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उपराष्ट्रपति के लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया के आगामी दौरे पर सचिव (पश्चिम) द्वारा मीडिया ब्रीफिंग का प्रतिलेख (14 अगस्त, 2019)

अगस्त 16, 2019

आधिकारिक प्रवक्ता, श्री रवीश कुमार : मित्रों , नमस्कार, शुभ दोपहर और माननीय उपराष्ट्रपति की 17-27 अगस्त, 2019 तक तीन देशों, लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया की यात्रा पर इस विशेष ब्रीफिंग में आपका स्वागत करता हूं। मेरे साथ मंच पर श्री गीतेश सरमा, सचिव (पश्चिम) और संयुक्त सचिव (सीई) डॉ. अंजू कुमार, सचिव (पश्चिम) अपनी प्रारंभिक टिप्पणी करेंगे और उसके बाद हम प्रश्नों के उत्तर देंगे। महोदय, अब मंच आपका है।

सचिव (पश्चिम), श्री गीतेश सरमा : शुभ दोपहर और आपके साथ रहना खुशी की बात है। हम आज आपको उपराष्ट्रपति की बाल्टिक की आगामी आने वाली यात्रा के बारे में जानकारी देने के लिए मिल रहे हैं।

इस वर्ष, उपराष्ट्रपति 17-21 अगस्त तक लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया के दौरे पर जाएंगे। उपराष्ट्रपति के साथ श्री संजय शामराव धोत्रे, मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, संचार और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्रीमती रानी नारा, संसद सदस्य (राज्य सभा), श्री मानस रंजन भूनिया, संसद सदस्य (राज्य सभा), श्री रमेश बिधूड़ी, संसद सदस्य (लोकसभा) और भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों सहित एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल होगा।

मित्रों, भारत और बाल्टिक देशों का ऐतिहासिक जुड़ाव है और प्रायः यह स्वीकार किया जाता है कि दूरी के बावजूद भाषाई जड़ें समान हैं। बाल्टिक देशों में यह अत्यधिक महसूस किया जाता है, वे संस्कृत और भारतीय संस्कृति के अन्य पहलुओं का स्पंदन करते हैं जिनका संवर्धन करने की आवश्यकता है।

बाल्टिक देशों के अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र भी भारत के विशाल बाजार और इस प्रकार की प्रौद्योगिकियों के पूरक और पोषक हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इस मायने में एक ऐतिहासिक दौरा है कि यह लंबे समय से प्रतीक्षित था। माननीय उपराष्ट्रपति की तीन बाल्टिक देशों की पहली उच्च स्तरीय यात्रा होगी और इसलिए वहां बहुत उत्साह के साथ इसकी प्रतीक्षा की जा रही है और ऐसा तब होता है जब हम अपनी राजनीतिक व्यस्तता के स्तर के साथ-साथ व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि करने के लिए मिलकर काम करते हैं।

मुझे कहना चाहिए कि वास्तव में दोनों देशों के संबंधों में, कोई विवादास्पद मुद्दे नहीं हैं और दोनों देशों के बीच वास्तव में बहुत अच्छी सद्भावना है। वे लिथुआनिया में 17-19 अगस्त तक रहेंगे और वे लिथुआनिया के राष्ट्रपति, महामहिम गीतादास नौसदा के साथ बैठक करेंगे और लिथुआनियाई संसद के सभापति से भी भेंट करेंगे। यात्रा के राजनीतिक पहलुओं के साथ-साथ एक भारत-लिथुआनिया व्यापार-मंच भी है। वास्तव में सीआईआई इस व्यापार मंच का समन्वय कर रहा है।

लातविया की यात्रा 19 से 20 अगस्त तक है और माननीय उपराष्ट्रपति की लातविया के राष्ट्रपति महामहिम श्री एगिल्स लेविट्स के साथ द्विपक्षीय बैठक होगी और प्रधानमंत्री कृष्णिसिस कारी, कार्यवाहक सभापति और पुनः एक व्यापार घटक है, जो है भारत-लातविया व्यापार मंच, भारतीय पक्ष से एसोचैम के साथ बैठक होगी। माननीय उपराष्ट्रपति, लातविया के स्वतंत्रता स्मारक पर भी पुष्पांजलि अर्पण करेंगे और लातविया के राष्ट्रीय पुस्तकालय में महात्मा गांधी की प्रतिमा का अनावरण करेंगे।

एस्टोनिया की यात्रा पुनः अत्यधिक केंद्रित यात्रा है। बैठकों में एस्टोनिया की राष्ट्रपति सुश्री केर्स्टी काजलजैड और प्रधानमंत्री जूरी रातास के साथ बैठक शामिल हैं। एस्टोनियाई संसद में वे रिइगिकोगु के राष्ट्रपति और अन्य लोगों से मुलाकात करेंगे। भारतीय पक्ष के लिए एक बहुत ही विशेष प्रकार के आभार के रूप में एस्टोनियाई सरकार ने उपराष्ट्रपति को अपने प्रमुखों के सम्मेलन को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया है जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया है। वहां पर एक व्यापार मंच भी है जिसका नेतृत्व भारतीय पक्ष की ओर से भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा किया जाता है।

इन तीनों देशों में भारतीय समुदाय के लोगों की संख्या बहुत कम है, लेकिन वे बहुत जीवंत हैं और कुछ युवा आईटी और अन्य आर्थिक क्षेत्रों में कार्यरत हैं। तो, वास्तव में यह एक ऐतिहासिक यात्रा है और पारंपरिक भावनाओं को सुदृढ़ करने और हमारे संबंधों को नई उचाईयों पर ले जाने का समय है। इसलिए हम सभी इस यात्रा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

आधिकारिक प्रवक्ता, श्री रवीश कुमार : महोदय, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

प्रश्न : क्या इन तीन देशों में हमारे मिशन हैं?

सचिव (पश्चिम), श्री गीतेश सरमा : अभी तक इन देशों में हमारे निवासी मिशन नहीं हैं। हम पड़ोसी देशों से अपने हितों की देखभाल कर रहे हैं। उदाहरण के लिए पोलैंड से लिथुआनिया, स्वीडन से लात्विया और फिनलैंड से एस्टोनिया और तीनों बाल्टिक देशों के दिल्ली में मिशन हैं।

प्रश्न : विगत वर्ष, हमारे यहाँ भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन था, क्या हम भारत-बाल्टिक देशों की शिखर बैठक कर रहे हैं, क्या कोई प्रस्ताव है ? दूसरे, एस्टोनिया के बारे में, जब आईटी क्षेत्र की बात आती है, तो वह एक बहुत ही उन्नत देशों में से एक है। नई दिल्ली उस विशिष्ट देश के साथ किस तरह का सहयोग कर रही है जिसके लिए उसे जाना जाता है, मेरा तात्पर्य है कि अभी पांच वर्ष पहले उनकी आईटी प्रणाली पर एक हमला हुआ था और इसीलिए यह सबसे आगे आया है।

सचिव (पश्चिम), श्री गीतेश सरमा : वास्तव में आप बिलकुल सही हैं और इन देशों के अपेक्षाकृत छोटे आकार के बावजूद उनके पास अपने महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं और एस्टोनिया विशेष रूप से ई-शासन के संबंध में सबसे उन्नत देशों में से एक है। इसलिए, हम निश्चित रूप से एक साथ काम करना चाहते हैं और इस यात्रा के दौरान भी आईटी और ई-शासन, साइबर सुरक्षा के संदर्भ में सहयोग पर ध्यान दिया जाएगा। ये कुछ क्षेत्र हैं जिन पर हम विचार कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए, यह माना जाता है कि स्काइप का आविष्कार एस्टोनिया में किया गया था, इसलिए, वास्तव में आईटी क्षेत्र में उसका बड़ा नाम हैं और इसलिए हम हैं, अतः उनके क्षेत्रों में बहुत सारे तालमेल किए जा सकते हैं और हम उन्हें भुनाना चाहते हैं।

भारत-बाल्टिक देश शिखर सम्मेलन पर इस समय इस प्रकार का कोई विशिष्ट प्रस्ताव नहीं है, लेकिन जैसा कि आपने देखा है कि उपराष्ट्रपति तीन देशों को एक बार में कवर कर रहे है। यह बहुत ही सामंजस्यपूर्ण समाज है और तीनों देशों में इस बात पर आम सहमति है कि भारत के साथ मित्रता बढ़ाई जानी चाहिए और उसे नई ऊचाइयों पर ले जाना चाहिए।

प्रश्न : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत की उम्मीदवारी और अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन के लिए भारत के प्रस्ताव पर उनका क्या रुख रहा है ?

सचिव (पश्चिम), श्री गीतेश सरमा : मुझे लगता है कि आम तौर पर हम उनके साथ जुड़े रहते हैं और वे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे का समर्थन करते हैं। आतंकवाद के बारे में भी मुझे लगता है कि वे बहुत समझदार रहे हैं और पुलवामा के बाद वे बेहद संवेदनशील रहे हैं।

इसलिए मुझे लगता है कि इन देशों के बहुत ही समान आधार है, लेकिन आप यह भी जानते हैं कि वे बड़े यूरोपीय भू-भाग का भी हिस्सा हैं, इसलिए जब हम इन देशों के साथ काम करते हैं, तो हमें इन मित्रों को यूरोपीय क्षेत्र में भी काम करने का अवसर मिलता है, इसलिए यूरोपीय क्षेत्र में ऐसे मित्र देशों के साथ काम करने में बहुत सारे फायदे हैं।

प्रश्न : आपने अभी उल्लेख किया है कि इन तीन बाल्टिक देशों में अभी तक हमारे मिशन नहीं हैं, इसके क्या कारण हैं क्योंकि ये सभी बहुत महत्वपूर्ण देश हैं और यहां तक कि इनका भू-भाग भी बहुत बड़ा है। यह ऐसा समय है जब हम बहुत छोटे अफ्रीकी देशों में मिशन खोलने का प्रयास कर रहे हैं, तो क्या कारण है कि इन तीन बहुत महत्वपूर्ण देशों में हमारे कोई राजनयिक मिशन नहीं है और क्या हम इन देशों में दूतावास खोलने की योजना बना रहे हैं ?

प्रश्न : आपने बताया कि इन देशों के साथ भारत का एक गहरा रिश्ता है खासतौर पर संस्कृत को लेकर। तो मैं चाहूँगा कि आप इस पर थोड़ा प्रकाश डालें और आगे किस तरह की योजना होगी भाषा के सन्दर्भ में, अगर बात करें तो संस्कृत को मुख्य रखते हुए दोनों देशों के रिश्तों के संवर्धन में और आगे इस पर काम करने में ?

सचिव (पश्चिम), श्री गीतेश सरमा :
मुझे लगता है कि राजनयिक मिशनों के मुद्दे पर, ऐसी हर जगह मिशन होने चाहिए जो निश्चित रूप से भारत के कद का देश है लेकिन तब अवस्थिति के संदर्भ में विभिन्न बिंदुओं पर बहुत सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाता है।

फिलहाल, हम बहुत निकटता से काम कर रहे हैं। आपने इन सभी का बड़े होने का उल्लेख किया है, लेकिन वे वास्तव में ये सब नहीं हैं, वे सघन प्रदेश हैं और इस स्तर पर बहुत निकटता से काम करना मुश्किल नहीं है।

उदाहरण के लिए, हेलसिंकी और टैलीन, लेकिन आप सही कह रहे हैं कि किसी न किसी स्तर पर एक ऐसी स्थिति हो सकती है, जब भारत वहाँ पर निवासी मिशन बनाने पर नज़र रखेगा। यह समय की बात है और सभी विभिन्न तत्वों को एक साथ लाना है लेकिन अब तक आप पूरी तरह से सही हैं कि हमारे मिशन नहीं है लेकिन इससे वास्तव में उनके साथ व्यापार करने की हमारी क्षमता क्षीण नहीं हुई है।

प्रश्न क्रमश :…………. अश्राव्य…………

सचिव (पश्चिम), श्री गीतेश सरमा : लिथुआनिया हम वारसॉ से कवर कर रहे हैं, लातविया हम स्वीडन से कवर कर रहे हैं और एस्टोनिया हम हेलसिंकी, फिनलैंड से कवर कर रहे हैं।

संयुक्त सचिव (सीई), डॉ. अंजू कुमार :
जो लिथुआनिया में भाषा बोली जाती है उसमें बताया जाता है कि 10 हज़ार शब्द ऐसे हैं जिनका मूल संस्कृत से निकलता है, उसमें से 108 को उन्होंने प्रकाशित किया है और वो काफी समान शब्द हैं, उनसे लगता है कि उनकी जननी एक ही है। । तो वो लक्ष्य है कि पूरे के पूरे 10 हज़ार शब्दों को खोजा जाएगा और उनका उपयुक्त अनुवाद किया जाएगा।

हर देश में हिंदी चेयर्स हैं, भारत विद्या की संस्कृति बहुत सशक्त है और आप देखेंगे की बहुत सारे छात्र, जो आगरा में संस्थान है उसमे हिंदी का उच्चतर अध्ययन करने के लिए आते हैं। विश्वविद्यालयों, भारत केंद्र में अध्ययन करने के पश्चात् वे उन्नत अध्ययन के लिए आगरा आए।

बहुत सारे लोग आपको ऐसे मिलेंगे और हमारे पास भी बाल्टिक अध्ययन के लिए हरिद्वार में एक केंद्र है । तो वो भी एक महत्वपूर्ण साधन रहता है दोनों भाषाओं को जोड़ने का।

प्रश्न : चीन ने इन तीनों देशों में कन्फ्यूशियस केंद्र खोले हैं। तो क्या हम उन रास्तों पर लोगों से लोगों के संपर्क को बढ़ावा देने और इन दिशाओं में आगे बढ़ने के लिए नहीं सोच रहे हैं ?

आधिकारिक प्रवक्ता, श्री रवीश कुमार : डॉ. अंजू ने केवल यह उल्लेख किया कि हम क्या कर रहे हैं।

प्रश्न क्रमश : इन बहुत से देशों में चीन ने कन्फ्यूशियस केंद्र खोले हैं, क्या उन देशों में हम समान कार्य नहीं करते हैं?

आधिकारिक प्रवक्ता, श्री रवीश कुमार : डॉ. अंजू ने केवल उल्लेख किया है कि इन देशों में हमारे पास भारत-विद्या केंद्र हैं और इन सभी देशों में हमारे पास हिंदी चेयर है।

यहाँ आने के लिए आप सभी का धन्यवाद

(समापन)
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