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चतुर्थ यूएस – भारत सामरिक वार्ता विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग पर भारत – यूएस संयुक्‍त फैक्‍ट शीट

जून 24, 2013

भारत और यूएस के बीच विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहयोग के क्षेत्र में सुदृढ़ द्विपक्षीय संबंध कायम हैं। यह बहुत से साझा लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने में महत्‍वपूर्ण रहा है, जिसमें स्‍थायी आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन; नागरिकों को सुदीर्घ और स्‍वास्‍थ्‍यकर जीवन; ऊर्जा के स्‍वच्‍छ स्रोतों का विकास; और भावी पीढि़यों से अपने पर्यावरण की सुरक्षा शामिल है। वर्ष 2005 में हस्‍ताक्षरित भारत यूएस विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग करार के अंतर्गत एक संयुक्‍त समिति (जेएमसी) गठित की गई है जिसकी बैठकें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में योजना बनाने, समन्‍वय स्‍थापित करने, निगरानी करने और द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के उद्देश्‍य से आयोजित की जाती हैं। जेएमसी की बैठक हमारे विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रयासों के लिए सामरिक मार्गदर्शन प्रदान करने के उद्देश्‍य से दोनों देशों के नेताओं के साथ वर्ष में दो बार आयोजित की जाती है। भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री तथा यूएस के राष्‍ट्रपति के वैज्ञानिक सलाहकार की सह अध्‍यक्षता वाले आयोग क्रमश: जून 2010 और जून 2012 में बैठक आयोजित की गई। संयुक्‍त आयोग ने वर्ष 2012-2014 के लिए एक कार्य योजना तैयार की है जिसमें संयुक्‍त परियोजनाएं, संयुक्‍त कार्यशालाएं, वैज्ञानिकों के पारस्‍परिक दौरे और आधारभूत तथा अनुप्रयुक्‍त विज्ञान; वातावरण, पर्यावरण और पृथ्‍वी विज्ञान; स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा विज्ञान; डेटा शेयरिंग; विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित की शिक्षा; नवाचार और अंतरिक्ष में महिलाओं का योगदान जैसे विभिन्‍न क्षेत्रों में महत्‍वपूर्ण नेटवर्क की स्‍थापना शामिल हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अपार संभावनाओं को स्वीकार करने के उद्देश्‍य से भारत और यूएस सक्रिय सहभागिता बनाए हुए हैं, जिसका उद्देश्‍य ऐसे महत्‍वपूर्ण अनुसंधान और सार्वजनिक निजी भागीदारी करने के लिए सहयोग प्रदान करना है जो प्रौद्योगिकी आधारित नवाचार और उद्यमशीलता के लिए सहायक है।

महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास पर मिलकर कार्य करना

भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) और यूएस के ऊर्जा विभाग (डीओई) के बीच जुलाई, 2011 में हस्‍ताक्षरित एक करार के प्रावधानों के अंतर्गत डीएई और डीओई अगली पीढ़ी की सहयोगात्‍मक व्‍यवस्‍थाओं के विकास, उच्‍च तीव्रता वाले सुचालक रेडियो आवृत्ति प्रोटोन त्‍वरक के विकास और भौतिकी अनुसंधान से संबंधित सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

बढ़ रहे मधुमेह रोग से निपटना

लगभग 62 मिलियन भारतीय और 26 मिलियन अमरीकी लोग मधुमेह के शिकार हैं। भारतीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय और यूएस के स्‍वास्‍थ्‍य एवं मानव सेवा विभाग के बीच वर्ष 2012 में किए गए एक करार के तहत भारतीय चिकित्‍सा अनुसंधान परिषद और नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हेल्‍थ, नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ डायबिटीज एण्‍ड डायजेस्टिव एण्‍ड किडनी डिजीज (एनआईडीडीके) सहयोगात्‍मक अनुसंधान कर रहे हैं, जिसका उद्देश्‍य उन व्‍यवस्‍थाओं की बेहतर समझ विकसित करना है, जिनके अंतर्गत मधुमेह को प्रमुखता दी गई है और मधुमेह को रोकने तथा बीमारी के उपचार हेतु नवाचारी समाधानों की पहचान की जाती है। भारत – यूएस विज्ञान और प्रौद्योगिकी फोरम (आईयूएसएसटीएफ) के साथ संयुक्‍त भागीदारी में आईसीएमआर और एनआईडीडी के द्वारा इस विषय पर एक संयुक्‍त कार्यशाला आयोजित की गई।

रोटावायरस वैक्‍सीन

भारत यूएस के बीच एक अद्भुत सामाजिक नवाचारी भागीदारी जिसमें भारत का जैव प्रौद्योगिकी विभाग, यूएस के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्‍थ, यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एण्‍ड प्रिवेंशन, पीएटीएच, भारत बायोटेक, स्‍टेनफोर्ड युनिवर्सिटी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्‍थान और बहुत से अन्‍य सार्वजनिक और निजी भागीदार, सहयोगी संस्‍थान शामिल हैं, के माध्‍यम से हाल ही में चरण-।।। के चिकित्‍सीय परीक्षण के परिणाम जारी किए गए जिनमें एक नई रोटावायरस वैक्‍सीन : ROTAVAC® भी शामिल है। चरण-।।। के चिकित्‍सीय परीक्षण में भारत के 6000 से अधिक प्रतिभागी शामिल हैं, के सकारात्‍मक परिणामों ने यह दर्शाया कि ROTAVAC® का उत्‍कृष्‍ट सुरक्षा और दक्षता प्रोफाइल है, और इसे भारत में 100 वर्ष के भीतर विकसित की गई अपने तरह की पहली नई वैक्‍सीन के रूप में मान्‍यता दी जा सकती है।

कम लागत वाली चिकित्‍सा प्रौद्योगिकियां

यूएस के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हेल्‍थ ने वर्ष 2013 में भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग के साथ दो संयुक्‍त वक्‍तव्‍यों पर हस्‍ताक्षर किए। संयुक्‍त वक्‍तव्‍यों का उद्देश्‍य द्विपक्षीय वैज्ञानिक सहयोग के क्षेत्रों में नई पहल करना है, जिसके अंतर्गत कम लागत वाले नैदानिक और चिकित्‍सा उपचार संबंधी चिकित्‍सीय उपकरणों के विकास और ऐसे मौजूदा सहयोग को जारी रखने पर जोर दिया जाता है।

हमारी सौर प्रणाली को बेहतर ढंग से समझने के लिए संयुक्‍त अंतरिक्ष पहल

इंडियन इनिसिएटिव इन ग्रेविटेशनल ऑब्‍जर्वेशंस (इंडआजीओ) और यूएस लेजर इंटरफैरोमीटर ग्रेविटेशनल – वेब ऑब्‍जर्वेटरी लैबोरेटरी और भारत के अन्‍य संस्‍थानों के बीच एक भागीदारी के माध्‍यम से दोनों पक्ष भारत में एक विश्‍व स्‍तर के ग्रेविटेशनल वेब डिटेक्‍टर के निर्माण हेतु कार्य कर रहे हैं जो यूएस, यूरोप और जापान में ब्रह्मांड स्‍तर पर घटित होने वाली अद्भुत घटनाओं जैसे ब्‍लैक होल न्‍यूट्रोन स्‍टार्स और सुपरनोवास से उत्‍सर्जित होने वाली गुरुत्‍वाकर्षण तरंगों का अध्‍ययन करने के लिए निर्माणाधीन डिटेक्‍टर के नेटवर्क के विस्‍तार में सहायक होगा। यह अनुसंधान हमारी बिग बैंग की समझ बेहतर करने में सहायक हो सकता है। भारत ने अपनी 12वीं और आगामी पंचवर्षीय रूपरेखाओं में इस उद्देश्‍य को पूरा करने का प्रस्‍ताव किया है।

नवाचारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनंसंधान के क्षेत्र में सहयोग

भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग तथा यूएस ने वर्ष 2000 में भारत – यूस विज्ञान और प्रौद्योगिकी फोरम (आईयूएसएसटीएफ) को विज्ञान, इंजीनियरिंग और स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में आपसी तौर पर लाभप्रद द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के लिए बराबर बराबर निधि‍यां उपलब्‍ध कराईं। पिछली 10 वर्षों में आईयूएसएसटीएफ ने भारतीय और यूएस के वैज्ञानिकों के बीच 12,000 से अधिक बार विचार विमर्श करने के लिए आवश्‍यक सुविधाएं प्रदान की है/ वर्ष 2012-13 में आईयूएसएसटीएफ ने 30 द्विपक्षीय कार्यशालाओं, चार उन्‍नत स्‍कूलों, 10 वास्‍तविक संयुक्‍त अनुसंधान केन्‍द्रों तीन नवाचारी / प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरण कार्यक्रमों और एक दर्जन से अधिक विद्यार्थी और संकाय सदस्‍यों की अध्‍येतावृत्ति के लिए अपेक्षित सहयोग प्रदान किया। आईयूएसएसटीएफ ने भारतीय जैव प्रौद्योगिकी विभाग और विज्ञान एवं इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड की भागीदारी से क्रमश: 100 भारतीय और 35 यूएस विद्यार्थियों को भारत तथा यूएस के शैक्षणिक / अनुसंधान संस्‍थानों में ग्रीष्‍मकालीन इंटर्नशिप के लिए भी सहायता प्रदान की है। प्रौद्योगिकी प्रबंधन के लिए यूएस की सर्वश्रेष्‍ठ प्रक्रियाओं पर भारतीय वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण हेतु जैव प्रौद्योगिकी विभाग की सहभागिता से जुलाई 2012 के दौरान खुराना प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरण पाठ्यक्रम शुरू किया गया। अप्रैल 2013 में आईयूएसएसटीएफ ने अपने पांचवें भारत – यूएस फ्रंटियर्स ऑफ साइंस सिंपोजियम का आयोजन किया, जिसमें 60 युवा भारतीय और यूएस वैज्ञानिकों ने भाग लिया और 2014 में भारत यूएस फंटियर्स ऑफ इंजीनियरिंग के लिए योजनाएं बनाई जा रही हैं। दोनों कार्यक्रमों का आयोजन युवा अग्रणी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के बीच बेहतर संपर्क स्‍थापित करने के उद्देश्‍य से यूएस की राष्‍ट्रीय अकादमियों की सहभागिता से किया गया।

अनुसंधान और शिक्षा के बीच संपर्क स्‍थापित करना

भारत ने अपने विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (एसईआरबी) की स्‍थापना वर्ष 2008 में की थी। एसईआरबी के वैज्ञानिक यूएस नेशनल साइंस फाउंडेशन (एनएसएफ) का लगातार दौरा करते रहते हैं और भारत का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग एनएफएस की प्रवीणता समीक्षा प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी प्राप्‍त करने का इच्‍छुक है। जनवरी, 2013 में यूएस नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ बायो मेडिकल इमेजिंग एण्‍ड बायोइंजीनियरिंग ने आईयूएसएसटीएफ बोर्ड की बैठक के दौरान एसईआरबी के साथ एक करार पर हस्‍ताक्षर किए। यह करार हाइपरटेंशन पर संयुक्‍त रूप से वित्‍तीय सहायता प्राप्‍त एक नए सामूहिक अनुसंधान कार्यक्रम शुरू करने के लिए किया गया है। डीएसटी और एनएसएफएस विश्‍व स्‍तर पर अपने स्‍नातक अनुसंधान अवसरों के माध्‍यम से भागीदार तैयार करने की योजनाओं पर चर्चा कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत भारत में उच्‍च गुणवत्‍तायुक्‍त अनुसंधान वातावरण में सहयोगात्‍मक अनुसंधान के माध्‍यम से व्‍यावसायिक विकास बढ़ाने के लिए यूएस स्‍नातक अनुसंधान अध्‍येतावृत्ति के अवसर उपलब्‍ध कराने पर जोर दिया जाता है। एसईआरबी ने आईयूएसएसटीएफ द्वारा कार्यान्वित एस.एन. बोस स्‍कॉलर प्रोग्राम शुरू किया है जिसके अंतर्गत एक दूसरे के देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्‍थानों में इंटर्नशिप के लिए 50 भारतीय और 30 यूएस विद्यार्थियों को अध्‍येतावृत्ति प्रदान की जा रही है। एनएसएफ की सहभागिता से भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने भी गणित और सांख्यिकी के क्षेत्र में एक वास्‍तविक अनुसंधान और विकास नेटवर्क के संयुक्‍त केन्‍द्र का शुभारंभ किया है जिसमें संकाय सदस्‍य और विद्यार्थियों का आदान प्रदान, पोस्‍ट डाक्‍टोरल कार्यक्रम और संयुक्‍त कार्यशालाएं शामिल हैं, जिनमें भारतीय और यूएस के विश्‍वविद्यालयों को भी शामिल किया गया है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग तथा एनएसएफ ईएपीएसआई कार्यक्रम के अंतर्गत 2013 में यूएस के विद्यार्थियों के लिए भारतीय विश्‍वविद्यालयों में शुरू किए जाने वाले ग्रीष्‍मकालीन इंटर्नशिप कार्यक्रम पर भी कार्य कर रहे हैं।

स्‍वच्‍छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग

जलवायु परिवर्तन की समस्‍या के समाधान की आवश्‍यकता को स्‍वीकार करने, आपसी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और एक ऐसी स्‍वच्‍छ ऊर्जा सुरक्षा निर्मित करने जिसके फलस्‍वरूप निवेश, रोजगार सृजन और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, के उद्देश्‍य से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूएस के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने ऊर्जा सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता, स्‍वच्‍छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर सहयोग बढ़ाने के लिए भारत यूएस समझौता ज्ञापन के अंतर्गत‍ उन्‍नत स्‍वच्‍छ ऊर्जा के लिए भारत - यूएस भागीदारी (पीएसीई) का शुभारंभ किया। इस समझौता ज्ञापन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के यूएस दौरे के दौरान 24 नवंबर, 2009 को हस्‍ताक्षर किए गए। पीएसीई के तत्‍वावधान में एक प्राथमिक पहले के रूप में भारत सरकार और यूएस के ऊर्जा विभाग (डीओई) ने 4 नवंबर, 2010 को यूएस के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के दौरान संयुक्‍त स्‍वच्‍छ ऊर्जा अनुसंधान और विकास केन्‍द्र (जेसीईआरडीसी) की स्‍थापना के लिए एक करार पर हस्‍ताक्षर किए। जेसीईआरडीसी का संपूर्ण उद्देश्‍य सौर ऊर्जा, ऊर्जा सक्षमता पैदा करना और बहुसंस्‍थानिक सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्‍यम से दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन जैसे तीन प्रमुखता क्षेत्रों में सार्वजनिक निजी समूहों के जरिए संयुक्‍त नवाचारी अनुसंधान और विकास को आवश्‍यक सुविधाएं मुहैया कराना है। जेसीईआरडीसी को भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा यूएस के ऊर्जा विभाग द्वारा वित्‍तीय सहायता प्रदान की जाती है। भारत में इस कार्यक्रम का प्रशासन भारत यूएस विज्ञान और प्रौद्योगिकी फोरम (आईयूएसएसटीएफ) द्वारा किया जा रहा है। वर्ष 2013 के दौरान निम्‍नलिखित तीन समूहों का गठन किया जिनमें 80 से अधिक शैक्षणिक और औद्योगिक भागीदार शामिल हैं : (1) सोलर एनर्जी रिसर्च इंस्‍टीट्यूट फॉर इंडिया एण्‍ड यूएस (एसईआरआईआईयूएस); (2) इंडिया यूएस ज्‍वाइंट सेंटर फॉर बिल्डिंग एनर्जी रिसर्च एण्‍ड डवलपमेंट (सीबीईआरडी); और (3) इंडिया यूएस कंसोर्टियम फॉर डवलपमेंट ऑफ सस्‍टेनेबल एडवांस्‍ड लिंगोसेलूलोसिक बायोफ्यूल सिस्‍टम्‍स (एसएएलबीएस)।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं को बढ़ावा देना

वर्ष 2010 में यूएस – भारत में द्विपक्षीय सहभागिता के लिए प्राथमिकता क्षेत्र के रूप में ''विज्ञान में महिलाएं’’ की पहचान की। नई दिल्‍ली में यूएस के दूतावास ने आईयूएसएसटीएफ और डीएसटी की सहभागिता से एक वार्षिक कार्यशाला का संयुक्‍त रूप से आयोजन किया जिससे कि वर्ष 2009 से इस पहल को आगे बढ़ाया जा सके। इन कार्यशालाओं में द्विपक्षीय सहभागिता के लिए एक क्षेत्र के रूप में दोनों देशों में महिला वैज्ञानिक व्‍यवसायियों के नेतृत्‍व और नेटवर्किंग की पहचान की गई है। आईयूएसएसटीएफ में इस मुद्दे को एक फ्लैगशिप कार्यक्रम के रूप में आगे बढ़ाया है। दिसंबर 2012 में दोनों पक्षों ने विज्ञान में महिलाएं पहल को आगे बढ़ाने के लिए एक स्‍थायी संचा‍लन समिति का गठन किया और विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग पर भारत – यूएस संयुक्‍त समिति की बैठक के महत्‍वपूर्ण निर्णयों के अंतर्गत विज्ञान व्‍यवसायियों के रूप में महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए सर्वश्रेष्‍ठ प्रक्रियाओं पर चर्चा करने के उद्देश्‍य से एक कार्यशाला आयोजित की। मई, 2013 में यूएस के विदेश विभाग के नेतृत्‍व में यूएस के प्रौद्योगिकी कार्यपालकों का एक प्रतिनिधिमण्‍डल भारत में भारतीय सूचना और संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में महिलाओं के लिए चुनौतियों और अवसरों के बारे में जानकारी प्राप्‍त करने के लिए भारत आया। इस क्षेत्र में दीर्घकालीन स्‍थायी कार्यक्रम तैयार करने के लिए संबंधित एजेंसियों के साथ चर्चा हेतु भारत का एक प्रतिनिधिमण्‍डल यूएस का दौरा करेगा।

विश्‍व की सर्वाधिक शक्तिशाली दूरबीन का विकास करना

वर्ष 2010 से भारत ने कैलीफोर्निया इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी के नेतृत्‍व वाले कंसोर्टियम को 30 मीटर लंबाई वाली दूरबीन के निर्माण में एक सदस्‍य के रूप में अपने योगदान के लिए प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है जो हवाई के मौना की में विश्‍व की सर्वाधिक शक्तिशाली दूरबीन विकसित कर रहा है। इस कंर्सोटियम के भारतीय भागीदारों में इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ एस्‍ट्रोफिजिक्‍स, इंटर-युनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्‍ट्रोनॉमी एण्‍ड एस्‍ट्रोफिजिक्‍स और आर्यभट्ट रिसर्च इंस्‍टीट्यूट ऑफ ऑब्‍जर्वेशनल साइंस शामिल हैं। हवाई देश अप्रैल 2013 में इस परियोजना के लिए बिल्डिंग परमिट स्‍वीकृत किया।

नवाचार और उद्यमशीलता के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षमता के इस्‍तेमाल के लिए संयुक्‍त परियोजनाओं का निधियन

2-3 मिलियन डालर प्रति वर्ष के वार्षिक बजट के साथ 2009 में स्‍थापित विज्ञान और प्रौद्योगिकी इंडोमेंट बोर्ड (एसटीईबी) सकारात्‍मक सामाजिक प्रभाव के लिए संभावित संयुक्‍त रूप से विकसित नवाचारी प्रौद्योगिकियों के वाणिज्‍यीकरण को बढ़ावा देता है। परियोजना के अंतर्गत नागरिकों के स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार और उनके सशक्‍तीकरण पर ध्‍यान केन्द्रित किया जाता है। आज की तारीख में एसटीईबी ने चार अनुदान स्‍वीकृत किए हैं, जिनमें से दो स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में (मोबाइल फोन आधारित मधुमेह नैदानिक सुविधा और फेकल इनकंटीनेंस को प्रबंधित करने का एक उपकरण) और दो अनुदान नागरिकों के सशक्‍तीकरण (खेत से बाजार तक कृषि उत्‍पादों के परिवहन हेतु उन्‍नत रेफ्रिजरेशन और ऐसे स्‍थानों में वित्‍तीय सेवाएं उपलब्‍ध कराना जहां बैंकों की सुविधाएं उपलब्‍ध नहीं है) के लिए प्रदान किए गए। इस वर्ष सात प्रस्‍ताव तैयार किए गए और उनकी अंतिम समीक्षा की जा रही है। 24 जून, 2013 को नई दिल्‍ली में आयोजित चतुर्थ यूएस भारत सामरिक वार्ता के दौरान पांच नए पुरस्‍कारों की घोषणा की जा रही है।

डेटा नेटवर्क तैयार करने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी

9 जून, 2012 को पहले प्रत्‍यक्ष भारत – यूएस उन्‍नत विज्ञान और शिक्षा नेटवर्क के जरिए यूएस और बंगलौर स्थित भारतीय विज्ञान केन्‍द्र के बीच बहुत से डेटा का प्रवाह शुरू किया गया। ग्‍लोबल रिंग नेटवर्क फॉर एडवांस एप्‍लीकेशंस डवलपमेंट (जीएलओआरआईएडी) के एक भाग के रूप में यह परियोजना एनएसएफ और टाटा कम्‍युनिकेशंस के बीच सार्वजनिक निजी भागीदारी के माध्‍यम से संयुक्‍त रूप से वित्‍तीय सहायता प्राप्‍त परियोजना है और इसकी स्‍थापना बंगलौर स्थित टाटा इंस्‍टीट्यूट फॉर फंडामेंटल रिसर्च के इंटरनेशनल सेंटर फॉर थ्‍योरिटिकल साइंस में की गई है। भारत को जीएलओआरआईएडी से जोड़ने के उद्देश्‍य से बंगलौर के वैज्ञानिक एक अंतर्राष्‍ट्रीय चुनौती का समाधान करने में लगे हुए हैं जिससे कि जेनोमिक्‍स डेटा का प्रयोग करते हुए मरीज की देखरेख करने में सुधार किया जा सके। वे हार्वर्ड मेडिकल स्‍कूल में अपने भागीदारों के साथ सिंगल डाउनलोड में तीन टेराबाइट का अभूतपूर्व डेटा प्राप्‍त करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

वैश्विक स्‍तर पर विकास की चुनौतियों का समाधान करने के लिए नवाचार में वृद्धि करना

मई 2012 में भारत सरकार ने अपने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के माध्‍यम से सहस्‍त्राब्दि गठबंधन (मिलेनियम अलायंस), जो यूएसएआईडी और फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्‍बर्स ऑफ कामर्स एण्‍ड इंडस्‍ट्री (फिक्‍की) के बीच एक संयुक्‍त पहल के रूप में है, में 5 मिलियन यूएस डालर की धनराशि का योगदान दिया है। इस राशि का प्रयोग नवोदभव, गेम चेंजिंग और भारत तथा विश्‍व में विकासात्‍मक चुनौतियों के लागत प्रभावी समाधानों की पहचान, सहायता और तेजी लाने के लिए कार्य कर रहा है। आज की तारीख तक यूएसएआईडी ने इस गठबंधन में 7.7 मिलियन का योगदान किया है, जो एफआईसीसीआई के समतुल्‍य है। सितंबर, 2012 में मिलेनियम अलायंस ने संकल्‍पना नोट के लिए एक मांग जारी की जिसके परिणामस्‍वरूप 14,00 लोगों ने अपने विचार प्रस्‍तुत किए। सहस्‍त्राब्दि गठबंधन भागीदारों ने 24 जून, 2013 को सामरिक वार्ता के दौरान अपने पहले नौ पुरस्‍कार पाने वालों की घोषणा की।

पेयजल से अर्सेनिक का हटाया जाना

नई दिल्‍ली में यूएस दूतावास बहु-पणधारक सहभागिता का नेतृत्‍व कर रहा है जो ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्‍ध कराने के लिए विभिन्‍न मॉडल विकसित कर रहा है, जो राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जल संबंधी रणनीतिक प्राथमिकताओं में से एक है। प्रौद्योगिकी प्रदाता, भारत सरकार के मंत्रालय, गैर सरकारी संगठन और वित्‍तपोषण करने वाले पक्षकार 2014 के प्रारंभ में एक प्रायोगिक कार्यक्रम के रूप में लगभग 1,25000 लोगों को प्रभावित करने वाले 25 गावों के एक समूह में नवीनतम आर्सेनिक उन्‍मूलन प्रौद्योगिकियों के नियोजन की दिशा में कार्य करेंगे, इस पहल के अंतर्गत यूएस की कंपनियों द्वारा प्रौद्योगिकी और तकनीकी जानकारी उपलब्‍ध कराई जाएगी।

सरकारों को अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी और सुलभ बनाना

भारत और यूएस ने जुलाई, 2011 में एक मुक्‍त स्रोत सॉफ्टवेयर प्‍लेटफार्म लांच किया। इसका उद्देश्‍य दोनों देशों की संगत मुक्‍त सरकारी साइटों जिनमें सरकारी डेटा एकत्र किया गया है, की सूचना सामग्री को एकत्रित करना है। मुक्‍त सरकारी प्‍लेटफार्म (ओजीपीएल) डेटा पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता में वृद्धि करता है। इसके लिए वह ज्‍यादा से ज्‍यादा सरकारी डेटा, दस्‍तावेज, टूल और प्रक्रियाओं को एक मुक्‍त रूप से उपलब्‍ध मुक्‍त स्रोत प्‍लेटफार्म के माध्‍यम से सार्वजनिक तौर पर उपलब्‍ध कराता है। उपयोगी मशीन द्वारा पढ़े जाने योग्‍य फार्मेट में इस डेटा की उपलब्‍धता के माध्‍यम से नवाचारक, विकासकर्ता, मीडिया विशेषज्ञ और शैक्षणिक समुदाय नए अनुप्रयोग और अंतर्दृष्टि विकसित कर सकते हैं जो नागरिकों को अपेक्षाकृत बेहतर निर्णय लेने के लिए ज्‍यादा सूचना उपलब्‍ध कराएंगे और सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि ये नवाचार को बढ़ावा देंगे तथा आर्थिक अवसर उपलब्‍ध कराएंगे। भारत और यूएस ने इस संदर्भ में प्रायोगिक परियोजनाओं पर घाना और रवांडा के साथ कार्य किया है।

भारत और दक्षिण एशिया परियोजना में प्‍लांट हेल्‍थ सिस्‍टम का उन्‍नयन

भारत यूएस कृषि वार्ता के अंतर्गत किए जा रहे प्रयासों के भाग के रूप में यूएसएआईडी / भारत के कृषि तथा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत एफएएस / ऑफिस ऑफ कैपसिटी बिल्डिंग एण्‍ड डवलपमेंट के साथ तकनीकी सहायता प्रदान करने और भारत के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ प्‍लांट हेल्‍थ मैनेजमेंट (एनआईपीएचएम) के संस्‍थागत क्षमता निर्माण के लिए प्रशिक्षण उपलब्‍ध कराने हेतु एक प्रतिभागी एजेंसी सेवा करार किया गया। इस प्रशिक्षण से एनआईपीएचएम को अंतर्राष्‍ट्रीय प्‍लांट प्रोटेक्शन कन्‍वेंशन के क्षेत्र में एक मान्‍यता प्राप्‍त प्रणेता के रूप में सक्षम होना चाहिए जो दक्षिण एशिया में इंटरनेशनल प्‍लांट हेल्‍थ समुदाय को प्रशिक्षण प्रदान करेगा और संघरोध सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए भारत के कृषि मंत्रालय की क्षमता में वृद्धि करेगा। इसके परिणामस्‍वरूप अनुसंधान परियोजनाओं के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिला है और यह दक्षिण एशियाई देशों में प्‍लांट हेल्‍थ प्रबंधन तथा जैव सुरक्षा नेटवर्क को सुदृढ़ बनाता है।

नागरिक अंतरिक्ष सहयोग का विस्‍तार

भारत – यूएस नागरिक अंतरिक्ष संयुक्‍त कार्यकारी समूह ने अपनी चौथी बैठक वाशिंगटन डीसी में 21 मार्च, 2013 को आयोजित की। संयुक्‍त कार्यकारी समूह ने व्‍यापक मुद्दों पर विचार विमर्श किया और बहुत से क्षेत्रों में कार्य के विस्‍तार की आवश्‍यकता व्‍यक्‍त की जिनमें स्‍थायी विकास को बढ़ावा देना और यूएस ग्‍लोबल पोजिशनिंग सिस्‍टम और इंडियन रिजनल नैवीगेशन सेटलाइट सिस्‍टम के बीच सक्षमता और अंतर-प्रचालनीयता को बढ़ावा देने के लिए जमीनी प्रेक्षण डेटा के प्रयोग में सुधार करने संबंधी उपाय शामिल हैं। मार्च 2012 में हस्‍ताक्षरित करारों के अंतर्गत नासा, यूएस नेशनल ओसियानिक एण्‍ड एटमॉस्‍फेरिक एडमिनिस्‍ट्रेशन (एनओएए) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने ओसियनसेट-2 मिशन और ग्‍लोबल प्रेसिपिटेशन मेजरमेंट और इसरो-फ्रेंच स्‍पेस एजेंसी मेघा ट्रॉपिक मिशन के क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं। नासा और इसरो ने भारत के मार्स ऑर्बिट मिशन से संबंधित कार्यकलापों के लिए भी एक करार पर हस्‍ताक्षर किए। इसके अलावा नासा और इसरो एक संयुक्‍त डुअल फ्रिक्‍वेंसी (एल और एस बैंड) सिंथेटिक अपर्चर रडार इमेजिंग सेटलाइट मिशन के संभावित विकास पर भी चर्चा कर रहे हैं। दोनों एजेंसियां भविष्‍य में अंतरिक्ष अन्‍वेषण कार्य के लिए आवश्‍यक सहयोग क्षेत्रों की पहचान करेंगे, जिनमें चंद्रमा और अन्‍य लक्षित स्‍थानों के भावी मिशन शामिल हैं।

पृथ्‍वी, समुद्र और वातावरण विज्ञान

भारत के पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) और यूएस नेशनल ओसियानिक एण्‍ड एटमॉस्‍फेरिक एडमिनिस्‍ट्रेशन (एनओएए) के बीच जमीनी प्रेक्षण और पृथ्‍वी विज्ञान पर 2008 में किए गए समझौता ज्ञापन के अंतर्गत सहयोग में आरएएमए मूरिंग के जरिए अफ्रीकी, एशियाई, आस्‍ट्रेलियाई मानसून अध्‍ययन के लिए रिसर्च मूर्ड एर्रे का विकास और हिंद महासागर तथा जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए उपयोगी डेटा सृजित करना, जलवायु संबंधी विविधता पर अनुसंधान करना, ऊष्‍णकटिबंधीय चक्रवात, मानसू के साथ साथ महत्‍वपूर्ण पेलेजिक फिश स्‍टॉक और खतरनाक एलगल ब्‍लूम्‍स पर अनुसंधान शामिल है। जीवंत समुद्री संसाधन अनुसंधान के क्षेत्र में वर्तमान और भावी अनुसंधान भागीदारी को सुकर बनाने के लिए अभिरुचि का एक वक्‍तव्‍य तैयार किया जा रहा है। एमओईएस और यूएस भूगर्भीय सर्वेक्षण पृथ्‍वी विज्ञान अनुसंधान पर एक समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है जिसमें क्रोपलैंड मॉनिटरिंग और जल अध्‍ययनों पर सहयोग शामिल होगा।

वर्ष 2010 की भारत – यूएस कृषि वार्ता के अंतर्गत यूएस नेशनल सेंटर्स फॉर एनवायर्नमेंटल प्रिडक्‍शन (एनसीईपी) में एक ''मॉनसून डेस्‍क'' की स्‍थापना की गई है। इसकी स्‍थापना उन्‍नत ढंग से मॉनसून का पूर्वानुमान लगाने के लिए मिलकर कार्य करने के उद्देश्‍य से की गई है। अंतर्राष्‍ट्रीय समुद्री ड्रिलिंग कार्यक्रम (आईओडीपी), जिसका संचालन एनएसएफ द्वारा किया जा रहा है, के अंतर्गत एमओईएस ''जेओआईडीईएस संकल्‍प’’ सुविधा का सदुपयोग करते हुए अरब सागर / हिंद महासागर में गहरे समुद्री सतह पर महत्‍वपूर्ण निदर्शी ड्रिलिंग संचालित करेगा। इस अनुसंधान से यह अपेक्षा है कि यह वैश्विक स्‍तर पर जलवायु परिवर्तन और भारतीय मॉनसून में विविधता पर रोशनी डालेगा। यूनिवर्सिटी कॉरपोरेशन फॉर एटमॉ‍स्‍फेरिक रिसर्च (यूसीएआर) और एमआईएस के बीच मौसम और जलवायु संबंधी अध्‍ययनों के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर हेतु विचार विमर्श जारी है। इसमें एयरबॉर्न अनुसंधान एयरक्राफ्ट का विकास शामिल है।

नई दिल्‍ली
24 जून, 2013



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