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प्रोटोकॉल और कूटनीति: शैली को सत्‍व से मिलाना

अप्रैल 04, 2014

मनीष चंद द्वारा

जब एक फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने दूसरी बार भारत का दौरा किया तो उन्‍होंने एक विशेष सिख सज्जन के बारे में पूछा जिसे उनकी आगरा, प्रतिष्ठित ताजमहल का घर, की यात्रा के दौरान उनकी देखभाल के लिए प्रोटोकॉल अधिकारी के रूप में नियुक्‍त किया गया था। उन्‍होंने बहुत स्नेह के साथ उसे याद किया और उन्‍हें शिष्‍टता और मनोबल से आसपास के क्षेत्र को दिखाने के लिए उसकी तारीफ की। वास्तविक कहानी दर्शाता है कि कैसे प्रोटोकॉल अलक्षित रूप से किसी देश की कूटनीति, संस्कृति और शिष्टाचार का चेहरा बन जाता है जो संयुक्त वक्‍तव्‍यों पर हस्ताक्षर होने और समझौते किए जाने के बाद भी लंबे समय तक विदेशी अतिथियों के मन में रहता है।

प्रोटोकॉल: कूटनीति की पहली पंक्ति

वास्तव में, मेजबान देश के मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी पहले व्‍यक्ति होते हैं जो आने वाले नेता का स्‍वागत करते हैं और वही अंतिम व्‍यक्ति भी होता है जिसे वे अपने देश वापस जाने से पहले देखते हैं। प्रोटोकॉल अधिकारी, जैसा कि भारत के विदेश मंत्रालय में दिनकर खुल्लर, सचिव (पश्चिम) ठीक ही कहते हैं, इतिहास के नक्शेकदम पर चलते हैं और राजनयिक संबंध की पहली पंक्ति का निर्माण करते हैं।

जर्मनी संघीय गणराज्य के राष्ट्रपति, श्री जॉकिम गॉक नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत समारोह में सम्मान गारद का निरीक्षण करते हुए
व्‍युत्पत्ति के रूप में, प्रोटोकॉल को ग्रीक शब्द "प्रोटोकोलान" से लिया गया है जिसका अर्थ "पहला गोंद" है और इसका संकेत किसी दस्‍तावेज को मुहरबंद करते समय इसके परिरक्षण के लिए इसके सामने के भाग में कागज की एक परत चिपकाने के कार्य से है, जो इसे और अधिक प्रामाणिकता प्रदान करे। प्रोटोकॉल शब्‍द मूल रूप से राष्‍ट्रों के बीच आधिकारिक पत्राचार में अपनाए गए बातचीत के विभिन्न रूपों से संबंधित है किन्‍तु बाद में यह अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों के बहुत व्यापक क्षेत्र में शामिल हो गया। जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय में शिष्‍टाचार के मशहूर प्रोफेसर डॉ. पी. एम. फॉर्नी के अनुसार प्रोटोकॉल का उल्‍लेख सुव्‍यवस्थित और परंपरागत नियमों के रूप में किया जाता है जिसने राष्ट्रों और लोगों के लिए साथ जीने और काम करने को आसान बना दिया है। उनका कहना है कि "प्रोटोकॉल का हिस्सा हमेशा सभी उपस्थित लोगों के श्रेणीबद्ध अस्तित्‍व की अभिस्‍वीकृति है। प्रोटोकॉल के नियम शिष्‍टाचार के सिद्धांतों पर आधारित हैं"।

मंच तैयार करना

प्रोटोकॉल, अच्छी शराब की तरह माहौल को तैयार करता है और चालू अहम कूटनीतिक प्रयोजन के साथ आगे बढ़ने के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक नेतृत्व के लिए सही माहौल पैदा करता है। भारत के मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी, रूचिरा कम्बोज का कहना है कि प्रोटोकॉल एक देश के शिष्टाचार को दर्शाते हैं। इसलिए, प्रोटोकॉल प्रभावी और सफल कूटनीति की कुंजी है। दुर्भाग्य से, प्रोटोकॉल कभी कभी सिर्फ वैभव और भव्यता, धूमधाम और समारोह, तथा चमक-धमक और तड़क-भड़क से भ्रमित हो जाता है। लेकिन जैसा कि कोई भी अनुभवी राजनयिक आपको बताएगा कि वह एक भ्रामक रूप से मोहक तस्वीर है। अच्छा प्रोटोकॉल, और इसे छोटे–छोटे विवरणों पर ध्‍यान देकर तैयार करने में यह सुनिश्चित करने के लिए अथक कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है कि सब कुछ बिना किसी अड़चन के या यों कहिए कि यंत्रवत परिशुद्धता के साथ चले।

प्रोटोकॉल प्रमुख सुश्री रूचिरा कम्बोज, नई दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर जंजीबार के राष्ट्रपति, डॉ. अली मोहम्मद शीन का स्‍वागत करते हुए।

भारत जैसी बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए, जो 100 से अधिक राष्‍ट्र/सरकार के प्रमुखों, उप–प्रमुखों, उप-राष्‍ट्रपतियों, मंत्रियों और उच्‍च प्रोफाइल राजनयिक और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी करता है, देश के बढ़ते हुए राजनयिक कद का अर्थ है इसकी छोटी किन्‍तु समर्पित प्रोटोकॉल अधिकारियों की टीम के लिए अधिक से अधिक काम, जिन्‍होंने यह सब जोश के साथ किया है। केंद्र में विदेश मंत्रालय में प्रोटोकॉल विभाग में मुश्किल से लगभग 50 अधिकारी और कर्मचारी हैं जो राजनयिक मशीनरी को अच्‍छी तरह से स्‍वर साधिक गीत की तरह गुंजायमान रखने के लिए निरंतर कड़ी मेहनत करते हैं।

राज्य प्रोटोकॉल अधिकारियों की बैठक

भारत स्पष्ट रूप से सबसे व्यस्त अंतर्राष्‍ट्रीय राजनयिक केन्द्रों में से एक है क्‍योंकि यह 170 विदेशी दूतावासों, 200 मानद वाणिज्य दूतावासों, 100 महावाणिज्य दूतावासों और 38 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की मेजबानी करता है। विदेशी नेताओं का अधिकांश दौरा दिल्ली में वार्ता और बैठकों पर केंद्रित होता है। तथापि, पिछले एक दशक से अधिक या लगभग उतने ही समय के दौरान, क्रियाशीलता भारत के अन्य राज्यों में भी स्थानांतरित हो गई है। कई बार, दौरा करने वाले नेता भारत की अपनी सरकारी यात्रा की शुरूआत मुंबई या बंगलूर या हैदराबाद से करते हैं। वास्तव में, दौरा करने वाले किसी नेता के लिए दिल्‍ली में वार्ता में भाग लेना, प्रतिष्ठित ताज महल को देखने के लिए आगरा की यात्रा करना और मुंबई या बंगलूर या हैदराबाद, जैसा भी मामला हो, को प्रस्‍थान करना लगभग प्रथागत हो गया है। म्यांमार के राष्ट्रपति या मॉरीशस के राष्ट्रपति जैसे कुछ नेता रहे हैं जिन्‍होंने वार्ता के लिए दिल्ली आने से पहले बिहार में कुछ दिन बिताए हैं।

नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में राज्य प्रोटोकॉल अधिकारी

अन्य राज्यों में राज्यों की राजधानियों और शहरों में भी महत्वपूर्ण अंतर्राष्‍ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी की जाती है। उदाहरण के लिए, हरियाणा में एक हलचल भरा शहर, गुड़गांव ने पिछले वर्ष नवंबर में एशिया यूरोप बैठक (एएसईएम) की मेजबानी की जो लगभग 50 एशियाई और यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को भारतीय तटों पर लेकर आया। 2012 में, गुड़गांव ने क्षेत्रीय सहयोग की हिंद महासागर रिम संघ (आईओआर-एआरसी) से 20 से अधिक देशों के विदेश मंत्रियों की मेजबानी की। बंगलूर, भारत का सूचना प्रौद्योगिकी शहर और कर्नाटक की राजधानी, ने 2012 में विदेश मंत्रियों की रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय बैठक की मेजबानी की।

देश के तेजी से बढ़ते कूटनीतिक कार्य में राज्यों के बढ़ते हुए महत्व की इस पृष्ठभूमि में, भारत के विदेश मंत्रालय ने 10-12 मार्च तक नई दिल्ली में राज्य प्रोटोकॉल अधिकारियों की दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया। सम्मेलन के पीछे विचार दिल्ली में विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल विभाग और राज्य प्रोटोकॉल अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना था। सम्मेलन में एक पुस्तिका के रूप में राज्य प्रोटोकॉल अधिकारियों के लिए सख्त दिशानिर्देश बनाए गए जो किसी विदेशी अतिथि के साथ उनके ओहदे के अनुसार किए जाने वाले आचरण के प्रकार के लिए उनके राज्‍य का दौरा कर रहे किसी विदेशी देश के अत्‍यधिक अपेक्षा रखने वाले राजदूत को संभालने जैसे मुश्किल हालात से निपटने में उन्हें सक्षम करेगा।

दिशानिर्देश, अन्य बातों के अलावा राज्य प्रोटोकॉल अधिकारियों के लिए राष्‍ट्र के प्रमुखों, उप राष्ट्रपतियों और सरकार के प्रमुखों के स्तर पर विदेशी गणमान्य व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली अति विशिष्‍ट व्‍यक्तियों और विशिष्‍ट व्‍यक्तियों की यात्राओं को संभालने के लिए बुनियादी नियमों को निर्धारित करता है। फोकस भारत के राज्‍यों/ संघ राज्य क्षेत्रों में विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की यात्राओं के प्रोटोकॉल पहलुओं से निपटने के लिए एक समान नीति सुनिश्चित करना है। यात्राओं को निम्‍नवत वर्गीकृत किया गया है: 1) राजकीय यात्रा 2) आधिकारिक यात्रा 3) कार्यकारी यात्रा। एक राजकीय यात्रा राष्‍ट्र या सरकार के प्रमुख के स्तर पर एक यात्रा है जहां गणमान्य अतिथि को सभी औपचारिक सम्मान दिया जाता है। आधिकारिक यात्रा में कोई औपचारिक पहलू शामिल नहीं है और उसमें एक राजकीय यात्रा में सम्मिलित अन्य कार्य शामिल हो सकते हैं। एक कार्यकारी यात्रा में आधिकारिक यात्रा के तत्व शामिल हो सकते हैं, और वे आमतौर पर केवल दिल्ली तक ही सीमित होते हैं। राज्य प्रोटोकॉल अधिकारियों को भारत में उनके अपने राज्यों में विदेशी वाणिज्‍य दूतावासों और विदेश व्यापार कार्यालयों के खुलने/ कार्य करने के लिए भी दिशानिर्देशों का पालन करने के अनुदेश दिए गए।

राजनयिक उन्मुक्ति

प्रोटोकॉल केवल विदेशी नेताओं के त्रुटिरहित दौरे सुनिश्चित करना ही नहीं है; यह राजनयिक उन्मुक्ति और सम्मेलनों के मुद्दों से भी संबंधित है। उदाहरण के लिए, राजनयिक संबंधों पर 1961 का वियना कन्वेंशन संप्रभु देशों के बीच राजनयिक संबंधों के लिए एक रूपरेखा को परिभाषित करता है। अंतर्राष्‍ट्रीय संधि में राजनयिक उन्मुक्ति की परिकल्पना की गई है और यह एक राजनयिक मिशन के विशेषाधिकार को निर्धारित करता है जो मेजबान देश द्वारा दबाव या उत्पीड़न के भय के बिना राजनयिकों को अपना कार्य निष्‍पादित करने में सक्षम बनाता है। 189 राज्यों द्वारा संधि की पुष्टि की गई है। यह वही संधि था जिसके बल पर भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी प्राधिकारियों द्वारा इसके राजनयिक देवयानी खोबरागाड़े की गिरफ्तारी और दुर्व्यवहार का विरोध किया था।

फूलों के साथ इसे कहना

प्रोटोकॉल के महत्व को, इसलिए, अतिरंजित नहीं किया जा सकता है और यह समय के साथ तेजी से बढ़ा है। जबकि भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए अपनी गतिविधियों को बढ़ाया है और इसके राजनयिक पदचिह्नों का विश्‍व भर में विस्तार हुआ है, एशिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्था इसके स्वागत करते हुए आलिंगन में अधिक से अधिक विश्व के नेताओं के स्वागत के लिए तैयार दिखता है। भारत की छोटी किन्‍तु कट्टर रूप से समर्पित प्रोटोकॉल अधिकारियों की टीम हमेशा चुनौती से ऊपर उठे है, और यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार लग रहे हैं कि संबंध हमेशा की तरह जोशपूर्ण रहे, अतिथियों को राजकीय भोज में तरजीह के अनुसार बिठाएं, मेजपोश के रंग और फूलों का चुनाव बिल्‍कुल सही हो ताकि वह ऐतिहासिक समझौता सुनिश्चित हो सके और देशों और उनके नेताओं के बीच चिरस्थायी मैत्री कायम हो।

(मनीष चंद अंतर्राष्‍ट्रीय मामलों पर केंद्रित एक ऑनलाइन पत्रिका और समाचार-पत्र, इंडिया राइट्स, www.indiawrites.org, के मुख्‍य संपादक हैं)।



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