जगत की जरूरतों की बात की। मैं आपको स्‍मरण दिलाना चाहूंगा कि श्री गोपालकृष्‍णन ने क्‍या कहा था। उन्‍होंने कहा कि हम समावेशी हरित विकास की दिशा में योगदान देने और कार्य करने के लिए तैयार हैं।

यदि आप यह जानना चाहेंगे कि भारत उद्योग जगत यहां क्‍या कर रहा है तो मैं बताना चाहूंगा कि यह सम्‍मेलन मुख्‍यत: अंतर्सरकारी है, परंतु इसमें सभ्‍य समाज और बड़े समूहों सहित अन्‍य भागीदारों की भी सहभागिता है। परंतु मैं समझता हूं कि भारतीय उद्योग जगत विश्‍व के अन्‍य क्षेत्रों की तुलना में ब्राजील अधिक सक्रिय है। जैसा कि हम विभिन्‍न पहलुओं के संबंध में अपने घरेलू पक्ष में देखते हैं, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण इत्‍यादि के संदर्भ में भारतीय उद्योग जगत को अच्‍छी प्रतिक्रिया प्राप्‍त हुई है जबकि इसने देश में विकास एवं समावेशी प्रगति की दिशा में कार्य करने की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है।

प्रश्‍न : यहां हमें सामान्‍य प्रकार के आश्‍वासन एवं प्रतिबद्धताएं सुनने को मिली हैं। ऐसी बात नहीं है कि कोई ठोस लक्ष्‍य निर्धारित किया गया है। आप स्‍वयं कह रहे हैं कि वे अपनी पुरानी प्रतिबद्धताओं को ही दोहरा रहे हैं। वे फिर इसी आशय का आश्‍वासन दे रहे हैं कि वे सभी केन्‍द्रीय बिन्‍दुओं के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस शिखर सम्‍मेलन में कौन सी नई बात जोड़ी गई है?
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि: इस शिखर सम्‍मेलन से विकासशील देशों को सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि रियो सिद्धांतों तथा पहले से विद्यमान प्रतिबद्धताओं की पुन: पुष्‍टि की गई है। इन प्रतिबद्धताओं को समाप्‍त करने के काफी प्रयास किए गए और कई प्रकार की कार्रवाइयां भी की गईं, ताकि इनसे बचा जा सके और जैसा कि आपके मित्र ने कहा इसे दक्षिण-दक्षिण सहयोग अथवा इसी प्रकार के किसी तंत्र से प्रतिस्‍थापित करने की दिशा में भी प्रयास किए गए। इस सम्‍मेलन से क्‍या लाभ हुए हैं? इस सम्‍मेलन से रियो सिद्धांतों की वैधता की पुष्‍टि हुई है।

यह इस बात की पुष्‍टि है कि दक्षि-दक्षिण देशों के बीच सहयोग एक ऐसी भागीदारी है, जिसमें दोनों पक्ष समान हैं और वे एक दूसरे की राष्‍ट्रीय प्राथमिकताओं को प्राप्‍त करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं जो उत्‍तर-दक्षिण के पुराने प्रतिमान से अलग है, जिसमें इसकी वैधता और महत्‍व को बनाए रखा गया है। और इस सम्‍मेलन से विशेष लाभ यह हुआ है कि उन्‍हें उनके वायदों का स्‍मरण कराया गया है। अब हमें उन वायदों को कार्यान्‍वित करने की आवश्‍यकता है। आप बिल्‍कुल सही हैं। कार्यान्‍वयन में ही सबसे बड़ी कोताही बरती गई थी। परंतु यह एक ऐसी कोताही थी जिसे हम सबको स्‍वीकार करना है। यह तथ्‍य ही इस सम्‍मेलन की सफलता का परिचायक है कि हम उन्‍हें उनके वायदों, खासकर वार्ता प्रक्रिया के सफल परिणामों को याद दिलाने में सफल रहे हैं और हम उन्‍हें एक साथ बनाए रखने में सफल रहे हैं।

प्रश्‍न :कई मामले में अमरीका और जर्मनी वस्‍तुत:...(अश्रव्‍य)...मनीबैग। श्री ओबामा और चांसलर मर्केल की अनुपस्‍थिति को भारत किस प्रकार देखता है? निराशा? जिम्‍मेदारी का अभाव? इस विशेष बात को भारत किस प्रकार देखता है?
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि: इसके तथ्‍य आपके सामने हैं। लोग इसके कई कारण पता रहे हैं। अमरीकी राष्‍ट्रपति चुनावों में और जर्मनी की चांसलर यूरो जोन संकट का समाधान करने में उलझे हैं। मैं समझता हूं कि आप जो कह रहे हैं वह कुछ हद तक जायज भी है, परंतु हमें याद रखना चाहिए कि वहां की विदेश मंत्री द्वारा प्रतिनिधित्‍व किए जाने की संभावना है। यहां की चर्चाओं में अमरीका काफी सक्रिय रहा है। विदेश विभाग में विशेष दूत के नेतृत्‍व में एक उच्‍च स्‍तरीय प्रतिनिधिमण्‍डल भी यहां आया है। जो वार्ताएं यहां पर हुई हैं उनमें यह प्रतिनिधिमण्‍डल काफी सक्रिय रहा है।

जर्मनी के साथ भी यही मामला है। यूरो जोन संघ के भाग के रूप में ही नहीं, बल्‍कि व्‍यक्‍तिगत हैसियत से भी जर्मनी का इस सम्‍मेलन का इस सम्‍मेलन में काफी उच्‍च स्‍तर पर प्रतिनिधित्‍व रहा है। इसलिए मैं समझता हूं कि हमें इस बात को इस तरह से देखना चाहिए कि चाहे जर्मनी अथवा संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के नेता किसी भी कारणवश सम्‍मेलन में भाग लेने हेतु नहीं आ पाए हैं, परंतु इस सम्‍मेलन में राजनैतिक रूप से उनकी काफी अच्‍छी उपस्‍थिति रही है।

प्रश्‍न: आपने एक तंत्र के रूप में प्रौद्योगिकी की बात कही। परंतु आप आईपीआर मुद्दे का समाधान किस तरह देखते है? आपने उत्‍कृष्‍टता केन्‍द्रों का विकास किए जाने की बात कही। इन केन्‍द्रों का प्रचालन सीजी मॉडल पर किया जाएगा?
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत के उप स्‍थायी प्रतिनिधि : यह स्‍थिति काफी लंबे समय से रही है और हमें बौद्धिक संपदा अधिकार व्‍यवस्‍थाओं का समुचित उपयोग करने की आवश्‍यकता है। साथ ही हमें विश्‍व व्‍यापार संगठन और ट्रिप्‍स के अंतर्गत बौद्धिक संपदा अधिकार व्‍यवस्‍थाओं के विद्यमान तौर तरीकों का भी सर्वोत्‍तम उपयोग करना चाहिए। सहयोग के संदर्भ में भी हम काफी मजबूत रहे हैं। आप सही कह रहे हैं कि सीजी मॉडल आकर्षक रहा है और हम इसका उपयोग करना चाहते हैं।

बुनियादी तौर पर हमारा प्रयास रहा है कि प्रौद्योगिकी पर कार्य करने के लिए हमने जो तंत्र बनाए हैं वे इस प्रकार के हैं कि ये मॉडल, सीजी मॉडल और आपीआर से संबंधित मॉडल को लागू किया जा सकता है और सतत विकास के संदर्भ में भी हम इन पर चर्चा कर सकते हैं। यह चर्चा न सिर्फ विशेष संदर्भ में बल्‍कि विश्‍व व्‍यापार संगठन के संदर्भ में भी हो सकती है। इसलिए निश्‍चित रूप से ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें हमें काम करना है। प्रौद्योगिकी अंतरण तंत्रों, जिनकी स्‍थापना की जानी है, के संबंध में कार्य करने के दौरान ये हमारी प्रतिनिधिमण्‍डल के लिए प्राथमिकता के क्षेत्र रहेंगे।

सरकारी प्रवक्‍ता: आपका बहुत-बहुत धन्‍यवाद। इसी के साथ प्रेस वार्ता का समापन होता है।

(समाप्‍त)

रियो डि जेनरियो
21 जून, 2012



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