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भारत – 65 साल में असाधारण गणतंत्र

जनवरी 23, 2015

लेखक : एस वाई कुरेशी

भारत के बारे में सोचते ही दो शब्‍द जेहन में आते हैं - प्रजातंत्र तथा गणतंत्र। भारत विश्‍व का सबसे बड़ा गणतंत्र है - यह सर्वविदित है। लेकिन एक बात जो कम ही लोगों को पता है वह यह है कि भारत के हरेक ढांचे में गणतंत्र की आत्‍मा रची-बसी है।

भारत में क्‍लासिकल एथेंस (508-322 ई.पू.) तथा रोमन रिपब्‍लिक (509 ई.-27 ई.पू.) जैसे विश्‍व के विख्‍यात पुरानतम गणतंत्रों से पहले भी गणतंत्र की परम्‍पराएं विद्यमान थी। इनसे पूर्व अनेक भारतीय गणतंत्रों में भगवान बुद्ध के जीवन-काल में लगभग 600 ई.पू. में वैशाली में (बिहार में) विद्यमान वैज्‍ज्‍यन राज्‍य सर्वाधिक प्रसिद्ध था। इसके बाद, भारत में गणतंत्र के अनेक उदाहरण मिलते हैं। वर्ष 1830 में, सर चार्ल्स मैटकाफ, भारत के तत्‍कालीन गर्वनर जनरल, ने लिखा ''छोटे-छोटे समुदाय स्‍वयं में छोटे-छोटे गणतंत्रों के स्‍वरूप हैं। वे अपनी जरूरतों की सभी चीजें आपसी आदान-प्रदान से प्राप्‍त कर लेते हैं और वे लगभग किसी भी बाहरी संबंधों पर निर्भर नहीं रहते हैं। इन स्‍व-निर्भर, स्‍वशासी ग्राम गणतंत्रों ने महान भारतीय सभ्‍यता को जीवित रखा है जिसे महानतम शक्‍तिशाली साम्राज्‍य भी कभी हिला नहीं सका है।

आज विश्‍व के इस सबसे बड़े गणतंत्र में लगभग पांच लाख छोटे-छोटे गांव हैं जो स्‍वशासन के माध्‍यम से अपना शासन संचालन कर रहे हैं। इसे पंचायती राज [ग्राम समुदाय का शासन] के नाम से जाना जाता है। भारत अब तक महान गणतंत्र के 64 बंसत देख चुका है। इन गौरवपूर्ण विगत वर्षों का सिंहावलोकन करना हमारे लिए काफी सुखद होगा।

जब से भारतवर्ष ने एक महान संविधान का अंगीकार करके सार्वभौमिक मताधिकार वाला एक लोकतांत्रिक गणतंत्र बन गया है तब से जीवंत: निर्वाचन प्रणाली वाली लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था भारत की सर्वाधिक सहनशील एवं भाई-चारे की प्रवृत्‍ति का परिचायक रही है। विकसित राष्‍ट्रों द्वारा इसे ‘’मूर्खतापूर्ण पहल’' की संज्ञा दी गई। उनकी आशंकाएं उस समय विद्यमान वास्‍तविकताओं पर आधारित थीं। भारत को एक बहुत बड़े दुर्भाग्‍यपूर्ण विभाजन का दंश झेलना पड़ा था जिसमें लाखों व्‍यक्‍ति मारे गए। उस समय यहां असमान, विभाजित जाति आधारित पदानुक्रमीय समाज विद्यमान था जिसमें 84 प्रतिशत व्‍यक्‍ति अशिक्षित थे एवं गरीबी की पराकाष्‍ठा झेल रहे थे। वे अपना शासन संचालन करने में कहां से समर्थ हो सकते थे?

भारत का भविष्‍य काफी समय से नीति के हाथ अपरिवर्तित रहा। भारत ने ऐसे समय में प्रजातंत्र को अपनाया जैसे कोई मछली जल का ही आसरा करती है।

आजादी तथा प्रजातंत्र के इस नए माहौल में स्‍वयं को ढालते हुए भारत ने नोबल पुरस्‍कार विजेता के उस प्रसिद्ध कथन को चरितार्थ किया जिसमें उन्‍होंने कहा था कि ''कोई भी राष्‍ट्र प्रजातंत्र के लिए अनुकूल नहीं बनता है बल्‍कि प्रजातंत्र के माध्‍यम से अनुकूल बनता है।''

विगत 64 वर्षों से भारतीय निर्वाचन आयोग ने लोक सभा के लिए 16 चुनाव तथा राज्‍य विधान सभाओं के लिए 360 चुनाव, एक भी चुनाव समय सीमा से चुके बिना, कराए हैं। भारत में सत्‍ता का शांतिपूर्ण, सुव्‍यवस्‍थित एवं लोकतांत्रिक हस्‍तांतरण संपूर्ण लोकतांत्रिक विश्‍व के लिए स्‍पर्धा का विषय रहा है। पद मुक्‍त हो रहे प्रधान मत्री (अथवा मुख्‍यमंत्री) द्वारा पद धारण करने वाले को नम्रतापूर्वक एवं करबद्ध रूप से सत्‍ता का हस्‍तांतरण करना स्‍वयं में एक दुर्लभ उदाहरण है जिसे अनेक गणतांत्रिक देश अभी भी अपनी परंपरा का हिस्‍सा नहीं बना सके हैं।

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी प्रधानमंत्री का पद मुक्‍त करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से प्रेमपूर्वक मिलते हुए (www.cuurentnewsofindia.com)मई, 2014 में सम्‍पन्‍न 14वां आम चुनाव विश्‍व के इतिहास में सबसे बड़ा चुनाव था। 834 मिलियन मतदाताओं में से 534 मिलियन मतदाताओं ने 1.8 मिलियन इलैक्‍ट्रोनिक्‍स वोटिंग मशीन के माध्‍यम से 931,986 मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग किया। आकार की दृष्‍टि से, भारत में मतदाताओं की संख्‍या किसी भी महादेश के कुल मतदाताओं की संख्‍या से अधिक है। वास्‍तव में इसमें 90 देशों का समावेशन प्रतीत होता है, न सिर्फ संख्‍या के मामले में वरन् विविधताओं के संदर्भ में भी।

यह संख्‍या लगातार बढ़ती जा रही है। वर्ष 2009 में हुए आम चुनाव की तुलना में आम चुनाव 2014 में 118 मिलियन से अधिक मतदाताओं की वृद्धि हुई। मतदाताओं की संख्‍या के संदर्भ में यह, यह एक संपूर्ण पाकिस्‍तान या दक्षिण अफ्रिका तथा दक्षिण कोरिया संयुक्‍त रूप से, या तीन कनाडा, या चार आस्‍ट्रेलिया या 10 पुर्तगाल या 20 फिनलैंड को एक साथ शामिल करने के बराबर है।

निसंदेह भारत विश्‍व का सर्वाधिक विविधताओं वाला देश है जहां भौगोलिक विविधताओं (मरूस्‍थल, पर्वत, वन, द्विप, तटीय क्षेत्र) के अलावा विभिन्‍न धर्म, विभिन्‍न संस्‍कृतियां पाई जाती हैं। हमारे यहां विश्‍व के सभी प्रमुख धर्म, बीस राज भाषाएं तथा 780 बोलियां हैं। इन विविधताओं की जरूरतों को पूरा कर पाना काफी मुश्‍किल है। इसी तरह की कठिनाईयां आतंकवाद, सुरक्षा संबंधी खतरों, वैश्‍वीकरण के अनुरूप समायोजन, सूचना प्रौद्योगिकी के जानकारों की बढ़ती हुई आकांक्षाओं से उत्‍पन्‍न अन्‍य चुनौतियों का सामना करने में भी पेश आती हैं।

गणतंत्र की मुख्‍य विशिष्‍टताओं का समावेशन तथा भागीदारी

चुनाव निश्‍चित रूप से स्‍वतंत्र एवं निष्‍पक्ष हो सकते हैं यदि ये समावेशी प्रकृति, सामाजिक रूप से न्‍यायसंगत तथा सहयोगात्‍मक हों। हमारी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के इतिहास के 64 वर्षों में, मतदाताओं की मतदान केंद्रों पर मतप्रयोग हेतु उपस्‍थिति लगभग 55 से 60 प्रतिशत के बीच ही रही है, जो निश्‍चित रूप से भारत के निर्वाचन आयोग की उम्‍मीदों से काफी कम है। इस समस्‍या के निराकरण हेतु भारत के निर्वाचन आयोग ने ‘'व्‍यवस्‍थित मतदाता शिक्षा एवं निर्वाचनीय भागीदारी’' (एस वी ई ई पी) स्‍कंध की स्‍थापना की जिसने सभी नागरिकों, विशेषकर शहरी उच्‍च एवं मध्‍यम वर्ग, युवा एवं महिला, को निर्वाचन में अपनी भागीदारी करने के लिए जागरूक करने हेतु बहु-आयामी अभियानों की शुरूआत की। इसके बेहतर लोकतांत्रिक परिणाम प्राप्‍त हुए। विगत चार वर्षों के दौरान, प्रत्‍येक राज्‍य स्‍तरीय एवं राष्‍ट्रीय स्‍तर के चुनावों में मतदाताओं की अभूतपूर्व उपस्‍थिति रही जो अनेक मामलों में अब तक अधिकतम रही।

राष्‍ट्रीय मतदाता दिवस का मनाया जाना : 18 वर्ष की आयु प्राप्‍त करने वाले युवाओं के लिए विशेषकर बनाए गए कार्यक्रम की मुख्‍य विशिष्‍टताओं में से एक था। ऐसे युवाओं की काफी पहले से ही पहचान करने हेतु एक मुहिम चलाई गई ओर 25 जनवरी (भारत के निर्वाचन आयोग का स्‍थापना दिवस) को सभी 800000 मतदान बूथों पर आयोजित बधाई समारोहों में राष्‍ट्रीय मतदाता दिवस (एन वी डी) के रूप में मनाया गया।

प्रथम राष्‍ट्रीय मतदाता दिवस का समारोह भारत के राष्‍ट्रपति द्वारा तीस से अधिक देशों के मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍तों की उपस्‍थिति में दिनांक 25 जनवरी, 2011 को मनाया गया। इस कार्यक्रम की विशिष्‍टता यह रही कि इस देशव्‍यापी समारोह के लिए एक भी अतिरिक्‍त रूपये की मांग नहीं की। हमने निर्वाचन पंजीकरण कार्यकलापों के लिए निर्दिष्‍ट निधि का उपयोग करके ही इसे एक बड़े राष्‍ट्रीय समारोह के रूप में मनाया। अनेक देशों ने इस अद्वितीय, लागत रहित किंतु प्रभावी मॉडल वाले कार्यक्रम के प्रति अपनी गहरी अभिरूचि दिखाई और कुछ देशों ने इसे बाद में अपनाया भी।

प्रौद्योगिकी का उपयोग

उप महाद्विपीय स्‍वरूप वाले राष्‍ट्र में चुनाव का प्रबंधन प्रत्‍येक संभावित प्रौद्योगिकी के प्रयोग के बिना आसानी से कर पाना संभव नहीं हो सकता है। इससे निर्वाचन प्रक्रिया काफी सुदृढ़ हुई है। इन प्रौद्योगिकियों की पूर्णत: विश्‍वसनीयता सुनिश्‍चित करने हेतु इनके उपयोग से इनका कठिन क्षेत्र-परीक्षण किया जाता हे। हमें अनेक देशों में अपरीक्षित प्रौद्योगिकियों के अविचारी एवं उतावलेपन प्रयोग से चुनाव के विफल हो जाने की घटनाएं देखने को मिली हैं।

ई वी एम : भारतीय लोकतंत्र के लिए विलक्षण मशीन

नवम्‍बर, 1998 से संसद एवं विधान मंडलों के सभी चुनावों में ई वी एम का प्रयोग किया जाता रहा है। इससे मतों की गिनती करने, इसे तेजी से, शांतिपूर्वक निष्‍पादित करने और अवैध मत मुक्‍त बनाने के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। मत गिनती के दिन होने वाले झगड़ा झंझटों एवं तनावों से अब निजात मिल गई है। इसमें कोई आश्‍चर्य नहीं है कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विलक्षण मशीन साबित हुई है। अनेक देश जैसे- भूटान, नेपाल एवं नामिबिया ने इसे अपनाया है जबकि अन्‍य कई देश इसे अपनाने पर गहनता से विचार कर रहे हैं। ई वी एम में नित्‍य नया स्‍तरोन्‍नयन हो रहा है। नवीनतम परिवर्तन मतदाता सत्‍यापनीय कागज जांच ट्रेल (वी वी पी ए टी) को इसमें जोड़ा गया है। वी वी पी ए टी मतदाता को यह सत्‍यापित कराता है कि उसने सही तरीके से अपना मत डाल दिया है तथा यह उसे स्‍टोर किए गए इलेक्‍ट्रोनिक परिणामों की जांच करने का साधन भी प्रदान करता है। अब हमारे पास विश्‍व का सर्वाधिक पारदर्शी विश्‍वसनीय निर्वाचन प्रणाली है।

भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा इस विशाल कार्य को निष्‍पादित करने के तरीके को चार हॉलमार्क परिलक्षित करते हैं : स्‍वतंत्रता, पारदर्शिता, निष्‍पक्षता तथा व्‍यावसायिकता। यह आयोग में जनता के पूर्ण विश्‍वास को सुनिश्‍चित करता है।

पिछले आम चुनाव की एक नई अनोखी विशिष्‍टता समाचार मीडिया, मोबाइल टेलीफोनी तथा सोशल मीडिया सहित की पहली बार किसी चुनाव में निभाई गई महत्‍वपूर्ण भमिका थी। कुछ ने तो सोशल मीडिया को नई चुनाव ‘युद्धभूमि’ और आम चुनाव, 2014 को ‘प्रथम सोशल मीडिया चुनाव’ की संज्ञा तक दे डाली।

निष्‍कर्ष :

भारतीय निर्वाचन आयोग की सफलता के रहस्‍यों में इसका नए विचारों को अपनाने हेतु इसकी ओर मुखातिब होना और अपनी गलतियों एवं उपलब्‍धियों से सीख लेना है। इसलिए, हम मानते हैं कि यह प्रत्‍येक चुनाव पूर्ववर्ती सर्वोत्‍तम चुनाव से भी बेहतर होता है। उत्‍कृष्‍ट उपलब्‍धि प्राप्‍त करने की दिशा में निर्वाचन आयोग के प्रयास जारी रहने चाहिए। भारत ही नहीं बल्‍कि संपूर्ण विश्‍व को इस क्षेत्र में प्रजातंत्र को सफल बनाने में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।

इस बात को महसूस करते हुए विश्‍व के अनेक महत्‍वाकांक्षी देश भारतीय निर्वाचन आयोग के निस्‍तारण पर जानकारी, कौशल एवं विशेषज्ञता को साझा करने की अपेक्षा रखते हैं, इस आयोग ने भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय लोकतंत्र तथा चुनाव प्रबंधन संस्‍थान (आई आई डी ई एम) की स्‍थापना राष्‍ट्रीय एवं अंतरराष्‍ट्रीय दोनों भागीदारों के लिए निर्वाचन एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का एक प्रशिक्षण तथा संसाधन केंद्र के रूप में की। इस संस्‍थान ने मात्र तीन वर्ष की अवधि के दौरान ही हजारों मास्‍टर घरेलू प्रशिक्षकों के अलावा पचास से अधिक अफ्रीका- एशिया तथा राष्‍ट्रमंडल देशों के चुनाव प्रबंधकों को प्रशिक्षण प्रदान किया है। यह संस्‍थान अब पूरे विश्‍व में प्रजातंत्र के प्रतिनिधियों को सहायता प्रदान करने वाला एक प्रशिक्षण केंद्र बन गया है।

अब वह समय आ गया है कि भारत में स्‍वतंत्र एवं निष्‍पक्ष चुनाव निश्‍चित समझा जाता है। वास्‍तव में, एक भी चुनाव न करा पाना एक बड़ी खबर बन सकती है। हमें ऐसा कभी नहीं होने देना चाहिए। यह भारत राष्‍ट्र को अपनी जनता एवं विश्‍व के प्रति वचनबद्धता है।

(डा. एस. वाई. कुरैशी, भूतपूर्व लोक सेवक (सिविल सर्वेंट) भारत के 17वें मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त हैं। इससे पहले वे सचिव, खेल एवं युवा कार्य मंत्रालय, महानिदेशक, राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एन ए सी ओ), महानिदेशक, दूरदर्शन, विश्‍व का सबसे बड़ा राष्‍ट्रीय प्रसारक, इत्‍यादि पदों पर भी आसीन रहे थे।)



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