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चौथी भारत-यूएस सामरिक वार्ता क्‍यों महत्‍वपूर्ण होगी

जून 21, 2013

राजीव शर्मा द्वारा*

भारत और संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के बीच परामर्श के लिए कम से कम 26 संस्‍थानीकृत द्विपक्षीय तंत्र हैं। भारत - यूएस सामरिक वार्ता इनमें से एक है। इस सामरिक वार्ता के चौथे संस्‍करण का आयोजन नई दिल्‍ली में 24 जून 2013 को उस समय होगा जब संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के विदेश मंत्री जॉन केरी और उनके भारतीय समकक्ष श्री सलमान खुर्शीद इस बहुत महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने और अपनी सामरिक साझेदारी को और गति प्रदान करने के लिए अपने - अपने पक्षों का नेतृत्‍व करेंगे।

अपने सहयोग को गहन करने तथा अपने सामरिक सहयोग को संवारने में दोनों पक्षों के लिए महत्‍वपूर्ण टेक अवे हैं। यह दोनों पक्षों के लिए विजयदायी स्थिति होगी।

संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के लिए भारत का महत्‍व इस तथ्‍य में निहित है कि सामरिक दृष्टि से ऐसे चार राष्‍ट्रों के बहुत करीब में स्थित भारत एक महत्‍वपूर्ण स्विंग राज्‍य है जिनमें आज संयुक्‍त राज्‍य अमरीका की सबसे अधिक रूचि है - चीन, पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान और म्‍यांमार, यद्यिप यह आवश्‍यक नहीं है कि इन देशों का महत्‍व इसी क्रम में हो। इसके अलावा कोई भी देश, संयुक्‍त राज्‍य अमरीका की तो बात ही और है, आर्थिक दृष्टि से उत्‍थानशील भारत को आज नजरंदाज करने की हिमाकत नहीं कर सकता है, जिसके पास विश्‍व की तीसरी सबसे बड़ी थल सेना है, चौथी सबसे बड़ी वायु सेना और पांचवीं सबसे बड़ी नौसेना है।

भारत के लिए संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के महत्‍व के बारे में स्‍पष्‍टीकरण देने की शायद ही जरूरत हो। यदि वैश्विक सुरक्षा एवं राजनयिक वास्‍तुशिल्‍प में भारत को महत्‍वपूर्ण खिलाड़ी बनना है, तो संयुक्‍त राज्‍य अमरीका की सहायता के बिना यह उद्देश्‍य प्राप्‍त नहीं हो सकता है। 2010 में राष्‍ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान संयुक्‍त राज्‍य अमरीका ने 4 बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्‍यवस्‍थाओं (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्‍यवस्‍था, आस्‍ट्रलिया समूह और वासेनार व्‍यवस्‍था) में भारत के चरणबद्ध प्रवेश का समर्थन करने के अपने इरादे की घोषणा की थी। यह कार्य चल रहा है तथा उम्‍मीद है कि निकट भविष्‍य में भारत इनका सदस्‍य बन जाएगा। इसके बाद पूर्ण वीटो अधिकार के साथ संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की स्‍थाई सदस्‍यता का दावा करने के लिए भारत का प्रस्‍ताव अधिक वैध एवं ताकतवर होगा। विदेश मंत्री जॉन केरी ने हाल के अपने यूट्यूब वक्‍तव्‍य में दोहराया है कि संयुक्‍त राज्‍य अमरीका संशोधित एवं विस्‍तारित संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के स्‍थाई सदस्‍य के रूप में भारत के शामिल होने का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है।

जहां तक कार्यसूची में मुद्दों का संबंध है, दोनों पक्षों के पास मुद्दों की भरमार होगी। स्‍वाभाविक रूप से अफगानिस्‍तान चर्चा का एक प्रमुख बिंदु होगा क्‍योंकि अफगानिस्‍तान से अमरीका एवं नाटो के सैनिकों की चरणबद्ध वापसी फरवरी 2014 से होनी है। अफगानिस्‍तान के बारे में भारत निश्चित रूप से विदेश मंत्री जॉन केरी के मुख से वाशिंगटन की योजना के बारे में सुनने का इच्‍छुक होगा। स्थिर एवं शांतिपूर्ण अफगानिस्‍तान भारत के लिए सामरिक अपरिहार्यता है। हाल के इतिहास से पता चला है कि अस्थिर अफगानिस्‍तान से भारत की राष्‍ट्रीय सुरक्षा को कितना खतरा तब हो सकता है जब तालिबान ने 1996 से 2001 तक इस देश पर शासन किया था। संयुक्‍त राज्‍य अमरीका की वापसी से राजनीतिक दृष्टि से जो रिक्‍त स्‍थान अनिवार्य रूप से सृजित होगा उसकी भरपाई करने के लिए तालिबान के सत्‍ता में आने के ख्याल मात्र से भारत भयभीत होगा।

चौ‍थी भारत - यूएस सामरिक वार्ता में ऊर्जा एवं रक्षा विचार - विमर्श के केंद्र में होंगे। इसके अलावा दो और मुद्दे ऐसे हैं जिन पर दोनों पक्ष विचार - विमर्श करने के इच्‍छुक होंगे : भारतीय बाजारों में तरजीही पहुंच प्राप्‍त करना (अमरीका के दृष्टिकोण से) और भारत के कुशल कामकारों के लिए संयुक्‍त राज्‍य अमरीका द्वारा रोजगार के अधिक अवसर खोलने का मुद्दा (भारत के दृष्टिकोण से)।

दोनों देशों ने पिछले एक दशक में काफी कुछ दूरी तय की है तथा रक्षा, राजनय, आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद, कृषि, नैनो प्रौद्योगिकी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, दवा, ऊर्जा, शिक्षा एवं स्‍वास्‍थ्‍य जैसे महत्‍वपूर्ण एवं विविध क्षेत्रों में एक दूसरे के साथ निकटता से सहयोग किया है।

सामरिक वार्ता की प्रक्रिया से दोनों पक्ष एक दूसरे के करीब आए हैं क्‍योंकि विश्‍व के सबसे ताकतवर लोकतंत्र और विश्‍व के सबसे अधिक आबादी वाले लोकतंत्र ने इस तरह के महत्‍वपर्ण क्षेत्रों में परस्‍पर परामर्श एवं सहयोग की दिशा में कदम बढ़ाया है। द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय रूचि के अनेक मुद्दों पर दोनों ही देशों की विचारधारा समान है, हालांकि अनेक अन्‍य मुद्दों पर इनके विचारों में भिन्‍नता भी है। परंतु जो चीज मायने रखती है वह विश्‍व के समक्ष मौजूद सामरिक मुद्दों पर एक दूसरे से परामर्श करने संबंधी उनका दृढ़ निश्‍चय है।

इस सामरिक वार्ता प्रक्रिय से किसी नाटकीय सफलता की उम्‍मीद नहीं की जा सकती है तथा करनी भी नहीं चाहिए। यह कोई 100 मीटर की दौड़ नहीं है अपितु यह एक मैराथन है। इसके अलावा इस प्रक्रिया को इस रूप में भी नहीं समझना चाहिए कि यह द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए एक टेस्‍ट केस है। वास्‍तव में यह तथ्‍य कि दोनों पक्ष सामरिक वार्ता का एक संस्‍थानीकृत तंत्र स्‍थापित करने के स्‍तर पर पहुंच गए हैं, इसे उस महत्‍व के प्रमाण के रूप में देखा जाना चाहिए जो दोनों पक्ष एक दूसरे को देते हैं।

2010 में भारत एवं संयुक्‍त राज्‍य अमरीका के बीच सामरिक वार्ता प्रक्रिया का उद्घाटन होने के समय से दोनों पक्षों ने अपने द्विपक्षीय संबंध में उल्‍लेखनीय विकास एवं विस्‍तार दर्ज किया है। जून 2012 में वाशिंगटन में तीसरी सामरिक वार्ता के आयोजन के बाद इस बिंदु पर तथा यहां उल्लिखित बिंदुओं पर भारत और संयुक्‍त राज्‍य अमरीका द्वारा विधिवत बल दिया गया।

अपनी तीसरी सामरिक वार्ता के अंत में दोनों प्रतिभागियों अर्थात तत्‍कालीन विदेश मंत्री श्रीमती हिलेरी क्लिंटन और भारत के विदेश में श्री एस एम कृष्‍णा ने कहा था कि भारत - यूएस संबंध पहले से ही परिपक्‍वता के ऐसे चरण में पहुंच गए हैं जहां ऐसी किसी नाटकीय सफलता की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है जिसकी पहले जरूरत थी।

वाशिंगटन में तीसरी भारत - यूएस सामरिक वार्ता के अंत में हिलेरी क्लिंटन और एस एम कृष्‍णा के बीच इस बात पर सहमति हुई थी कि दोनों देशों के लोगों तथा दोनों देशों के नेताओं के बीच भागीदारी एवं बढ़ते संबंधों की चौड़ाई एवं विविधता से सामरिक वार्ता के केंद्र में लोगों के बीच घनिष्‍ट संबंध, निजी सहयोग तथा सार्वजनिक - निजी साझेदारी में वृद्धि हुई है।

भारत एवं संयुक्‍त राज्‍य अमरीका एशिया, हिंद महासागर क्षेत्र तथा प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता एवं समृद्धि के साझे विजन पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं तथा पूर्वी एशिया शिखर बैठक, आसियान क्षेत्रीय मंच तथा आसियान रक्षा मंत्री बैठक प्‍लस जैसे क्षेत्रीय मंचों में बहुत निकटता से काम कर रहे हैं।

महत्‍वपूर्ण रूप से, दोनों महाशक्तियों ने जापान के साथ एक त्रिपक्षीय वार्ता प्रक्रिया भी शुरू की है जिसका उद्देश्‍य संयुक्‍त रूप से क्षेत्रीय आर्थिक संयोजकता को सुदृढ़ करना तथा क्षेत्रीय व्‍यापार, पारगमन एवं ऊर्जा सहलग्‍नता को बढ़ावा देना है। संयुक्‍त राज्‍य अमरीका ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती भागीदारी का स्‍वागत किया है तथा चाहता है कि भारत इस संबंध में अधिक सक्रि‍य भूमिका का निर्वाह करे।

तीसरी भारत - यूएस सामरिक वार्ता में दोनों पक्षों द्वारा जिन बातों को रेखांकित किया गया उनमें से एक महत्‍वपूर्ण बिंदु समुद्री सुरक्षा, बाधा रहित वाणिज्‍य, नौवहन की आजादी तथा समुद्री विवादों के शांतिपूर्ण निस्‍तारण के महत्‍व के प्रति उनका समर्थन था।

यदि क्रिकेट की उपमा का प्रयोग करें तो भारत - यूएस सामरिक वार्ता टेस्‍ट मैच है न कि 20 - 20 गेम। निश्चित रूप से परिणाम प्राप्‍त होंगे। हमें धैर्य रखना होगा।

*लेखक नई दिल्‍ली स्थित पत्रकार - लेखक तथा सामरिक विश्‍लेषक है जिससे bhootnath004@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।

(ऊपर व्‍यक्‍त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)



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