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मारीशस में भारतीय संविदा मजदूरों के पहुंचने की 180वीं वर्षगांठ

अक्तूबर 24, 2014

लेखक : राजदूत भास्‍वती मुखर्जी *

images/2in.jpg(पोर्ट लुइस में आप्रवासी घाट पर भवनों का एक जीर्ण-शीर्ण परिसर) एक अंतर्राष्‍ट्रीय संविदा श्रम मार्ग के निर्माण की दिशा में

180 साल पहले 2 नवंबर को आप्रवासी घाट पर मारीशस में भारतीय संविदा श्रमिकों के पहली बार पहुंचने की 180वीं वर्षगांठ के अवसर पर 2 से 4 नवंबर, 2014 के दौरान पोर्ट लुइस, मारीशस में एक अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आयोजन किया जा रहा है जिसमें भारत की ओर से मंत्री स्‍तर पर भागीदारी हो रही है। इसके तहत 1834 में दासता उन्‍मूलन के बाद भारत से मारीशस में संविदा श्रम की यात्रा पर चर्चा होगी जो ऐसी यात्रा है जो स्‍वयं आधुनिक मारीशस के इतिहास को मर्मस्‍पर्शी ढंग से उजागर करती है जो हमारे अपने इतिहास के साथ अभिन्‍न रूप से जुड़ा है। यह वह स्‍थान है जहां से संविदा श्रमिक, जो मुख्‍य रूप से बिहार और उत्‍तर प्रदेश के थे परंतु उपनिवेशी भारत के दक्षिणी प्रांतों से भी थे, आप्रवासी घाट के गेट से गुजरे, गन्‍ने के खेतों में या अन्‍यत्र संविदा श्रमिक के रूप में काम करने के लिए मारीशस में रूकने के लिए या अन्‍य स्‍थानों, जैसे कि गुयाना, सूरीनाम एवं रियूनियन द्वीप में जाने के लिए। जैसा कि 12 मार्च, 2013 को मारीशस की अपनी पिछली यात्रा के दौरान भारत के राष्‍ट्रपति महामहिम श्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है :

आप्रवासी घाट के इस ऐतिहासिक विरासत स्‍थल का दौरा, जहां पहली बार मारीशस में भारत के बहादुर पुरूषों एवं महिलाओं तथा अन्‍य देशों के लोगों ने उस समय अपना कदम रखा जब वे 175 से अधिक वर्ष पहले यहां पहुंचे थे, मेरी स्‍मृति में हमेशा गूंजता रहेगा। आप्रवासी घाट सबसे भव्‍य ढंग से सभी प्रतिकूल परिस्थितियों में मानवीय भावना की विजय को दर्शाता है। यह इन जीवंत पुरूषों एवं महिलाओं की स्‍मृ‍ति के स्‍मारक के रूप में हैं। उनके प्रचुर साहस, इच्‍छाशक्ति तथा धैर्य ने आज के मारीशस का निर्माण किया है।

images/in__1.jpg(मारीशस में आप्रवासी घाट पर एक संस्‍मारक पटिया) इस सम्‍मेलन की अध्‍यक्ष मारीशस के प्रधानमंत्री द्वारा की जा रही है जहां हमारी विदेश मंत्री महोदया मानद अतिथि होंगी तथा एक महत्‍वपूर्ण वक्‍तव्‍य देंगी। यह सम्‍मेलन एक समयानुकूल पहल है। यह स्‍लेव रूट परियोजना को संपूरित करता है जो अनेक महाद्वीपों में बड़े पैमाने पर लोगों की आवाजाही से भी संबंधित है। यह मुख्‍य रूप से भारत के अलावा हिंद महासागर के भिन्‍न – भिन्‍न भागों में स्थित अनेक अन्‍य देशों के 4,62,000 से अधिक पुरूषों, महिलाओं एवं बच्‍चों के दर्द एवं कष्‍ट की इन यादों के लिए श्रद्धांजलि होगी, जिन्‍होंने आप्रवासी घाट पर मारीशस के समुद्री तटों पर अपने कदम रखे थे। मारीशस एक अन्‍य कारण से अनोखा है। यह दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जहां यूनेस्‍को की दो साइटें हैं, एक साइट दासता की प्रतिरोधकता के लिए समर्पित है जिसका नाम ले मार्न है तथा दूसरी साइट संविदा श्रमिकों से संबंधित है जिसका नाम आप्रवासी घाट है। स्‍पष्‍ट रूप से, दासता एवं संविदा श्रम दोनों से जुड़े वैश्विक उपनिवेश पश्‍चात विरासत पर इस तरह की बातचीत विविधता के मानवतावाद पर सार्वभौमिक बातचीत में योगदान करेगी क्‍योंकि यह लोगों के बीच सामान्‍य सांस्‍कृतिक एवं सभ्‍यतागत संपर्कों की बेहतर समझ को बढ़ावा देती है और इस प्रकार सांस्‍कृतिक विविधता को सुदृढ़ करती है तथा मानवता को समृद्ध करती है।

images/in__1.jpg(ले मोर्न, जो मारीशस का यूनेस्‍को द्वारा मान्‍यताप्राप्‍त एक विश्‍व विरासत स्‍थल है) इसकी शुरूआत कैसे हुई? 1983 में ब्रिटेन में दासता का उन्‍मूलन हो जाने तथा मारीशस में 1935 में इसका कार्यान्‍वयन होने की वजह से ब्रिटेन ने औद्योगिक क्रांति के यौवन काल में तथा पूंजीवाद के शुरूआती दिनों में अपने औपनिवेशिक वर्चस्‍व को बनाए रखने के उद्देश्‍य से गन्‍ने के खेतों में काम करने के लिए भारत की ओर रूख किया। यहीं से भारतीय श्रमिकों के बड़े पैमाने पर पलायन के मानवीय इतिहास के एक अध्‍याय को लिखने की शुरूआत हुई। यह कालापानी की तरह एक लंबी यात्रा की शुरूआत, वनवास की एक दु:खद यात्रा की शुरूआत थी। सरदारसोर मिस्‍त्री के रूप में जाने जाने वाले भर्ती कर्ताओं ने इन निर्दोष, भोले मजदूरों को बहकाने में बड़ी भूमिका निभाई, जिनमें से अनेक का यह विश्‍वास था कि मिरिच देश (मारीशस) उत्‍तर भारत के बिल्‍कुल उत्‍तर में है। संविदा का स्‍वरूप क्‍या है? आक्‍सफोर्ड इंग्लिश डिक्‍सनरी में इसे एक औपचारिक करार के रूप में परिभाषित किया गया है जो स्‍वामी के प्रति एक परिशिष्‍ट से बांधता है या यह एक संविदा है जिसके माध्‍यम से कोई व्‍यक्ति औपनिवेशिक भूस्‍वामी के लिए एक निश्चित अवधि के लिए काम करने के लिए सहमत होता है। इस प्रकार, संविदा समानता या प्राकृतिक न्‍याय के सिद्धांत पर आधारित नहीं थी। तथापि, ग्रेट एक्‍पेरिमेंट, जैसाकि इसे कहा जाता है, जिसे पहली बार 1834 में मारीशस में स्‍थापित किया गया, को पिछली औपनि‍वेशिक महाशक्तियों द्वारा एक महान सफलता के रूप में माना गया। इसकी वजह से पिछले औपनिवेशिक देश अपने उपनिवेशों के लिए विश्‍व के अन्‍य भागों में संविदा श्रमिकों की भर्ती करने लगे। आज इन स्‍वतंत्र देशों के तहत अंतर्राष्‍ट्रीय संविदा श्रम रूट परियोजना पर कोई 22 देश आते हैं।

images/in__1.jpg(मारीशस में आप्रवासी घाट पर किचन ब्‍लाक के अवशेष) इस पृष्‍ठभूमि के आधार पर यह बिल्‍कुल उपयुक्‍त था कि आप्रवासी घाट को विश्‍व विरासत की सूची में शामिल किया जाए क्‍योंकि यह यूनेस्‍को के प्रचालनात्‍मक दिशानिर्देशों की कसौटी संख्‍या (6) को पूरा करता है। इसके प्रचालनात्‍मक पैराग्राफ 2 में अपनाया गया निर्णय (30 सीओएम 8 बी.33) निम्‍नानुसार कहता है ::

आप्रवासी घाट, जिसे गुलाम की बजाय संविदा मजदूरों के प्रयोग के लिए ग्रेट एक्‍सपेरिमेंट के लिए 1834 में ब्रिटिश सरकार द्वारा पहली साइट के रूप में चुना गया, गन्‍ने के खेतों में काम करने के लिए या विश्‍व के अन्‍य भागों में ले जाए जाने के लिए भारत से मारीशस जाने वाले लगभग आधे मिलियन संविदा श्रमिकों की यादों से गहरे रूप से जुड़ा है।

यूनेस्‍को में भारत के राजदूत के रूप में तथा विश्‍व विरासत समिति में भारत के प्रतिनिधि के रूप में मुझे 2006 में विल्‍नुइस, लिथुयानिया में समिति की बैठक में अफ्रीकी समूह के लिए तथा मारीशस के लिए मामले पर दलील देने का गौरव प्राप्‍त हुआ था। सलाहकार बोर्ड द्वारा यह दलील देने के प्रयासों के बावजूद कि कोई संविदा श्रमिक मार्ग नहीं है तथा यह कि मारीशस तथा अन्‍य स्‍थानों पर जाने वाले भारतीय मजदूर आधुनिक अप्रवासन के माध्‍यम से बेहतर भविष्‍य की तलाश कर रहे थे, मारीशस और भारत से ऊपर उल्‍लेख के अनुसार जोरदार शब्‍दों में कहा कि आप्रवासी घाट से संविदा श्रमिकों का गुजरने की तुलना आधुनिक अप्रवासन से नहीं की जा सकती है जैसा कि हम इसे समझते हैं और यह कि इसका बकाया सार्वभौमिक मूल्‍य (ओ यू वी) अक्षुण्‍य है तथा यह स्‍लेव रूट की तरह ही पूरी दुनिया के लिए एक महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक स्‍मृति का प्रतिनिधित्‍व करता है। तदनुसार, तथा सलाहकार बोर्ड द्वारा नकारात्‍क सिफारिश के बावजूद वाहवाही के साथ इस साइट को शामिल किया गया जो भारत एवं मारीशस के लिए एक बड़ी जीत है तथा संविदा श्रम विरासत की अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान के लिए भी एक बड़ी जीत है। विश्‍व विरासत समिति ने यह भी सिफारिश की कि संबंधित राज्‍य पक्षकार के रूप में मारीशस तथा अन्‍य इच्‍छुक राज्‍य, विशेष रूप से भारत संविदा श्रम के कार्य क्षेत्र तथा वैश्विक स्‍तर पर इसके प्रभाव को समझने एवं विश्‍व रजिस्‍टर की यूनेस्‍को स्‍मृति के लिए आप्रवासी घाट के अभिलेखों को शामिल करने की संभावना पर विचार करने के लिए संविदा श्रम पर अनुसंधान कर रहे हैं। यह सम्‍मेलन इन सिफारिशों को आगे बढ़ाने की दिशा में हमारे प्रयासों का प्रतीक है।

यह सम्‍मेलन संविदा श्रम के इस वैश्विक स्‍वरूप को समझने के प्रयास में एक महत्‍वपूर्ण कदम है। यह सम्‍मेलन अन्‍य देशों में बेहतर रूप से ज्ञात संविदा श्रम के अनुभवों को जानने की आवश्‍यकता को पूरा करता है। अंतर्राष्‍ट्रीय संविदा श्रम रूट 19वीं शताब्‍दी में संविदात्‍मक श्रम के प्रवासन से जुड़े अनुभव रखने वाले सभी देशों को एक मंच पर लाएगा, जब वैश्विक आर्थिक व्‍यवस्‍था उस ढंग से परिवर्तित हो रही थी जिसे हम आज जानते हैं तथा यह व्‍यक्तियों, संस्‍थाओं के एक नेटवर्क का सृजन करेगा जो अपने – अपने पूर्वजों के इतिहास, संस्‍कृति एवं संविदा प्रणाली के बारे में अपने ज्ञान का प्रसार करेंगे, सहयोग करेंगे तथा साझा करेंगे और उपयुक्‍त ढंग से अपने – अपने देशों में राष्‍ट्र निर्माण की प्रक्रिया में योगदान करेंगे।

यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि जांच के इस क्षेत्र में जो छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है उसके तहत अक्‍सर विद्वान एवं बुद्धिजीवी भौगोलिक एवं संकल्‍पनात्‍मक संकीर्णता की सीमा को पार नहीं कर पाते हैं, जो सामान्‍यतौर पर समाकालीन प्‍लांटेशन अध्‍ययन का और विशेष रूप से संविदा श्रम अध्‍ययन का एक हॉलमार्क बन गया है। इतना ही दुर्भाग्‍यपूर्ण यह भी है कि संविदा श्रम रूट में अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कोई रूचि नहीं है, हालांकि सामाजिक – आर्थिक, सांस्‍कृतिक एवं राजनीतिक जीवन की रेखाओं को आकार देने में इसकी भूमिका को सभी स्‍वीकार करते हैं तथा उपनिवेश पश्‍चात युग में जीवंत लोकतंत्र, जैसे कि मारीशस में इसने काफी योगदान दिया है। यह सम्‍मेलन इन प्रणालियों पर नए परिप्रेक्ष्‍यों का विकास करने तथा सभी जटिलताओं के साथ संविदा श्रम के अनुभव की हमारी समझ को गहन करने के प्रयोजन के लिए संविदा श्रम पर काम करने वाले विद्वानों का एक अंतर्राष्‍ट्रीय नेटवर्क निर्मित करने की आवश्‍यकता को उजागर करने में मदद करेगा।

संविदा श्रम रूट परियोजना के अपेक्षित परिणाम इस प्रकार हैं जो भारत के लिए सीधे तौर पर प्रासंगिक हैं :

  • पूरी दुनिया में संविदा श्रम के प्रवास पर अनुसंधान के विकास तथा प्रलेखन केंद्र एवं डाटा बेस की स्‍थापना को प्रोत्‍साहित करना;
  • ऐसी संस्‍थाओं, व्‍यक्तियों का एक नेटवर्क सृजित करना जो अपने पूर्वजों के इतिहास, संस्‍कृति तथा संविदा प्रणाली के बारे में ज्ञान का प्रसार करेंगे, आपस में सहयोग करेंगे तथा साझा करेंगे;
  • संविदा श्रम से संबंधित सांस्‍कृतिक विरासत स्‍थलों का पता लगाना तथा उनका परिरक्षण करना और उनको संविदा श्रम रूट पर रखना।
भारत के सहयोग से यह सम्‍मेलन उत्‍पत्ति वाले देशों में तथा उनके अंतिम डेस्टिनेशन में सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक संदर्भ में संविदा श्रम की विरासत को बेहतर ढंग से समझने के लिए अनेक कठिन मुद्दों पर गौर करेगा। यह दुनिया के भिन्‍न – भिन्‍न भागों में संविदा पश्‍चात पहचान बनाने की प्रकृति पर विचार – विमर्श करेगा तथा इस बात पर भी चर्चा करेगा कि किस तरह आज की दुनिया में राष्‍ट्रपारीय पहचान के विकास का मार्ग प्रशस्‍त कर रहा है और अंतत: संविदा श्रम तथा नृजातीय केंद्रीयता के बीच संबंध क्‍या है, अर्थात नृजातीय लेबल तथा स्‍टीरियो टाइपिंग पर रोक लगाने की आवश्‍यकता ताकि नृजातीय सीमाओं के विकास को रोका जा सके क्‍योंकि यह एक ऐसा विकास है जिसका अध्‍ययन बारीकी से स्‍लेव रूट के विद्वानों द्वारा किया गया है।

यह सम्‍मेलन महात्‍मा गांधी जी के दासता एवं संविदा श्रम दोनों को नकारने की सतत वैधता को रेखांकित करता है। गांधी जी ने कहा है :

कैसे किसी को दासता स्‍वीकार करने के लिए मजबूर किया जा सकता है?
मैं मालिक की बात मानने से इंकार करता हूँ।
वह मुझे परेशान कर सकता है, मेरी हड्डियों को चकनाचूर कर सकता है तथा मुझे मार भी सकता है।
इसके बाद केवल मेरा मृत शरीर होगा, न कि मेरी आज्ञाकारिता।
अंतत:, इस प्रकार, जीत मेरी है न कि उसकी,
क्‍योंकि वह मुझसे कराना चाहता था उसे वह नहीं करा पाया।


images/2in.jpg(राजदूत भास्‍वती मुखर्जी)*(लेखक एक पूर्व राजनयिक हैं जो यूनेस्‍को में भारत की स्‍थायी प्रतिनिधि (2004-2010) थी।
यह लेख विदेश मंत्रालय की वेबसाइट : www.mea.gov.in के खंड ‘केंद्र बिंदु में’ के लिए अनन्‍य रूप से लिखा गया है)


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