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रियो दे जनेरियो में आयोजित मीडिया वार्ता में माननीय पर्यावरण और वन राज्य मंत्री की आरंभिक टिप्पणी

जून 20, 2012

रियो के इस खूबसूरत शहर में मीडिया के मित्रों से बात करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है।

आरंभ में ही मैं मेजबान देश ब्राज़ील को सम्मेलन में उनके उत्कृष्ट प्रबंधन के लिए धन्यवाद देना चाहूँगा और रियो+20 परिणाम दस्तावेज़ के शीघ्र निष्पादन के लिए उनकी अध्यक्षता को हार्दिक बधाई देता हूँ। मैं ब्राज़ील की अध्यक्षता की पारदर्शिता और अंतर्वेशन की प्रशंसा करती हूँ जिससे उन्होने इस प्रक्रिया का संचालन किया है क्योंकि परिणाम दस्तावेज़ सभी प्रतिनिधिमंडलों द्वारा स्वीकार किए जाने के लिए महत्वपूर्ण है।

जहां तक भारत की बात है, यह परिणाम दस्तावेज़ हमारी जरूरतों और लाभों को ध्यान में रखता है और हम इस समस्त पैकेज से संतुष्ट हैं। भारत रियो में रचनात्मक रहा और हमारे प्रस्तावों, जिन्हे व्यापक समर्थन मिला, के साथ हमारे प्रतिनिधिमंडल ने मतभेदों तथा महत्वपूर्ण मुद्दों पर सर्वसम्मति बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह रहा कि पर्यावरण पर होने वाली चर्चाओं में साझे परंतु भिन्न दायित्वों के सिद्धान्त को बहाल कर दिया गाय।समानता तथा इसकी अभिव्यक्ति और इसके सिद्धांत सतत विकास हेतु अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के केंद्र में हैं और हमें इस बात की खुशी है कि हमने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सामूहिक रूप से सहमति व्यक्त की है जो विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

परिणाम दस्तावेज़ ने गरीबी उन्मूलन को सबसे बड़ी अंतर्राष्ट्रीय चुनौती भी माना है। ऐसा करने में, यह इसको स्पष्ट रूप से अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंडे के केंद्र में रखता है।

इस सम्मेलन को दीर्घकालीन विकास के उद्देश्यों की प्रक्रिया को आरंभ करने के लिए भी याद रखा जाएगा। चूंकि 2015 के बाद के अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंडे में इनका शामिल होना अपेक्षित है, ऐसी आशा है की एसडीजी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को एक समावेशित तथा दीर्घकालीन विकास की ओर ले जाएगी। हम इस बात से प्रसन्न हैं कि यह प्रक्रिया और इसका परिणाम रियो के उद्देश्यों, सम्मान, राष्ट्रीय परिस्थितियों, प्राथमिकताओं तथा सामर्थ्यों द्वारा निर्देशित होगा।

हम इस बात से संतुष्ट हैं कि किसी विशेष उद्देश्य एवं लक्ष्य की शर्त नहीं रखी गयी है और हमें न सिर्फ विकसित देशों के लिए बल्कि सभी देशों के लिए लागू होगा होने वाली अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रिया में रचनात्मक रूप से शामिल होने की प्रतीक्षा है। इसके जरिये सतत विकास और सीबीडीआर पर सभी पक्षों द्वारा सार्थक कार्यवाही की जाएगी और विकास का मार्ग अवरुद्ध नहीं होगा।

हम हरित अर्थव्यवस्था को सतत विकास तथा गरीबी उन्मूलन का एक साधन मानते हैं और हमने हरित अर्थव्यवस्था के बहाने किए जाने वाले उपायों एवं व्यापार बाधाओं को पक्के तौर पर अस्वीकार कर दिया है।

हालांकि हम विकासशील देशों के लिए कार्यान्वन के संवर्धित तरीके नहीं उपलब्ध कराये जाने के लिए विकसित देशों में राजनैतिक इच्छा की कमी पर निराशा है परंतु हमें इस बात की खुशी है कि हमने प्रौद्योगिकी अंतरण तथा वित्त के लिए दो तंत्रों की स्थापना किए जाने पर अपनी सहमति व्यक्त की है।ये दोनों प्रस्ताव भारत ने रखे थे जिन्हे अफ्रीका के देशों, अल्पविकसित देशों तथा लघु द्वीप राज्यों सहित जी-77 देशों का ठोस समर्थन प्राप्त हुआ। अब हम समूहिक रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए उत्सुक हैं कि इन तंत्रों को प्रचलित किया जाए और इनका प्रभावी उपयोग विकासशील देशों के लिए किया जाए।

आज शाम मुझे एक उच्चस्तरीय गोल मेज़ बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया जिसमें मैंने इस बात पर बल दिया कि यह विडम्बना है कि हमारे सामने न सिर्फ वैश्विक मंदी है बल्कि हम पर्यावरण क्षेत्र में भी साथ-साथ ही मंदी की शुरुआत कर रहे हैं। हम यहाँ एक बार फिर धरती और उसके बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए यहाँ आए हैं न कि प्रदूषकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए।

मैंने उल्लेख किया था की मैं 1.2 बिलियन लोगों का प्रतिनिध्तिव कर रहा हूँ और हमारी चुनौती एक मजबूत अर्थव्यवस्था का निर्माण तथा गरीबी उन्मूलन के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना है कि हमारे गरीब लोगों को, जो कि पहले से ही जलवायु-परिवर्तन से होने वाले आपदाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं, और नुकसान न हो।

मुझे धनी देशों के पर्यावरणवाद और गरीब देशों के पर्यावरणवाद में अंतर बताने की अनुमति दीजिये। धनी देश बढ़े, विकसित हुए और उन्होने विश्व को प्रदूषित किया।इसके फलस्वरूप जब पर्यावरण के आंदोलन आरंभ हुए, उनके पास सफाई करने के लिए धन था। हमारी उदीयमान प्रगति और अर्थव्यवस्था ने हमारे विकास के पथ को एक प्रदूषित विश्व की समस्याओं के साथ आरंभ किया।

हमारी मूलभूत चुनौती सीमित संसाधनों से अधिक कार्य करने की है। मितहारिता और नवाचार विकास के लिए हमारे नए रास्ते हैं और विकास को दीर्घकालीन तथा रियायती बनाने के लिए विकास के लाभों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना हमारी चुनौती होगी।

कार्यक्षमता में क्रांति से कुछ ही परिणाम सामने आए हैं। पर्याप्तता के संबंध में क्रांति आरंभ होनी चाहिए। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, हमारे पास सभी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं परंतु सभी के लालच को पूरा करने के लिए नहीं।

जब हम हरित अर्थव्यवस्था की बात करते हैं तो भारत एक हरित विश्व अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध है परंतु मैं यह अवश्य जोड़ना चाहूँगा कि एक वास्तविक हरित अर्थव्यवस्था न कि एक हरे रंग से रंगी लालच की अर्थव्यवस्था, जैसा की हमारे पर्यावरणवादी कहते हैं।

हम एक ऐसी हरित अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध है जो प्रकृति का भौतिकीकरण नहीं करती और स्थानीय समुदायों की रक्षा करती है। इसलिए बाज़ार द्वारा संचालित हरित अर्थव्यवस्था- भूमि, जल और वनों में व्यवसाय के पुराने उदाहरण अब व्यापार में समान्य क्रियाओं की तरह कायम नहीं रह सकते क्योंकि यह एक असफल प्रतिमान है। स्थानीय समुदायों की रक्षा करना तथा उन्हे इसमें शामिल करना आवश्यक है। स्थानीय समाधानों को परिचालित करना होगा। हरित अर्थव्यवस्था बुनियादी और लोकतान्त्रिक होनी चाहिए अन्यथा हरित अर्थव्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। हरित अर्थव्यवस्था की कीमत गरीबों के लिए रियायती नहीं रह जाएगी।

मैंने गोल मेज़ में इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि भारत ने पहले ही दीर्घकालीन विकास के संदर्भ में हरित विकास का प्रचार करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं जिनमें 2005 की तुलना में 2020 तक निस्सरण की मात्रा में 20-25 प्रतिशत तक की कमी लाने, 20,000 मेगा वॉट की सौर ऊर्जा का उत्पादन करने और ऊर्जा कार्यक्षमता की वृद्धि और दीर्घकालीन अधिवास के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय मिशन जैसी योजनाएँ शामिल हैं।

धन्यवाद

रियो दे जनेरयो
20 जून, 2012



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