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नीदरलैंड की अपनी यात्रा के दौरान एनआरसी हैंडेल्सब्लाड के साथ विदेश मंत्री का साक्षात्कार

जनवरी 15, 2020

सरकार अयोध्या के निर्णय के बाद मुसलमानों को उनके समान अधिकारों के बारे में आश्वस्त करने के लिए क्या कर सकती है?

"क्या आपने निर्णय के हजार पृष्ठ पढ़े हैं? यह एक अत्यंत नाजुक निर्णय है, जिसमें इस बारे में भी चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि सभी समुदायों को उनके सम्मान के बारे में आश्वस्त किया जाना चाहिए। ताकि देखभाल आवश्यक न हो। और देखिए, अब कुछ दिन बाद ही और यदि आप प्रतिक्रियाएं देखेंगे, तो मुझे लगता है कि अधिकतर लोगों का मानना है कि यह उचित है।"

सरकार ने पहले से ही अनेक लोगों को सुरक्षित कर दिया है और भीड़ पर प्रतिबंध लगाया है।

"मुझे लगता है कि यह सरकार के मूलभूत उत्तरदायित्वों में से एक है। मैं निवारक बंधक बनाने का पक्षधर हूँ जिसके परिणामस्वरूप किसी भी हिंसा की दुर्घटना से बचा jजा सकता है। कभी-कभी सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उपाय किए जाने चाहिए। ऐसा करना न केवल न्यायोचित है, बल्कि, वास्तव में कभी-कभी आवश्यक भी होता है।

"मुझे प्रसन्नता है कि एक महत्वपूर्ण मुद्दे का सही समाधान हो गया है। हमें अपनी संस्थाओं की शक्ति पर गहरा विश्वास है। देखिए, विश्व में कितने चुनाव परिणाम संघर्ष का विषय बन जाते हैं। भारत में, हमने सत्तर वर्षों से असाधारण निष्पक्ष चुनाव करवाए हैं।"

कश्मीर में अब कैसी स्थिति है?


"मैंने सुना है कि सामान्य जन-जीवन धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा है। दुकानें खुल गई हैं, लोग बाजारों में वापस जा रहे हैं। सीमा पार से [पाकिस्तान से] आने वाले आतंकवाद के कारण अयोध्या की तुलना में यहां अधिक सख्त उपायों की आवश्यकता थी। हमने टेलीफोन और इंटरनेट आवाजाही बंद कर दी थी क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि बुरी मंशा रखने वाले लोग संवाद करें। टेलीफोन लाइनें अब फिर से खुली हैं। इंटरनेट की पूर्णतः बहाली अभी नहीं हुई है, क्योंकि उग्रवादियों ने पहले अत्यधिक हिंसक समयकाल में कट्टरता और सामूहिक जुड़ाव के लिए सामाजिक मीडिया का प्रयोग किया था।"

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लोग घर से बाहर निकलने में डरते हैं। अब भी, उपायों में ढील देने के बावजूद, वे यह मानने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं कि वे सुरक्षित हैं।

"मुझे लगता है कि उन्हें उग्रवादियों द्वारा डराने-धमकाने का भी डर है, जिन्होंने पोस्टर लगा दिए जिनमे लोगों को धमकी दी गई है ताकि वे विद्यालय न जाएं और अपने स्टोर बंद रखें।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि प्रतिबंध हटाए जाने के बावजूद भी लोगों में काफी समय तक रोष रहेगा?

"कल्पना कीजिए कि यदि हमने ऐसा नहीं किया तो क्या होता। हमने 2016 में लोगों को जिसे वे राजनीतिक बैठकें कहते हैं, के आयोजन की अनुमति दी थी। हिंसा चरम सीमा पर हुई। इस प्रकार की बैठकों का प्रायः आतंकी और अलगाववादी दुरुपयोग करते है। कश्मीर में, हमने 30 वर्षों में लड़ाई में, 40,000 जानें गवाईं हैं। स्थिति अद्वितीय है कि ऐसा पड़ोसी देश [पाकिस्तान] की सचेत आतंकवादी नीति से हो रहा है।"

लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि स्वायत्तता के अंत से व्याप्त असंतोष किसी ना किसी रूप में बाहर आएगा?

"संवैधानिक अनुच्छेद में शामिल स्वायत्तता अस्थायी थी, इसे एक बार परिवर्तित होना ही था। इसके अलावा, सरकार को विश्वास था कि यह अनुच्छेद कश्मीर के लोगों के लिए अच्छा नहीं है और यह उनके विकास में अवरोधक है।

अब यह सुनिश्चित करना हमारे ऊपर निर्भर है कि जिस विकास का वादा किया गया था, वास्तव में उसकी परिणति हो। यदि मैं कश्मीर में रहा होता और मैंने एक या दो वर्षों में अपना जीवन-यापन बेहतर होते हुए देखा होता तो मैं केवल एक ही निष्कर्ष निकालता। "

समृद्धि और स्वायत्तता दो अलग-अलग बातें हैं।

"क्या आपको वास्तव में ऐसा लगता है कि लोग यह चाहेंगे कि आगामी 30 वर्षों में 40,000 व्यक्ति मारे जाएं?" हम डिजिटलीकरण, प्रतिभा विकास, वैश्वीकरण के आधुनिक युग में प्रवेश कर रहे हैं। क्या हमें इस मध्ययुगीन स्थिति को संरक्षित करना चाहिए? हमें अतीत से एक और तीस वर्षों की पुनरावृत्ति नहीं चाहिए। हमें कुछ निर्णायक करना होगा।"

हाल ही में, मुख्य रूप से 27 दक्षिणपंथी और 'सुदूर दक्षिणपंथी' एमईपी ने कश्मीर का दौरा किया था, जबकि भारतीय विपक्ष और अधिकांश पत्रकारों को वहां जाने से वंचित किया गया है। इस चयन का आधार क्या है?

"सांसद स्वयं देखना चाहते थे कि स्थितियां किस प्रकार की हैं। मैं उनसे मिला था, वे बिना किसी पूर्वाग्रह मत के आए थे। हमने वही किया जो हम निष्पक्ष लोगों के प्रत्येक समूह के साथ सदैव करते हैं, अर्थात अपनी राय देना और उंहें स्वयं निर्णय लेने के लिए कहना।"

तो क्या वामपंथी एमईपी के एक समूह को भी वहां जाने की अनुमति होगी?

"बहुत कुछ यात्रा के प्रयोजन पर निर्भर करेगा। यदि लोगों का कोई समूह बिना किसी पूर्वाग्रह के, कश्मीर की यात्रा करना चाहता है, तो हम ना नहीं कहेंगे। हम सामाजिक और राजनीतिक दोनों रूप से बहुत बहुलवादी देश हैं।"

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