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विरासतः विश्व धरोहर गुजरात की 'रानी',प्राचीन भारत का जल प्रबंधन् का नायाब नमूना

फरवरी 23, 2015

शोभना जैन

मद्धम हवा के झोंको के बीच,ढलती सांझ की संदूरी आभा से बुनता तिलस्म सा और इसके बीच खड़ी भव्य 'रानी की वाव' तन मन को ठंडक पहुँचाता एक पड़ाव. रानी की वाव यानि अदभुत स्थापत्य से उकेरे गये शिल्प से बनी एक अप्रतिम 'सीढीदार बावड़ी' , प्राचीन भारत के बेहतरीन जल प्रबंधन का एक नायाब नमूना. जल संरक्षण के आधुनिक विकसित दौर मे एक प्रतीक प्राचीन भारत के जल संचयन की अदभुत विकसित क्षमता का. भूमितल से शुरू होती इस सीढीदार बाव की 'य़ात्रा' प्राचीन भारतीय शिल्प की उत्कृष्ट् कलाकृतियों के बीच अदभुत स्थापत्य कला वाले स्तंभों और नक्काशीदार भव्य मंडपों से गुजरते हुए , छन कर आती ठंडी हवा के बीच गहरे कुंए तक पहुंचने पर एक 'रहस्यलोक' की यात्रा सी है.

राज्य के पाटण जिले मे स्थित 11वीं सदी मे बनी रानी की वाव, क अप्रतिम इकलौती बावली है जो पिछले वर्ष जून मे युनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुई है.जल प्रंबधन का विकसित प्राचीन् भारतीय तरीका जहां हैरत मे डालता है, जल जहाँ जीवन को सींचता है, जल जहां प्राचीन भारतीय शिल्प की उत्कृष्ट् कलाकृतियों वाले मंदिर मे देवी देवताओ की प्रतिमाओ का अभिषेक भी करता है, और इस शांत माहौल मे यहा बने भूमिगत मंदिर मे हज़ारों शेषनाग के सहारे बैठे भगवान विष्णु सहस्त्रो वर्षो से वीतरागी भाव से आराम करते से लगते है, भगवन विष्णु के विभिन्न स्वरुप यहाँ बारीकी के साथ उकेरे गए है और यही पर बनी है एक सुरंग, जो पूरे माहौल मे तिलस्म सा बुनती है.विद्वानो के अनुसार 'यह वाव केवल पानी को संरक्षित करने के लिए ही नही बल्कि आध्यात्मिक महत्व के लिए भी बनाई गई थी ।खास बात यह है कि भगवान की प्रतिमा उकेरकर पानी की पवित्रता को बनाए रखने की अपील की गई है । इससे हमारे पूर्वजों की पानी के साथ जुडी भावनाओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. जल को अध्यात्म से जोड़ कर पर्यावरण संरक्षण का एक संदेश ...

ज़मीन के नीचे बनी यह बावड़ी करीब 64 मीटर लम्बी , 20 मीटर चौड़ी और 27 मीटर गहरी है । मूल रूप मे में यह सात मंज़िला इमारत थी , लेकिन अब इसकी पांच मंज़िल को ही संरक्षित करके रखा जा सका है. भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण आने वाली बाढ़ और लुप्त हुई सरस्वती नदी के कारण यह बहुमूल्य धरोहर तकरीबन 700 सालों तक गाद की परतों तले दबी रही। एक भूगर्भ वैज्ञानिक के अनुसार ‘यह भारत में बावलियों के सर्वोच्च विकास का एक सुन्दर नमूना है। यह एक काफी बड़ी और जटिल सरंचना वाली बावली है यह बावडी भारत के सीढ़ीदार कुओं की श्रेणी में अपनी खास जगह रखती है। यूनेस्को ने इस बावड़ी को एकल ढांचे में भूजल संसाधनों के प्रयोग की तकनीकी एवं जल प्रबंधन प्रणाली का एक अनोखा उदाहरण माना है । यह 11वीं सदी का भारतीय भूमिगत वास्तु संरचना का एक अनूठे प्रकार का सबसे विकसित एवं व्यापक उदाहरण है, जो भारत में बावडी यानी जल संचयन। की विकास गाथा है.हमारे पुरखे भूमिगत जल का इस्तेमाल इस खूबी के साथ करते थे कि व्यवस्था के साथ इसमें एक सौंदर्य की झलकता था। भूमिगत जल के स्रोत के उपयोग व जल प्रबंधन प्रणाली के रूप में ‘रानी की वाव’ का कोई जवाब नहींगत वर्ष दोहा, कतर में हुई यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति की 38वीं बैठक मे वाव को'विश्व धरोहर' की प्रतिष्ठित मान्यता प्रदान की गई। यूनेस्को ने इसे तकनीकी विकास का एक ऐसा उत्कृष्ट उदाहरण माना है जिसमें जल-प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था और भूमिगत जल का इस्तेमाल इस खूबी के साथ किया गया है कि व्यवस्था के साथ इसमें एक सौंदर्य भी झलकता है।फरवरी 2013 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इसे विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकित किया था। भारत की इस अनमोल धरोहर को विश्व धरोहर सूची में शामिल करवाने में पाटण के स्थानीय लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान है.रानी की वाव समेत भारत में अब तक 31 स्थलों को विश्व धरोहर सूची में जगह मिल चुकी है। इनमें 24 सांस्कृतिक स्थल शामिल हैं।

इतिहास की परतों को पलटे तो पता चलता है कि राजा जयसिंह के राज में पाटण गुजरात की राजधानी थी । तब इसका नाम अन्हिलपुर हुआ करता था । वनराज चौदहवें ने इसकी खोज की थी । इस वाव का निर्माण रानी उदयमति नें 1063 में अपने पति और पाटण के राजा भीमदेव प्रथम की याद में करवाया था । भीमदेव पाटण के सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे । रानी उदयमति की मौत के पश्चात इस बावड़ी को करणदेव प्रथम ने पूरा किया । इस बात का प्रमाण मेरंग सूरी द्वारा लिखी गई 'प्रबंध चिंतामणि' से मिलता है. जिसे सूरी ने 1304 ईस्वीं में लिखा था

अपने नाम के अनुसार ही इसे भारत के सीढ़ीदार कुओं की रानी कहा जाता है । इतिहासकारो के अनुसार सरस्वती नदी में बाढ़ आने के बाद यहाँ पानी जमा हुआ था जिससे की 1980 तक इसमें गाद भरी रही । 1980 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे दुबारा खोज निकला.इसमें तक़रीबन 800 नक्काशीदार मूर्तिया थी जिसमें से केवल 500 ही मिली है । वास्तुशिल्पियो के अनुसार वाव के खंभे सोलंकी वंश और उसके शिल्प के नायाब नमूने हैं। वाव की दीवारों और खंभों पर ज्यादातर नक्काशियां राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि जैसे अवतारों के कई रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं।‘.एक प्रसिद्ध वास्तु शिल्पी का कहना है ‘यहाँ वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट नमूना देखने को मिलता है । इसपर की गई नक्काशी मारू-गुर्जर शैली की प्रतीत होती हैं है । स्तंभो पर अप्सरायों के शिल्प सोलह श्रृंगार की मुद्रा मे सौन्द्रय के प्रतीक शिल्प उकेरे गयें हैं, मंदिर में भगवन विष्णु के दशावतार के साथ-साथ साधु, विद्वानों और अप्सराओं की नक्काशीदार प्रतिमाएं बनी हुई है ।

इस वाव में एक छोटा द्वार भी है, ,इस द्वार से 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग निकलती है। जिसमें से एक सुरंग पाटण के शहर सिद्धपुर को जाती है । जिसे की अब बंद कर दिया गया है,यह युद्ध में हार के बाद राजा के बच निकलने के काम आती थी ।

गुजरात से यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल होने वाली रानी की वाव दूसरी ऎतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व का स्थल है। इससे पहले वर्ष 2004 में पंचमहाल जिले में स्थित चांपानेर-पावागढ़ किले को भी यूनेस्को विश्व विरासत सूची में शामिल कर चुका है। वी एन आई

(शोभना जैन ऑनलाइन हिंदी न्यूज़ एंड फीचर सर्विसेज, विज़न न्यूज़ ऑफ़ इंडिया की एडिटर-इन-चीफ हैं )


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