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रूस की उनकी यात्रा की पूर्व संध्‍या पर तास समाचार एजेंसी द्वारा भारत के राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के टीवी साक्षात्‍कार का पूर्ण प्रतिलेखन

मई 08, 2015

तास :राष्‍ट्रपति महोदय आज आपसे मुलाकात का अवसर प्राप्‍त होने के लिए आपका धन्‍यवाद। द्वितीय विश्‍व युद्ध में विजय की 70वीं वर्षगांठ के लिए मास्‍को की आपकी यात्रा की पूर्व संध्‍या पर हमारी मुलाकात हो रही है। और 20 साल पहले, आपने विजय की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित समारोहों में भाग लिया था जब आप रक्षा मंत्री थे। इस प्रकार, आपके लिए इस यात्रा का अभिप्राय क्‍या है तथा मास्‍को का दौरा करने के बारे में आपकी अनुभूतियां क्‍या हैं?

भारत के माननीय राष्‍ट्रपति :मुझे राष्‍ट्रपति ब्‍लादिमीर पुतिन सहित मास्‍को में हमारे पुराने एवं परंपरागत मित्रों से मुलाकात के अवसर पर बड़ी प्रसन्‍नता हो रही है। मैंने अपनी विभिन्‍न हैसियत से - भारत के रक्षा मंत्री के रूप में, भारत के विदेश मंत्री के रूप में और भारत के वित्‍त मंत्री के रूप में विभिन्‍न अवसरों पर राष्‍ट्रपति पुतिन के साथ चर्चा की है। इसके अलावा, राष्‍ट्रपति के रूप में मुझे इस महल में दो बार उनकी आगवानी करने का सम्‍मान प्राप्‍त हो चुका है जिसमें पिछले साल के अंत में उनकी आगवानी करने का अवसर शामिल है।

मैंने विजय की 50वीं वर्षगांठ के समारोहों में भाग लिया था। मैं रूस के सैनिकों तथा लोगों द्वारा किए गए सर्वश्रेष्‍ठ बलिदान, साहस और जोश की प्रशंसा करता हूँ। द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान उन्‍होंने बहुत बलिदान दिया।

रूस के लोगों के हाथों नाजीवाद एवं फासीवाद की ताकतों की भारी पराजय को देखकर भारत को बड़ी प्रसन्‍नता हुई थी। मुझे सेंट पीटर्सबर्ग में शहीद स्‍मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हो चुका है। यह देशभक्ति, साहस एवं जोश की भावना का प्रतीक है। परेड में जिन पुराने योद्धाओं ने भाग लिया था उनको मैं आज भी याद करता हूँ तथा दिल से उनकी प्रशंसा करता हूँ। उनमें से सभी 70 साल से अधिक आयु के थे। उनमें से कुछ महान जनरल मार्शल झुकोव के नेतृत्‍व में लाल सेना का हिस्‍सा थे जिनके समक्ष 9 मई, 1945 को बर्लिन में जर्मन हाई कमान ने आत्‍मसमर्पण किया था। यह कितनी भव्‍य उपलब्धि थी। मैं ही नहीं, अपितु रेड स्‍क्‍वैयर पर मौजूद सभी अन्‍य लोग पूरी तरह प्रभावित थे। आज भी मुझे उस यात्रा की यादें ताजी हैं।

तास :महामहिम, आप बिल्‍कुल सही कह रहे हैं कि भारत - रूस संबंधों का एक भव्‍य इतिहास है। निकोलस II भी 19वीं शताब्‍दी के अंत में पूरी दुनिया की अपनी यात्रा में बॉम्‍बे (मुंबई) में एक कांसुलेट खोलने की योजना बना रहे थे। आज, हमारा जो संबंध है वह इससे पहले कभी इतना खराब नहीं हुआ है, न तो संघर्ष द्वारा और न ही युद्ध द्वारा। रूस को आज भी हिंदी - रूसी भाई-भाई याद है, जो हिंदी में बहुत लोकप्रिय कहावत है। इस प्रकार, आपके अनुसार हमारे संबंध की गतिकी कैसी है? आज दोनों देशों के बीच स्थिति का आकलन आप किस रूप में करते हैं?

माननीय राष्‍ट्रपति :मैं कहूँगा कि हमारा संबंध बहुत व्‍यापक है। रूस ऐसा पहला देश था जिसके साथ भारत ने सामरिक साझेदारी स्‍थापित की। 1990 के दशक से पहले और 1990 दशक के बाद हमने विभिन्‍न करार एवं प्रोटोकॉल किए हैं।

मुझे आज भी याद है कि किस तरह हमने 1978 के रूपया - रूबल करार के संबंध में हमारे रिश्‍ते में बहुत जटिल समस्‍या को उस समय दूर किया था जब 1993 में राष्‍ट्रपति येल्‍तसिन भारत के दौरे पर आए थे। उस समय मैं इस देश का वाणिज्‍य मंत्री था। उस समय श्री पी वी नरसिम्‍हा राव हमारे प्रधानमंत्री थे तथा पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भारत के वित्‍त मंत्री थे। अपने सामूहिक प्रयासों के माध्‍यम से हम इस समस्‍या को हल करने में समर्थ हुए जिसका रूस को देय पर्याप्‍त धनराशि से सरोकार था। इसने रूस में भारतीय निर्यात, विशेष रूप से, तंबाकू, चाय और भारी संख्‍या में भेषज उत्‍पादों के निर्यात में तेजी लाने में भी मदद की। हम करार के अनुसार किस्‍तों में भुगतान करने में समर्थ हुए। हमारा यह मानना था कि रूस पुराने सोवियत संघ का उत्‍तराधिकारी राज्‍य है तथा जो धनराशि बकाया है उसका हकदार रूस है।

तब से, और उससे पहले से ही हमारा द्विपक्षीय संबंध हमेशा सकारात्‍मक रहा है तथा हमेशा आगे बढ़ रहा है, कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा है। व्‍यापार एवं रक्षा में हमारी साझेदारी के मामले में भी यह सच है; प्रमुख अंतर्राष्‍ट्रीय घटनाओं के बारे में सामान्‍य धारणाओं को साझा करने तथा बहुपक्षीय एवं क्षेत्रीय मंचों में हमारे सहयोग के मामले में भी यह सच है।

तास : परमाणु ऊर्जा, ईंधन तथा ऊर्जा परिसर के क्षेत्र में भारत और रूस के बीच सहयोग की संभावना एवं क्षमता पर आपकी राय क्‍या है?

माननीय राष्‍ट्रपति :रूस के साथ असैन्‍य परमाणु सहयोग एक महत्‍वपूर्ण मुद्दा है। आपको याद होगा कि जब मैं 2008 में विदेश मंत्री था तब हमने यूएसए के साथ एक असैन्‍य परमाणु सहयोग करार किया था जिसे 123 करार के नाम से जाना जाता है। इसके बाद कतिपय कदम उठाए जाने थे।

रूस उन अग्रणी देशों में से एक था जिन्‍होंने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह सहित विभिन्‍न परमाणु मंचों में हमारा समर्थन किया है तथा इस करार को अंतिम रूप देने में मदद की है। हमें परमाणु ऊर्जा प्रदान करने के लिए कुडानकुलम की सबसे महत्‍वपूर्ण परियोजना रूस का एक अनोखा योगदान तथा इस बात का स्‍मारक है कि भारत और रूस के बीच मैत्री बहुत उत्‍कृष्‍ट है।

हमारे आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक महत्‍वपूर्ण आवश्‍यकता है। ऊर्जा की दृष्टि से भारत अदक्ष देश है तथा हमें अपने लोगों के लिए ऊर्जा की जरूरत है। परमाणु ऊर्जा एवं गैर परंपरागत ऊर्जा के अलावा, ऊर्जा के हाइड्रो कार्बन स्रोत भी हमारे लिए एक महत्‍वपूर्ण पहलू है। हम पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी प्रतिबद्धता को हमेशा ध्‍यान में रखते हैं परंतु हमारा यह मानना है कि पर्यावरण संरक्षण तथा विकास की आवश्‍यकताएं एक - दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उन्‍हें एक - दूसरे के पूरक के रूप में माना जा सकता है। जैसा कि मैंने बताया, हमारा यह मानना है कि रूस के साथ विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्‍त सामरिक साझेदारी के आधार पर इन क्षेत्रों में अनेक कठिनाइयों से निजात पाना हमारे लिए संभव होगा।

तास :रूसी परिसंघ तथा भारत गणराज्‍य 50 साल से अधिक से समय से सैन्‍य एवं तकनीकी क्षेत्र में आपस में सहयोग कर रहे हैं तथा परंपरागत रूप से इस सहयोग का विस्‍तृत स्‍वरूप है। हाल के वर्षों में, यह सहयोग ''क्रेता एवं विक्रेता'' के साधारण रिश्‍ते से आगे निकल कर नई प्रौद्योगिकी विकसित करने तथा हथियारों के आधुनिकीकरण में बहु-आयामी साझेदारी के रूप में विकसित हो रहा है। इस क्षेत्र में वार्ता के परिणामों तथा सहयोग की संभावनाओं के बारे में आपका आकलन क्‍या है?

माननीय राष्‍ट्रपति :बिल्‍कुल ठीक। हमने अपने संबंध को स्‍तरोन्‍नत किया है तथा यह मात्र क्रेता एवं विक्रेता संबंध नहीं रह गया है। एक समय रूस हमारे लिए सैन्‍य हार्डवेयर का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता था। आज, रक्षा क्षेत्र में साझेदारी का एक उदाहरण क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस है जो भारत और रूस की प्रौद्योगिकी का एक संयुक्‍त उत्‍पाद है। निश्चित रूप से, हमारी रक्षा नीति एवं विदेश नीति आक्रामक नहीं है, अपितु यह रक्षात्मक है तथा यह अपनी रक्षा करने के लिए है, न कि हमला करने के लिए। हम आक्रमण की नीतियों में विश्‍वास नहीं रखते हैं।

हमारा संबंध मजबूत बना हुआ है तथा अनेक नए क्षेत्रों में इसका विस्‍तार हुआ है। अनेक प्रमुख एवं महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में हमने रूस की प्रौद्योगिकी का प्रयोग किया है। हमारे विकास के शुरूआती चरणों में इस्‍पात निर्माण से लेकर मशीन निर्माण तक और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जो बहुत उच्‍च स्‍तर की प्रौद्योगिकी है, हमने आपस में सहयोग किया है।

इस प्रकार, मेरा यह मानना है कि हमारी - मैं उस पदबंध का प्रयोग कर रहा हूँ जिसे अक्‍सर उद्धृत किया गया है - विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्‍त सामरिक साझेदारी ने हमारे संबंध को मात्र क्रेता एवं विक्रेता के स्‍तर से ऊपर उठाकर विभिन्‍न क्षेत्रों में संयुक्‍त साझेदारी पर पहुंचाया है जिसके तहत रक्षा से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान शामिल हैं। मेरा यह मानना है कि आने वाले वर्षों में यह संबंध और आगे बढ़ेगा।

तास : राष्‍ट्रपति महोदय, आपने बिल्‍कुल ठीक कहा है कि भारत और रूस सामरिक साझेदारी के माध्‍यम से एक - दूसरे से जुड़े हैं। यह विदेशी राजनीतिक क्षेत्र में सबसे अधिक स्‍पष्‍ट है जहां भारत और रूस दोनों ही अंतर्राष्‍ट्रीय समस्‍याओं की व्‍यापक रेंज के बारे में बहुत समान राय रखते हैं। हम संयुक्‍त राष्‍ट्र, ब्रिक्‍स तथा शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों में बहुत निकटता से आपस में सहयोग करते हैं। कई साल तक भारत के विदेश मंत्री के रूप में अपने अनुभव के आधार पर आप इस विदेशी राजनीतिक क्षेत्र में हमारे देशों के बीच सहयोग को किस रूप में देखते हैं?

माननीय राष्‍ट्रपति :जैसा कि मैंने अनेक अवसरों पर कहा है, हमारी साझी धारणा ने बहुराष्‍ट्रीय मंचों, द्विपक्षीय मंचों तथा संयुक्‍त राष्‍ट्र में एक साझी रणनीति अपनाने में हमारी मदद की है। यदि मैं इतिहास के पन्‍नों पर नजर डालूं, तो 1970 के दशक के पूर्वार्ध में जब तत्‍कालीन पूर्वी पाकिस्‍तान, अब बंग्‍लादेश, के लोग अपनी आजादी के लिए लड़ रहे थे तब भारत के साथ ही रूस ने भी उनका साथ दिया था। और संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद सहित विभिन्‍न अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों में लिए गए सबसे निर्णायक निर्णयों ने एक नए राष्‍ट्र के सृजन का मार्ग प्रशस्‍त किया जो आज अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय का एक महत्‍वपूर्ण सदस्‍य है। मैं बस आपको एक उदाहरण दे रहा हूँ। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जैसा कि आपने बिल्‍कुल ठीक कहा है, पिछले पांच दशकों से भी अधिक समय में हमने बहुराष्‍ट्रीय मंचों के अलावा क्षेत्रीय मंचों में भी एक - दूसरे के साथ सहयोग किया है।

मुझे आज भी याद है कि 2006 में जब ब्रिक की संकल्‍पना शुरू हुई थी (मूल रूप से यह ब्रिक्‍स न होकर ब्रिक था जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे)। ब्रिक्‍स के विदेश मंत्रियों ने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा के सत्र के दौरान अतिरिक्‍त समय में 2006 में बैठक की। रूस के विदेश मंत्री लावरोव, जो इस पद पर आज भी बने हुए हैं, तथा हम इस बैठक में शामिल हुए थे। इसके बाद एक शिखर बैठक हुई थी।

हमने अंतर्राष्‍ट्रीय घटनाओं पर साझी धारणाओं एवं समान विचारों को साझा किया जिससे ब्रिक्‍स, शंघाई सहयोग संगठन, जी-20 के अलावा संयुक्‍त राष्‍ट्र में भी पिछले वर्षों में हमारा संबंध सुदृढ़ हुआ है।

तास :राष्‍ट्रपति महोदय, भारत ने अपने विकास एवं अपने अग्रगामी कदम के रूप में हाइटेक विकास के त्‍वरित मार्ग को चुना है तथा बहुत ही कम अवधि में बहुत गंभीर सफलता हासिल की है। इस क्षेत्र में भारत शीर्ष अग्रणी देशों में से एक है। ऐसी सफलता अनोखी है, इस तरह का कोई और उदाहरण नहीं है। इसके बारे में आपकी राय क्‍या है? आज विश्‍व में इस सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण क्षेत्र में इतना अधिक सफल होने के लिए भारत ने किन तंत्रों का उपयोग किया है?

माननीय राष्‍ट्रपति :बिल्‍कुल शुरूआत से ही हम वैज्ञानिक सोच का निर्माण करने, अनुसंधान के लिए प्रोत्‍साहन; नवाचार एवं प्रौद्योगिकीय विकास; संस्‍थानिक सहायता आदि प्रदान करने पर बल दे रहे हैं, जिसने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से सफलता हासिल करने में हमारी मदद की है।

इसका श्रेय हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को जाता है। उनकी बेटी, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हमारे प्रयासों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। और इसके बाद, 1990 के दशक में, भारत के भिन्‍न - भिन्‍न प्रधानमंत्रियों ने संस्‍थानिक क्षमता के निर्माण में तथा नवाचार एवं अनुसंधान को प्रोत्‍साहित करने में योगदान दिया। हमारा यह मानना है कि सफलता के लिए, चाहे लोकतांत्रिक परिवर्तन के क्षेत्र में हो या सामाजिक - आर्थिक उत्‍थान के क्षेत्र में, नीतियों के लिए संस्‍थानिक समर्थन कार्यक्रमों को लागू करने के लिए नितांत आवश्‍यक है। यह उन कारणों में से एक है जिनकी वजह से हम सफलता प्राप्‍त कर सके। हमारी संस्‍थाएं उत्‍कृष्‍ट हैं तथा भारत ने उनका अभीष्‍ट उपयोग किया है।

हमारे कुछ पथ-प्रदर्शकों तथा प्रख्‍यात वैज्ञानिकों जैसे कि परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में डा. भाभा तथा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में डा. विक्रम साराभाई ने अमूल्‍य योगदान दिया। और हमने अपने बुनियादी दर्शन को हमेशा ध्‍यान में रखा कि विज्ञान का प्रयोग पूरी दुनिया में लोगों के कल्‍याण के लिए किया जाना चाहिए, न कि महाशक्ति बनने की होड़ के लिए और पूरी दुनिया के विनाश के लिए, अपितु बेहतर सामाजिक एवं आर्थिक जीवन के लिए पूरी दुनिया के लोगों के उत्‍थान के लिए।

तास :राष्‍ट्रपति महोदय, अब आप राष्‍ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के मध्‍य में हैं। भारत के राष्‍ट्रपति के सर्वोच्‍च पद तक पहुंचने के लिए आपने एक लंबा रास्‍ता तय किया है। अतीत में आप अनेक मंत्रालयों के मंत्री रह चुके हैं। अभी भी आपके सामने राष्‍ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल का आधा समय बाकी है। इस समय राष्‍ट्रपति के रूप में आप क्‍या कर रहे हैं? क्‍या करने की जरूरत है तथा अपने कार्यकाल के अगले आधे समय में आपके लक्ष्‍य क्‍या हैं?

माननीय राष्‍ट्रपति :मैं इस बात को स्‍पष्‍ट करना चाहता हूँ कि हमारे संविधान के अनुसार राष्‍ट्रपति कार्यपालक प्राधिकारी नहीं है। भारत गणराज्‍य में कार्यपालक की शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्‍व में मंत्रिमंडल के पास है। राष्‍ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह के अनुसार काम करने के लिए बाध्‍य है। परंतु, संविधान को बनाए रखना, इसकी रक्षा करना तथा बचाव करना राष्‍ट्रपति की जिम्‍मेदारी है। यह एक महत्‍वपूर्ण भूमिका है जिसे वह निभात है।

हमारे संवैधानिक पदों पर काम करने वाला हर व्‍यक्ति संविधान में सच्‍ची आस्‍था रखने और इसका पालन करने की शपथ लेता है। परंतु जब गणराज्‍य के राष्‍ट्रपति को भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश द्वारा पद की शपथ दिलाई जाती है, तो राष्‍ट्रपति संविधान को बनाए रखने, इसकी रक्षा करने एवं बचाव करने की शपथ लेता है। इस प्रकार, यह मेरा कार्य है।

राष्‍ट्रपति की संवैधानिक शक्ति उस समय बहुत महत्‍वपूर्ण जांच करने की है जब आम चुनाव के बाद नए प्रधानमंत्री एवं मंत्री परिषद की नियुक्ति का मुद्दा उठता है। यदि बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट बहुमत होता है, जैसा कि 2014 के आम चुनाव में हुआ है, तो राष्‍ट्रपति का कार्य सरकार बनाने के लिए बहुमत वाले दल के नेता को आमंत्रित करना है तथा उनकी सलाह पर मंत्रियों की नियुक्ति करना बहुत सरल हो जाता है। 1950 से भारत में अधिकांश बार ऐसा हुआ है। परंतु, इस चुनाव से पूर्व, पिछले 20 वर्षों में 1989 से लेकर 2009 तक भारतीय संसद के लिए चुनाव में खंडित जनादेश प्राप्‍त हुए थे। किसी व्‍यक्तिगत दल या दलों के समूह के लिए कोई स्‍पष्‍ट बहुमत नहीं था। और, यह निर्णायक क्षण होता है जब राष्‍ट्रपति को इस निष्‍कर्ष पर पहुंचना होता है कि कौन सरकार बना सकता है तथा प्रणाली में राजनीतिक स्थिरता प्रदान कर सकता है।

कई बार, ऐसा हो सकता है कि जिस सरकार की उन्‍होंने नियुक्ति की है उसका कार्यकाल बहुत लंबा न हो। मंत्री परिषद लोक सभा के प्रति जबावदेह होती है तथा पहला महत्‍वपूर्ण कार्य विश्‍वास मत के रूप में या अन्‍य कुछ महत्‍वपूर्ण अवसरों पर घटित होता है जहां सदन मतदान के माध्‍यम से अपनी इच्‍छा की अभिव्‍यक्ति करता है। यदि कार्यपालक इस परीक्षा में पास होने में असफल रहता है, तो इसका अभिप्राय यह होता है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्‍व में मंत्री परिषद को त्‍यागपत्र देना होगा। इस प्रकार, राष्‍ट्रपति को अपने विवेक का प्रयोग करने और निर्णय लेने की जरूरत होती है। और, इस मामले पर काम करने के लिए प्रधानमंत्री या मंत्रिमंडल से कोई सलाह नहीं मिलती है क्‍योंकि उस समय उनका अस्तित्‍व नहीं होता है। प्रधानमंत्री का कार्यालय और मंत्री परिषद काम चलाऊ सरकार के रूप में होते हैं।

हमारी प्रथा यह है कि जब भी आम चुनाव के परिणाम आते हैं, तो निवर्तमान प्रधानमंत्री राष्‍ट्रपति को अपना त्‍यागपत्र सौंपता है। राष्‍ट्रपति उनको बताता है कि अपनी राय तैयार करने में उनको कुछ समय लगेगा। वह निवर्तमान प्रधानमंत्री से तब तक काम करते रहने के लिए कहता है जब तक कि वैकल्पिक व्‍यवस्‍था नहीं हो जाती है। यही इस साल हुआ तथा हर पांच साल में यह नाटक दोहराया जाता है। इस प्रकार, राष्‍ट्रपति के सबसे महत्‍वपूर्ण कार्यों में से यह एक कार्य है।

दूसरी बात जो है उसे मैंने राष्‍ट्रपति के रूप में नियुक्‍त होने पर किया है। राष्‍ट्राध्‍यक्ष के रूप में मैं अपनी संवैधानिक सीमाओं को जानता हूँ। परंतु साथ ही मैंने सोचा कि मैं स्‍वयं राष्‍ट्रपति भवन के बारे में काफी कुछ कर सकता हूँ। हमारा एक बहुत बहुमूल्‍य कला संग्रह है। हमारी एक विशाल लाइब्रेरी है जिसमें अनेक महत्‍वपूर्ण घटनाओं को रिकार्ड किया गया है। पिछले 70-75 साल के समकालीन भारत का इतिहास इस भवन के इर्द-गिर्द जमा है। और इस भवन अर्थात राष्‍ट्रपति भवन के चारों ओर एक तरह का रहस्‍य है। इस प्रकार, मैंने दौरा करने के लिए आम आदमी के लिए राष्‍ट्रपति भवन को खोलकर इस रहस्‍य को दूर करने का प्रयास किया ताकि वे कुछ महत्‍वपूर्ण कमरों, स्‍थानों, कोनों को देख सकें, जहां इस देश की नियति का मार्गदर्शन करने के लिए महत्‍वपूर्ण निर्णय लिए गए।

मैं एक संग्रहालय का भी निर्माण कर रहा हूँ जहां अनेक महत्‍वपूर्ण प्रदर्शनियां होंगी। मैंने राष्‍ट्रपति भवन के बारे में कुछ प्रकाशन निकाले हैं। फरवरी के मध्‍य से लेकर मार्च के मध्‍य तक वसंत ऋतु के दौरान भारी संख्‍या में आगंतुक यहां आए, 5,00,000 से अधिक लोगों ने मुगल गार्डन का दौरा किया। इस गार्डन को, जहां हमने संक्षिप्‍त वाक किया है, को मुगल गार्डन के नाम से जाना जाता है।

मैं विश्‍वविद्यालयों एवं उच्‍च शिक्षा संस्‍थाओं को संबोधित करता हूँ। मैं उनका दौरा करता हूँ तथा उनको सलाह देता हूँ। मैं उभरते कलाकारों, युवा नवाचारियों, लेखकों एवं चित्रकारों को प्रोत्‍साहित भी करता हूँ। चयनित व्‍यक्तियों को हमारे साथ ठहरने, राष्‍ट्रपति भवन की जीवन शैली को साझा करने के लिए आमंत्रित किया जाता है तथा वे इसका लुत्‍फ उठाते हैं। मैं यह सब काम कर रहा हूँ।

तास :राष्‍ट्रपति महोदय, मैं भारत में इसके किचन के बारे में सबसे उल्‍लेखनीय, प्रसिद्ध चीजों में से एक का हवाला देना चाहूँगा। भारत ऐसा देश है जो सभी अन्‍य देशों से बहुत भिन्‍न है। यह अनोखा देश है परंतु इस दृष्टि से भारतीय किचन सबसे अनोखी एवं विशेष है। मैं जानता हूँ कि भारी संख्‍या में लोक इसके मसालों के अलावा भारतीय किचन के प्रशंसक हैं। राष्‍ट्रपति महोदय, आपको कौन से व्‍यंजन पसंद हैं? आपका मनपसंद खाना क्‍या है और आमतौर पर आम क्‍या खाते हैं? उदाहरण के लिए, यदि आप उनके लिए खाना तैयार करा रहे हैं जो भारत के दौरे पर आए हैं?

माननीय राष्‍ट्रपति :यह बहुत रोचक प्रश्‍न है। मुझे यह स्‍वीकार करना चाहिए कि भोजन, भाषा, संस्‍कृति, जाति एवं जीवन शैली की दृष्टि से भारत में बहुत विविधताएं हैं। भिन्‍न - भिन्‍न भागों में आपको भिन्‍न - भिन्‍न प्रकार के भोजन देखने को मिलेंगे। मैं बंगाल के पूर्वी भाग से हूँ। निश्चित रूप से, रूस के साथ हमारा बहुत पुराना संबंध है। हमारे कवि रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्‍होंने 1930 के दशक में रूस का दौरा किया था, ने अपने बेटे एवं अन्‍यों सहित अपने रिश्‍तेदारों को रूस से कुछ सुदंर पत्र लिखे हैं जिनका अंग्रेजी में अनुवाद ''लेटर्स फ्राम रसिया'' के रूप में किया गया है। वह तथा हर बंगाली, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, मिष्‍ठान एवं चावल, चावल के विभिन्‍न प्रकार के व्‍यंजनों के बहुत शौकीन हैं।

दक्षिण भारत के लोग भी चावल से बने व्‍यंजनों को पसंद करते हैं परंतु तैयार करने का उनका तरीका भिन्‍न होता है। उत्‍तर- पश्चिमी भारत के लोग गेहूँ के बहुत शौकीन हैं। इस प्रकार, बॉम्‍बे की बतख से लेकर विभिन्‍न अन्‍य व्‍यंजनों तक भारत के भिन्‍न - भिन्‍न भाग में आपको भिन्‍न - भिन्‍न व्‍यंजन मिलेंगे। मैं कह सकता हूँ कि पश्चिम में बॉम्‍बे की बतख से पूर्वी भाग में बहुत अच्‍छे मिष्‍ठान जिसे रसगुल्‍ला कहा जाता है, भारतीय व्‍यंजन की बहुत व्‍यापक रेंज उपलब्‍ध है। मेरी समझ से रूस से आने वाले लोग इन सब चीजों का लुत्‍फ उठाएंगे। निश्चित रूप से, राष्‍ट्रपति भवन में हम दावत के लिए विभिन्‍न प्रकार के भारी संख्‍या में व्‍यंजन तैयार करते हैं। हम अपने मेहमानों को पश्चिम शैली के भोजन भी परोसते हैं।

तास :राष्‍ट्रपति महोदय, आपने रवींद्रनाथ टैगोर का नाम लिया। मुझे उनकी कविताएं बहुत अच्‍छी लगती हैं जिनका रूसी भाषा में अनुवाद किया गया है तथा कई बार रूस एवं सोवियत संघ ने उनको प्रकाशित किया गया है। साहित्‍य प्रेमी उनका बहुत सम्‍मान करते हैं। मुझे पता है कि आपको उनकी कुछ कविताएं अच्‍छी तरह याद हैं। हालांकि यह मेरे लिए थोड़ी गुस्‍ताखी होगी परंतु क्या आप उनके कुछ कविताओं को पढ़कर हमारे लिए सुना सकते हैं।

माननीय राष्‍ट्रपति :निश्चित रूप से, मैं टैगोर की कुछ पंक्तियां सुना सकता हूँ। परंतु इससे पहले, मैं एक छोटी बात बताना चाहूँगा। आप जानते हैं टैगोर का देहांत अगस्‍त, 1941 में 80 साल की आयु में हुआ था। उनके दोस्‍तों ने लिखा है कि वह युद्ध की प्रगति जानने के लिए अखबार पढ़ा करते थे। सर्जिकल आपरेशन के लिए जाने से कुछ ही घंटे पहले उन्‍हें बताया गया कि रूस की सेना जर्मनी की सेना को आगे बढ़ने से रोकने में सफल हो रही है तथा रूस की सेना आगे बढ़ रही है। टैगोर के दोस्‍त रूस के लिए उनके प्रेम को जानते थे। टैगोर ने कहा, जी हां, वे ऐसा कर सकते हैं तथा मुझे इस बात की बड़ी प्रसन्‍नता है कि वे ऐसा करेंगे।

टैगोर ने एक बहुत सुंदर कविता लिखी है जिसमें बताया गया है कि किस तरह सदियों के दौरान भारत का विकास हुआ है। विषय 'भारत की आत्‍मा' है। मैं उद्धृत कर रहा हूँ, ''केहो नही जाने कर एओभाने कटो मनुशेर धारा''। इसका अभिप्राय यह है कि कोई नहीं जानता कि कहां से कितनी धाराएं लोगों की आई हैं तथा किस तरह वे मानवता के विशाल सागर, जो भारत है, में मिल गई हैं। ऐसा इसलिए है कि यदि आप भारतीय आबादी का विश्‍लेषण करें, तो आप पाएंगे कि यहां सभी प्रमुख जातियां एवं जातीय समूह मौजूद हैं। उत्‍तर - पश्चिम भागों में भारी संख्‍या में कॉकेशन रहते हैं। दक्षिण में भारी संख्‍या में द्रविड़ मूल के लोग रहते हैं। पूरा उत्‍तर - पूर्वी भारत मंगोलिया के लोगों से भरा पड़ा है। और विभिन्‍न जातियों का यह संगम भारत की विशेषता है।

यह भी रोचक है कि हमारे नोबल पुरस्‍कार विजेता रवींद्र नाथ टैगोर ने 1930 में उस समय कुछ छात्रों के समक्ष 'जन गण मन' गाया जो आज भारत का राष्‍ट्रगान है जब वह रूस में अलीसा किंगीना कम्‍यून ऑफ पाइनियर के दौर पर गए थे।

टैगोर ने हमेशा मानवता की बात की तथा मानव आत्‍मा की बात की जो विशाल है तथा किसी संकीर्ण सीमा के अंदर उसे नहीं बांधा जा सकता है।

तास :राष्‍ट्रपति महोदय आपका धन्‍यवाद, आपने महान भारतीयों तथा एक महान बंगाली के बारे में उत्‍कृष्‍ट शब्‍द कहा। वह महान विवेक वाले व्‍यक्ति थे। राष्‍ट्रपति महोदय, मुझे पता है कि आप 80वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। हम अग्रिम में नहीं मनाते हैं। मुझे उम्‍मीद है कि हमें जश्‍न मनाने का अवसर प्राप्‍त होगा। लगभग 60 साल के अपने जीवन में आप अपनी पत्‍नी के साथ रहे हैं। आपके भव्‍य बच्‍चे हैं। आपने अपने बच्‍चों को क्‍या सलाह दी है? अपनी उम्र की ऊंचाई से परिवार की किन परंपराओं को आप सबसे अधिक महत्‍व देते हैं?

माननीय राष्‍ट्रपति :मेरे परिवार की मूल्‍य पंरपरा औसत भारतीय की मूल्‍य परंपरा है जो हमें हमारी सभ्‍यता के मूल्‍यों के रूप में विरासत में मिली है। भारत में, पारिवारिक रिश्‍ता ऐसी चीज है जो भारत के लोगों के लिए बहुत पवित्र है। लोगों की इन विशाल विविधताओं के साथ कानूनी पात्रताएं हैं; परंतु शायद की कोई तलाक होता है। हम इन मूल्‍यों के साथ पले - बढ़ें हैं।

मेरी पत्‍नी खुद एक कलाकार है तथा टैगोर के गीतों को बहुत अच्‍छी तरह गाती है। मेरी बेटी कथक की नृत्‍यांगना है, जो एक भारतीय शास्‍त्रीय नृत्‍य है। अब वह राजनीति में है। मेरा बड़ा बेटा, जो इंजीनियर है तथा स्‍टील मेटलर्जी में विशेषज्ञ है, आज संसद सदस्‍य है। पहले वह पश्चिम बंगाल की विधान सभा का सदस्‍य था।

मेरा परिवार एक राजनीतिक परिवार है। मेरा बेटा तीसरी पीढ़ी का विधायक है। मेरे पिता स्‍वतंत्रता सेनानी थे जिन्‍होंने ब्रिटेन की साम्राज्‍यवादी ताकतों तथा भारत में ब्रिटिश शासन के विरूद्ध संघर्ष किया। स्‍वतंत्रता संग्राम के दौरान वह कई साल तक जेल में रहे।

मेरे परिवार की तीन पीढि़यां विधायिका की सदस्‍य बन गई हैं।

पारिवारिक मूल्‍य महत्‍वपूर्ण हैं तथा ये मूल्‍य हमें हमारी सभ्‍यता के प्रमुख मूल्‍यों ने विरासत में मिलते हैं।

तास :राष्‍ट्रपति महोदय, मेरा एक आखिरी प्रश्‍न। हमारे कार्यक्रम को सत्‍ता का सूत्र, सत्‍ता का समीकरण कहा जाता है यदि आप इसे ऐसी संज्ञा देना पसंद करते हैं। आप कुछ वर्षों के राष्‍ट्रपति हैं तथा आप कई वर्षों तक मंत्री रहे हैं। मैं साक्षात्‍कारों में हमेशा यही प्रश्‍न पूछता हूँ। आपके लिए सत्‍ता क्‍या है? इसका स्‍वाद कैसा है?

माननीय राष्‍ट्रपति :यह एक शाश्‍वत प्रश्‍न है जिसे कई लोग पूछते हैं। कुछ समय पहले, मैंने इस बारे में एक बहुत रोचक पुस्‍तक पढ़ी है कि किस तरह अमरीका के राष्‍ट्रपतियों, जैसे कि जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन, राष्‍ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्‍ट जो द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान अमरीका के राष्‍ट्रपति थे, तथा इसके बाद राष्‍ट्रपति कैनेडी, राष्‍ट्रपति जॉनसन, राष्‍ट्रपति क्लिंटन आदि ने अपनी ताकत का प्रयोग किया।

सत्‍ता को परिभाषित करना बहुत कठिन है। परंतु मेरा जो विश्‍वास है वह यह है कि सत्‍ता का संचयन एवं संकेंद्रण नहीं होना चाहिए। यह भी भारतीय सभ्‍यता का एक प्रमुख मूल्‍य है। सत्‍ता विकीर्णन एवं बिखराव है। यदि आप वास्‍तव में सत्‍ता का लुत्‍फ उठाना चाहते हैं, तो आपको सत्‍ता का त्‍याग करना होगा। हालांकि यह विरोधाभासी प्रतीत होता है, परंतु यह विरोधाभासी नहीं है। इसी वजह से यदि आप अंतत: विश्‍वास करते हैं कि सत्‍ता लोगों के हाथ में है जिनकी आपको सेवा करनी है, तो आप सही मायने में सत्‍ता का लुत्‍फ उठा सकते हैं। और यदि आप संकेंद्रित करना चाहते हैं, तो संभवत: इससे यह उक्ति सही हो सकती है - ''सत्‍ता भ्रष्‍ट बनाती है तथा परम सत्‍ता बिल्‍कुल भ्रष्‍ट बना देती है।''

तास :... ... ...
माननीय राष्‍ट्रपति :धन्यवाद।

यह साक्षात्‍कार भारत के राष्‍ट्रपति की वेबसाइट पर उपलब्‍ध है तथा आप इसे http://www.presidentofindia.nic.in/foreignvisitdetail.htm?28&fvid=11​ पर देख सकते हैं।
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