लोक राजनय लोक राजनय

भारत और वियतनाम : पुराने मित्र, नए परिदृश्य

अगस्त 24, 2014

लेखक : मनीष चंद

पूरब की ओर देखो। पश्चिम की ओर देखो। भारत और वियतनाम के बीच बहुआयामी संबंध दिनोंदिन गहरे होते जा रहे हैं तथा नई दिशाओं में फैलते जा रहे हैं। कई तरीकों से यह भारत की पूरब की ओर देखो नीति तथा वियतनाम की पश्चिम की ओर देखो नीति के बीच एक अचूक मैच है। क्यों कि दोनों देशों का उद्देश्यर आने वाले दिनों में घनिष्ट सामरिक, आर्थिक एवं ऊर्जा संबंधों का निर्माण करना है। आपस में जुड़े हितों का यह संगम 25 - 26 अगस्त , 2014 को भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्व राज की वियतनाम यात्रा में परिलक्षित होगा। अगस्तर के शुरूआत में म्यांीमार में आसियान, आसियान क्षेत्रीय मंच एवं पूर्वी एशिया शिखर बैठक के सिलसिले में अनेक द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय बैठकों के बाद यह दक्षिण पूर्व एशिया के किसी देश की उनकी शुरूआती अकेली द्विपक्षीय यात्राओं में से एक होगी।

images/Untitled_2.jpg(चित्र में : 29 अक्टूीबर, 1954 को हनोई में राष्ट्ररपति हो ची मिन्ह् के साथ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, फोटो : दि हिंदू फोटो लाइब्रेरी के सौजन्यो से)भारत और वियतनाम के बीच संबंध असाधारण रूप से मैत्रीपूर्ण और आभासिक रूप से किसी असहमति या टकराव से मुक्तं हैं। संबंध प्राचीन चाम सभ्यकता के समय से चले आ रहे हैं जब उड़ीसा के लोग वियतनाम गए थे तथा वहां उन्हें रहने योग्यच घर मिला था, संस्कृेतियों, रीति-रिवाजों, भाषा एवं आस्थााओं का आपस में विलय हुआ था। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तथा वियतनाम के आइकानिक नेता हो ची मिन्हं द्वारा रखी गई मजबूत नींव पर आधारित संबंध में पिछले वर्षों में घातांकी वृद्धि हुई है। फ्रांसीसी ताकतों के विरूद्ध प्रसिद्ध डेन बेन फु संग्राम में वियतनाम की विजय का जश्नि मनाने के लिए पंडित नेहरू 1954 में वियतनाम गए थे। इसके बाद 1958 में हो ची मिन्हप भारत के दौरे पर आए थे। राष्ट्रधपति राजेंद्र प्रसाद 1959 में वियतनाम के दौरे पर गए थे। उपनिवेश विरोधी साझी धारणा एवं एकता की भावना जिसने स्व तंत्रता के बाद के वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को आकार दिया, अब विकास सहयोग, राष्ट्रत निर्माण में अनुभव की साझेदारी, व्याउपार एवं निवेश में विस्ताषर तथा रक्षा संबंधों में वृद्धि पर बल के साथ बहुउद्देश्यींय सामरिक साझेदारी का रूप ले लिया है। उच्चरस्तंरीय दौरों में निरंतर वृद्धि हो रही है तथा वियतनाम के शीर्ष स्तिर के लगभग सभी नेताओं ने भारत का दौरा किया है तथा पिछले वर्षों में भारतीय नेता एवं मंत्री दक्षिण पूर्व एशिया के इस देश के दौरे पर गए हैं।

ऊर्जा और सिनर्जी

आर्थिक दृष्टि से हम एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यंवस्था तथा दक्षिण पूर्व एशिया की उभरती अर्थव्यदवस्थाि के बीच एक नई ऊर्जा एवं सिनर्जी देख सकते हैं। अनुमान है कि द्विपक्षीय व्यावपार 8 बिलियन डालर है। दोनों पक्ष अब 2020 तक द्विपक्षीय व्यायपार को 15 बिलियन डालर तक बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। वियतनाम अनेक भारतीय कंपनियों के लिए एक आकर्षक डेस्टिनेशन है। वियतनाम में भारत की तकरीबन 1 बिलियन डालर मूल्यक की 68 परियोजनाएं पहले से चल रही हैं। भारतीय निवेश के तहत विविध क्षेत्र शामिल हैं जैसे कि तेल एवं गैस की खोज, खनिज की खोज और प्रसंस्क रण, चीनी विनिर्माण, कृषि रसायन, आईटी और कृषि प्रसंस्कोरण आदि। वियतनामी कंपनियां भी भारत में अपनी उपस्थिति बढ़ा रही हैं। भारत में वियतनाम की तीन निवेश परियोजनाएं हैं जिनका कुल मूल्या 23.6 मिलियन अमरीकी डालर है। वियतनाम में शीर्ष भारतीय निवेशकों में अन्यों के अलावा ओ वी एल, एस्साीर एक्स प्लोेरेशन एंड प्रोडक्शेन लिमिटेड, नागार्जुन लिमिटेड, के सी पी इंडस्ट्रीभ लिमिटेड, नगोन कॉफी मैनुफैक्चसरिंग, वैंकटेश्वरर हैचरीज, फिलिप्सव कार्बन एंड मैकलियोड रसेल एवं सी जी एल शामिल हैं।

वियतनाम में किसी भारतीय कंपनी द्वारा एकल सबसे बड़ा निवेश टाटा पावर की बड़ी परियोजना है जो सोक ट्रांग में लांग फु-II ताप विद्युत संयंत्र के निर्माण के लिए 1.8 बिलियन डालर की परियोजना है।

images/Untitled_3.jpg(लांग फु-II ताप विद्युत संयंत्र के मॉडल का चित्र)ऊर्जा सहयोग अन्य- उदीयमान क्षेत्र है जो दोनों देशों को करीब ला रहा है। नवंबर, 2013 में वियतनाम की कम्यु-निस्टा पार्टी के महासचिव नगुयेन फु ट्रांग की भारत यात्रा के दौरान वियतनाम सैद्धांतिक तौर पर भारतीय कंपनियों को सात तेल खोज ब्लागक प्रदान करने के लिए सहमत हुआ था। उम्मीतद है कि दोनों पक्ष शीघ्र ही इस सहयोग को औपचारिक रूप देने के लिए संधि पर हस्ता क्षर करेंगे। वियतनाम में तेल एवं गैस के क्षेत्र में अन्वेदषण में भारत की भागीदारी के विरूद्ध अक्समर चीन ने इस आधार पर विरोध जताया है कि ये ब्ला क दक्षिण चीन सागर के विवादित हिस्सोंम में हैं, जिस पर पूरी तरह से बीजिंग द्वारा दावा किया जा रहा है। वियतनाम ने जोरदार शब्दों में चीन के विरोध को अस्वीरकार किया है तथा कहा है कि ये अंतर्राष्ट्री य समुद्र के अंदर आते हैं।

सामरिक कैनवस

सामरिक कैनवस इस क्षेत्र में उथल-पुथल की पृष्ठंभूमि में भारत एवं वियतनाम के बीच सामरिक एवं रक्षा संबंधों ने एक नया बल एवं आयाम हासिल किया है। नियमों पर आधारित व्यरवस्थां तथा नौवहन की आजादी की वकालत करते हुए भारत ने समुद्र के यूएन कानूनों के अनुसरण में दक्षिण चीन सागर विवाद के समाधान पर जोर दिया है। म्यां मार में भारत - आसियान तथा ए आर एफ बैठकों में भारत की विदेश मंत्री द्वारा इस दृष्टिकोण को दोहराया गया। समुद्री सुरक्षा को ध्याकन में रखते हुए भारत ने सैन्य उपकरण की खरीद के लिए वियतनाम को 100 मिलियन डालर का ऋण प्रदान किया है जिसका उद्देश्यो वियतनाम की सैन्या अवसंरचना को मजबूत करना तथा किसी बाहरी संकट से निपटने के लिए उसे तैयार करना है। दोनों पक्ष अब समुद्री सुरक्षा सहयोग के दायरे का विस्ताेर करने के लिए सामरिक रक्षा वार्ता एवं संयुक्त् नौसैन्यक अभ्याोस को गहन करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा, भारत और वियतनाम अपने बढ़ते संबंधों को क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता के लिए वृहद अभियान के अंग के रूप में देख रहे हैं। यह आसियान, पूर्वी एशिया शिखर बैठक, मेकांग - गंगा सहयोग, एशिया - यूरोप बैठक (असेम) सहित अनेक क्षेत्रीय मंचों में उनके घनिष्ट सहयोग में परिलक्षित होता है। ''भारत और वियतनाम इस क्षेत्र में शांति, समृद्धि, स्थिरता एवं विकास चाहते हैं। वियतनाम के रूप में भारत को एक स्वाकमी भक्तं एवं हर स्थिति में साथ देने वाला मित्र प्राप्ता हुआ है'', भारत में वियतनाम के राजदूत नगुयेन थान्हर तेन ने कहा।

images/Untitled_4.jpg(चित्र में : नवंबर, 2013 में भारत की अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्र पति के साथ वियतनाम की कम्युिनिस्टा पार्टी के महासचिव नगुयेन फु त्रांग)ज्ञान साझेदारी

भारत - वियतनाम संबंधों को जो चीज ठोस रूप देती है वह बढ़ती विकास साझेदारी है जो आई टी, शिक्षा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के अग्रणी क्षेत्रों में सहयोग पर आधारित है। वियतनाम के आर्थिक उत्थातन को बढ़ावा देने के लिए भारत ने अनेक अवसंरचना परियोजनाओं के लिए तकरीबन 165 मिलियन डालर का ऋण प्रदान किया है। ज्ञान उद्योग में अपनी प्रमाणित ताकतों के आधार पर भारत ने क्षमता निर्माण की अनेक संस्थांओं के निर्माण में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई है जिसमें आई टी प्रशिक्षण केंद्रों, अंग्रेजी भाषा प्रशिक्षण केंद्रों तथा उद्यमशीलता विकास संस्थाानों की स्थाटपना शामिल है। वियतनाम में चावल अनुसंधान संस्था्न की स्थांपना में भारत की सहायता ने इस देश को विश्वप के अग्रणी चावल निर्यात बनने में मदद की है तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देश में हरित क्रांति का मार्ग प्रशस्तअ किया है, वियतनाम में भारत के पूर्व राजदूत आफताब सेठ ने कहा। चूंकि वियतनाम की अधिकांश आबादी युवा है तथा अपनी खुद की शर्तों पर अपनी नियति का निर्माण करना चाहती है, इसलिए भारत ने भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग (आई टी ई सी) कार्यक्रम के तहत हर साल सैकड़ों वियतनामी छात्रों को छात्रवृत्ति की पेशकश की है। हाल के समय में, आई टी दोनों देशों के बीच ज्ञान आधारित साझेदारी के एक महत्विपूर्ण आधार के रूप में उभरा है। भारत हनोई में इंदिरा गांधी हाई-टेक साइबर फोरेंसिक लैबोरेटरी तथा वियतनाम की राष्ट्री य रक्षा अकादमी में एक वियतनाम - भारत अंग्रेजी एवं आई टी प्रशिक्षण केंद्र स्था्पित करने में मदद करने के लिए सहमत हुआ है। आईटी क्षेत्र की शीर्ष कंपनियों जिसमें एन आई आई टी, अप्टेलक एवं टाटा इंफोटेक शामिल हैं, ने पूरे वियतनाम में 80 से अधिक फ्रेंचाइजी केंद्र खोले हैं। पिछले साल नवंबर में, भारत ने वियतनाम को एक हाई पावर सुपर कंप्यू्टर दिया था।

सांस्कृंतिक संबंध

दिल्लीृ और हो ची मिन्हा शहर के बीच नवंबर में शुरू होने वाली पहली सीधी उड़ान से जन दर जन संपर्क, यात्रा एवं पर्यटन में उछाल आने की पूरी संभावना है। वियतनाम में तकरीबन 1500 भारतीय रहते हैं। भारत इस साल के उत्तकरार्ध में हनोई में एक सांस्कृंतिक केंद्र खोलने वाला है। भारत और वियतनाम के बीच चाम सभ्य ता के पुराने संबंध एक नया महत्वा ग्रहण करेंगे क्यों कि भारतीय पुरातत्वच सर्वेक्षण वियतनाम में माई सन की यूनेस्को् विरासत साइट में स्थित सदियों पुराने हिंदू मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए परिरक्षण एवं संरक्षण का कार्य शुरू करने वाला है।

images/Untitled_5.jpg(चित्र में : माई सन, वियतनाम)
नए क्षितिज : आगे की राह

आई टी, शिक्षा, बौद्ध धर्म एवं रणनीति को अपने जटिल विकास पथ में शामिल करके भारत और वियतनाम के बीच संबंधों ने अथक रूप से प्राचीन एवं आधुनिक काल का मिश्रण करने का प्रयास किया है ताकि एक मजबूत समकालीन साझेदारी का निर्माण हो सके। आने वाले दिनों में, दिल्लीम - हनोई संबंध के लिए एकमात्र राह आगे बढ़ने, नए परिदृश्यर एवं अवसरों के द्वार खोलने की है ताकि परस्पलर ऊर्जावान एवं सशक्त साझेदारी का निर्माण हो सके।

(मनीश चंद इंडिया राइट्स नेटवर्क www.indiawrites.org के मुख्यर संपादक हैं, जो अंतर्राष्ट्री य मामलों एवं इंडिया स्टोइरी पर केंद्रित एक पोर्टल एवं ई-जर्नल है)

- इस लेख में व्यइक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।

संदर्भ :

वियतनाम भारत का हर समय साथ देने वाला मित्र है : वियतनाम के राजदूत
वियतनाम की कम्युहनिस्ट पार्टी के महासचिव की भारत की राजकीय यात्रा के अवसर पर संयुक्त वक्त व्यव
वियतनाम की कम्युतनिस्टय पार्टी के महासचिव नगुयेन फु त्रांग की भारत की राजकीय यात्रा के दौरान हस्ताकक्षरित दस्ताटवेजों की सूची
भारत के प्रधान मंत्री एवं वियतनाम की कम्युंनिस्टस पार्टी के महासचिव के मीडिया वक्तेव्यय
वियतनाम एशिया – प्रशांत क्षेत्र में भारत की बड़ी भूमिका का समर्थन करता है



टिप्पणियाँ

टिप्पणी पोस्ट करें

  • नाम *
    ई - मेल *
  • आपकी टिप्पणी लिखें *
  • सत्यापन कोड * Verification Code
केन्द्र बिन्दु में
यह भी देखें