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भारतीय भेषज उद्योग – सबके लिए स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख तक सस्‍ती पहुंच

अगस्त 16, 2014

मुरली नीलकंठ, वैश्विक सामान्‍य वकील, सिप्‍ला लिमिटेड

पूरी दुनिया में सूचना प्रौद्योगिकी (आई टी) क्षेत्र में बहुत कम समाचार है जहां किसी न किसी रूप में भारत का उल्‍लेख न होता हो और परिणामत: आज भारत अपनी आई टी महाशक्ति के लिए विश्‍व विख्‍यात है। तीस साल पहले, इसकी कल्‍पना करना हम में से अधिकांश के लिए कठिन था।

भारतीय फार्मा सेक्‍टर की कहानी भी आई टी सेक्‍टर जैसी हो सकती है यदि इसकी उपलब्धियों तथा विशाल प्रभाव पर पर्याप्‍त ध्‍यान दिया गया होता, जो इसमें पूरे विश्‍व में स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख पर डाला है। भारत में अन्‍य विनिर्माण या भारी उद्योगों से भिन्‍न फार्मा सेक्‍टर नवाचारी है, व्‍यापक तौर पर यह स्‍वीकार किया जाता है कि यह एच आई वी / एड्स जैसे रोगों के उपचार में वैश्‍विक स्‍तर पर प्रभाव डाल रहा है और विश्‍व की स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख संबंधी आवश्‍यकताओं को पूरा करने में भी समर्थ है।

यह तथ्‍य कि भारतीय कारखानों को 3685 दवाओं का उत्‍पादन करने के लिए लाइसेंस दिया गया है जबकि यूके के अंदर 3815 दवाओं का उत्‍पादन होता है, सुझाव देता है कि भारतीय कारखाने वैश्विक स्‍तर पर गुणवत्‍ता के मानकों को पूरा कर रहे हैं और जटिल दवाओं का उत्‍पादन करने में समर्थ हैं। यद्यपि, विनियामकों द्वारा भारतीय विनिर्माण सुविधाओं का दौरा किए जाने तथा प्रक्रियाओं में दोष निकालने में की खबरों को बड़े पैमाने पर छापा जाता है, इस बारे में बहुत कम बताया जाता है कि इसका रूटीन क्‍या है। एमएचआरए में निरीक्षण, प्रवर्तन एवं मानक निदेशक गेराल्‍ड हेडेल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत में विनियामकों द्वारा अभिचिन्हित समस्‍याओं की संख्‍या उनके द्वारा उत्‍पादित दवाओं की मात्रा के अनुपात में हैं। उन्‍होंने कहा कि जब हम 110 निरीक्षणों पर फिर से नजर डालते हैं जिन्‍हें हमने भारत में पिछले दो वर्षों में किया है, तो 9 या 10 कंपनियों को लेकर हमारे महत्‍वपूर्ण सरोकार हैं। यह सांख्यिकी की दृष्टि से दुनिया के अन्‍य भागों की तुलना में अधिक अनुपात को नहीं दर्शाता है। भारत सहन करने में सक्षम है क्‍योंकि एक बड़ा आपूर्तिकर्ता है। भारतीय फार्मा उद्योग लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक जेनरिक दवाओं का उत्‍पादन करता है, जबकि भारतीय फार्मा निर्यात में यूएस का हिस्‍सा लगभग 28 प्रतिशत है जिसके बाद यूरोपीय संघ (18 प्रतिशत) और अफ्रीका (17 प्रतिशत से अधिक) का स्‍थान है। यह वैश्विक नेतृत्‍व का एक स्‍पष्‍ट आभार होना चाहिए कि भारतीय फार्मा उद्योग ने वह हासिल किया है जो वैश्विक स्‍तर पर गुणवत्‍ता के मानकों का अनुसरण किए बगैर संभव नहीं होता।

 भारतीय फार्मा उद्योग की एक अन्‍य लोकप्रिय शिकायत यह रही है कि अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार में निवेश कम है। 1985 से 2005 के दौरान, भारतीय फार्मा कंपनियों द्वारा 500 से अधिक नई दवाओं की खोज किए जाने के बावजूद ऐसी धारणा दिखाई देती है कि भारत विदेशी उत्‍पादों की नकल करने का प्रयास करता है। इवेल्‍युएट नामक एक अग्रणी स्‍वतंत्र विशेषज्ञ फार्मा परामर्शी फर्म द्वारा हाल के एक अध्‍ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि अन्‍वेषकों और जेनरिक्‍स द्वारा निवेश में मामूली अंतर होता है और यह केवल मिथक है कि अन्‍वेषक अनुसंधान में भारी निवेश करते हैं जबकि जेनरिक ऐसा नहीं करते हैं।

पश्चिमी जगत के अच्‍छी तरह से प्रसारित दावे के बावजूद अनुसंधान एवं विकास में निवेश में उल्‍लेखनीय गिरावट की रूझान प्रतीत होती है और उम्‍मीद है कि यह रूझान जारी रहेगी। जब हम यह महसूस करते हैं कि तकरीबन 50 प्रतिशत यूरोपीय फार्मा पेटेंट या तो निष्क्रिय पड़े हैं या फिर प्रतियोगियों को ब्‍लाक करने के लिए फाइल किए गए हैं, हमें आश्‍चर्य होता है कि नवाचार को किस तरह परिभाषित किया जा रहा है और प्रोत्‍साहित किया जा रहा है यदि प्रभाव और नवाचार पर पाबंदी लगाना तथा प्रतियोगिता को अवरूद्ध करना तथा सुधार के लिए बाधाएं खड़ी करना है तो क्‍या यह नवाचार है?

भारतीय फार्मा उद्योग ने स्‍पष्‍ट रूप से प्रदर्शित किया है कि स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल तक सार्वभौमिक पहुंच के लिए समाधान का अंग बनने की इसमें क्षमता है। भारत की ताकत ''मी टू’’ ड्रग अधिक से अधिक विकसित करने की बजाए दवाओं तक वैश्विक पहुंच में सुधार के लिए नवाचार करना है जिसे परंपरागत रूप से पश्चिमी जगत द्वारा नवाचार के रूप में परिभाषित किया गया है। अब उत्‍तरोत्‍तर यह स्‍वीकार किया जा रहा है कि विद्यमान आई पी आर व्‍यवस्‍था जिसका पश्चिमी जगत द्वारा अनुसरण किया जा रहा है, नवाचार को बढ़ावा नहीं दे रही है।

 इस प्रकार, वर्तमान पेटेंट सिस्‍टम स्‍वयं ही पेटेंट स्‍वीकृति संस्‍थाओं के बुरे प्रभावों से पीछे हट रहा है जो किसी महत्‍वपूर्ण वस्‍तु का उत्‍पादन नहीं करते हैं परंतु केवल लाइसेंस संबंधी राजस्‍व प्राप्‍त करने के लिए उल्‍लंघन की कार्रवाइयों के साथ व्‍यवसायियों को धमकाने के उद्देश्‍य से पेटेंट धारण करते हैं। पेटेंट के अन्‍य दोष भी हैं जो एकाधिकारवादी शक्ति से संबंधित हैं, क्‍योंकि इससे उपभोक्‍ताओं को नुकसान होता है जिन्‍हें ऊंची कीमतों का भुगतान करना पड़ता है और यह सुधार एवं परवर्ती नवाचार में भी रूकावट बन सकता है। स्‍थायी विकास, मूल अनुसंधान के लिए बहुत कम प्रोत्‍साहन तथा अनुसंधान की द्विरावृत्ति पेटेंट सिस्‍टम की सबसे गंभीर समस्‍याओं में से कुछ हैं। टीआरआईपी – अनुपालक पेटेंट व्‍यवस्‍था के अलावा जो हट पूर्वक नवाचार को बढ़ावा देता है एवं नकल को हतोत्‍साहित करता है, ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतियोगिता के लिए यह वैश्विक मानक के रूप में अगली पीढ़ी की बाधाएं खड़ी करेगा। जिस तरह टी आर आई पी में डब्‍ल्‍यू टी ओ द्वारा आई पी आर का निदान किया गया, अभी हाल की बाधाएं सामंजस्‍यपूर्ण विनियमन के रूप में प्रतीत हो सकती हैं। पेटेंट लिंकेज (उदाहरण के लिए कनाडा और यूएस में) केवल पेटेंट के उल्‍लंघन के आरोप पर बाजार पहुंच प्रदान करने से इंकार करता है। यूएस उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा यह संकेत दिए जाने के बावजूद कि पेटेंट लिंकेज पर फिर से विचार करने की जरूरत है तथा दवाओं तक पहुंच से पेटेंट के उल्‍लंघन के आरोप पर नकारा नहीं जाना चाहिए तथा पेटेंट लिंकेज का एक सिस्‍टम शुरू करने के लिए इटली द्वारा हाल के प्रयास यूरोपीय आयोग की ओर से एक नोटिस के रूप में परिणत हुए जिसमें इटली के कानून से इन प्रावधानों को हटाने की मांग की गई, पेटेंट लिंकेज स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख में प्रतियोगिता के लिए वास्‍तविक बाधा है जिससे महंगी दवाओं का मार्ग प्रशस्‍त होगा।

डाटा को देखने से पता चलता है कि किस तरह पेटेंट धारकों का एकाधिकार है तथा समाज को किसी लाभ के बगैर वे प्रतियोगिता एवं नवाचार को दूर रखते हैं। फार्मा सेक्‍टर के अलावा अन्‍य क्षेत्रों में इस तरह की संकल्‍पना मौजूद नहीं है तथा विशेष ट्रीटमेंट पाने के लिए फार्मा सेक्‍टर के लिए कोई वास्‍तविक औचित्‍य दिखाई नहीं देता है। वास्‍तव में, डाटा से अनेक आचारशास्‍त्रीय एवं नैतिक मुद्दे खड़े होते हैं।

 देशों को हमेशा अपनी स्‍थानीय अनोखी परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऐसी नीति एवं विनिमय को अनुकूलित करने की अनुमति दी गई है। कुछ देश अन्‍य देशों की तुलना में प्रौद्योगिकी की दृष्टि से अधिक प्रवीण हैं और इस भेद की वजह से प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अलग मानदंडों की जरूरत हो सकती है। जहां संकल्‍पना के रूप में सामंजस्‍य को स्‍वीकार किया गया है, उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ, इसे ऐसे ढंग से लागू किया गया है कि यह व्‍यक्तिगत देशों की स्‍थानीय परिस्थितियों के लिए सहानुभूति के रूप में है। भारत की ताकत एवं विशेषज्ञता दवाएं विकसित करने में हैं जो दुनियाभर के रोगियों के लिए सुगम्‍य हैं। आई पी आर व्‍यवस्‍था पर भारत के दृष्टिकोण में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि भिन्‍न – भिन्‍न देशों को एक समान विनियामक व्‍यवस्‍था अपनाने के लिए बाध्‍य नहीं किया जा सकता है। सिद्धांतों पर आधारित इस दृष्टिकोण को हाल ही में व्‍यापार सुविधा करार पर वार्ता के बाली चक्र के दौरान प्रदर्शित किया गया।

प्रशांत पारीय एवं अटलांटिक पारीय साझेदारी, जिस पर वार्ता चल रही है, की पृष्‍ठभूमि में भारत को प्रतियोगिता पर बाधा के लिए प्राक्‍सी के रूप में सामंजस्‍य का प्रयोग करने का विरोध करने की अगुवाई करके वैश्विक बाजार स्‍थल में अपना नेतृत्‍व प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान किया है। यद्यपि यूएस एवं उसके सहयोगी आधिकारिक तौर पर आई पी आर व्‍यवस्‍था पर भारत के दृष्टिकोण विरोध कर सकते हैं, उन्‍होंने महसूस किया है कि उनके संपोषणीय विकास की कुंजी सरकार की यह सुनिश्चित करने की सामर्थ्‍य है कि स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख हर किसी के पहुंच के अंदर हो, न कि केवल धनवानों की पहुंच के अंदर हो। स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख की लागत में काफी वृद्धि हुई है जिसकी वजह से भारी संख्‍या में रोगी बगैर उपचार के रह जाते हैं, नकली दवाओं के आयात का जोखिम उत्‍पन्‍न हो रहा है या अनेक मामलों में वे दिवालिया घोषित हो रहे हैं।

यूएन, ग्‍लोबल फंड, पी ई पी एफ ए आर तथा अन्‍य सहायता संस्‍थाओं द्वारा कुछ प्रयासों के बावजूद विकासशील विश्‍व में स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख तक पहुंच का मुद्दा वह प्रभाव नहीं डाल पाया है जो इसे डालना चाहिए। हालांकि अभिव्‍यक्‍त नहीं किया गया है फिर भी ऐसा माना जा रहा है कि भारतीय फार्मा कंपनियों में भारतीय आई टी कंपनियों की तरह वाई2के संकट को दूर करने की क्षमता है जो विश्‍व के स्‍वास्‍थ्‍य देखरेख संकट के समाधान का एक प्रमुख घटक है। अब आई पी आर व्‍यवस्‍था में नेतृत्‍व करने के लिए भारत के पास एक अच्‍छा अवसर है क्‍योंकि दक्षिण अफ्रीका एवं ब्राजील जैसे अधिकाधिक देश भारत के उदाहरण का अनुसरण कर रहे हैं।



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