मीडिया सेंटर मीडिया सेंटर

टाइम पत्रिका के लिए प्रधानमंत्री का साक्षात्‍कार

मई 08, 2015

2 मई को, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी टाइम पत्रिका के संपादक नैन्‍सी गिब्‍स, एशिया के संपादक जौहर अब्‍दुलकरीम और दक्षिण एशिया ब्‍यूरो के प्रमुख निखिल कुमार के साथ नई दिल्‍ली में दो घंटे के अनन्‍य साक्षात्‍कार के लिए बैठे। ज्‍यादातर हिंदी में बोलते हुए, मोदी ने भारत के लिए अपनी आकांक्षाओं, आतंकवाद पर वैश्विक युद्ध के अलावा ऐसी हर बातों पर बात की जो निजी तौर पर उनको विचलित करती हैं। पूर्ण साक्षात्‍कार के बाद अनूदित एवं संक्षिप्‍त हाइलाइट :

भारत को चलाने के बारे में अब तक उन्‍होंने जो कुछ सीख है : सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मैं संघ सरकार की संरचनाओं के लिए नया हूँ। भिन्‍न - भिन्‍न विभाग अपने - अपने ढंग से काम करते हैं - ऐसा प्रतीत होता है कि हर विभाग अपने आप में सरकार है। मेरा प्रयास इस बुखारी को तोड़ना है ताकि हर व्‍यक्ति - सामूहिक ढंग से किसी समस्‍या को देख पाए। मैं संघ सरकार को एक संयोजित संस्‍था के रूप में नहीं देखता हूँ, अपितु इसे एक जैविक संस्‍था के रूप में देखता हूँ।

आप यूएस को किस रूप में देखते हैं : हम स्‍वाभाविक मित्र हैं ... यह इस बारे में नहीं है कि यूएस के लिए भारत क्‍या कर सकता है, भारत के लिए यूएस क्‍या कर सकता है ... जिस रूप में हमें इसे देखना चाहिए वह यह है कि भारत और यूएस पूरी दुनिया के लिए ... हर जगह लोकतांत्रिक मूल्‍यों को सुदृढ़ करने के लिए साथ मिलकर काम कर सकते हैं।

चीन के साथ भारत के कभी - कभी तनावपूर्ण संबंधों पर : लगभग तीन दशक से भारत - चीन सीमा पर कुल मिलाकर शांति एवं अमन - चैन है। लगभग एक चौथाई शताब्‍दी में एक भी गोली नहीं चली है। दोनों देश महान परिपक्‍वता तथा आर्थिक सहयोग के लिए प्रतिबद्धता का प्रदर्शन कर रहे हैं।

अफगानिस्‍तान में तालिबान के सत्‍ता में वापस आने की संभावना पर : यूएस सैनिकों की वापसी वास्‍तव में अमरीकी सरकार का एक स्‍वतंत्र निर्णय है, परंतु अफगानिस्‍तान में स्थिर सरकार के हित में, यूएस सैनिकों की वापसी के बाद उनकी सुरक्षा संबंधी आवश्‍यकताओं को समझने के लिए अफगान सरकार के साथ परामर्श का आयोजन करना महत्‍वपूर्ण होगा।

आतंकवाद के खतरे से निपटने पर : हमें नेम प्‍लेट से आतंकवाद को नहीं देखना चाहिए - किस गुट से उनका संबंध है, उनका भौगोलिक लोकेशन क्‍या है, पीडि़त कौन हैं। ये व्‍यक्तिगत गुट या नाम बदलते रहेंगे। आज, आप तालिबान या आई एस आई एस को देख रहे हैं; कल आपको दूसरे नाम देखने को मिल सकते हैं।

हमें अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद पर संयुक्‍त राष्‍ट्र के व्‍यापक अभिसमय को पारित करना चाहिए। कम से कम यह स्‍पष्‍ट रूप से स्‍थापित करेगा कि आपको किसे आतंकी के रूप में देखना चाहिए और किसे नहीं देखना चाहिए। हमें इस क्षेत्र से आतंकवाद की कड़ी को समाप्‍त करने की जरूरत है - आतंकियों को अलग-थलग करने की जरूरत है जो आतंकवाद एवं क्षेत्र के बीच इस परस्‍पर परिवर्तनीय दलीलों का प्रयोग करते हैं।

अनेक देश आतंकवाद को व्‍यक्तिगत देशों की कानून व्‍यवस्‍था की समस्‍या के रूप में देखा करते थे। हमें इसे ऐसी चीज के रूप में देखना चाहिए जो मानवीय मूल्‍यों के लिए लड़ाई है।

क्‍या आर्थिक सुधार दूर तक पहुंचे हैं और इनकी गति पर्याप्‍त है : (इस बार) पिछले साल सरकार ने कुछ भी घटित होता हुआ प्रतीत नहीं हुआ। ऐसा प्रतीत हुआ कि नीतिगत दृष्टि से पूरी तरह से लकवा मार गया है ... कोई नेतृत्‍व नहीं था। मेरी सरकार के सत्‍ता में आने को पिछली सरकार के दस साल के विकास बनाम मेरी सरकार के दस माह के विकास के संदर्भ में देखा जाना चाहिए ... भारत तथा भारत में मौजूद अवसरों को लेकर एक बार फिर से पूरी दुनिया उत्साहित और प्रोत्‍साहित है। चाहे यह आई एम एफ हो, या विश्‍व बैंक या मूडी या अन्‍य क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां हों, वे सभी एक आवाज में कह रही हैं कि भारत का आर्थिक भविष्‍य बहुत उज्‍ज्‍वल है।

क्‍या आप उस तरह की एकाधिकारवादी सत्‍ता के पक्ष में हैं जो चीन के नेता के पास है : भारत लोकतांत्रिक देश है; यह हमारे डी एन ए में है। जहां तक विभिन्‍न राजनीतिक दलों का संबंध है, मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि ऐसे निर्णय लेने के लिए उनमें परिपक्‍वता एवं विवेक है जो राष्‍ट्र के सर्वोत्‍तम हित में है। इस प्रकार, यदि आप मुझसे यह पूछ रहे हैं कि क्‍या भारत को चलाने के लिए आपको तानाशाही की जरूरत है, तो जी नहीं, आपको इसकी जरूरत नहीं है। क्‍या आपको ऐसे ताकतवर व्‍यक्ति की जरूरत है, जो सत्‍ता के संकेंद्रण में विश्‍वास रखता है, तो जी नहीं, आपको इसकी जरूरत नहीं है। यदि आप मुझे लोकतांत्रिक मूल्‍यों तथा संपदा, सत्‍ता, समृद्धि एवं ख्‍याति के बीच चयन करने के लिए कहेंगे, तो मैं बहुत सरलता से और किसी संकोच के बगैर लोकतांत्रिक मूल्‍यों को चुनूंगा।

भारत की धार्मिक विविधता पर, जिसके बारे में कुछ नागरिकों का विश्‍वास है कि यह संकट में है : मेरा दर्शन, मेरी पार्टी का दर्शन तथा मेरी सरकार का दर्शन सबका साथ, सबका विकास है। हर व्‍यक्ति को साथ लेकर समावेशी विकास के लिए आगे बढ़ो। जहां कहीं भी किसी अल्‍पसंख्‍यक धर्म के बारे में नकारात्‍मक सोच व्‍यक्‍त की जाती है, हमने तुरंत उसे नकारा है। जहां तक सरकार का संबंध है, केवल एक पवित्र ग्रंथ है जो भारत का संविधान है। भारत की एकता एवं अखंडता सर्वोच्‍च प्राथमिकता है। सभी धर्मों तथा सभी समुदायों के एक जैसे अधिकार हैं तथा उनकी पूर्ण एवं सकल सुरक्षा का सुनिश्‍चय करना मेरी जिम्‍मेदारी है। मेरी सरकार जाति, पंथ और धर्म के आधार पर किसी भेदभाव को बर्दाश्‍त या स्‍वीकार नहीं करेगी।

कौन सी चीजें आपको प्रभावित करती हैं : (सांस रोकते हैं और आंसू पोंछते हैं।) यह मेरे हृदय को गहराई तक छू जाता है। मेरा जन्‍म बहुत ही गरीब परिवार में हुआ है। बचपन में मैं रेल के डिब्‍बों में चाय बेचा करता था। मेरी मां बरतन धोया करती थी तथा जीविका कमाने के लिए दूसरों के घरों में निम्‍न स्‍तर के घरेलू काम करती थी। मैंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है। मैंने गरीबी का जीवन जीया है। बच्‍चे के रूप में, मेरा पूरा बचपन गरीबी में बीता है। मेरे लिए गरीबी, एक तरह से मेरे जीवन की पहली प्रेरणा थी ... मैं तय किया कि मैं अपने लिए नहीं जिऊँगा, अपितु दूसरों के लिए जीऊँगा।

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी : सबसे पहले भारत में आप सभी का स्‍वागत है। यह आपकी भारत की पहली यात्रा है तथा मुझे इस बात की प्रसन्‍नता है कि अपनी पहली यात्रा पर ही आपने मुझे मुलाकात का अवसर प्रदान किया है। मुझे उम्‍मीद है कि यह अवसर, आपकी यह यात्रा भारत में अधिक बार वापस आने के लिए आपको अवसर प्रदान करेगी।

टाइम : धन्‍यवाद, हम भी ऐसी ही उम्‍मीद रखते हैं। मैं वर्षगांठ की बधाई के साथ अपनी बात शुरू करना चाहूँगा। अब आपकी सरकार के लगभग एक साल पूरे होने वाले हैं। इसलिए, मैं जानना चाहता हूँ कि किन चीजों ने आपको सबसे अधिक अचंभित किया। आपने अक्‍सर कहा है कि आप बाहरी हैं। अब जबकि आप पूरी तरह अंदरूनी हो गए हैं, आपने किन अच्‍छाइयों एवं अवसरों तथा बाधाओं को देखा है जिनका आप उन कार्यक्रमों में सामना कर रहे हैं जिनको आप आगे बढ़ाने की उम्‍मीद कर रहे हैं?

मोदी : चालीस साल से अधिक के अपने राजनीतिक जीवन में, मुझे पूरे भारत का भ्रमण करने का अवसर एवं मौका मिला है। भारत के ऐसे 400 से अधिक जिले होंगे जहां हमने संभवत: एक रात गुजारी है। इस प्रकार, मैं भारत की अच्‍छाइयों से पूरी तरह अवगत हूँ, मुझे उन चुनौतियों की अच्‍छी तरह जानकारी है जो हमारे सामने मौजूद हैं, मुझे उनके प्रति कोई अनभिज्ञता नहीं है। मेरे लिए जो अपेक्षाकृत नया था वह संघीय सरकार की संरचनाएं, प्रणालियां, संघीय सरकार के स्‍तर पर हमारे काम करने का तरीका है। यह वह भाग है जिसे मैं यहां सरकार में आने से पूर्व परिचित नहीं था।

मेरी समझ से सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मैं संघीय सरकार की संरचनाओं के लिए नया था। वे मेरे लिए नई थी, मैं उनके लिए नया था, इसलिए, एक - दूसरे के परिप्रेक्ष्‍य को समझने का प्रश्‍न था। परंतु बहुत कम समय में बहुत संकेंद्रित एवं प्रतिबद्ध कार्रवाइयों के माध्‍यम से मैंने इस कमी को दूर किया है। अब हमारी सोच में तालमेल है। मैं उनको बहुत अच्‍छी तरह समझता हूँ, वे मुझे बहुत अच्‍छी तरह समझते हैं। इसकी वजह से, बहुत कम समय में हम संघीय संरचना के अंदर एक अबाध, सीवन रहित कार्य तंत्र स्‍थापित करने में समर्थ हुए हैं। लंबे समय तक मैं गुजरात का मुख्‍यमंत्री रहा हूँ। मैं बहुत अच्‍छी तरह जानता हूँ कि केंद्र सरकार भारत के राज्‍यों के बारे में क्‍या सोचती है तथा संघीय सरकार के बारे में राज्‍य सरकारों की सोच क्‍या है। मैं सोच की इस प्रक्रिया को बदलना चाहता हूँ, चिंतन की मौलिक प्रक्रिया को बदलना चाहता हूँ कि किस तरह संघीय सरकार एवं राज्‍य सरकारों को एक - दूसरे के बारे में सोचना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि संघीय सरकार तथा राज्‍य सरकारें देश के लिए साथ मिलकर काम करें। मौलिक रूप से मैं उस सोच में पूर्ण परिवर्तन लाना चाहता हूँ कि संघीय सरकार राज्‍य सरकारों के लिए दाता है और राज्‍य सरकारें संघीय सरकार से बड़े पैमाने पर प्राप्‍तकर्ता हैं। और मेरी समझ से बहुत ही कम समय में मैंने काफी हद तक इस उद्देश्‍य को प्राप्‍त करने में सफलता प्राप्‍त की है।

मैंने इसके लिए एक शब्‍द गढ़ा है जिसे मैं सहयोगात्‍मक संघवाद कहता हूँ। वास्‍तव में मैंने एक कदम आगे बढ़ाया तथा इसे सहयोगात्‍मक प्रतिस्‍पर्धी संघवाद की संज्ञा दी। मूल रूप से धारणा यह है कि देश के विकास के लिए एक - दूसरे के साथ होड़ करने के लिए भिन्‍न - भिन्‍न राज्‍य सरकारों को प्रोत्‍साहित करने की जरूरत है। मूल रूप से मैंने जो करने का प्रयास किया है तथा मेरी समझ से हम इसे करने में समर्थ हुए हैं, वह यह है कि हमने राष्‍ट्र को एक ध्रुव वाले विकास राष्‍ट्र से परिवर्तित करके इसे विकास के 30 ध्रवों वाले राष्‍ट्र में परिवर्तित किया है; भारत में कुल 29 राज्‍य और एक संघीय केंद्र हैं।

इसी तरह, संघीय शासन में प्रवेश करने के बाद मेरा यह अनुभव है कि भारत सरकार के भिन्‍न - भिन्‍न विभाग अलग - थलग रूप में काम करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि हर विभाग अपने आप में सरकार के रूप में काम करता है। इसका कारण यह है कि पिछले तीन दशकों से संघीय स्‍तर पर बहुमत की कोई सरकार नहीं रही है; मूलरूप से गठबंधन की सरकारें रही हैं जिनका सरकारी प्रणालियों पर भारी असर हुआ है जिससे साइलो का सृजन हुआ है। मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहा हूँ कि ये साइलो टूट जाएं, यह कि एक सामूहिक चिंतन प्रक्रिया का सृजन हो जिससे संघीय सरकार का सृजन हो। और मेरी समझ से हम बहुत कम समय में इसे प्राप्‍त करने में समर्थ हुए हैं जिसमें हर कोई समूह के रूप में साथ मिलकर सोचता है, हर कोई साथ मिलकर काम करता है। और इसके अलावा, इसने संघीय शासन की प्रशासनिक प्रणाली को फिर से जीवंत बनाया है जो व्‍यक्तिगत साइलो की तुलना में सामूहिक ढंग से किसी समस्‍या को देखती है।

मैं संघीय शासन को संयोजित ईकाई के रूप में नहीं देखता हूँ, अपितु इसे एक जैविक ईकाई के रूप में देखता हूँ ताकि हर कोई दूसरे की समस्‍या को समझ सके और उन समस्‍याओं को दूर करने के लिए साथ मिलकर सामूहिक ढंग से काम कर सके।

टाइम : अब हम यूएस, भारत - यूएस संबंध पर आते हैं, राष्‍ट्रपति ओबामा ने आपकी और अभी हाल ही में टाइम 100 की बहुत तारीफ की है। जैसा कि आप भारत को बदलना चाहते हैं, जैसा कि आपने कहा, आप सरकार को बदलना चाहते हैं, आपकी समझ से यूएस को किस तरह आपको देखना चाहिए - साझेदार के रूप में, आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में? उदाहरण के तौर पर क्‍या ''मेक इन इंडिया'' का अभिप्राय यह है कि यूएस से यहां अधिक नौकरियां आएंगी? इस प्रकार, सेवा क्षेत्र पर जो हमारे बीच चर्चा चल रही है, क्‍या वह विनिर्माण क्षेत्र पर शिफ्ट नहीं होगी? यूएस को किस रूप में आपको देखना चाहिए?

मोदी : जिस तरह से राष्‍ट्रपति ओबामा ने बहुत उदारता के साथ मेरा उल्‍लेख किया है उसका मैं बहुत ही आभारी हूँ। टाइम पत्रिका में हाल ही में उन्‍होंने जो लिखा है उसके लिए भी मैं उनका बहुत आभारी हूँ।

यदि मुझे एक शब्‍द में भारत - यूएस संबंध का वर्णन करना हो, तो मैं कहूँगा कि हम स्‍वाभाविक मित्र हैं। मेरी समझ से भारत और यूएस के बीच संबंध और दोनों देशों ने अपने आप में पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्‍यों को सुदृढ़ करने में बहुत महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है तथा ऐसी भूमिका निभाना जारी रखेंगे।

भारत - यूएस संबंध कैसा होना चाहिए, यूएस के लिए भारत क्‍या कर सकता है, भारत के लिए यूएस क्‍या कर सकता है, मेरी समझ से यह वस्‍तुत: बहुत सीमित दृष्टिकोण है। मेरी समझ से हमें इसे इस रूप में देखना चाहिए कि भारत और यूएस पूरी दुनिया के लिए साथ मिलकर क्‍या कर सकते हैं। इस परिप्रेक्ष्‍य में हम संयुक्‍त राज्‍य के साथ हमारे संबंध को देखते हैं।

टाइम : आप इस साल पहले ही 16 देशों का दौरा कर चुके हैं। आपकी राय में आपके अन्‍य स्‍वाभाविक दोस्‍त कौन हैं?

मोदी : मेरी समझ से पत्रकार के दृष्टिकोण से यह एक अपेक्षित प्रश्‍न है! मेरी समझ से हर देश का अपना महत्‍व है तथा हर संबंध को उसके अपने परिप्रेक्ष्‍य में देखने की जरूरत है। विश्‍व के ऐसे अनेक देश हैं जिनके साथ भारत की सामरिक साझेदारियां हैं। ऐसे अनेक अन्‍य देश भी हैं जिनके साथ हमारा ऐसा संबंध है जो कुछ अन्‍य दृष्टियों से व्‍यापक है। कुछ देश ऐसे हैं जो स्‍वाभाविक दोस्‍त के रूप में होने के लिए भी संभवत: पैदा हुए हैं, परंतु स्‍वाभाविक दोस्‍त बनने के लिए हमें अभी भी कुछ कमियों को दूर करने की जरूरत है। इस प्रकार, मेरी समझ से हर संबंध को समग्र परिप्रेक्ष्‍य में तथा इस रूप में देखना हमारे लिए जरूरी है कि किस तरह भारत हर देश के साथ उस संबंध को लेता है।

उदाहरण के लिए यदि आप भारत - यूएस संबंध को देखें, तो इस संबंध में भारतीय डायसपोरा ने जो भूमिका निभाई है वह बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। जी हां, हम लोकतांत्रिक मूल्‍यों को महत्‍व देते हैं परंतु भारत और यूएस के बीच मैत्री के रिश्‍ते को सुदृढ़ करने में भारतीय डायसपोरा ने महान भूमिका निभाई है और निश्चित रूप से दोनों देशों के बीच लोकतांत्रिक मूल्‍यों के महत्‍व को रेखांकित करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।

और हमारे विश्‍वव्‍यापी दृष्टिकोण में ... हमारे साझे लोकतांत्रिक मूल्‍यों के अलावा विश्‍व में भिन्‍न - भिन्‍न स्थितियों पर हमारे वैश्विक दृष्टिकोण में समानताएं हैं। इस प्रकार, यदि अन्‍य देशों के साथ संबंध का मुझे वर्णन करना हो, तो मैं कहूँगा कि अन्‍य देशों के साथ भारत के हर संबंध को उस संदर्भ एवं परिप्रेक्ष्‍य में देखने की जरूतर है जो एक - दूसरे से भिन्‍न हैं।

टाइम : प्रधानमंत्री महोदय, बहुत जल्‍दी आप चीन जाने वाले हैं। दक्षिण एशियाई क्षेत्र सहित वैश्विक स्‍तर पर चीन अधिकाधिक प्रभावशाली एवं हठधर्मी होता जा रहा है। भारत और चीन के बीच एक सीमा युद्ध हो चुका है तथा कई बार संबंध, माहौल तनावपूर्ण हो सकते हैं। चीन की आपकी यात्रा तथा चीन के नेतृत्‍व के साथ आपकी बैठक से चीन के साथ आप किस तरह के संबंध का निर्माण करना चाहते हैं? क्‍या आप समझते हैं कि आप चीन के नेताओं के साथ कारोबार करने में सफल हो सकते हैं? क्‍या भारत और चीन कभी दोस्‍त हो सकते हैं?

मोदी : 1962 में, 1990 के दशक के पूर्वार्ध में, भारत - चीन युद्ध के बाद भारत और चीन सीमा पर शांति एवं अमन चैन के लिए एक रूपरेखा पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा, लगभग पिछले दशकों से लेकर अब तक जब हम 21वीं शताब्‍दी में प्रवेश कर रहे हैं, कुल मिलाकर भारत - चीन सीमा पर शांति एवं अमन-चैन है। सीमा पर अस्थिरता नहीं है। लगभग एक चौथाई शताब्‍दी में एक भी गोली नहीं चली है। इससे मौलिक रूप से साबित होता है कि दोनों देशों ने इतिहास से सबक लिया है।

जहां तक विशिष्‍ट रूप से भारत - चीन संबंध का अभिप्राय है, यह सच है कि भारत और चीन के बीच लंबी सीमा रेखा है तथा इसका एक बड़ा भाग विवादि है। इसके बावजूद, मेरी समझ से दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग सुनिश्चित करने एवं प्रतिबद्ध करने के लिए पिछले दो दशकों में काफी परिपक्‍वता का प्रदर्शन किया है, जो पिछले 20 से 30 वर्षों में निरंतर बढ़ रहा है तथा इस समय यह ऐसे चरण में पहुंच गया है जहां दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्‍यापार, निवेश तथा परियोजनाओं से संबंधित भागीदारी हो रही है। विश्‍व में वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखते हुए हम आज ऐसे चरण पर पहुंच गए हैं जहां अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर चीन के साथ सहयोग करते हैं परंतु साथ ही हम उस समय चीन के साथ होड़ भी करते हैं जब वाणिज्‍य एवं व्‍यापार की बात आती है।

आपने विश्‍व में और इस क्षेत्र में चीन के प्रभाव में वृद्धि का जिक्र किया। मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि विश्‍व में ऐसा एक भी देश नहीं है, चाहे उसकी आबादी एक मिलियन हो या काफी अधिक हो, जो अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपने प्रभाव में वृद्धि नहीं करना चाहता है। मेरी समझ से अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपने प्रभाव में वृद्धि करना राष्‍ट्रों के लिए बहुत स्‍वाभाविक प्रवृत्ति है, जब वे भिन्‍न- भिन्‍न देशों के साथ अपने अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों को आगे बढ़ाते हैं। मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि अंतर्राष्‍ट्रीय कानूनों एवं विनियमों का समुचित रूप से आदर करते हुए तथा मानवीय मूल्‍यों का पूरा सम्‍मान करते हुए, मेरी समझ से इन दो परिप्रेक्ष्‍यों को ध्‍यान में रखकर हर देश को अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के लाभ के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनी उपस्थिति, अपने प्रभाव, अपने दबदबे में वृद्धि करने का अधिकार है।

टाइम : मैं एक अनुवर्ती प्रश्‍न पूछने की इच्‍छा रखता हूँ। आपकी चीन यात्रा की पूर्व संध्‍या पर, क्‍या यह राष्‍ट्रपति शी को कोई विशेष संदेश भेजना चाहते हैं? क्‍या यह अपनी यात्रा की पूर्व संध्‍या पर उनसे कुछ कहना चाहते हैं?

मोदी : मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि दो देशों के बीच संबंध, भारत - चीन संबंध, जैसा कि आपने इसका जिक्र किया, ऐसा होना चाहिए कि एक - दूसरे के साथ संचार करने के लिए वास्‍तव में हमारे लिए किसी तीसरी संस्‍था के माध्‍यम से जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इस समय हमारा जो संबंध है उसका यह स्‍तर है।

टाइम : यूएस धीरे - धीरे अफगानिस्‍तान से अपनी सैनिकों को हटा रहा है। मेरा यह मानना है कि आप तालिबान के सत्‍ता में वापस लौटने को लेकर और आई एस आई एस से खतरे को लेकर चिंतित हैं तथा आप इसे किस रूप में देखते हैं।

मोदी : आपने जो प्रश्‍न पूछा है उसके दो अलग - अलग परिप्रेक्ष्‍य हैं तथा मैं उन दोनों परिप्रेक्ष्‍यों का अलग - अलग जवाब देने का प्रयास करूंगा। पहला भारत - अफगानिस्‍तान संबंध से संबंधित है। सभी लोग अच्‍छी तरह जानते हैं कि भारत और अफगानिस्‍तान के बीच जो रिश्‍ते हैं वे बहुत पुराने हैं तथा यह बहुत करीबी संबंध है। इन दिनों लोग अवसंरचना विकास की बात कर रहे हैं। परंतु यदि आप इतिहास में पीछे मुड़कर देखें, तो आप देखेंगे कि इस क्षेत्र के पूर्व सम्राटों में से एक यानी कि शेरशाह सूरी उनमें से एक था जिन्‍होंने कोलकाता - काबुल ग्रैंड ट्रक रोड का निर्माण किया।

भारत - अफगानिस्‍तान संबंध की नजदीकी कोई नई बात नहीं है। यह बहुत प्राचीन काल से चली आ रही है। और करीबी मित्र के रूप में, जब से भारत आजाद हुआ है तभी से हमने वह सब किया है तथा करते रहेंगे जो यह देखने के लिए करना अपेक्षित होगा कि करीबी मित्र के रूप में अफगानिस्‍तान विकास और प्रगति करे।

राष्‍ट्रपति अशरफ घनी पिछले सप्‍ताह यहां आए थे। हमारे बीच अच्‍छी बैठक एवं व्‍यापक चर्चा हुई। चर्चा के प्रमुख बिंदुओं में से एक अफगानिस्‍तान में विकास एवं प्रगति के लिए रोड मैप था। हमने अतीत में इसके लिए व्यापक रूप से प्रतिबद्धता की है। वास्‍तव में पुनर्निर्माण एवं विकास के लिए अफगानिस्‍तान के लिए भारत की सहायता लगभग 2.2 बिलियन अमरीकी डालर के आसपास है। हमने यह भी प्रतिबद्धता की है कि अफगानिस्‍तान के विकास के लिए जो भी करने की जरूरत होगी वह सब हम करेंगे। और हमने न केवल प्रतिबद्धताएं की है, अपितु हम उन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए ठोस एवं विशिष्‍ट कदम भी उठा रहे हैं।

जहां तक अफगानिस्‍तान से यूएस सैनिकों के हटने का संबंध है, इस मुद्दे पर मैंने राष्‍ट्रपति ओबामा के साथ उस समय बहुत विस्‍तार से चर्चा की थी जब मैं पिछले साल सितंबर में यूएस के दौरे पर गया था। मैंने उनसे कहा कि यूएस सैनिकों की वापसी वास्‍तव में अमरीकी सरकार का एक स्‍वतंत्र निर्णय है, परंतु अफगानिस्‍तान में स्थिर सरकार के हित में, यूएस सैनिकों की वापसी के बाद उनकी सुरक्षा संबंधी आवश्‍यकताओं को समझने के लिए अफगान सरकार के साथ परामर्श का आयोजन करना महत्‍वपूर्ण होगा। और मैंने उनसे कहा कि यूएस सैनिकों की वापसी के बाद हम सभी को अफगानिस्‍तान की सुरक्षा संबंधी आवश्‍यकताओं को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। बाकी निश्चित रूप से यह ऐसा निर्णय है जिसे यूएस सरकार को लेना है। परंतु हमारा हित अफगानिस्‍तान में शांति एवं स्थिरता सुनिश्चित करने में है; और इसके लिए जो भी करने की जरूरत होगी हम वह सब करेंगे।

जहां तक तालिबान और आई एस आई एस की समस्‍या का संबंध है, जिसका आपने उल्‍लेख किया, मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि समग्र परिप्रेक्ष्‍य का, अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर वे आतंकवाद को जिस रूप में देखते हैं उसका विस्‍तार से निरीक्षण करने की अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय को जरूरत है। उदाहरण के लिए 1993 तक, ऐसे देश थे जो इस समस्‍या की पूरी क्षमता को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे थे। वे इसे पूरी तरह व्‍यक्तिगत देशों की कानून एवं व्‍यवस्‍था की समस्‍या के रूप में देखा करते थे और इसे इसी रूप में समझा करते थे, न कि वे इसे अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर एक बुरी ताकत के रूप में मानते थे।

यदि आप बहुत ध्‍यान से स्थिति का वास्‍तव में विश्‍लेषण करें, तो जिस चीज की जरूरत है वह संभवत: यह है कि जो देश मानव मूल्‍यों में विश्‍वास रखते हैं उन्‍हें साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए। हमें नामपट्ट से आतंकवाद को नहीं देखना चाहिए - किस गुट से उनका संबंध है, उनके नाम क्‍या हैं, उनका भौगोलिक लोकेशन क्‍या है, आतंकवाद के पीडि़त कौन हैं... मेरी समझ से हमें उनको अलग - अलग टुकड़ों में नहीं देखना चाहिए। वस्‍तुत: हमें आतंकवाद की विचाराधारा को व्‍यापक रूप से देखना चाहिए, इसे ऐसी चीज के रूप में देखना चाहिए जो मानव मूल्‍यों के लिए लड़ाई है क्‍योंकि आतंकी मानवता के खिलाफ लड़ रहे हैं।

इस प्रकार, जिन देशों का मानव मूल्‍यों में विश्‍वास है उन सभी को साथ आना चाहिए और वैचारिक ताकत के रूप में इस बुरी ताकत के खिलाफ लड़ना चाहिए, तथा इसे व्‍यापक रूप से देखना चाहिए, न कि इसे तालिबान, आई एस आई एस या व्‍यक्तिगत गुट या नाम के रूप में देखना चाहिए। ये व्‍यक्तिगत गुट या नाम बदलते रहेंगे। आज आप तालिबान या आई एस आई एस को देख रहे हैं; कल हो सकता है कि आपको अन्‍य नाम देखने को मिले।इस प्रकार, देशों के लिए यह जरूरी है कि वे गुटों से आगे बढ़ें, व्‍यक्तिगत नामों से आगे बढ़ें, भौगोलिक लोकेशन से आगे बढ़ें, जिससे वे आते हैं, आतंकवाद के पीडि़तों पर नजर डालने से आगे बढ़ें और एक एकीकृत ताकत के रूप में तथा एक समूह के रूप में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करें।

टाइम : इस प्रकार, हम भिन्‍न ढंग से क्‍या करेंगे यदि इकट्ठा होने की बात साकार हो जाती है, यदि हम इस खतरे को उस ढंग से देखते हैं जिस ढंग से देखने के लिए आप कह रहे हैं; तो इस खतरे से निपटने के तरीके में क्‍या परिवर्तन होगा?

मोदी : मेरी समझ से पहले कदम के रूप में अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय निश्चित रूप से अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद पर संयुक्‍त राष्‍ट्र के व्‍यापक अभिसमय को पारित करने पर विचार कर सकता है, जो पिछले कई दशकों से संयुक्‍त राष्‍ट्र में पड़ा हुआ है। मेरी समझ से यह पहला कदम हो सकता है। कम से कम यह स्‍पष्‍ट रूप से स्‍थापित करेगा कि आप किसे आतंकी के रूप में देखते हैं और आप किसे आतंकी के रूप में नहीं देखते हैं। आतंकवाद की परिभाषा के मुद्दे का निपटारा हो जाएगा।

दूसरा काम जो करना महत्‍वपूर्ण है वह यह है कि किसी विशुद्धत: राजनीतिक परिप्रेक्ष्‍य से आतंकवाद का विश्‍लेषण करने या देखने की जरूरत नहीं है, अपितु इसे उस परिप्रेक्ष्‍य भी देखने की जरूरत है जिस तरह यह मानव मूल्‍यों पर मानवता के खिलाफ ताकत के रूप में हमला करता है, जिसके बारे में मैंने पहले उल्‍लेख किया है। यदि आप सीरिया में आतंकवाद को एक नजरिए से देखेंगे और सीरिया के बाहर आतंकवाद को दूसरे नजरिए से देखेंगे, तो इससे समस्‍याएं उत्‍पन्‍न हो सकती हैं। यदि आप आतंकवाद को श्रेणियों में बांट कर देखेंगे, जैसे कि अच्‍छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद, तो भी इसकी अपनी चुनौतियां उत्‍पन्‍न हो सकती हैं। इसी तरह, यदि आप तालिबान को अच्‍छे तालिबान या बुरे तालिबान के रूप में देखेंगे, तो इसकी अपनी समस्‍याएं उत्‍पन्‍न हो सकती हैं।

मेरी समझ से हमें इन प्रश्‍नों पर व्‍यक्तिगत रूप से नहीं देखना चाहिए। हमें एक आवाज में, न कि विखंडित आवाजों में इस समस्‍या का समाधान करना चाहिए - कुछ इस तरह कि उससे अंतर्राष्‍ट्रीय फोकस असंगठित होता है जब आतंकवाद की समस्‍या सामने आती है। मेरा यह मानना है कि यह आसानी से हो सकता है।

मेरी समझ से हमें जो अन्‍य कार्य करने की जरूरत है वह यह है कि हमें धर्म से आतंकवाद का संबंध काटने के लिए संकेंद्रित प्रयास करने की जरूरत है। जब पिछले साल सितंबर में और इस साल जनवरी में राष्‍ट्रपति ओबामा से मेरी मुलाकात हुई थी, तो विशेष रूप से पिछले साल सितंबर में मैंने उनसे धर्म से आतंकवाद को न जोड़ने के कार्य की अगुवाई करने का अनुरोध किया था। मेरी समझ से यदि हम ऐसा करने में सफल हो जाते हैं और यदि हम इस पथ पर आगे बढ़ते हैं, तो इससे कम से कम भावनात्‍मक रूप में गुमराह करने के कार्य पर रोक लग जाएगी जो इस विशेष संकल्‍पना में अंतर्निहित है। यह आतंकियों को पूरी तरह से अलग - थलग करने में भी अतिरिक्‍त रूप से हमारी मदद करेगा, जो आतंकवाद एवं धर्म के बीच दलीलों के इस परस्‍पर आदान - प्रदान का प्रयोग करते हैं।

आतंकवाद के खिलाफ हमारी सामूहिक लड़ाई में जो दूसरा पहलू महत्‍वपूर्ण है वह संचार प्रौद्योगिकी, संचार के प्रणाली विज्ञान जिसका आतंकी प्रयोग करते हैं और वित्‍त पोषण के तरीकों से जुड़ा प्रश्‍न है। धन शोधन, गंदे धन, ड्रग सौदा, हथियारों की तस्‍करी से आतंकियों का संबंध है। हमें अपने आपसे पूछना होगा कि कहां से आतंकी अपने हथियार प्राप्‍त करते हैं? वे कहां से अपनी संचार प्रौद्योगिकी प्राप्‍त करते हैं? वे कहां से अपना वित्‍त पोषण प्राप्‍त करते हैं? ये कुछ ऐसे पहलू हैं जहां मेरी समझ से पूरे अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय का एक साथ होने और आतंकियों द्वारा इन तीन प्रमुख पहलुओं तक पहुंच प्राप्‍त करने पर पूर्ण रोक लगाने की जरूरत है जो संचार, वित्‍त पोषण एवं हथियारों तक आसान पहुंच की दृष्टि से उनकी मदद करता है।

यदि हम अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद पर संयुक्‍त राष्‍ट्र के व्‍यापक अभिसमय को पारित करते हैं, और यदि हम ऐसे कदम उठाते हैं जिन्‍हें मैंने अभी - अभी सूचीबद्ध किया है, तो इससे उन देशों को अलग - थलग करने में हमें मदद मिलेगी, अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय को मदद मिलेगी, जो आतंकवाद के समर्थन में खड़े हैं।

टाइम : प्रधानमंत्री महोदय, आप धर्म से आतंकवाद को अलग करने का जिक्र कर रहे थे। आपने तालिबान का उल्‍लेख किया, आपने आई एस आई एस का उल्‍लेख किया। जो दो अन्‍य समूह अपनी गतिविधियों के माध्‍यम से पूरी दुनिया में खूब सारी सुर्खियां बटोर रहे हैं वे अफ्रीका में बोको हरम तथा अल शबाब हैं। वे सभी दावा कर रहे हैं कि वे जो भी कर रहे हैं वह सब इस्‍लाम की ओर से कर रहे हैं। क्‍या आप मानते हैं कि इस्‍लामिक जगत, इस्‍लाम के विश्‍व नेताओं को उनको नियंत्रित करने के लिए अपने स्‍वयं के समुदायों में और अधिक कार्य करना चाहिए जो कट्टरपंथी हैं, शिक्षा क मोर्चे पर उनको और अधिक करना चाहिए और इनके खिलाफ संघर्ष में अधिक सहयोग करना चाहिए?

मोदी : जब आरंभिक प्रश्‍न पूछा गया था तब तालिबान और आई एस आई एस का जिक्र किया गया था। इसी वजह से जब मैंने अपना उत्‍तर तैयार किया और अपना जवाब देना शुरू किया, तो मूलरूप से उससे पहले मैंने यह कहा कि हमें व्‍यक्तिगत गुटों से आगे बढ़कर देखने की जरूरत है। मैंने विशिष्‍ट रूप से तालिबान या आई एस आई एस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्‍यक्‍त की है, अपितु मैंने इस बात का उल्‍लेख किया है कि अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय को एक बड़े परिप्रेक्ष्‍य से इस समस्‍या को देखने की जरूरत है, न कि नामपट्ट या गुटों, जिनका मैंने जिक्र किया, के व्‍यक्तिगत परिप्रेक्ष्‍य से इस समस्‍या को देखने की जरूरत है।

मेरी समझ से आतंकवाद चिंतन की एक प्रक्रिया है। यह एक चिंतन प्रक्रिया है जो अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के लिए बहुत बड़ा खतरा है। मैं इसे किसी खास धर्म या धार्मिक नेताओं की कार्रवाइयों से भी नहीं जोड़ रहा हूँ। जैसा कि मैंने बताया, मेरी समझ से यह ऐसी चीज है जिस पर उन देशों को एकजुट होने की जरूरत है और सामूहिक रूप से इसके खिलाफ संघर्ष करने की जरूरत है जो मानव मूल्‍यों में विश्‍वास रखते हैं न कि व्‍यक्तिगत धर्मों के नजरिए से व्‍यक्तिगत गुटों को देखने की जरूरत है।

टाइम : यदि मैं पीछे मुड़कर देखूँ, तो आपने दो बातें कहीं हैं। प्रधानमंत्री महोदय, आपने कहा कि हर देश अपना प्रभाव, प्रभाव के अपने क्षेत्र को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। कई बार स्‍पष्‍ट रूप से यह बहुत सकारात्‍मक नहीं होता है। एक पहलू यह है कि भारत और यूएस विश्‍व में साथ मिलकर दोनों क्‍या कर सकते हैं। परंतु एक कार्य जो यूएस इस समय कर रहा है वह यह है कि वह यूक्रेन में रूस के प्रभाव को कम करने का प्रयास कर रहा है। क्‍या आप रूस के खिलाफ अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिबंधों का समर्थन करते हैं?

मोदी : यह मुद्दा जी-20 शिखर बैठक में उठा था। राष्‍ट्रपति ओबामा वहां मौजूद थे, राष्‍ट्रपति पुतिन वहां मौजूद थे और दोनों राष्‍ट्रपतियों की मौजूदगी में मैंने अपने विचार रखे थे। मेरा दृष्टिकोण यह है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र के दिशानिर्देश हैं, संयुक्‍त राष्‍ट्र में प्रावधान हैं; और मेरी समझ से संयुक्‍त राष्‍ट्र की रूपरेखा के अंदर जिस बात पर भी सहमति होती है, उसका अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय को अनुसरण करना चाहिए।

टाइम : एक अन्‍य बड़ा अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्दा जो उठा रह है वह इस साल के उत्‍तरार्ध में पेरिस जलवायु शिखर बैठक है। क्‍या भारत अपने उत्‍सर्जन की अधिकतम सीमा, अपने उत्‍सर्जन की ऊपरी सीमा को निर्दिष्‍ट करेगा?

मोदी : यदि आप बहुत ध्‍यान से भिन्‍न - भिन्‍न देशों की संस्‍कृति एवं सभ्‍यता के इतिहास का विश्‍लेषण करें, विशेष रूप से उस जीवन शैली पर ध्‍यान दें जिसका वे सदियों से और अपने इतिहास की शताब्दियों से अनुसरण कर रहे हैं, तो पूरी दुनिया में आप पाएंगे कि विश्‍व के इस भाग ने, विशेष रूप से भारत ने सह-अस्तित्‍व में, अपने इतिहास के हजारों वर्षों में प्रकृति के साथ घनिष्‍ट संबंध में अपने आर्थिक विकास को आगे बढ़ाया है तथा इसका समर्थन किया है। विश्‍व के इस भाग ने, विशेष रूप से भारतीय सभ्‍यता में मुख्‍य मूल्‍य यह है कि प्रकृति का दोहन अपराध है और हमें प्रकृति से केवल उतना लेना चाहिए जो हमारी जरूरतों के लिए नितांत आवश्‍यक है, न कि हमें इससे अधिक दोहन करना चाहिए।

यदि मैं थोड़े हल्‍के मिजाज में उस प्रथा की फिर से गणना करूँ जो भारतीय संस्‍कृति की रूपरेखा में बहुत आम है... जब आप सवेरे उठते हैं तथा बिस्‍तर से उतर कर नीचे पांव रखते हैं, तो आप मातृभूमि पर कदम रखते हैं जिससे उनको तकलीफ होती है। हम अपने बच्‍चों को जो सिखाते हैं, वह यह है कि धरती आपकी माता है जो देती है; वह दाता है। इसलिए, कृपया धरती मां पर अपना कदम रखने और उसे तकलीफ पहुंचाने से पूर्व उनसे क्षमा याचना करें।

हम अपने सांस्‍कृतिक इतिहास में यह भी सिखाते हैं कि पूरा ब्रह्मांड एक परिवार है। उदाहरण के लिए, सोने के समय की भारतीय कहानियां - जिसमें स्‍कूली पुस्‍तकें शामिल हैं - ऐसे संदर्भों से पूरी तरह अटी पड़ी हैं कि चांद हमारा मामा है और सूर्य हमारा दादा है। इस प्रकार, जब हम परिवार के नजरिए से विशुद्ध रूप से इन पहलुओं को देखते हैं, तो प्रकृति के साथ हमारा लगाव बहुत गहरा और बहुत भिन्‍न प्रकार का है।

जहां तक विशिष्‍ट रूप से सीओपी-21 से संबंधित प्रश्‍न का संबंध है, मेरी समझ से यदि आप पूरी दुनिया पर नजर डालें तथा जलवायु परिवर्तन के संपूर्ण मुद्दे को देखें, यदि विश्‍व का एक भाग ऐसा है जो इस विशिष्‍ट प्रयोजन पर स्‍वाभाविक रूप से नेतृत्‍व प्रदान कर सकता है, तो वह विश्‍व का यह भाग है। जहां तक मेरी विशिष्‍ट भूमिका एवं जिम्‍मेदारी का संबंध है, मैं इसके बारे में बहुत ही सतर्क एवं सजग हूँ। वास्‍तव में, जब मैं गुजरात का मुख्‍यमंत्री था, तो मेरी सरकार दुनिया में संभवत: चौथी राज्‍य सरकार थी जिसने मेरे खास राज्‍य के अंदर जलवायु परिवर्तन विभाग का गठन किया। और हम विकास की अपनी नीति से इसके कार्य को बहुत निकटता से जोड़ते हैं जिसे हमने राज्‍य में अपनाया है।

भविष्‍य में भी, हम जो पहलें करने जा रहे हैं उनकी दृष्टि से हम ऐसी ऊर्जा का प्रयोग करने पर बहुत अधिक जोर देने जा रहे हैं जो पर्यावरण अनुकूल है। उदाहरण के लिए, नवीकरणीय स्रोतों से 175 गीगावाट का लक्ष्‍य अपने लिए निर्धारित करके हमने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक विशाल पहल शुरू की है - सोलर सेक्‍टर से 100 गीगावाट और पवन सेक्‍टर से 75 गीगावाट। यह वास्‍तव में मेरी सरकार की एक व्‍यापक एवं विशाल पहल है।

मैंने एक अन्‍य मिशन मोड की परियोजना शुरू की है जिसे हम स्‍वच्‍छ गंगा मिशन के रूप में पुकारते हैं। यह मूलरूप से गंगा नदी को फिर से जीवंत बनाने के लिए है। गंगा नदी की प्रवाह रेखा लगभग 2500 किमी लंबी है। मोटेतौर पर भारत की 40 प्रतिशत आबादी प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से इस नदी से जुड़ी हुई है। यह केवल स्‍वच्‍छ गंगा पहल नहीं है, केवल किसी नदी की सफाई मात्र नहीं है; यह वास्‍तव में विकास की एक बहुत बड़ी पहल है जिसका मुख्‍य फोकस ऐसा विकास करना है जो पर्यावरण अनुकूल हो।

वास्‍तव में - और संपूर्ण अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय से मैं कहना चाहता हूँ - कि जो अपने - अपने देशों में पर्यावरण अनुकूल विकास करने में विश्‍वास रखते हैं उनको मैं आगे आकर गंगा नदी की सफाई में हमारा साझेदार बनने के लिए आमंत्रित करता हूँ, जो मेरी समझ से, जैसा कि मैंने पहले कहा है, मूल रूप से एक पर्यावरण अनुकूल विकास एवं प्रगति का मॉडल है जो पर्यावरण के संरक्षण पर केंद्रित है।

मैंने अनेक परतों में मिशन मोड में पर्यावरण संरक्षण के इन कदमों को उठाया है। उदाहरण के लिए, एक परत ऊर्जा की बचत से संबंधित है। हमने एलईडी बल्‍बों का वितरण करने और इसकी लोकप्रियता सुनिश्चित करने के लिए एक राष्‍ट्रव्‍यापी अभियान शुरू किया है - जो ऐसी चीज है जिससे मूलरूप से कार्बन का उत्‍सर्जन तथा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ऊर्जा की खपत में कार्बन की मात्रा कम होती है।

भारत में किसानों के लिए, मैंने मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड नामक एक पहल शुरू की है। मूलरूप से यह ऐसी प्रणाली है जिसके माध्‍यम से हम किसानों को उस मिट्टी में विषाक्‍तता के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं जिसमें वे खेती करते हैं। उद्देश्‍य वैज्ञानिक तरीके से इस संपूर्ण मुद्दे पर ध्‍यान देना और रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में कटौती की दृष्टि से, जैविक उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि की दृष्टि से उनके अगले कदम के बारे में किसानों को सलाह देना है ताकि मिट्टी उर्वरा शक्ति बनी रहे। इससे स्‍वाभाविक रूप से देश के अंदर खेती का पर्यावरणीय बोझ कम होगा। भारत के हिमालयन क्षेत्र के लिए मैं चाहता हूँ कि यह क्षेत्र संपूर्ण विश्‍व के लिए जैविक खेती की राजधानी में परिवर्तित हो।

मैं दूसरे कदम के बारे में बात करूँगा जो छोटे कदम के रूप में प्रतीत हो सकता है परंतु जिसका देश के अंदर बहुत बड़ा पर्यावरणीय प्रभाव है। भारत में हम खाना पकाने के लिए परिवारों को सब्सिडी वाले एल पी जी गैस सिलेंडर प्रदान करते हैं। कुछ समय पहले, मैंने धनी एवं समृद्ध परिवारों से सब्सिडी वाले अपने गैस सिलेंडर को छोड़ने का अनुरोध किया था ताकि खाना पकाने के लिए गैस सिलेंडर के प्रयोग को फ्री किया जा सके। थोड़े ही समय में लगभग 4 लाख परिवारों ने सब्सिडी वाले अपने गैस सिलेंडर का परित्‍याग कर दिया है। मेरा उद्देश्‍य यह है कि ऐसे गैस सिलेंडरों को गरीब परिवारों को प्रदान किया जाए जिससे हम तीन उद्देश्‍य प्राप्‍त कर सकते हैं। पहला, वे खाना पकाने के प्रयोजनों के लिए जलावन का प्रयोग करना बंद कर देंगे जिससे वनों की विकृति पर रोक लगेगी। दूसरा, इससे कार्बन का उत्‍सर्जन कम होगा क्‍योंकि जलावन को जलाने से अधिक मात्रा में कार्बन का उत्‍सर्जन होता है। तीसरा, इससे स्‍वास्‍थ्‍य से जुड़ी समस्‍याओं में भी कमी आएगी जो गरीब परिवारों में उस समय पैदा होती हैं जब खाना पकाने के लिए जलावन को जलाया जाता है। इस प्रकार, मूलरूप से हम इन तीनों उद्देश्‍यों को प्राप्‍त करने का प्रयास कर रहे हैं - कार्बन के उत्‍सर्जन में कमी लाना, वन की विकृति को कम करना, और इस बहुत सरल पर्यावरण अनुकूल उपाय के माध्‍यम से गरीब परिवारों के स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार लाना।

एक अन्‍य निर्णय जिसकी हमने हाल ही में घोषणा की है, दो संकल्‍पनाओं को एक साथ मिलाया गया है - ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करना और ग्रामीण क्षेत्रों में हरित क्षेत्र में वृद्धि करना; ग्रामीण भूमि पर वन लगाने, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करने के लिए हमने 40 हजार करोड़ रूपए (लगभग 6.7 बिलियन अमरीकी डालर) की राशि प्रदान की है जिससे पर्यावरण के संरक्षण का मार्ग प्रशस्‍त हो रहा है।

हमने जो एक अन्‍य कदम उठाया है वह भारत के 50 शहरों में मेट्रो मास परिवहन सुविधाओं का निर्माण करना है। इसी तरह, भारत के 500 शहरों में हमने बड़े पैमाने पर अपशिष्‍ट जल शोधन तथा ठोस अपशिष्‍ट प्रबंधन की योजनाएं शुरू की है। हमारा उद्देश्‍य वैश्विक स्‍तर पर प्रतिस्‍पर्धी पहलुओं का प्रयोग करके सार्वजनिक - निजी साझेदारियों के माध्‍यम से इन सुविधाओं का निर्माण करना है। ये सभी कदम, जिनका मैंने उल्‍लेख किया है, पिछले दस महीनों में उठाए गए हैं जिनका मुख्‍य उद्देश्‍य यह सुनिश्चित करना है कि हमारा आर्थिक विकास पर्यावरण अनुकूल हो।

दूसरा पहलू जिसका मैं उल्‍लेख करता रहता हूँ परंतु संभवत: अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय अभी भी इस पर ध्‍यान देने के लिए तैयार नहीं है या इस पर अभी तक ध्‍यान नहीं दे रहा है, हमारी जीवन शैली में परिवर्तन लाने की आवश्‍यकता है। मेरी समझ से 'प्रयोग करो और फेंक दो' की संस्‍कृति, डिस्‍पोजेबल की संस्‍कृति से पर्यावरण पर भारी बोझ पड़ रहा है। मेरी समझ से, धरती के संसाधनों का पुनर्चक्रण या पुन: प्रयोग एक महत्‍वपूर्ण पहलू है जिसे हमें अपनी दैनिक जीवन शैली में अपनाना चाहिए। मेरी समझ से हमारी जीवन शैली में परिवर्तन करना बहुत जरूरी है।

टाइम : प्रधानमंत्री महोदय, आपने आर्थिक एवं विकास सुधारों की बात की जिनको आप भारत में शुरू कर रहे हैं परंतु प्रगति के अन्‍य कीर्तिमान भी हैं। इस साल पहले राष्‍ट्रपति ओबामा ने कहा था कि सफलता प्राप्‍त करने के लिए भारत के लिए यह जरूरी है कि यह देश धार्मिक आधार पर अलग न हो। राष्‍ट्रपति ओबामा की टिप्‍पणी का आपके लिए अभिप्राय क्‍या है?

मोदी : भारत एक पुरानी सभ्‍यता है जिसका हजारों साल पुराना इतिहास है। यदि आप बहुत ध्‍यान से भारत के इतिहास का विश्‍लेषण करें, तो संभवत: आपको एक भी ऐसी घटना नहीं मिलेगी जहां भारत ने दूसरे देश पर हमला किया है। इसी तरह, आप हमारे इतिहास में ऐसा एक भी संदर्भ नहीं ढूंढ़ सकते हैं जहां हमने जाति या धर्म के आधार पर लड़ाई लड़ी है। भारत की, हमारी सभ्‍यता की विविधता वास्‍तव में बहुत सुंदर वस्‍तु है जिस पर हमें बहुत गर्व है। जीवन का हमारा दर्शन ऐसा है जिस पर हम हजारों वर्षों से चल रहे हैं तथा हमारे संविधान में भी यह परिलक्षित हुआ है। हमारे संविधान में किसी निरपेक्ष संकीर्णता का कोई उल्‍लेख नहीं है। मूल रूप से यह हमारी अपनी सभ्‍यता के नैतिक मूल्‍यों को दर्शाता है जो सभी धर्मों का समान रूप से आदर करने की बात करते हैं। एक भारतीय धर्मग्रंथ में कहा गया है, ''सत्‍य एक है परंतु संत इसे भिन्‍न - भिन्‍न नामों से पुकारते हैं''। इसी तरह, जब विश्‍व धर्म सम्‍मेलन के लिए स्‍वामी विवेकानंद शिकागो गए थे तब उन्‍होंने कहा था कि धर्मों का आदर करना केवल सार्वभौमिक सहिष्‍णुता का प्रश्‍न नहीं है; यह इस बात में विश्‍वास करने का मुद्दा है कि सभी धर्म सच्‍चे हैं। इस प्रकार, यह एक सकारात्‍मक दृष्टिकोण है तथा धर्म के प्रति भारत और भारतीय सभ्‍यता में इसी दृष्टिकोण को अपनाया गया है। यदि आप दुनिया के सबसे छोटे अल्‍पसंख्‍यकों में से एक पर नजर डालें, अर्थात पारसी समुदाय को देखें, तो यह संभवत: सबसे अधिक भारत में फला-फूला है। हमारे सेना प्रमुखों में से एक पारसी समुदाय से हैं। हमारे सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक पारसी समुदाय से हैं। उच्‍चतम न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीशों में से एक छोटे से इस अल्‍पसंख्‍यक समुदाय से थे। इस प्रकार हमारे लिए सभी धर्मों की स्‍वीकार्यता हमारे खून में है, यह हमारी सभ्‍यता में मौजूद है। अपने साथ सभी धर्मों को लेकर साथ काम करना हमारी प्रणाली में रचा-बसा है।

मेरा दर्शन, मेरी पार्टी का दर्शन तथा मेरी सरकार का दर्शन सबका साथ, सबका विकास है। इस प्रकार, इस खास ध्‍येय का अंतर्निहित दर्शन और संवेग सबको साथ लेकर चलना तथा समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है।

टाइम : जैसा कि हम यूएस के राजनीतिक अभियान की ओर अग्रसर हो रहे हैं, अमरीका के ढेर सारे राजनीतिक नेता उस भूमिका के बारे में बात कर रहे हैं, जो उनकी आस्‍था द्वारा निभाई जाती है तथा नेता के रूप में अपने दृष्टिकोणों की बात कर रहे हैं। क्‍या आप इस बारे में थोड़ी बात कर सकते हैं कि भारत के नेता के रूप में आपके लिए हिंदूवाद में आपकी आस्‍था का अभिप्राय क्‍या है?

मोदी : धर्म और आस्‍था बिल्‍कुल निजी मामले हैं। जहां तक सरकार का संबंध है, केवल एक पवित्र ग्रंथ है जो भारत का संविधान है।

वास्‍तव में, यदि आप हिंदूवाद की परिभाषा को देखें, तो भारत के उच्‍चतम न्‍यायालय ने बहुत सुंदर परिभाषा दी है; इस परिभाषा के अनुसार हिंदूवाद कोई धर्म नहीं है, वास्‍तव में यह एक जीवन शैली है।

यदि आप हमारी अपनी आस्‍था को देखें, तो मेरी समझ से मैं इन मूल्‍यों के साथ पला बढ़ा हूँ, जिनका मैंने पहले उल्‍लेख किया है कि धर्म एक जीवन शैली है। हम 'वसुधैव कुटुम्‍बकम' भी कहते हैं - पूरा विश्‍व एक परिवार है तथा हम सभी धर्मों का आदर करते हैं। मैं इन मूल्‍यों के साथ पला - बढ़ा हूँ।

मूल रूप से भारतीय दर्शन, हिंदू दर्शन का निचोड़ यह है कि सभी सुखी होने चाहिए, सभी स्‍वस्‍थ होने चाहिए, सभी को अपना पूरा जीवन जीना चाहिए। यह किसी खास धर्म या किसी खास पंथ से जुड़ा हुआ नहीं है। यह दर्शन है, जीवन जीने का तरीका है जिसके तहत सभी समाज शामिल हैं।

और हिंदूवाद ऐसा धर्म है जिसमें बहुत गहराई और बहुत विविधता है। उदाहरण के लिए, जो लोग मूर्ति पूजा करते हैं वे हिंदू हैं तथा जो मूर्ति पूजा से नफरत करते हैं वे भी हिंदू हो सकते हैं।

टाइम : प्रधानमंत्री महोदय, आपकी पार्टी के कुछ सदस्‍यों ने भारत में अल्‍संख्‍यक धर्मों के बारे में कुछ अनुचित बातें कही हैं और हमारा यह मानना है कि मुसलमानों, ईसाइयों, कुछ अन्‍य समुदायों ने भारत में भविष्‍य में अपने धर्म का अनुसरण करने को लेकर चिंता व्‍यक्‍त की है तथा हम यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि आप कह रहे हैं कि आपके नेतृत्‍व में उन्‍हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?

मोदी : जहां तक भारतीय जनता पार्टी और मेरी सरकार का संबंध है, इस प्रकार की विचारधारा में हमारा बिल्‍कुल भी विश्‍वास नहीं है। और जहां कहीं भी किसी अल्‍पसंख्‍यक धर्म के बारे में व्‍यक्तिगत सोच व्‍यक्‍त की जाती है, हमने तुरंत उसे नकारा है। जहां तक भाजपा और सरकार का संबंध है, जैसा कि मैंने पहले बताया, संदर्भ का केवल एक पवित्र ग्रंथ है जो भारत का संविधान है। हमारे लिए, देश की एकता एवं अखंडता सर्वोच्‍च प्राथमिकता है। सभी धर्मों तथा सभी समुदायों के एक जैसे अधिकार हैं तथा उनकी पूर्ण एवं सकल सुरक्षा का सुनिश्‍चय करना मेरी जिम्‍मेदारी है। मेरी सरकार जाति, पंथ और धर्म के आधार पर किसी भेदभाव को बर्दाश्‍त या स्‍वीकार नहीं करेगी। इस प्रकार, भारत में अल्‍पसंख्‍यकों के अधिकारों के संबंध में काल्‍पनिक आशंकाओं के लिए कोई जगह नहीं है।

टाइम : प्रधानमंत्री महोदय, यदि इजाजत हो, तो मैं पिछले साल के आपके चुनाव के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ। एक प्रमुख मुद्दा तथा सबसे महत्‍वपूर्ण मुद्दा जिसकी बात की गई थी वह अर्थव्‍यवस्‍था थी। परंतु इस संबंध में ढेर सारे निवेशकों ने सुधार की गति के बारे में प्रश्‍न पूछना शुरू कर दिया है, क्‍या इसकी गति पर्याप्‍त है? यह कि मूल रूप से अर्थव्‍यवस्‍था को तेल की कीमतों में गिरावट से लाभ हुआ है... जिस गति से आपने सुधार किया है उसके बारे में प्रश्‍नों पर आपका उत्‍तर क्‍या है तथा अब जब आप अपनी सरकार के दूसरे साल में कदम रख रहे हैं, आप किन सुधारों की योजना बना रहे हैं?

मोदी : यदि आप पिछले साल मार्च से मई, 2014 के अखबारों को उठाकर पढ़ें, तो आपको सही मायने में संदर्भ तथा संदर्भ के प्रमुख पहलुओं के बारे में पता चल जाएगा जिसमें उस समय हम चुनाव लड़ रहे थे। जिसमें से एक मुद्दा यह था कि पिछले साल सरकार में कुछ भी घटित होता हुआ प्रतीत नहीं हुआ। ऐसा प्रतीत हुआ कि उस समय नीतिगत दृष्टि से पूरी तरह से लकवा मार गया है। दो, पूरी प्रणाली में चारों ओर भ्रष्‍टाचार का बोलबाला था। तीन, कोई नेतृत्‍व नहीं था; केंद्र में कमजोर सरकार थी। इस संदर्भ एवं पृष्‍ठभूमि में मैंने चुनाव लड़ा था। मेरे चुनाव, पिछले साल 2014 में सत्‍ता में मेरी सरकार के आने को मई, 2014 से पहले देश में पिछले दस सालों में विकास के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस प्रकार, आपको पिछली सरकार के दस वर्षों बनाम मेरी सरकार के दस माह को देखने की जरूरत है।

आप वास्‍तव में देखेंगे कि अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पूरा विश्‍व एक बार पुन: भारत और भारत द्वारा प्रस्‍तुत अवसरों को लेकर बहुत अधिक उत्‍साहित एवं प्रोत्‍साहित है। इस पर, 21वीं शताब्‍दी की शुरूआत पर नजर डालने का एक अन्‍य तरीका ब्रिक की दृष्टि से है जिसे चार उभरती अर्थव्‍यवस्‍थाओं का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए सृजित किया गया है। आकलन यह था कि ब्रिक देश अंतर्राष्‍ट्रीय आर्थिक विकास का संचालन करेंगे। 2014 से 6-7 साल पहले एक दृष्टिकोण के उभरने की शुरूआत हुई थी कि ब्रिक में 'आई' संभवत: सबसे कम प्रासंगिक हो गया है या संभवत: ब्रिक समूह को पीछे ले गया है।

पिछले दस महीनों में ''आई'' ने ब्रिक्‍स में अपनी स्थिति का फिर से दावा किया है। अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर, चाहे यह आई एम एफ हो, या विश्‍व बैंक या मूडी या अन्‍य क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां हों, वे सभी एक आवाज में कह रही हैं कि भारत का आर्थिक भविष्‍य बहुत उज्‍ज्‍वल है। यह तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है तथा पुन: अंतर्राष्‍ट्रीय आर्थिक प्रणाली में विकास और स्थिरता का एक कारक बन गया है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍थाओं में से एक है।

पिछले दस महीने स्‍पष्‍ट रूप से साबित करते हैं कि जहां तक लोगों की आकांक्षाओं का संबंध है, देश में और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी हम इन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं।

अगले पांच वर्षों में हम जो करने जा रहे हैं उसकी रूपरेखा के बारे में मेरे मन में बहुत स्‍पष्‍ट विचार हैं। हमने पिछले एक साल में जो किया है वह बिल्‍कुल इस योजना के अनुसार है। और अगले चार वर्षों में, हमारे पास चरण दर चरण उपाय हैं जो वैसे - वैसे खुलेंगे जैसे - जैसे हम आगे बढ़ेंगे। जहां तक पिछले 11 महीनों में सुधार प्रक्रिया का संबंध है, यह केवल नीतिगत सुधारों का मुद्दा नहीं है जिसे मेरी सरकार द्वारा शुरू किया गया है। हमने संकेंद्रित प्रशासनिक सुधार भी किए हैं। (i) कारोबार करने में सरलता लाने के लिए; (ii) सरकार को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए; (iii) प्रौद्योगिकी एवं अभिशासन के स्‍तर पर सुधार; (iv) सरकार के सभी स्‍तरों पर सुधार, चाहे यह स्‍थानीय शासन हो या राज्‍य सरकार या केंद्र सरकार। हमने मूल रूप से पूरी तरह से भिन्‍न स्‍तर पर सुधार प्रक्रिया शुरू की है जहां संघीय एवं राज्‍य दोनों स्‍तर नीति आधारित एवं प्रशासनिक सुधार प्रणाली के माध्‍यम से काम कर रहे हैं।

कराधान के क्षेत्र में भारत की आजादी के बाद से सबसे बड़ा सुधार जो होने वाला है वह जी एस टी है तथा हमारी यह उम्‍मीद है कि हम वित्‍त वर्ष 2016 से इसे लागू करना शुरू कर देंगे।

दूसरा उदाहरण बीमा के क्षेत्र में विदेश प्रत्‍यक्ष निवेश की अधिकतम सीमा को बढ़ाकर 49 प्रतिशत करना है। यह पिछले 7 - 8 वर्षों से अटका हुआ था तथा इसमें कोई प्रगति नहीं हो रही थी। हमने सुनिश्चित किया कि हमारी सरकार के पहले वर्ष के अंदर संसद द्वारा इसे पारित किया गया।

टाइम : प्रधानमंत्री महोदय, जब कुछ लोग भारत और चीन के आर्थिक विकास की तुलना करते हैं, तो कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि चीन के विकास की गति बहुत अधिक है तथा वह काफी अधिक सफल हुआ है क्‍योंकि यह एक पार्टी के शासन वाला देश है जिसमें पार्टी के नेता मूल रूप से अपनी एवं अपने मंत्रिमंडल की नीतियों को अधिदेशित कर सकता है। निश्चित रूप से भारत लोकतांत्रिक देश है। संसद की निचली सदन में आपके पास जनादेश है। उच्‍च सदन में आपके पास बहुमत नहीं है। उदाहरण के तौर पर नया भूमि अधिग्रहण कानून जैसी चीजें उस प्रणाली की वजह से अटक जाती हैं जो भारत में है। क्‍या आप कभी - कभी यह सोचते हैं कि आपके पास राष्‍ट्रपति शी जैसे अधिकार होने चाहिए ताकि आप अपनी इच्‍छा के अनुसार चीजों को आगे बढ़ा सकें?

मोदी : अपने स्‍वभाव से ही भारत लोकतंत्र है। हम केवल अपने संविधान के आधार पर ही लोकतांत्रिक देश नहीं हैं; यह हमारे डी एन ए में है। जहां तक भारत के विभिन्‍न राजनीतिक दलों का संबंध है, मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि ऐसे निर्णय लेने के लिए उनमें परिपक्‍वता एवं विवेक है जो राष्‍ट्र के सर्वोत्‍तम हित में है। मेरा यह दृढ़ विश्‍वास है कि हमारे लिए लोकतंत्र तथा लोकतांत्रिक मूल्‍यों में आस्‍था विश्‍वास का विषय है, जो देश के सभी राजनीतिक दलों में व्‍याप्‍त है। यह सच है कि उच्‍च सदन में हमारे पास बहुमत नहीं है। इसके बावजूद, यदि आप संसद की उत्‍पादकता को देखें, तो वास्‍तव में हमारी सरकार ने काफी उपलब्धि हासिल की है। लोक सभा - संसद के निचले सदन में उत्‍पादकता लगभग 124 प्रतिशत है जबकि उच्‍च सदन में उत्‍पादकता 107 प्रतिशत के आसपास है। कुल मिलाकर, यह विधायी कार्य का बहुत सकारात्‍मक संदेश देता है। कुल मिलाकर, संसद में लगभग 40 विधेयक पारित हुए हैं। इस प्रकार, यदि आप मुझसे यह पूछ रहे हैं कि क्‍या भारत को चलाने के लिए आपको तानाशाही की जरूरत है, तो जी नहीं, आपको इसकी जरूरत नहीं है। क्‍या आपको देश को चलाने के लिए तानाशाही सोच की जरूरत है, तो जी नहीं, आपको इसकी जरूरत नहीं है। क्‍या आपको ऐसे ताकतवर व्‍यक्ति की जरूरत है, जो एक स्‍थान पर सत्‍ता के संकेंद्रण में विश्‍वास रखता है, तो जी नहीं, आपको इसकी जरूरत नहीं है। यदि भारत को आगे ले जाने के लिए किसी चीज की जरूरत है, तो यह लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्‍यों में सहज विश्‍वास है। मेरी समझ से इसकी जरूरत है और यह हमारे पास मौजूद है। यदि आप मुझे एक ओर लोकतांत्रिक मूल्‍यों तथा दूसरी ओर संपदा, सत्‍ता, समृद्धि एवं ख्‍याति के बीच चयन करने के लिए कहेंगे, तो मैं बहुत सरलता से और किसी संदेह के बगैर लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक मूल्‍यों में आस्‍था को चुनूंगा।

टाइम : लोकतंत्र के पहलुओं, लोकतंत्र के स्‍तंभों में से एक बोलने की आजादी है। इस साल पहले, भारत के प्राधिकारियों ने दिसंबर, 2012 में भयावह बलात्‍कार कांड के बारे में एक वित्‍त चित्र पर प्रतिबंध लगाया है। प्राधिकारियों ने ऐसा क्‍यों किया तथा आपके लिए बोलने की आजादी की सीमाएं क्‍या हैं? क्‍या आप समझते हैं कि बोलने की आजादी की कुछ सीमाएं होनी चाहिए?

मोदी : इस प्रश्‍न में दो अलग - अलग चीजें है तथा मैं उन दोनों का उत्‍तर देने का प्रयास करूँगा। परंतु, पहला थोड़ी हल्‍की मुद्रा में है यदि मैं गैलीलियो के बारे में सुविख्‍यात घटना को फिर से ताजा कर सकूँ। उन्‍होंने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया कि पृथ्‍वी सूर्य का चक्‍कर लगाती है परंतु उस समय में सामाजिक व्‍यवहार में वे सिद्धांत उसके खिलाफ थे जो बाइबिल में प्रतिपादित था तथा उस समय गैलीलियो को जेल में डालने का निर्णय लिया गया।

आज भारत ऐसी सभ्‍यता है जहां बलिदान का सिद्धांत एवं दर्शन हमारे पालन - पोषण के अंग के रूप में समाया हुआ है। यदि आप इसे पृष्‍ठभूमि के रूप में लेते हैं और हमारे इतिहास पर नजर डालते हैं, तो उस समय के एक महान विचारक हुआ करते थे जिनका नाम चार्वाक था जिन्‍होंने अति सुखवाद के दर्शन को प्रतिपादित किया जो भारतीय मूल्‍यों का विरोधी है। मूल रूप में उनका यह कहना है कि आपको कल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बस खाओ, पियो और आज को सुखद बनाओ। परंतु इन अतिवादी विचारों के बावजूद, जो भारतीय मूल्‍यों के बिल्‍कुल विरोधी थे, उनकी संत से तुलना की गई तथा उनको समाहित किया गया और भारतीय समाज में अपने विचारों को व्‍यक्‍त करने की छूट प्रदान की गई।

इस प्रकार, जहां तक बोलने की आजादी का संबंध है, इसमें हमारी प्रतिबद्धता एवं हमारी आस्‍था की दृष्टि से तिल मात्र भी संदेह नहीं है।

यदि आप उस वृत्‍त चित्र के प्रसारण से संबंधित मुद्दे को देखें, जिसका आप उल्‍लेख कर रहे हैं, तो यह बोलने की आजादी का प्रश्‍न नहीं है, यह कानून से जुड़ा प्रश्‍न है। इसके दो या तीन पहलू हैं। एक पहलू यह है कि बलात्‍कार की पीडि़ता की पहचान प्रकट नहीं होनी चाहिए जो उस समय निश्चित रूप से होगा जब इस साक्षात्‍कार को प्रसारित करने की अनुमति दी जाएगी। दो, मामला अभी भी न्‍यायाधीन है तथा प्रसारण जिसमें उस व्‍यक्ति का साक्षात्‍कार है जिसने कथित रूप से अपराध किया है, से न्‍यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। तीन, पीडि़त की सुरक्षा का सुनिश्‍चय करना भी हमारी जिम्‍मेदारी है। यदि हम इस तरह की चीजों के घटित होने की इजाजत देंगे, तो इसका प्रभाव यह होगा कि हमें पीडि़त की अस्मिता का उल्‍लंघन करना होगा। इसलिए, मेरा यह मानना है कि यह बोलने की आजादी से जुड़ा प्रश्‍न नहीं है, यह कानून तथा पीडि़त का सम्‍मान करने तथा इस विशिष्‍ट मामले में न्‍यायिक प्रक्रिया का सम्‍मान करने का मामला है। जहां तक बोलने की आजादी का संबंध है, जैसा कि मैंने पहले बताया, यह बिल्‍कुल भी मुद्दा नहीं है। यह ऐसी चीज है जिसका हम अपने लोकतांत्रिक मूल्‍यों के एक महत्‍वपूर्ण पहलू के रूप में बहुत सम्‍मान करते हैं।

टाइम : मुझे आश्‍चर्य है कि यदि मैं इससे पहले कि आप पीटर जो बहुत उत्‍सुक हैं, की ओर सम्‍मुख हों, एक आखिरी प्रश्‍न पूछना चाहता हूँ। हमने प्रभाव के बारे में तथा टाइम 100 के बारे में काफी बात की, ये वो लोग हैं जो हमारी समझ से इस समय वैश्विक स्‍तर पर बहुत प्रभाव रखते हैं, क्‍या आप हमें बता सकते हैं कि आप सब्‍से अधिक किससे प्रभावित हैं?

मोदी : आपने जो प्रश्‍न पूछा है वह वास्‍तव में मेरे दिल को छू गया है। मेरा जन्‍म बहुत ही गरीब परिवार में हुआ है। बचपन में मैं रेल के डिब्‍बों में चाय बेचा करता था। मेरी मां बरतन धोया करती थी तथा जीविका कमाने के लिए दूसरों के घरों में निम्‍न स्‍तर के घरेलू काम करती थी।

मैंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है। मैंने गरीबी का जीवन जीया है। बच्‍चे के रूप में, मेरा पूरा बचपन गरीबी में बीता है। मेरे लिए गरीबी एक तरह से मेरे जीवन की पहली प्रेरणा, गरीबों के लिए कुछ करने के लिए प्रतिबद्धता थी। मैंने तय किया कि मैं अपने लिए न जी कर दूसरों के लिए जीऊँगा और उनके लिए काम करूँगा। गरीबी में पलने के मेरे अनुभव ने मेरे बचपन को गहन रूप से प्रभावित किया। उस समय 12 या 13 साल की आयु में मैंने स्‍वामी विवेकानंद की कृतियों को पढ़ना शुरू किया। उससे मुझे साहस और विजन प्राप्‍त हुआ, उससे मेरी संवेदनशीलता तीक्ष्‍ण एवं गहन हुई तथा मुझे जीवन में एक नई दिशा एवं परिप्रेक्ष्‍य प्रदान किया। 15 या 16 साल की आयु में मैंने दूसरों के लिए अपने आपको समर्पित करने का निर्णय लिया और आज तक मैं उसी निर्णय पर चल रहा हूँ।

यह साक्षात्‍कार http://time.com/3849492/narendra-modi-interview/) पर भी उपलब्‍ध है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी पोस्ट करें

  • नाम *
    ई - मेल *
  • आपकी टिप्पणी लिखें *
  • सत्यापन कोड * Verification Code