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लॉस काबोस में जी-20 शिखर के समापन पर प्रधानमंत्री जी का मीडिया वक्तव्य

जून 19, 2012

जी-20 शिखर सम्मेलन अत्यंत ही कठिन परिस्थितियों में आयोजित किया जा रहा है। अधिकांश देशों में विकास दर में आई कमी पर यूरोज़ोन में व्याप्त अनिश्चिता की छाया रही जो बैंकिंग प्रणाली की कमजोरियों और अत्यधिक संप्रभु ऋण दिये जाने के कारण उत्पन्न हुई। यह शिखर सम्मेलन इन चिंताओं पर जी-20 के नेताओं द्वारा विचार-विमर्श करने का बहुमूल्य अवसर उपलब्ध कराता है।

जी-20 में मेरा सम्बोधन संतुलित रहा है और यह हमारे विचारों को भी व्यक्त करता है। इस सम्मेलन का मेरा समग्र आकलन यह है कि सभी देशों की नीतियों को विकास प्रक्रिया को बढ़ावा देने के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कई उपाय किए गए हैं परंतु इस बात पर भी आमतौर पर सहमति बनी है कि यूरोज़ोन में व्याप्त अनिश्चिता की भावना में कमी लाने के तात्कालिक उपाय किए जाने चाहिए।

यूरोज़ोन के नेताओं ने हमे आश्वस्त किया है कि वे यूरोज़ोन क्षेत्र की अखंडता को संरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वे वर्तमान मुद्रा संघ से आगे बढ़कर एकीकृत बैंकिंग पर्यवेक्षण तथा समान और प्रवर्तन योग्य राजकोषीय नियमों को अंगीकार किए जाने की आवश्यकता को स्वीकार करते है। तथापि इसके लिए क्रमिक प्रक्रिया की आवश्यकता होगी। यूरोज़ोन के संबंध में 17 संसदों तथा यूरोपीय संघ के 27 देशों के मामले में इन्हें शामिल करने वाली संधि में परिवर्तन करने भी इस प्रकार की प्रक्रिया में समय लगेगा। यूरोज़ोन के नेताओं ने यूरोज़ोन क्षेत्र को संरक्षित रखने की आवश्यकता के लिए हर संभव उपाय करने की ठोस प्रतिबद्धता का संकेत दिया जबकि दीर्घावधिक संस्थागत रूप रेखाओं का निर्माण जारी रखा जाना चाहिए।

28 या 29 जून को आयोजित होने वाले यूरोपीय शिखर सम्मेलन के बाद वे विशेष संकेत देने में समर्थ होंगे। उन्होने प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए उत्पाद एवं श्रम बाज़ारों में ढांचागत सुधारों के जरिये इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के अपने संकल्प का भी संकेत दिया है।

जी-20 देशों ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के संसाधनों में वृद्धि किए जाने की आवश्यकता के प्रति भी अपनी अनुक्रिया व्यक्त की है ताकि यह वर्तमान स्थिति में अपनी उपयुक्त भूमिका निभाने में समर्थ हो सके। भारत ने 10 बिलियन अमरीकी डॉलर का अंशदान किया है। ब्रिक्स तथा अन्य देशों ने भी अंशदान किया है जिससे अप्रैल में सहमत कुल प्रतिबद्धता बढ़कर लगभग 460 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुँच गयी है।

भारत का अंशदान हमारी इस स्वीकारोक्ति को प्रतिबिंबित करता है कि विश्व समुदाय के एक जिम्मेदार देश के रूप में हमें निश्चित रूप से अपनी भूमिका निभानी चाहिए। हमने पूरी राशि का अंशदान नकद के रूप में और इस भावना में किया है कि अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास कहीं भी आवश्यकता पड़ने पर ऋण देने की क्षमता हो। अतः यह हमारे रिज़र्व का भाग बना रहेगा।

अनेक नेताओं ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में अभिशासन सुधारों की गति में तेज़ी लाने के महत्व पर बल दिया जिसमें कोटा फार्मूले में सुधार लाना शामिल है जिससे कि आर्थिक प्रभाव प्रतिबिम्बित हो सके।

शिखर सम्मेलन में नए संरक्षणवादी उपायों को स्थिर रखने की प्रतिबद्धता दोहराई गयी और इसे वर्ष 2013 से 2014 तक की प्रतिबद्धता के आगे बढ़ाया गया। संरक्षणवादी प्रवृत्तियों, जिनसे आम तौर पर उच्च बेरोजगारी एवं अल्प विकास की अवधि में वृद्धि होती है, की रोकथाम करने की दिशा में यह जी-20 द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण मंशा वक्तव्य है।

लॉस काबोस घोषणा हमारी इस पहल को पूर्णतः प्रतिबिम्बित करती है कि विकासशील देशों में अवसंरचना क्षेत्र में निवेश से विकास के संवर्धन तथा वैश्विक सुधार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। यह घोषणा इस बात का संकेत करती है कि इस प्रयोजनार्थ बहुपक्षीय विकास बैंकों को सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए। हम उनकी प्रतिबद्धताओं को विशिष्ठ कार्यवाहियों में बदलने के लिए जी-20 के अन्य देशों के साथ मिलकर कार्य करेंगे।

शिखर सम्मेलन में अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी चर्चा हुई जिनमे नियामक सुधार में प्रगति, खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादकता से जुड़े मुद्दे, भ्रष्टाचार रोधी उपाय और हरित विकास से सम्बद्ध मुद्दे का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है।

लॉस काबोस
19 जून, 2012



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