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इराक में भारतीय – एक दिवास्‍वप्‍न

जुलाई 02, 2014

तल्मिज अहमद

इराक के साथ भारत के आधुनिक रिश्‍तों की शुरूआत युद्ध के साथ हुई जब प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों के मेसापो‍टैमिया में कदम रखा तथा ओटोमन बलों के विरूद्ध कुछ भीषण लड़ाई के बाद वे बगदाद में ब्रिटिश शासन स्‍थापित करने में सफल हुए थे। दक्षिण इराक के हर कस्‍बे में भारतीय सैनिकों के अवशेष हैं, मुसलमानों के कब्रिस्‍तान के रूप में और हिंदूओं के लिए संस्‍मारक प्‍लाक के रूप में। यद्यपि इराक के नवस्‍थापित राज्‍य में ब्रिटिश प्राधिकार स्‍थापित हुआ, लेकिन रोजमर्रा के मामलों का प्रबंधन भारत से होता था, जहां भारतीय राष्‍ट्रीय विकास के भिन्‍न – भिन्‍न क्षेत्रों में बड़ा योगदान कर रहे थे।

भारत के साथ ये घनिष्‍ट संबंध 1958 में रिपब्लिक क्रांति जिसने राजतंत्र को समाप्‍त किया और इसके 10 साल बाद बाथिस्‍ट क्रांति से और मजबूत हुए। जैसा कि इराक ने 1970 के दशक के पूर्वार्ध से बड़े पैमाने पर राष्‍ट्रीय विकास शुरू किया, तेल के धनी अन्‍य देशों से भिन्‍न इराक सरकार ने भारी संख्‍या में भारतीय कंपनियों को ठेका दिया और इस प्रकार 1970 के दशक के अंत तक भारतीय कंपनियों को 50 से अधिक परियोजनाएं मिल चुकी थी जिसमें अनेक क्षेत्र शामिल थे जैसा कि जल आपूर्ति एवं मल व्‍ययन की स्‍कीमें; सड़क, पुल एवं फ्लाईओवर; तकनीकी एवं व्‍यवसाय प्रबंधन शिक्षा; रेलवे एवं प्रतिष्ठित निर्माण परियोजनाएं जैसा कि मंत्री परिषद भवन। अनोखी बात यह है कि भारत ने इस क्षेत्र में रक्षा प्रशिक्षण भी प्रदान किया तथा सेना की वरिष्‍ठ टीम बगदाद में देश के राष्‍ट्रीय रक्षा कालेज में स्थित है और भारतीय वायु सेना की टीमें इराक के सभी प्रमुख अड्डों पर लड़ाकू प्रशिक्षण प्रदान कर रही है।

images/iraq_1.jpgभारतीय कंपनियों को बड़ी परियोजनाएं सौंपने की यह परंपरा ईरान – इराक युद्ध के बावजूद 1980 के दशक में भी जारी रही, इराक में भारतीय समुदाय, जो कमोबेश पूरी तरह से इंजीनियरों मजदूरों तथा तकनीशियनों से बना है जो भारतीय एवं अन्‍य परियोजनाओं के लिए काम कर रहे हैं, की संख्‍या जब चरम थी तब यह 50,000 के आसपास थी। कमोबेश हर सरकारी विभाग में, विशेष रूप में पेट्रोलियम, रेलवे, वित्‍त, आयोजना एवं सिविल निर्माण की संस्‍थाओं में विशेषज्ञ के रूप में भी भारतीयों ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई।

कुबैत पर इराक के कब्‍जे, इसके बाद खाड़ी युद्ध तथा प्रतिबंध – निरीक्षण व्‍यवसाय के प्रवर्तन से 1990 के बाद द्विपक्षीय संबंध प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए। तथापि जब अनाज के बदले में तेल कार्यक्रम शुरू हुआ तो पुन: भारतीय फर्मों ने इस अवसर का बढ़- चढ़कर लाभ उठाया तथा खाद्य सामग्री, शैक्षिक सामग्री, कंप्‍यूटर, दवा एवं चिकित्‍सा उपकरण से संबंधित इराक की तात्‍कालिक आवश्‍यकताओं को पूरा किया। जिनका मूल्‍य कुल मिलाकर 2012 में एक बिलियन डालर से अधिक आंका गया। भारत ने 1998-99 के शिष्‍टमंडलों के आदान – प्रदान तथा संयुक्‍त आयोग की बहाली के माध्‍यम से इराक के साथ अपने राजनीतिक संबंधों को फिर से जिंदा भी किया।

2003 में युद्ध की वजह से इराक की राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई क्‍योंकि देश की राजनीतिक एवं आर्थिक अवसंरचना ध्‍वस्‍त हो गई तथा देश ने उन संस्‍थाओं को गवां दिया जो इसे एकजुट रखे हुए थी। इसकी वजह से पेशेवर बलों के विरूद्ध देशव्‍यापी विद्रोह शुरू हो गया। दुर्भाग्‍य से, ‘फूट डालो और राज करो’ की नीतियों की वजह से देश में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक मनमुटाव भी भड़क उठा जिसमें अलकायदा के जेहादी तत्‍व पवित्र तीर्थ स्‍थलों एवं कमजोर वर्गों को निशाना बना रहे थे। असंख्‍य सेनापति भी उभरे जिन्‍होंने अपहरण के बदले में फिरौती लेकर अपने संसाधनों को सुदृढ़ किया।

इस पृष्‍ठभूमि में, जुलाई, 2004 में, नाटकीय ढंग से इराक ने उस समय भारतीयों की चेतना को जगाया, जब केन्‍या के तीन और मिस्र के एक ड्राइवर के साथ तीन भारतीय ड्राइवरों को फलुजाह में अगवा कर लिया गया तथा फिरौती के लिए लगभग 6 सप्‍ताह तक रखा गया। ये ड्राइवर कुवैत की एक कंपनी के लिए काम कर रहे थे जिसने उनको ट्रकों में इराक भेजा था जिसमें यूएस बलों के लिए सैन्‍य उपकरण एवं रसद लदे थे। ड्राइवरों के पास कोई पासपोर्ट या वीजा नहीं था, उनको कोई सुरक्षा नहीं प्रदान की गई थी और उनको उनकी मंजिल तक पहुंचाने के लिए कोई गाइड नहीं था, जो फलुजाह था वह उस समय यूएस सेना की घेराबंदी में था।

उनकी रिहाई पर बात करने के लिए जिस राजनयिक दल को बगदाद भेजा गया उसे यह जानकर आश्‍चर्य हुआ कि देश में करीब 20,000 भारतीय काम कर रहे हैं, जिसमें से कई अमरीकी सेना के विभिन्‍न शिविरों में थे, तथा इसके पीछे जो आकर्षण था वह स्‍पष्‍ट रूप से यह था कि युद्ध क्षेत्र में ड्यूटी के बढाने में ऊंचे वेतन का भुगतान किया जा रहा था। ड्राइवरों के अपहरण के संदर्भ में, सरकार ने रोजगार के लिए भारतीय के इराक के मूवमेंट पर प्रतिबंध लगा दिया जा मई, 2010 तक जारी रहा।

2004 के बंधक संकट के दौरान, भारत के 24 x 7 टेलीविजन न्‍यूज चैनलों ने योजनाबद्ध तरीके से एक जोरदार अभियान चलाया जिसने ड्राइवरों के परिवार के सदस्‍यों की दुर्दशा तथा अपने नागरिकों की रक्षा करने में सरकार की विफलता को उजागर किया। चूंकि उस समय भी इराक युद्ध क्षेत्र था तथा भारतीय पत्रकारों की उपस्थिति को प्रोत्‍साहित नहीं करता था, भारतीय मीडिया को पता नहीं चला कि बगदाद में राजनयिक अपहर्ताओं का प्रतिनिधित्‍व करने वाले एक वार्ताकार के साथ एक माह से अधिक समय तक लगातार बातचीत करते रहे, जिससे वे हर रोज कई घंटे तक बात करते थे। चर्चा में अनेक बातें शामिल थी जिसमें पहली बात यह थी कि यूएस के कब्‍जे की आलोचना करते हुए एक राजनीतिक वक्‍तव्‍य जारी हो, जिसके बाद फिरौती तथा फिरौती देने के तरीकों एवं ड्राइवरों की रिहाई पर लंबी चर्चा हुई। अपहर्ताओं को उनकी अनेक मिलियन की मांग से अधिक साधारण राशि पर रजामंद किया गया जिसका प्रस्‍ताव कुवैती कंपनी ने किया था – यह तथा भारतीय टीम के वार्ता करने के कौशलों एवं उस समय कुवैत में राजदूत की समझाने – बुझाने की योग्‍यता का सम्‍मान है।

किसी विदेशी राष्‍ट्र में भारत के लिए अपने तरह के इस पहले अनुभव ने अनेक पहलुओं का खुलासा किया जो ऐसी परिस्थितियों की खासियत होती है। पहला, इसने पुष्टि की कि दिल्‍ली में सभी सरकारों के लिए भारतीय समुदाय का कल्‍याण सर्वोपरि होना चाहिए, संबंधित देश में चाहे जैसी भी स्थिति हो या जिस भी परिस्थितियों में भारतीय वहां काम करने के लिए जाते हैं। इसके अलावा, कोई ऐसी परिस्थिति जिसमें विदेश में रहने वाले भारतीय बंधक की स्थिति में हो या अन्‍य विकट स्थिति में, न्‍यूज चैनलों के लिए यह तब तक प्राइम स्‍टोरी होगी जब तक कि समस्‍या का अंतत: समाधान नहीं हो जाता है। भारतीय मीडिया समान्‍य तौर पर परिस्थिति के पीछे छिपी जटिलताओं एवं कठिनाइयों की समझ या थोड़ा संयम का प्रदर्शन करेगी पंरतु भारतीयों को बचाने के लिए सरकार द्वारा सीधी, तुरंत और तगड़ी कार्रवाई पर जोर देगी। विपक्षी राजनीतिज्ञों द्वारा इस चुनौती के प्रति सरकार के अपर्याप्‍त प्रत्‍युत्‍तर के लिए सरकार की कटु आलोचना से स्थिति के और जटिल होने की संभावना है।

images/iraq_2.jpgदस साल बाद, अब जब भारतीय नागरिक जिहादी गुट इस्‍लामिक इराक और सीरिया राज्‍य (आई एस आई एस), जिसने इराक के बड़े शहरों पर कब्‍जा कर लिया है, की नाटकीय सफलताओं की वजह से इराक के विभिन्‍न शहरों में फंस गए हैं, ये पहलू फिर से जाहिर हो रहे हैं। मीडिया अथक रूप से इसके पीछे लगा हुआ है तथा सरकार की ओर से तेजी से कार्रवाई की मांग कर रहा है। वास्‍तव में देखा जाए जो सरकार का प्रत्‍युत्‍तर तीव्र एवं कारगर रहा है: एक वरिष्‍ठ अधिकारी को बगदाद में तैनात किया गया है तथा 24 घंटे काम करने वाले सहायता केंद्र ऐसे शहरों में स्‍थापित किए गए हैं जहां भारतीय भारी संख्‍या में रोजगार प्राप्‍त हैं। इसके अलावा, एक ताकतवर बयान में, भारतीय नौसेना ने खाड़ी के समुद्र में दो वेजल्‍स को तैनात किया है, जबकि सिविलियन एयरक्राफ्ट जरूरत पड़ने पर जल्‍दी से निकालने के लिए स्‍टैंडबाई मोड में है।

स्‍पष्‍ट रूप से, जो लोग आई एस आई एस के कब्‍जे वाले शहरों में फंसे हैं उनसे सीधा संपर्क स्‍थापित करना भारतीय राजनयिकों के लिए बहुत ही कठिन है। यदि आई एस आई एस कैडर तथा इराकी बलों जिसे संघर्ष के लिए तैयार किया जा रहा है के बीच सीधी सैन्‍य भिडंत होती है, तो वास्‍तव में स्थिति और बिगड़ सकती है।

स्थिति अपनी विडंबनाओं से रहित नहीं है। 2004 के बंधक संकट के दौरान परिवार के सदस्‍य टेलीविजन पर अक्‍सर अपनी छाती पीटकर रोते हुए तथा यह शपथ लेते हुए दिखाई देते थे वे भविष्‍य में कभी भी अपने लोगों को कार्य के लिए विदेश नहीं जाने देंगे। परंतु उनके बचाव के कुछ माह के अंदर, ड्राइवर वापस कुवैत में थे। जब टीवी पर साक्षात्‍कार लिया गया तो परिवार के उन्‍हीं सदस्‍यों ने अब कहा, वस्‍तुत: आक्रामकता के साथ, कि आदमी को अपने परिवार के सदस्‍यों के लिए रोजी - रोटी कमानी होती है। इस समय भी वैसी ही बातें दिख रही हैं। इराक में असुरक्षित क्षेत्रों के कुछ मजदूर घर लौटने के लिए चिंतित हैं, जबकि ऐसे लोगों की संख्‍या अधिक है जो वहां रूकने के इच्‍छुक हैं। जिस देश में बगावत का माहौल हो वहां रोजगार की तलाश करने की लोगों की चिंता इस तथ्‍य से पुष्‍ट होती है कि जिस समय इराक में काम करने पर सरकारी प्रतिबंध लागू था उस समय भी भारत से हजारों लोग संयुक्‍त अरब अमीरात या कुवैत आए तथा और वहां से इराक के लिए प्रस्‍थान कर गए, जबकि उन्‍हें सरकारी प्रतिबंध की जानकारी थी।

यह स्थिति इस वजह से उभरती है कि यद्यपि काम के लिए खाड़ी देशों में भारतीयों का पलायन शुरू होने के बाद 40 साल बीत चुके हैं, फिर भी हम संभावित मजदूरों से भारी धनराशि से श्रम ठेकेदारों को रोकने में समर्थ नहीं हो पाए हैं। इस प्रकार ठेकेदारों से लिए गए ऋण को लौटाने और साथ ही परिवार के सदस्‍यों के लिए पैसा भेजने की वजह से कठिन एवं खतरनाक स्थितियों में भी रूके रहने के लिए मजदूर मजबूर होते हैं। तथापि जो परिस्थितियां सिविल संघर्ष से गुजर रहे देशों में रोजगार की तलाश करने के लिए भारत के नागरिकों को विवश करती हैं उनकी भारत सरकार के लिए थोड़ी प्रासंगिकता है : जब स्थिति खराब हो, तो सरकार के पास उनको सुरक्षित वापस लाने के लिए अपने सभी संसाधनों का प्रयोग करने के अलावा सरकार के पास कोई विकल्‍प नहीं होता है, भले ही हम जानते हों कि स्थिति थोड़ा सामान्‍य होते ही वे पुन: भाग कर उसी देश में चले जाएंगे।

images/iraq_45.jpg(लेख पूर्व राजनयिक हैं जो 1977 से 1979 में इराक में तैनात थे तथा 2004 में बगदाद में भारतीय वार्ता टीम का नेतृत्‍व किया था। यह लेख विदेश मंत्रालय की वेबसाइट www.mea.gov.in के ‘केंद्र बिंदु में’ खंड के लिए अनन्‍य रूप से लिखा गया है।)www.mea.gov.in]



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