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दूरदृष्टिप : भारत-चीन संबंधों की वर्णमाला

सितम्बर 17, 2014

मनीष चंद

‘ए’ फॉर एशिया, ‘बी’ फॉर बिजनेस, ‘सी’ फॉर कल्‍चर और ‘डी’ फॉर डिप्‍लोमेसी एवं डेवलपमेंट। यह सहयोग का नया मार्ग प्रशस्‍त करने तथा नई वैश्‍विक व्‍यवस्‍था की पुनर्संरचना करने के लिए नया व्‍याकरण गढ़ रही एशिया की दो उभरती ताकतों के बीच बहु-मुखी सहभागिता की नई वर्णमाला है। चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की 17 से 19 सितंबर तक की भारत यात्रा, जो दो एशियाई पड़ौसियों के बीच रिश्‍तों का कायापलट करने वाली और उनकी 2.5 बिलियन जनता, जो विश्‍व की एक तिहाई आबादी है, के लिए नए अवसर पैदा करने वाली अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण यात्रा होगी, में भारत-चीन संबंधों की नई वर्णमाला को पूर्ण अभिव्‍यक्‍ति मिलेगी।

मोदी-शी शिखर वार्ता का महत्‍व

भारत और चीन के नेता जब वार्ता करेंगे, तब दुनिया की नजर उन पर टिकी होंगी, जो अकारण नहीं है। आखिरकार उनके देश एशिया की अग्रणी अर्थव्‍यवस्‍थाएं हैं जिनका सकल घरेलू उत्‍पाद संयुक्‍त रूप से 11 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है और वे समावेशी वैश्‍विक व्‍यवस्‍था के अतिसक्रिय शिल्‍पकार पणधारी हैं। इस बार नई संरचना में भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के शी जिनपिंग के बीच अतिरिक्‍त प्रतिध्‍वनि के साथ पहली फुल-स्‍पेक्‍ट्रम की शिखर वार्ता होने की उम्‍मीद है : जिसमें दोनों पक्षों पर मजबूत इच्‍छा शक्‍ति वाले नेता मौजूद हैं, जिनको निर्णायक कदम उठाने के लिए स्‍पष्‍ट जनादेश प्राप्‍त है और जो अपने-अपने देशों के राष्‍ट्रीय पुनर्जागरण के नए अध्‍याय लिख रहे हैं। शी जिनपिंग को माओ त्‍सेतुंग के बाद चीन के सबसे शक्‍तिशाली नेता के रूप में देखा जाता है क्‍योंकि उन्‍हें चीनी संस्‍थापन में त्रिशासकदल में पद प्राप्‍त हैं जो उन्‍हें लगभग सर्वशक्‍तिमान बनाते हैं: वे चीन की साम्‍यवादी पार्टी के महासचिव हैं, वे राष्‍ट्राध्‍यक्ष हैं और केंद्रीय सैन्‍य आयोग के अध्‍यक्ष हैं। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी पिछली एक तिहाई शताब्‍दी में भारत में स्‍पष्‍ट संसदीय बहुमत की सरकार के प्रथम मुखिया हैं, जिसमें वे सहयोगी दलों की राजनीति के भय और चिंता से दूर हैं। सरल शब्‍दों में कहें तो, इस का आशय यह है कि दोनों नेताओं के पास जैसा चाहें वैसा करने की ताकत है। चीन के साथ प्रधान मंत्री मोदी के संबंध उस समय से हैं जब वे गुजरात के मुख्‍य मंत्री थे और चार बार चीन के दौरे पर आए थे और अपने राज्‍य के लिए मिलियनों डॉलर के निवेश करवाने में सफल रहे थे। दोनों नेताओं के बीच अच्‍छे समीकरण तभी बैठ गए थे जब वे इस वर्ष फोर्टालिजा में ब्रिक्‍स शिखर वार्ता के समय पहली बार मिले थे। साथ ही, वे एक दूसरे की प्रशंसा करने तथा सम्मान करने के लिए जाने जाते हैं। इस व्‍यक्‍तिगत कैमिस्‍ट्री और हितों के समभिरूपन से दोनों नेताओं को एशिया की दो उभरती ताकतों के बीच चिरस्‍थायी संबंध बनाने का अवसर प्राप्‍त होते हैं।

images/in__1.jpg(प्रधान मंत्री फोर्टालिजा, ब्राजील में छठी ब्रिक्‍स शिखर वार्ता के समय राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग से मिले) (14 जुलाई, 2014)व्यावहारिकतावाद : व्‍यवसाय और विकास

पुन: ‘एबीसीडी’ पर आते हैं, बिजनेस और डेवलपमेंट मोदी-शी जिनपिंग की शिखर वार्ता के मुख्‍य बिंदु होंगे। दुनिया के दो सर्वाधिक आबादी वाले देशों के नेताओं के बीच वार्ता में संबंधों के नये व्‍यावहारिकतावादी मॉडल को लागू करने पर अधिक ध्‍यान दिया जाएगा, जिसका आशय यह है कि अन्‍य क्षेत्रों में, चाहे वे आर्थिक हों, सैन्‍य हों अथवा सांस्‍कृतिक हों, संबंधों के विकास और विस्‍तार के मार्ग में दशकों पुराने सीमा विवाद जैसे जटिल और कठिन मुद्दों को नहीं आने दिया जाएगा। इस आदर्शवादी और लचीले दृष्‍टिकोण के बहुत लाभ हुए हैं : भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्‍यापार 65 बिलियन डॉलर से अधिक का हो गया है और दोनों देश निकट भविष्‍य में इसे 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। तथापि, मुकुलित हो रहे आर्थिक संबंधों का दूसरा पहलू भी है: 30 बिलियन से अधिक का बढ़ता हुआ व्‍यापारिक असंतुलन। इस व्‍यापारिक असंतुलन को दूर करने के लिए भारत चीन से भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और फार्मा कंपनियों को बाजार पहुंच उपलब्‍ध कराने की उम्‍मीद कर रहा है।

निवेश और विशेषज्ञता के महत्‍वाकांक्षी भारतीय अवसंरचना क्षेत्र के चलते, चीन का भारत के साथ भागीदारी करना इसकी विकास यात्रा में अभूतपूर्व अवसर रहा है। चीन भारत में चीनी कंपनियों के लिए विशिष्‍ट औद्योगिक पार्क स्‍थापित करने, भारतीय रेलवे का आधुनिकीकरण करने और एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था में निवेश को बढ़ाने की उम्‍मीद कर रहा है। अपने कूटनीतिक आर्थिक संवाद से शुरू करके दोनों देशों ने क्रेता-विक्रेता मॉडल के स्‍थान पर बेहतर दीर्घकालिक निवेश-आधारित मॉडल को अपनाते हुए अपने आर्थिक संबंधों में संरचनागत सुधार करने का लक्ष्‍य बनाया है। वर्तमान में निवेश का स्‍तर बहुत कम है : चीन, जिसकी विदेशी विनिमय रक्षित निधि 3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, ने भारत के उभरते बाजार में एक बिलियन डॉलर से भी कम का निवेश किया है। इस पृष्‍ठभूमि में, चीन के राष्‍ट्रपति द्वारा बड़ी निवेश योजनाओं की, और कम से कम गुजरात और महाराष्‍ट्र में दो चीनी औद्योगिक पार्कों की, घोषणा किए जाने की उम्‍मीद की जा सकती है। दुनिया के कार्यालय के रूप में जाने जाने वाले भारत को एक विनिर्माण पावरहाउस के रूप में बदलने, जो दिल्‍ली स्‍थित नई सरकार की मुख्‍य प्राथमिकता है, में दुनिया के कारखाने के रूप में जाने जाने वाले चीन से सहायता के रूप में अपनी विशेषज्ञताएं साझा करने की अपेक्षा की जाती है।

विश्‍वास को बढ़ाना

जबकि यह तय लग रहा है कि बड़े आर्थिक समझौते अधिक सुर्खियों में रहेंगे, दोनों नेता अपने आधारभूत हितों के लिए केंद्रीय महत्‍व के मुद्दों पर कूटनीतिक विश्‍वास को घनिष्‍ठ बनाने और समझ के दायरे को बढ़ाने की भी उम्‍मीद करेंगे। असीमांकित सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए रखने का मुद्दा एजेंडे में सबसे ऊपर होगा। विगत शिखर वार्ताओं में भारत ने इस बात को रेखांकित किया था कि बेहतर संबंध कायम करने और भारत-चीन संबंधों की पूरी संभावनाओं को मूर्त रूप देने के लिए सीमा पर शांति बनाए रखना एक पूर्वापेक्षा है, जो मुख्‍यत: अनसुलझे सीमा विवाद से पैदा हुई विश्‍वास की कमी के कारण अधूरी की अधूरी रह गई है। अक्‍टूबर 2013 में, भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह की बीजिंग यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने एक महत्‍वपूर्ण सीमा रक्षा सहयोग करार पर हस्‍ताक्षर किए थे, और गतिरोध-मुक्‍त मोर्चों को सुनिश्‍चित करने के लिए इस संरचना को मजबूत बनाए जाने तथा विश्‍वास निर्माण के अन्‍य उपाय किए जाने की उम्‍मीद की जा सकती है। दूरदृष्‍टि अपनाते हुए, दोनों नेताओं के पास चरण-।। पर अटकी हुई सीमा संबंधी पर बातचीत को एक निर्णायक गति देने का अद्वितीय अवसर है, और यह जटिल बातचीत का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और कठिन हिस्‍सा है, जो सीमा के वास्‍तविक सीमांकन का आधार बनेगा।

images/in__2.jpg(तत्‍कालीन प्रधान मंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह की अक्‍टूबर, 2013 में चीन यात्रा के दौरान भारत और चीन ने सीमा रक्षा सहयोग करार पर हस्‍ताक्षर किए।)विश्‍वास को बढ़ाना : हाथों में हाथ लेकर चलना

भविष्‍य की ओर देखते हुए, आकार लेते हुए भारत चीन संबंधों का कारगर मंत्र है व्‍यावहारिकता, और ऐसा होता प्रतीत भी हो रहा है। सैन्‍य परिधि में, दोनों एशियाई शक्‍तियां अब बेहतर विश्‍वास बढ़ाने और शीर्ष सैन्‍य आत्‍मविश्‍वास के बीच चर्चा को गहन बनाने की उम्‍मीद कर रही हैं। भारत और चीन ने आतंकवाद से लड़ने के तीन दौर के अभ्‍यास ‘हैंड-इन-हैंड’ नाम से किए थे। दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने वार्षिक संवाद के कार्यतंत्र बनाए हैं और भारतीय जहाजों ने चीनी बंदरगाहों की सद्भावना यात्राएं की हैं।

यह बात नई ऊर्जा देने वाली है कि भारत और चीन ने जलवायु परिवर्तन और बहुपक्षीय व्‍यापार बातचीत जैसे कई अंतर्संबंधित मुद्दों पर निकट सहयोग करते हुए अंतरराष्‍ट्रीय क्षेत्र में व्‍यावहारिक सहयोग को आकार दिया है। वे ब्रिक्‍स, आसियान क्षेत्रीय मंच, पूर्वी एशिया शिखर वार्ता और उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं के जी-20 क्‍लब जैसे अग्रणी बहुपक्षीय निकायों के प्रभावशाली सदस्‍य हैं।

‘ए’ फॉर एशियाई शताब्‍दी

यह स्‍पष्‍ट है कि उभरती एशियाई शताब्‍दी की चाबी वैश्‍विक स्‍तर पर भारत और चीन के एक साथ उत्‍थान के हाथ में है। सौहार्दपूर्ण भागीदारी बनाने में इतना अधिक प्रयास करने के साथ-साथ, भारत और चीन अब दोनों देशों की जनता के बीच संयोजकों का काम करने वाली संस्‍कृति और सृजनशीलता को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। 2014 में, जिसको दोनों देशों ने भारत-चीन मैत्री वर्ष का नाम दिया है, यात्रा, पर्यटन और लोगों का आपसी मेल-मिलाप बढ़ने की उम्‍मीद है। बौद्ध धर्म सभ्‍यतागत संबंध प्रदान करता है और बॉलीवुड बंधन मजबूत होता जा रहा है- हाल ही में चीन में एक बॉलीवुड फिल्‍मोत्‍सव शुरू किया गया था जिसे बहुत सराहा गया। दोनों देश अब संयुक्‍त रूप से फिल्‍मों के निर्माण के संबंध में एक समझौता करना चाहते हैं, जिससे उनके बीच एक नए लोकप्रिय सेतु निर्माण की और भारतीय फिल्‍म निर्माताओं को अमरीका के बाद दुनिया के सबसे बड़े बाजार तक पहुँच प्राप्‍त होने की उम्‍मीद है।

स्‍किल (कौशल), स्‍पीड (गति) और स्‍केल (पैमाना)

जैसा कि एक चीनी कहावत में कहा गया है, संशय हमेशा रहेंगे, परंतु हजारों मील की यात्रा भी एक छोटे कदम से शुरू होती है। भविष्‍य की ओर देखते हुए, एशिया के दोनों बड़े देश बेहतर सृजनात्‍मक और बहु-आयामी भागीदारी को आकार देते लग रहे हैं और इन्‍होंने सहयोग का एक व्‍यावहारिक मॉडल अपनाया है जिसमें प्रतिस्‍पर्धा और सहयोग के तत्‍वों का, आशा करते हैं कि सृजनात्‍मक संश्‍लेषण के साथ, सह-अस्‍तित्‍व होगा। सहयोगी भागीदारी के नए नमूने को ‘एबीसीडी’ और तीन ‘एस’ द्वारा बल प्राप्‍त होगा, जिनके बारे में प्रदान मंत्री मोदी ने बात की थी। प्रधान मंत्री मोदी का यह प्रसिद्ध कथन है कि चीन के साथ प्रतिस्‍पर्धा करने के लिए भारत को स्‍किल, स्‍पीड और स्‍केल चाहिए। एक दूसरे के विकास के अनुभवों से सीख लेने की इच्‍छाशक्‍ति नई दिल्‍ली और बीजिंग दोनों द्वारा इस बात को स्‍वीकार किए जाने में परिलक्षित हो रही है कि संघर्ष के स्‍थान पर सहयोग का लाभ अधिक होगा और भारत तथा चीन दोनों के उत्‍थान को गति प्रदान होगी तथा एक संतुलित एशियाई शताब्‍दी को आकार देने में सहायता प्राप्‍त होगी। प्रतीकात्‍मक विरोधों को एकतरफ रख कर देखा जाए, तो राष्‍ट्रीय विकास और पुनर्जागरण के भारत और चीन के स्‍वप्‍न गहराई तक जुड़े हुए हैं। भारत और चीन के नेताओं के लिए अब समय आ गया है कि वे एशियाई शताब्‍दी की कथनी को करनी में बदलें और अपनी 2.5 बिलियन आबादी के सपनों को साकार करें।

(मनीष चंद अंतरराष्‍ट्रीय मामलों पर केंद्रित एक वेब पोर्टल और ई-पत्रिका इंडिया राइट्स नेटवर्क,www.indiawrites.org, तथा इंडिया स्‍टोरी के मुख्‍य संपादक हैं।)

- लेख में व्‍यक्‍त किए गए विचार पूरी तरह लेखक के निजी विचार हैं।
संदर्भ :

संयुक्‍त वक्‍तव्‍य : भारत-चीन कूटनीतिक एवं विकास भागीदारी में सहयोग का भविष्‍य-दर्शन

भारत गणराज्‍य और चीनी लोक गणराज्‍य का 21वीं सदी का साझा दर्शन

भारत-चीन संबंध : पुराने संबंध, नया मॉडल?

मीडिया, संस्‍कृति और सृजनात्‍मकता के माध्‍यम से जुड़ते भारत और चीन

शी जिनपिंग की यात्रा : भारत को चीन के साथ संबंधों में ‘दिशांतरण’ की उम्‍मीद



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