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लॉस काबोस, मैक्‍सिको में आयोजित जी-20 शिखर सम्‍मेलन के पूर्ण सत्र में प्रधानमंत्री जी का संबोधन

जून 18, 2012

अध्‍यक्ष महोदय,

सबसे पहले मैं आपके द्वारा प्रदत्‍त आतिथ्‍य सत्‍कार एवं इस शिखर सम्‍मेलन के लिए की गई उत्‍कृष्‍ट व्‍यवस्‍थाओं के लिए आपको धन्‍यवाद देता हूं।

वैश्‍विक आर्थिक स्‍थिति गंभीर चिंता का विषय है। आर्थिक सुधारों की गति ढीली है और यहां तक कि तेजी से बढ़ने वाले उभरते बाजारों में भी मंदी आ रही है। इसके लिए हमें अनेक मोर्चों पर नीतिगत कार्रवाई करने की आवश्‍यकता है। वर्तमान में सर्वाधिक चिंता का विषय निश्‍चित रूप से यूरो जोन में विद्यमान अनिश्‍चितता है। इसके साथ ही संप्रभु ऋण संकट तथा बैंकिंग संकट के प्रतिकूल प्रभाव पूरी वैश्‍विक अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ रहे हैं।

ग्रीस में एक नई सरकार कार्यभार संभालने वाली है। हम उनकी बेहतरी की कामना करते हैं और हम इस आशय के आरंभिक वक्‍तव्‍यों से उत्‍साहित भी हैं।

तथापि यूरोप में संसर्ग के खतरे अभी भी बने हुए हैं क्‍योंकि ये अत्‍यधिक संप्रभु ऋण एवं विकास की अल्‍प संभावनाओं से उत्‍पन्‍न बैंकिंग क्षेत्र की कमजोरियों को प्रतिबिंबित करते हैं। यूरोपीय बैंकिंग प्रणाली के संकट से व्‍यापार वित्‍त पर भी दबाव पड़ सकता है और इससे न सिर्फ यूरो जोन बल्‍कि पूरे विश्‍व की आर्थिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो सकता है।

जरूरत इस बात की है यह शिखर सम्‍मेलन बाजार को इस आशय का ठोस संकेत दे कि यूरो जोन के देश बैंकिंग प्रणालियों को संरक्षित करने के यथासंभव सभी प्रयास करेंगे तथा वैश्‍विक समुदाय यूरो जोन द्वारा किए जाने वाले विश्‍वसनीय प्रयासों का समर्थन करेगा।

तथापि कुछ ऐसी समस्‍याएं भी हैं जिनका मैं उल्‍लेख करना चाहूंगा।

इस बात की भी चिंता है कि हमारे पास जो सुरक्षोपाय उपलब्‍ध हैं वे शायद इस संसर्ग का पर्याप्‍त रूप से मुकाबला करने में यूरोप तथा अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष द्वारा वर्तमान में एकत्र किया जाने वाला संभावित संसाधन एक वर्ष पूर्व लगाए गए अनुमान से कम है और यह संकट वस्‍तुत: काफी गंभीर है।

इस समस्‍या का एक समाधान तरलता उपलब्‍ध कराना भी हो सकता है, ताकि बाजार में जो अविश्‍वास का माहौल बना है उससे पार पाया जा सके। परंतु जब शोध क्षमता का प्रश्‍न होता है तब तरलता बहुत अधिक सहायक नहीं हो पाती है। इस समस्‍या का समाधान करने के लिए प्रभावी समायोजन कार्यक्रमों के साथ साथ तरलता उपलब्‍ध करायी जानी चाहिए, जिससे कि ऋण निरंतरता की शीघ्रातिशीघ्र वापसी सुनिश्‍चित हो सके। अंगीकार किए जाने वाले समायोजन कार्यक्रमों से विकास की गति बढ़नी चाहिए ताकि विभिन्‍न देश ऋण के जाल से निकलकर बाहर आ सकें।

अब मैं मितव्‍ययिता और विकास के बीच के संबंधों से जुड़े विवादास्‍पद मुदृदों पर आना चाहूंगा। इस बात का तर्क दिया जा सकता है कि आज की मितव्‍ययिता के आधार पर भविष्‍य में सतत विकास की आधारशिला रखी जा सकती है। परंतु एक वैकल्‍पिक विचार भी है कि चूंकि फिलहाल विकास की दर काफी कम हो गई है इसलिए विभिन्‍न देशों में सांमजस्‍यपूर्ण मितव्‍ययिता इस मर्ज की सही दवा नहीं हो सकती है।

वित्‍तीय बाजार आमतौर पर मितव्‍ययिता का पक्ष लेते हैं, परंतु उन्‍होंने भी उत्‍तरोत्‍तर इस बात को स्‍वीकार करना आरंभ कर दिया है कि विकासहीन मितव्‍ययिता से सतत ऋण स्‍थिति की समस्‍या का समाधान नहीं हो पाएगा।

मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि राजकोषीय अनुशासन महत्‍वपूर्ण नहीं है। मैं सिर्फ इतना ही कह रहा हूं कि सामंजस्‍य की बड़ी जरूरतों को ध्‍यान में रखते हुए एक ही तरीके का उपयोग सभी जगह नहीं किया जा सकता है। यह बात एक मुद्रा क्षेत्र के भीतर विशेष रूप से प्रासंगिक है। ऋण से ग्रसित यूरो जोन के सदस्‍य देशों में मितव्‍ययिता तभी कार्य कर सकेगी जब आधिक्‍य वाले सदस्‍य देश उक्‍त मुद्रा क्षेत्र में अन्‍यत्र अपने निवेशों को बढ़ावा देना चाहेंगे।

यूरो जोन में स्‍थायित्‍व लाने में अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष की महत्‍वपूर्ण समर्थकारी भूमिका हो सकती है। सभी सदस्‍यों को अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष को अपनी भूमिका निभाने में मदद करनी होगी। मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत ने 430 बिलियन अमरीकी डालर के अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष के अतिरिक्‍त सुरक्षोपाय में 10 बिलियन अमरीकी डालर का अंशदान देने का निर्णय लिया है।

अध्‍यक्ष महोदय,

अनेक समृद्ध देशों के समक्ष भी कठिनाइयां हैं जबकि अल्‍पविकसित और विकासशील देशों के समक्ष भी गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। इसका कारण वैश्‍विक संकट का नकारात्‍मक प्रभाव ही है। इस संदर्भ में विकासशील देशों में अवसंरचना क्षेत्र का निवेश अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण हो जाता है। इसके आधार पर दीर्घकाल में त्‍वरित प्रगति की आधारशिला रखी जा सकती है जबकि उनकी अर्थव्‍यवस्‍थाओं और समग्र वैश्‍विक अर्थव्‍यवस्‍था में भी तत्‍काल सुधार आ सकता है क्‍योंकि मांग का एक महत्‍वपूर्ण स्रोत निर्मित हो जाएगा।

विकासशील देशों में अवसंरचना क्षेत्र में निवेश का विस्‍तार तभी संभव हो सकता है जब उन्‍हें इस प्रकार के निवेश के वित्‍त पोषण हेतु दीर्घावधिक पूंजी उपलब्‍ध हो। इस समय यह कार्य कठिन है क्‍योंकि पूंजी प्रवाहों में व्‍यवधान उत्‍पन्‍न हो गया है। इस संदर्भ में बहुपक्षीय विकास बैंक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

हमने समृद्ध देशों में चलाए जाने वाले कार्यक्रमों का समर्थन करने के उद्देश्‍य से करते हुए अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्राकोष के संसाधनों में पर्याप्‍त विस्‍तार किया है। अब हमें बहुपक्षीय विकास बैंकों के संसाधन आधार का पर्याप्‍त विस्‍तार करने हेतु उपाय करने की आवश्‍यकता है ताकि ये विकासशील देशों को विकास लक्ष्‍य प्राप्‍त करने में सहायता प्राप्‍त कर सकें।जी-20 रूपरेखा कार्यदल तथा वित्‍तीय स्‍थायित्‍व बोर्ड इस बात की जांच कर सकता है कि देशवार प्रतिबद्धताओं तथा नियामक रूपरेखाओं के प्रोत्‍साहनों के जरिए अवसंरचना क्षेत्र में निवेश को किस प्रकार बढ़ाया जाए।

अध्‍यक्ष महोदय, मैं यहां बताना चाहूंगा कि मेरे विचार में जी-20 की कार्यसूची बोझिल होती जा रही है। हमें विभिन्‍न मोर्चों पर अपनी ऊर्जा को व्‍यर्थ बनाने की जगह कुछ लक्ष्‍यों पर विशेष रूप से बल देने की आवश्‍यकता है।

अन्‍य उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं के समान ही भारत में भी मंदी आई है। वैश्‍विक मंदी और विशेषकर पूंजी प्रवाहों पर इसके प्रतिकूल प्रभाव ने भी अपनी भूमिका निभाई है।आंतरिक बाध्‍यताओं के कारण भी निष्‍पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और हम इसे सही करने के लिए कार्य कर रहे हैं।

वर्ष 2011-12 में हमारी विकास दर घटकर 6.5 प्रतिशत रह गई है। जबकि पिछले वर्ष यह स्‍तर 8.4 प्रतिशत था। शेष विश्‍व की विकास दर के अनुभवों को देखते हुए यह आंकडा संतुलित कहा जा सकता है। परंतु हमारी जनता विकास के उच्‍च मार्ग पर वापस आने तथा नौकरियों के त्‍वरित सृजन के लिए अधीर हो रही है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के मौलिक तत्‍व मजबूत हैं और हमें विश्‍वास है कि हम 8.9 प्रतिशत प्रतिवर्ष की विकास दर दोबारा प्राप्‍त कर सकेंगे।

प्रतिकूल वैश्‍विक परिवेश का भी निवेश पर प्रभाव पड़ा है और इसके कारण विदेशी एवं घरेलू दोनों प्रकार के निवेशकों में आशंका है। हम निवेशकों के भरोसे को बहाल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। हम एक ऐसा परिवेश सृजित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिससे निवेशकों की भावनाओं को बढ़ावा मिले और उद्यम तथा सृजन के लिए अनुकूल परिवेश बन सके। हमारी नीतियां पारदर्शी एवं स्‍थिर हैं तथा ये घरेलू एवं विदेशी दोनों प्रकार के निवेशकों के लिए समान अवसर उपलब्‍ध कराने को ध्‍यान में रखकर बनाई गई हैं।

हम अवसंरचना निवेश पर विशेष बल दे रहे हैं और इस संदर्भ में हमने अवसंरचना निवेश को पटरी पर रखने के लिए महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य निर्धारित किए हैं। इसके साथ ही हमने कार्यान्‍वयन के दौरान आने वाले अवरोधों का समाधान करने के लिए समस्‍या निवारण तंत्र भी बनाए हैं।

अन्‍य देशों के समान ही हमने भी वर्ष 2008 के बाद राजकोषीय घाटे को बढ़ने की अनुमति दी, जिसका उद्देश्‍य अर्थव्‍यवस्‍था में प्रोत्‍साहन लाना था। अब हम बढ़ोत्‍तरी की इस प्रक्रिया को वापस लेने पर अपना ध्‍यान केन्‍द्रित कर रहे हैं। इसके लिए सब्‍सिडी पर नियंत्रण लगाने सहित अन्‍य कठोर निर्णय लेने की आवश्‍यकता होगी और हम इस प्रकार का निर्णय लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

इस संदर्भ में मैं सभी निवासियों को बायोमीट्रिक आंकड़ों के साथ यूनिक पहचान संख्‍या उपलब्‍ध कराने की दिशा में भारत में चल रहे महत्‍वपूर्ण कार्य का उल्‍लेख करना चाहूंगा। एक बिलियन से अधिक लोगों को शामिल करने वाले इस विशाल डेटाबेस से प्रभावी लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने एवं सब्‍सिडी योजनाओं की कमियों को दूर करने के जरिए विभिन्‍न वित्‍तीय एवं अन्‍य सेवाओं की सुपुर्दगी सुविधाजनक बन सकेगी।

धन्‍यवाद।

लॉस काबोस
18 जून, 2012



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