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जापान-भारत संघ, जापान-भारत संसदीय मैत्री लीग और अंतरराष्ट्रीय मैत्री विनिमय परिषद को प्रधानमंत्री का संबोधन

मई 28, 2013

मुझे यहां भारत के मित्रों से भरे इस कक्ष में उपस्थित होकर खुशी हो रही है। मैं विशेष रूप से श्री मोरी-सान की यहां मौजूदगी से प्रसन्नष और सम्मानित महसूस कर रहा हूँ।

श्री मोरी-सान केवल एक अच्छे व्यक्तिगत मित्र ही नहीं है। वे भारत के भी एक महान मित्र है। जापान के प्रधानमंत्री के रूप में, श्री मोरी-सान ने हमारे दोनों देशों और हमारे दोनों देशों के लोगों के बीच प्राचीन संबंधों में एक नए चरण की नींव रखी। यही कारण है कि हम भारत में उन्हेंक हमारे राष्ट्रीय सम्मान पद्म भूषण से सम्माहनित करके गौरवान्वित हुएं।

एशिया का पुनरुत्थान उगते सूरज के इस द्वीप में एक सदी पहले शुरू हुआ। तब से, जापान ने हमें आगे का रास्ता दिखाया है। भारत और जापान ने एक बढ़ते हुए एशिया का दृष्टिकोण साझा किया है। इसलिए, पिछले दशक के दौरान, हमारे दोनों देशों ने साझा मूल्यों और साझा हितों पर आधारित एक नया संबंध स्थापित किया है। एक आधुनिक, ज्ञान आधारित औद्योगिक शक्ति के रूप में जापान का विकास भारत के महान राष्ट्रीय नेताओं के लिए प्रेरणा का एक स्रोत था। दार्शनिक स्वामी विवेकानंद, कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर, इंजीनियर एम. विश्वेणश्वबरैय्या, देशभक्त सुभाष चंद्र बोस और राष्ट्र निर्माता जवाहरलाल नेहरू तथा और भी कई - वे सभी 19वीं और 20वीं सदी में जापान की महान उपलब्धियों से प्रेरित थे।

अभी हाल ही में, भारत के क्रमिक लेकिन सुस्थिर आर्थिक विकास ने हमारे दोनों देशों के लिए आपस में सहयोग करने और साथ काम करने के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। भारत को जापानी प्रौद्योगिकी और निवेश की जरूरत है। बदले में भारत, जापान की समग्र समृद्धि और विकास के लिए जापानी कंपनियों के विकास और वैश्वीकरण के लिए बढ़ते हुए अवसर प्रदान करता है।

मैं, प्रधानमंत्री शिंजो अबे द्वारा इस वर्ष टोक्यो में उनके पहले मेहमान बनने के लिए मुझे दिए गए निमंत्रण से बहुत सम्मानित हुआ। दुर्भाग्य से, मैं अपनी संसदीय प्रतिबद्धताओं के कारण उस समय यात्रा करने में असमर्थ रहा।

हालांकि मैं चेरी खिलने के मौसम के दौरान यात्रा नहीं कर पाया, बसंत के मौसम में यहाँ आने पर मुझे खुशी है, जिसका मुझे विश्वास है कि यह हमारे रिश्ते के लिए एक महान भविष्य का प्रतीक है। मैं इस बात से भी आश्वस्त हूँ कि प्रधानमंत्री अबे के नेतृत्व में हमारे लोगों में मैत्री, हमारे व्येवसायों के बीच साझेदारी और हमारे रक्षा और रणनीतिक समुदायों के बीच सहयोग और बढ़ेगा।

इस अवसर पर, मुझे अगस्त, 2007 में भारतीय संसद में प्रधानमंत्री अबे के प्रेरणादायक और दूरदर्शी संबोधन की याद आ रही है, जब उन्होंाने "दो समुद्रों के संगम" की बात की थी - प्रशांत और हिंद महासागर – जिसने हमारे द्विपक्षीय संबंधों के लिए नई रूपरेखा परिभाषित की। प्रधानमंत्री अबे और मैं, हमारी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाने, हमारे आर्थिक सहयोग को नई गति प्रदान करने और साझा क्षेत्रीय और वैश्विक हितों पर अपनी वार्ता को गहरा करने के लिए मिलकर काम करेंगे।

भारत और प्रशांत क्षेत्र मानव इतिहास में विरले देखी जाने वाली गति से विशाल पैमाने पर गम्भीऔर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन देख रहा है। इसने पिछली आधी सदी में स्वतंत्रता, अवसर और समृद्धि में एक अभूतपूर्व वृद्धि का अनुभव किया है।

उसी समय, इस क्षेत्र को कई चुनौतियों, अनसुलझे मुद्दों और अस्थिर सवालों का सामना करना पड़ा। हमारी बढ़ती अंतर - निर्भरता के बावजूद ऐतिहासिक मतभेद जारी रहें; समृद्धि ने देशों के भीतर और उनके बीच असमानताओं को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया; और स्थिरता व सुरक्षा के लिए खतरे जारी हैं।

प्रवाह और परिवर्तन के इस क्षण में भी हमारे पास इस सदी में एशिया के लिए एक नए मार्ग की रूपरेखा तैयार करने के लिए बहुत बड़ा अवसर है। वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्व और इसके विकास का इस क्षेत्र में झुकाव, इसका भविष्यथ इस सदी में विश्वा के ढांचे को आकार भी देगा।

भारत और जापान इस क्षेत्र में प्रमुख देशों में से हैं। हमारी साझा धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत शांति, सह-अस्तित्व और बहुलतावाद के सिद्धांतों को मूर्त रूप देते हैं। शांति, स्थिरता और सहयोग के माहौल को बढ़ावा देना और सुरक्षा और समृद्धि के लिए एक स्थायी नींव रखना हमारी जिम्मेदारी है। मैं इस संबंध में सहयोग के तीन क्षेत्रों का सुझाव देना चाहूंगा।

सबसे पहले, हमें क्षेत्रीय तंत्र और मंचों को मजबूत करना चाहिए जो परामर्श और सहयोग की आदतें विकसित करने में मदद करेगी, मतभेद प्रबंध के लिए सामान्य रूप से स्वीकृत सिद्धांतों को विकसित करने में सक्षम बनाएगी, क्षेत्र में सामंजस्य को सुदृढ़ करने और हमें आम चुनौतियों का सामना करने की अनुमति देगी।

दूसरा, हमें व्यापक और गहरे क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ाना चाहिए। यह पूरे क्षेत्र में और अधिक संतुलित और व्यापक आधार वाले आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा तथा और अधिक संतुलित क्षेत्रीय संरचना में योगदान देगा।

तीसरा, हिंद और प्रशांत महासागरों से जुड़े क्षेत्रों में समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय और वैश्विक समृद्धि के लिए आवश्यक है। इसलिए हमें नेविगेशन की स्वतंत्रता के सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार बेरोक-टोक वैध वाणिज्य को बनाए रखना चाहिए, समुद्री मुद्दों को शांति से सुलझाना चाहिए और समुद्र की क्षमता के दोहन के लिए और अधिक उद्देश्यपूर्ण रूप से मिलकर काम करना चाहिए और समुद्री डकैती जैसे आम समुद्र आधारित चुनौतियों का समाधान करना चाहिए।

इस क्षेत्र में भारत की स्व यं की मजबूत वचनबद्धता इस दृष्टिकोण से सुविज्ञ है। हमारी पूर्व की ओर देखो वचनबद्धता एक मजबूत आर्थिक महत्वी के साथ शुरू हुई, किन्तुह यह अपनी अंतर्वस्तुौ में तेजी से रणनीतिक बन गया है। हमारे राजनीतिक संबंध सभी देशों और आसियान जैसे समूहों के साथ तीव्र हो गए हैं। हमने व्यापार और आर्थिक समझौतों का जाल विकसित किया है।

हम संपर्क पर बल दे रहें हैं और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और आसियान क्षेत्रीय मंच जैसे सहयोग और सुरक्षा के क्षेत्रीय स्थि‍रकों में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।

जापान के साथ हमारा रिश्ता हमारी पूर्व की ओर देखो नीति के केन्द्रर में है। जापान ने एशिया की समृद्धि में वृद्धि को प्रेरित किया है और यह एशिया के भविष्य का अभिन्न अंग बनी हुई है। विश्वश का इसके विकास की गति को बहाल करने में जापान की सफलता में एक बड़ी हिस्सेदारी है। उद्यम, प्रौद्योगिकी और नवाचार में आपका सतत नेतृत्व और एशियाई पुनर्जागरण के गतिशील बने रहने की आपकी क्षमता अत्यंपत महत्वपूर्ण है।

जापान के साथ भारत के संबंध न केवल हमारे आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, अपितु इसलिए भी महत्वूरपर्ण है कि हम प्रशांत और हिंद महासागर से घिरे एशिया के विशाल क्षेत्र में स्थिरता और शांति की अपनी खोज में जापान को एक स्वाभाविक और अत्या वश्य क साथी के रूप में देखते हैं।

हमारे संबंधों को हमारे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत समानताओं और लोकतंत्र, शांति और स्वतंत्रता के आदर्शों की साझा प्रतिबद्धता से शक्ति मिलती है। हमारी बढ़ती हुई विश्वस दृष्टिकोण अभिसारिता है और एक दूसरे की समृद्धि में प्रगतिशील हिस्सेलदारी है। समुद्री सुरक्षा में हमारे साझा हित हैं और हमें अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक ही तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हमारी अर्थव्यवस्थाओं के बीच मजबूत सहयोग हैं जिसे समृद्ध करने के लिए एक खुला, नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली की जरूरत है। साथ ही, हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए एक नई संरचना की तलाश है।

हाल के वर्षों में, हमारे राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग में प्रमुखता से इजाफा हुआ है। जापान ही एकमात्र साझेदार है जिसके साथ हमारे विदेश और रक्षा मंत्रालयों के बीच दो जमा दो वार्ता हुई है। हमने जापानी समुद्री सेल्फ डिफेंस फोर्स के साथ भी द्विपक्षीय अभ्यास शुरू कर दिया है। जापान लंबे समय से भारत के आर्थिक विकास के प्रयासों में महत्वपूर्ण भागीदारी का हिस्सा रहा है।

मारुति सुजुकी के सहयोग से भारत में औद्योगिक विकास की एक लहर उठी। दिल्ली मेट्रो भी सार्वजनिक परिवहन में एक ऐसी ही क्रांति को प्रेरित कर रही है। हमारी दो प्रमुख अवसंरचना परियोजनाएं - पश्चिमी समर्पित माल-भाड़ा कॉरिडोर और दिल्ली मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर - अपने आकार और पैमाने दोनों में बेजोड़ हैं। हम चेन्नई और बेंगलुरू के बीच एक औद्योगिक कॉरीडोर जैसी नई परियोजनाओं की भी छानबीन कर रहे हैं। हमारे व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को 2011 में शुरू किया था और पिछले वर्ष हमने दुर्लभ भूमि के क्षेत्र में सहयोग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।

इन सभी से पता चलता है कि हमारा पहले से ही एक समृद्ध रिश्ता है। तथापि, हमने स्व यं के लिए इस दृष्टिकोण के अनुरूप उच्च महत्वाकांक्षा निर्धारित किया है कि हम इस साझेदारी के लिए हैं। इसलिए, आगे बढ़ते हुए, हमें अपने राजनीतिक बातचीत को और तेज तथा क्षेत्रों तथा आपसी हित के मुद्दों पर हमारी रणनीतिक विमर्श का विस्तार करना चाहिए। हमारे रक्षा और सुरक्षा वार्ता, सैन्य अभ्यास और रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ने चाहिए। हमें परामर्श करना चाहिए और वैश्विक एवं क्षेत्रीय मंचों में और अधिक बारीकी से समन्वय स्थापित करना चाहिए।

हमारा संबंध विस्तृत व्यापार और निवेश संबंधों पर भी आश्रित होना चाहिए। जैसा कि मैंने इससे पूर्व आज कीडैनरेन समारोह में व्यापार जगत के नेताओं से कहा कि हमारी प्रतिबद्धता और आत्मआविश्वाैस के बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि हम जल्द ही अपने विकास स्तार को 8% से अधिक के स्तर पर बहाल करेंगे जो पिछले दशक में हमारा स्तपर था।

यह आत्मआविश्वाैस हमारे आर्थिक बुनियादी बातों, हमारे देश में उद्यम की संपन्न भावना और हमारे द्वारा हाल ही में नीतियों में सुधार और मेगा परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए उठाए गए कदमों की ताकत से उपजा है। जापानी कंपनियों द्वारा भारत के बड़े बाजार में अधिक से अधिक निवेश हमारे आर्थिक हित के साथ-साथ रणनीतिक हित में भी होगा। इस विचार को भी उच्च प्रौद्योगिकी वाणिज्यम, स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और कौशल विकास में करीबी वचनबद्धता का मार्गदर्शन करना चाहिए।

प्रधानमंत्री अबे और मेरे पास आपसी चर्चा के लिए पर्याप्तक एजेंडा है। हमने मिलकर वार्षिक शिखर सम्मेअलन और कई पहलों की व्य्वस्थाे शुरू की थी जिसने हमारे रिश्ते को इस तरह की असाधारण गहराई और विविधता दी है। हम न केवल अपने रिश्ते की बढ़ती गति को बनाए रखेंगे बल्कि हमारे दोनों देशों, हमारे क्षेत्र और हमारी दुनिया के हित में इसमें नया तत्वण और नई परिभाषा जोड़ेंगे।

मैं यह बात स्वीाकार करते हुए अपनी बात समाप्ता करूंगा कि जापान तभी से मेरे हृदय के करीब है जब मैंने पहली बार 1971 में इस खूबसूरत देश का दौरा किया था। हमारे संबंधों को विकसित और समृद्ध होते हुए देखना मेरा सपना रहा है, और यह वही उद्देश्यह है जिस दिशा में मैंने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के पिछले नौ वर्षों में काम किया है। आज, मैं भारत और जापान के संबंधों को एक स्थालयी साझेदारी में परिवर्तित होते हुए देखकर द्रवीभूत हूँ। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि आपके प्रयास और पहल इस रिश्ते के लिए महान शक्ति का स्रोत बने रहेंगे।



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