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प्रधानमंत्री की संयुक्‍त राज्‍य अमरीका की चल रही यात्रा पर सरकारी प्रवक्‍ता द्वारा मीडिया वार्ता का प्रतिलेखन (25 सितंबर, 2015)

सितम्बर 26, 2015

सरकारी प्रवक्‍ता (श्री विकास स्‍वरूप) : ... (अश्रव्य) ... परंतु उन्‍होंने कुछ बहुत महत्‍वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकें भी की तथा उन बैठकों में जो हुआ उसकी मैं आप सभी को जानकारी प्रदान करने का प्रयास करूँगा। दिन की शुरूआत वर्ल्‍ड बैंक के अध्‍यक्ष श्री जिम यांग किम द्वारा प्रधानमंत्री जी से मुलाकात के साथ हुई। स्‍वच्‍छ भारत एवं स्‍वच्‍छ गंगा कार्यक्रमों में जो प्रगति हुई है उसकी उन्‍होंने प्रशंसा की, जहां विश्‍व बैंक एक प्रमुख साझेदार है। उन्‍होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी के सुधारों का उस पर बहुत बड़ा असर हुआ है जिस ढंग से विश्‍व भारत को देखता है। उन्‍होंने यह माना कि भारत में जो हो रहा है वह वास्‍तव में उससे काफी भिन्‍न है जो अन्‍य देशों में हुआ है। उनकी यह राय थी कि जैसे – जैसे भारत इन लक्ष्‍यों की दिशा में आगे बढ़ेगा, विश्‍व बैंक मजबूत साझेदार बनना चाहेगा। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री जी ने उस प्रगति का वर्णन किया जो हजारों शौचालयों के निर्माण, अंतर्राष्‍ट्रीय प्रौद्योगिकी की दिशा में हुई है जिनको स्‍वच्‍छ भारत कार्यक्रम के लिए अब लाया जा रहा है तथा उन्‍होंने नवीकरणीय ऊर्जा के 175 गीगावाट के लिए अपने महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रमों के बारे में बताया। उसके बाद विश्‍व बैंक की अभिशासन संरचना पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि उन्‍होंने वैश्विक अभिशासन के सुदृढ़ीकरण तथा वैश्विक अभिशासन की संस्‍थाओं के सुधार का हमेशा समर्थन किया है परंतु यह भी सच है कि भारत जैसे देशों का इन संरचनाओं में प्रतिनिधित्‍व नहीं है। इसलिए इसमें परिवर्तन की जरूरत है। इसके बाद, विश्‍व बैंक के अध्‍यक्ष ने जलवायु परिवर्तन में भारत के दृष्टिकोण के बारे में पूछताछ की और फिर प्रधानमंत्री जी ने इस पर एक लंबी व्‍याख्‍या प्रदान की। मैं उस पर आऊँगा क्‍योंकि प्रधानमंत्री जी ने उस समय भी इसी का उल्‍लेख किया जब उन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव श्री बान की मून से मुलाकात की।

प्रधानमंत्री जी की जो अगली बैठक थी वह किंगडम ऑफ जॉर्डन के महामहिम शाह अब्‍दुल्‍ला द्वितीय के साथ उनकी बैठक थी। य‍ह भी बहुत महत्‍वपूर्ण बैठक थी क्‍योंकि जॉर्डन भारत के दृष्टिकोण से बहुत महत्‍वपूर्ण क्षेत्र में बहुत महत्‍वपूर्ण देश है। प्रधानमंत्री जी ने मजबूत नेतृत्‍व के लिए शाह अब्‍दुल्‍ला की सराहना करते हुए बैठक की शुरूआत की, जिसका उन्‍होंने अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई में प्रदर्शन किया है। उन्‍होंने महामहिम का उस समर्थन के लिए भी धन्‍यवाद किया जो जॉर्डन ने उस समय प्रदान की जब भारतीय नागरिक इराक और सीरिया में फंस गए थे तथा उन्‍हें वहां से निकाला जाना था। शाह अब्‍दुल्‍ला ने कहा कि वह साझेदार के रूप में भारत को महत्‍व देते हैं तथा सुरक्षा एवं आर्थिक सहयोग जो भारत के साथ जॉर्डन का है, उसे बढ़ाना चाहते हैं। दोनों नेताओं ने यह स्‍वीकार किया कि आई एस आई एस अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के समक्ष आज सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। इस बात पर चर्चा हुई कि किस तरह हम अपने युवाओं को कट्टर होने से बचा सकते हैं तथा किस तरह हम अतिवाद के संदेश का प्रतिकार कर सकते हैं। इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री जी ने कहा कि आतंकवाद का संबंध धर्म से विच्‍छेद करने की जरूरत है और इस संदर्भ में उन्‍होंने कहा कि अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद तथा आई एस आई एस जैसे संगइनों के प्रकोप से लड़ने का एकमात्र आसरा वैश्विक स्‍तर पर कार्रवाई है। इस संदर्भ में, उन्‍होंने विशेष तौर पर अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद पर व्‍यापक अभिसमय के लिए काफी समय से लंबित प्रस्‍ताव का हवाला दिया तथा कहा कि अब समय आ गया है जब अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय को इस महत्‍वपूर्ण मुद्दे पर एक आवाज में बोलना चाहिए तथा इस वैश्विक अभिसमय को अंगीकार करना चाहिए। संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद सुधार पर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि यह बात समझ से परे है कि भारत जैसा विशाल देश, जो मानवता के छठवें भाग का प्रतिनिधित्‍व करता है, सुरक्षा परिषद में नहीं है। हम इसके लिए लंबे समय से आंदोलन करते आ रहे हैं। हम चाहते हैं कि संयुक्‍त राष्‍ट्र की 70वीं वर्षगांठ अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय के लिए अपनी बाध्‍यताओं में वृद्धि करने तथा संयुक्‍त राष्‍ट्र की इस बहुत महत्‍वपूर्ण संस्‍था में संशोधन करने का अवसर होना चाहिए। जॉर्डन के शाह ने कहा कि वह इसका पूरी तरह समर्थन करते हैं और उन्‍होंने सुरक्षा परिषद का स्‍थाई सदस्‍य बनने के लिए भारत की आकांक्षाओं का हमेशा समर्थन किया।

प्रधानमंत्री जी की अगली बैठक संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव महामहिम श्री बान की मून के साथ हुई। इस बैठक में चर्चा ज्‍यादातर शांति स्‍थापना, जलवायु परिवर्तन सहित संपोषणीय विकास पर, संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद सुधार तथा कुछ क्षेत्रीय मुद्दों पर केंद्रित थी। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र शांति स्‍थापना का निरंतर मजबूत समर्थक बना रहेगा परंतु साथ ही शांति स्‍थापना की कार्यवाहियों के संबंध में जिस तरह से निर्णय लिए जाते हैं उसमें परिवर्तन करने की जरूरत है तथा सैनिक भेजने वाले देशों, विशेष रूप से भारत जैसे विशाल देशों जो संचयी रूप से अंतर्राष्‍ट्रीय शांति स्‍थापना की कार्यवाहियों में सबसे अधिक सैनिक भेजते हैं, से शांति स्‍थापना मिशन को अधिकृत करने से पूर्व पर्याप्‍त रूप से परामर्श नहीं किया जाता है। जलवायु परिवर्तन पर भी बहुत विस्‍तार से चर्चा हुई तथा संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव ने इस विषय पर प्रधानमंत्री जी के विजन के बारे में पूछा, तो प्रधानमंत्री जी ने कहा कि इस समय विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच बड़े पैमाने पर आपसी विश्‍वास का अभाव है क्‍योंकि विकसित देशों ने जलवायु वित्‍त पोषण सहित अपनी प्रतिबद्धताओं को अभी तक पूरा नहीं किया है। उन्‍होंने वास्‍तव में यह कहा कि फोकस केवल उत्‍सर्जन पर ही नहीं होना चाहिए; हमें सकारात्‍मक लक्ष्‍य भी निर्धारित करने चाहिए तथा नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते प्रयोग का समर्थन करना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि प्रतिबंधों, नियंत्रण और दबाव का वर्णन इस महत्‍वपूर्ण विषय पर चर्चा करने का सकारात्‍मक तरीका नहीं है। हमें आने वाली पीढि़यों को उनके अधिकारों से वंचित करने का कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार, यह जलवायु न्‍याय का मुद्दा था। उन्‍होंने कहा कि अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं से रियायती वित्‍त पोषण नवीकरणीय ऊर्जा के लिए और विशेष रूप से प्रौद्योगिकी अंतरण के लिए उपलब्‍ध होना चाहिए। नेपाल और श्रीलंका पर भी मोटेतौर पर विचारों का आदान – प्रदान हुआ तथा संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव ने कहा कि वह इस क्षेत्र में भारत के मजबूत नेतृत्‍व को स्‍वीकार करते हैं।

इसके बाद, जैसा कि आप सभी जानते हैं, प्रधानमंत्री जी ने 2015 पश्‍चात विकास एजेंडा पर शिखर बैठक में अपना वक्‍तव्‍य दिया। मुझे पूरा यकीन है कि आप में से सभी लोगों ने प्रधानमंत्री जी का वक्‍तव्‍य लाइव सुना होगा परंतु मैं कुछ महत्‍वपूर्ण बातों को सारांश के रूप में प्रस्‍तुत करने का प्रयास करूँगा। प्रधानमंत्री जी ने कहा कि वास्‍तव में भारत पहले ही अपने फ्लैगशिप कार्यक्रमों में 17 विकास लक्ष्‍यों को शामिल कर चुका है। उन्‍होंने विशेष रूप से इस संदर्भ में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं का उल्‍लेख किया जो महिला सशक्‍तीकरण के लिए है। इसके अलावा, यदि आप स्‍वच्‍छ भारत अथवा स्‍मार्ट शहर स्‍थापित करने के कार्यक्रम या हमारे शहरों को साफ करने के कार्यक्रम, नदियों को साफ करने के कार्यक्रम को देखें, जिनको हम नवीकरणीय ऊर्जा, 175 गीगावाट की नवीकरणीय ऊर्जा के लिए करने का प्रयास कर रहे हैं – इनमें से सभी वास्‍तव में 17 लक्ष्‍यों के साथ बहुत सहज हैं, जिनको संयुक्‍त राष्‍ट्र तथा अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय द्वारा आज अपनाया गया है। इस प्रकार, पूरा भाषण पहले से ही उपलब्‍ध है तथा मैं नहीं समझता कि उसे यहां दोहराने की जरूरत है परंतु मौलिक रूप से मेरा यह मानना है कि यह इस बारे में प्रधानमंत्री जी का बहुत महत्‍वपूर्ण विजन वक्‍तव्‍य है कि किस तरह भारत संपोषणीय विकास लक्ष्‍यों को देखता है जो अब 2030 तक अंतर्राष्‍ट्रीय एजेंडा निर्धारित करेंगे और किस तरह अपने स्‍वयं के राष्‍ट्रीय विकास के प्रयासों के साथ इन लक्ष्‍यों को शामिल करने में सकारात्‍मक ढंग से हमारा झुकाव है।

इस बैठक के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री जी ने सेंट लूसिया के प्रधानमंत्री महामहिम श्री केनी डेविस एंटोनी के साथ एक संक्षिप्‍त पुल असाइड बैठक की। सेंट लूसिया के प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी का धन्‍यवाद किया तथा कहा कि उन्‍होंने छोटे देशों तथा उनकी आवाज को काफी अहमियत दी है। प्रधानमंत्री जी ने इसके जवाब में कहा कि उनके लिए यह धारणा का विषय है और इस बारे में संक्षिप्‍त चर्चा हुई कि क्‍या आगामी राष्‍ट्रमंडल शासनाध्‍यक्ष शिखर बैठक, जो इस साल के उत्‍तरार्ध में मालटा में होने वाली है, में बैठक के लिए उन दोनों के मिलने की संभावना होगी।

प्रधानमंत्री जी की अगली बैठक मिस्र के राष्‍ट्रपति महामहिम श्री अब्‍देल फतह अल्‍सीसी के साथ हुई। मिस्र के राष्‍ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री जी की यह पहली बैठक थी। इसलिए, यह दोनों नेताओं के लिए विचारों को आदान – प्रदान करने के लिए महत्‍वपूर्ण अवसर था। मुख्‍य रूप से चर्चा आतंकवाद की खिलाफत तथा कट्टरता रोकने पर तथा भारत और मिस्र के बीच आर्थिक एवं कारोबारी सहयोग पर केंद्रित थी। इस संदर्भ में, मिस्र के राष्‍ट्रपति ने नई स्‍वेज नहर परियोजना का उल्‍लेख किया। जैसा कि आप सभी जानते हैं स्‍वेज नहर के इस विस्‍तार को हाल ही में खोला गया है तथा भारत की ओर से प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी उन समारोहों में भाग लेने के लिए गए थे। इस बात पर चर्चा हुई कि किस तरह यह परियोजना भारत के लिए निवेश के अवसर प्रस्‍तुत करती है।

इस प्रकार, मेरी समझ से प्रधानमंत्री जी की अब तक की चर्चाओं का यह समग्र रूप में टोन एवं प्रकरण था। अब दो घंटे की अवधि में दो और बैठकें निर्धारित हैं। भूटान के प्रधानमंत्री के साथ बैठक होनी है और फिर श्रीलंका के राष्‍ट्रपति के साथ बैठक होगी जिसके बाद स्‍वीडन के प्रधानमंत्री के साथ बैठक होगी और एक बैठक साइप्रस के राष्‍ट्रपति के साथ होगी। इस प्रकार, इन चार बैठकों के साथ आज प्रधानमंत्री जी के कार्यक्रम की समाप्ति हो जाएगी और जैसा कि आप सभी जानते हैं कल जी-4 की शिखर बैठक होनी है जिसके पश्‍चात प्रधानमंत्री जी कैलिफोर्निया के लिए रवाना हो जाएंगे। इस प्रकार मैं यहीं पर अपनी वाणी को विरा देता हूँ, परंतु यदि आपका कोई प्रश्‍न हो, तो मुझे उनके उत्‍तर देकर प्रसन्‍नता होगी।

प्रश्‍न (आशीष): आपने बताया कि यू.एन. सेक्रेटरी जनरल से बातचीत के दौरान नेपाल पर प्रधानमंत्री ने बात की, यह क्‍या बातचीत हुई?

सरकारी प्रवक्‍ता : मूलरूप से यह मोटेतौर पर उस पर थी जो वहां घट रहा है। यह उस संदर्भ में थी।

प्रश्‍न (आशीष): संविधान के बारे में बातचीत हुई?

सरकारी प्रवक्‍ता :यह संविधान है या क्‍या है, बेसिकली नेपाल पर आदान-प्रदान हुआ।

प्रश्‍न (बरखा दत्‍त, एनडीटीवी) : प्रधानमंत्री जी ने आज अपने संबोधन में ‘जलवायु न्‍याय’ नामक पदबंध का प्रयोग किया। क्‍या आप थोड़ा विस्‍तार से बता सकते हैं कि उनके कहने का अभिप्राय क्‍या है, क्‍या इसका संदेश यह है कि विकसित देशों को याद रखना होगा कि डिबेट में पैरिटी होनी चाहिए। वास्‍तविक अभिप्राय क्‍या है?

सरकारी प्रवक्‍ता : मूलरूप से यह समता का प्रश्‍न है। जब हम उत्‍सर्जन के बारे में बात करते हैं, तो हमें प्रति व्‍यक्ति उत्‍सर्जन के बारे में बात करने की जरूरत होती है। भारत का प्रति व्‍यक्ति उत्‍सर्जन आज भी 1.7 है, जबकि अमरीका का यह 16 या 17 है। इस प्रकार, मुद्दा समता है और मुद्दा न्‍याय का है। आप विकासशील देशों की निंदा नहीं कर सकते हैं क्‍योंकि वे आज भी कार्बन उत्‍सर्जन के बहुत निम्‍न स्‍तर पर हैं, जमीनी स्‍तर पर विकास के उन लक्ष्‍यों को कभी प्राप्‍त नहीं किया है जिसकी वजह से अब प्रदूषण होगा तथा आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार, प्रधानमंत्री जी ने जोर देकर कहा कि हम विकास चाहते हैं परंतु हम संपोषणीय विकास चाहते हैं और हम इस संबंध में अपनी बाध्‍यताओं के प्रति सजग हैं। इसी वजह से, उन्‍होंने परमाणु ऊर्जा के 175 गीगावाट के महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रम को निर्धारित किया है ताकि परमाणु ऊर्जा में वृद्धि हो जो ऊर्जा का सबसे स्‍वच्‍छ रूप है, परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हम विकास के अपने विकल्‍पों को छोड़ देंगे। इस प्रकार, मुद्दा समता का है और मुद्दा जलवायु न्‍याय का है। यह कि जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक जिम्‍मेदारी को बहुत स्‍पष्‍ट रूप से समझना होगा तथा देखना होगा कि ऐसे देश कौन हैं जो उस स्थिति के लिए जिम्‍मेदार हैं जिसमें आज हम हैं।

प्रश्‍न :सर, प्राइवेट और पब्लिक सेक्‍टर के अलावा पर्सनल सेक्‍टर की बात की गई है। उसमें बोला गया है कि बेसिक नीड्स पूरी की जायेंगी। यह किस बुनियाद पर होगा?जैसे बेसिक नीड्स पूरी करने के लिए लोग मूव हो रहे हैं, इन्‍टर-स्‍टेट भी होते हैं, इन्‍टरनेशनल भी होते हैं, कुछ बड़े देशों में भी चले जाते हैं, कुछ छोटे देशों में जैसा कि आपने जिक्र किया कि इराक का बहुत बड़ा मुद्दा है। सो, बेसिक नीड हमारे यहॉं पूरी नहीं हो रही है और लोग मूव हो रहे हैं और मूव होने के बाद उनकी सीक्‍योरिटी नहीं है।

सरकारी प्रवक्‍ता : देखिये, अब कुछ देशों में तो जो सीक्‍योरिटी का इश्‍यू आप उठा रहे हैं, उसमें हमने तो उसमें कोई कॉन्‍ट्रीब्‍यूट नहीं किया है। हम तो सिर्फ यह कर सकते हैं कि अगर इन्‍टरनेशनल सिचुएशन कहीं इस तरह की हो गई है, जहां पर हमारे नागरिकों को सुरक्षा नहीं मिल सकती है, तो हम तुरन्‍त ट्रैवेल एडवाइजरी इश्‍यू करते हैं और हम कहते हैं कि आप वहां मत जाइये, जैसे हमने यमन में इश्‍यू की हुई है, हमने लीबिया में इश्‍यू की हुई है, इराक में इश्‍यू की हुई है। प्रॉब्‍लम यह है कि उन ट्रैवेल एडवाइजरीज के बावजूद हमारे कुछ नागरिक वहां पहुँच जाते हैं और वे मुसीबत में फंस जाते हैं। तब भी हम उनको वहॉं से निकालने की पूरी कोशिश करते हैं। अभी आपने देखा, यमन में हमारे कुछ मछुआरे फंस गये थे, वे अभी निकले हैं वहां से। लीबिया में भी अभी हमारे कुछ लोग बंधक हैं, कइयों को तो हमने निकाल लिया है। इराक में भी अभी 39 भारतीय बंधक बने हुए हैं। तो यह एक ऐसी समस्‍या है जो एक तरह से अन्‍तर्राष्‍ट्रीय समस्‍या है।

प्रश्‍न : ...(अश्रव्‍य)...

सरकारी प्रवक्‍ता :
नहीं, पर्सनल सेक्‍टर का यह मतलब थोड़े ही है कि पर्सनल सेक्‍टर के लिए आपको विदेश में ही जाना है। पर्सनल सेक्‍टर तो हम भारत में ही पूरा करने की चेष्‍टा कर रहे हैं न। हम इतने जॉब्‍स जो क्रिएट करना चाह रहे हैं, मेक इन इण्डिया पोग्राम क्‍यों है। मेक इन इण्डिया प्रोग्राम का मुख्‍य आधार ही यह है कि हम भारत में ही इतनी नौकरियां, इतने जॉब्‍स, इतनी ऑपरचुनिटी क्रिएट कर सकें कि किसी को बाहर जाने की ज़रूरत ही न पड़े।

प्रश्‍न : विकास जी, प्रधानमंत्री ने आज यू.एन. में अपने भाषण में इस बात पर ज़ोर दिया कि न‍ सिर्फ यू.एन.एस.सी. बल्कि यू.एन. में भी रिफॉर्म की ज़रूरत है नहीं तो इसकी विश्‍वसनीयता नहीं बनी रहेगी। किस तरह के रिफॉर्म की वह बात कर रहे थे, इस पर अगर कुछ आप साफ कर सकें?

सरकारी प्रवक्‍ता: देखिये, जब हम यू.एन. रिफॉर्म की बात करते हैं तब हम बात करते हैं कि यू.एन. का जो ढर्रा है काम करने का, उसमें सुधार की हम बात करते हैं और फिर हम बात करते हैं सीक्‍योरिटी काउन्सिल में सुधार करने की। यू.एन. का मुख्‍य अंग तो सीक्‍योरिटी काउन्सिल ही है, इन्‍टरनेशल पीस एण्‍ड सीक्‍योरिटी जिसे हम कहते हैं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सुरक्षा व्‍यवस्‍था, तो सीक्‍योरिटी काउन्सिल को उसका जिम्‍मेदार बताया गया है, बनाया गया है। इसलिए सबसे आवश्‍यक है कि सीक्‍योरिटी काउन्सिल में विस्‍तार हो और उसमें सुधार हो। सीक्‍योरिटी काउन्सिल जब बनी थी, यूनाइटेड नेशन्‍स का जब गठन हुआ था, उस समय केवल 51 देश थे। आज 193 देश हैं। लेकिन सीक्‍योरिटी काउन्सिल में एक ही विस्‍तार हुआ है 1963 और 1965 के बीच में। 1963 में एक प्रस्‍ताव पारित हुआ था कि अस्‍थायी सदस्‍यों की संख्‍या 4 से बढ़ा दी जाये, तो 11 से उसका कुल कम्‍पोज़ीशन 15 हो गया। उसके बाद से हम 2015 में बैठै हैं लेकिन कतई एक भी सुधार नहीं हुआ है, कतई विस्‍तार नहीं हुआ है। तो यह अब सबको लगने लगा है कि 2015 की जो सुरक्षा परिषद है, वह 1945 की जो जियो-पॉलिटिकल रिएलिटीज हैं, उनका आइना, उनका प्रतिबिम्‍ब नहीं हो सकती है। उसमें सुधार आना आवश्‍यक है, उसमें विस्‍तार आना आवश्‍यक है, तभी सुरक्षा परिषद सक्षम हो सकेगी कि जो आज के आधुनिक चैलेन्‍जेज हैं हमारे सामने, साइबर सीक्‍योरिटी का चैलेन्‍ज है, इन्‍टरनेशल टेररि़ज्‍म का चैलेन्‍ज है, उनसे हम निपट सकें।

अभी भी आप देख रहे हैं कि तीन कान्टिनेन्‍ट्स में युद्ध चल रहे हैं लेकिन सीक्‍योरिटी काउन्सिल उनसे जूझने में असमर्थ हो रही है। क्‍यों?क्‍योंकि न तो वह रिप्रेजेन्‍टेटिव है और उसकी लेजिटिमेसी पर भी अब कई लोगों को संदेह होने लगा है, उसकी लेजिटिमेसी अब संदिग्ध होने लगी है। इसलिए आवश्‍यक हो गया है कि हम सीक्‍योरिटी काउन्सिल का विस्‍तार करें और उसमें सुधार करें। सीक्‍योरिटी काउन्सिल और जनरल असेम्‍बली के बीच जो तालमेल है वह निर्धारित किया जायेगा और कुल मिलाकर इस मुद्दे पर एक गम्‍भीर चर्चा हो ताकि जो 70वीं एनीवर्सरी यूनाइटेड नेशन्‍स की हम लोग मनाने जा रहे हैं, जो शुरुआत हो चुकी है और एक साल चलेगी, उस दौरान हम यह एक बहुत बड़ा मूलभूत परिवर्तन यूनाइटेड नेशन्‍स की व्‍यवस्‍था में ला सकें।

प्रश्‍न (सिद्धार्थ जराबी, ब्‍लूमबर्ग टीवी) : जलवायु न्‍याय के मुद्दे पर वापस लौटते हैं। क्‍या यह कहना उपयुक्‍त होगा कि प्रधानमंत्री द्वारा आज की टिप्‍पणियां जलवायु परिवर्तन पर वार्ता की दिशा में हमारे दृष्टिकोण में किसी परिवर्तन या उसके पुन: अंशांकन का कोई संकेत है? क्‍या इसे उनकी टिप्‍पणियों से टेकअवे में से एक के रूप में लिया जा सकता है? अनुवर्तन का दूसरा बिंदु यह है कि चर्चा के दौरान अथवा फोरम जिसमें ये टिप्‍पणियां की गई, में इसे किस रूप में समझा गया है? इस पर वैश्विक संदर्भ को देखते हुए इसकी अनुगूंज कैसी होगी?

सरकारी प्रवक्‍ता
: देखिए, प्रधानमंत्री जी ने जो कहा है वह न तो नई चीज है या मौलिक रूप से कोई भिन्‍न चीज है। यह ऐसी चीज है जिसे विकासशील देश लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक जिम्‍मेदारी होनी चाहिए तथा विकासशील देशों से केवल उत्‍सर्जन के आधार पर विकास के अपने विकल्‍पों को सीमित करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। आज प्रधानमंत्री जी ने जिस दूसरी बात पर जोर दिया वह यह है कि हमें नकारात्‍क एजेंडा पर नहीं जोर देना चाहिए – नकारात्‍मक एजेंडा जो यह कह सकता है कि अपना उत्‍सर्जन सीमित करो, दबाव नियंत्रित करो। यह चीजों को देखने का सकारात्‍मक तरीका नहीं है। हमें वस्‍तुत: सकारात्‍मक एजेंडा पर जोर देना चाहिए। हमें जलवायु वित्‍त पोषण दीजिए, हमें प्रौद्योगिकीय अंतरण दीजिए और हमें नई प्रौद्योगिकियां प्राप्‍त करने में समर्थ बनाइए जो अधिक संपोषणीय ढंग से विकास के हमारे लक्ष्‍यों को पूरा करने में हमारी मदद करेंगी। इस प्रकार, ऐसा नहीं हो सकता है कि एक तरफ आप हमें जलवायु वित्‍त पोषण भी न दें, और दूसरी तरफ हमें प्रौद्योगिकी भी न दें और इसके बावजूद आप हमें मजबूर करें, हमारे ऊपर दबाव डालें कि नहीं, आपको अपने उत्‍सर्जन को एक विशेष स्‍तर पर नियंत्रित करना होगा।

इस प्रकार, प्रधानमंत्री जी इस विशेष बिंदु का उल्‍लेख कर रहे थे तथा मेरी समझ से उनकी आवाज और उनके शब्‍दों की अनुगूंज बहुत अच्‍छी तरह सुनी गई है तथा संपूर्ण विकासशील देशों में इस पर गौर किया है जिनका बिल्‍कुल इन्‍हीं सिद्धांतों में विश्‍वास है। मुख्‍य सिद्धांत साझी किंतु विभेदीकृत जिम्‍मेदारियों का है। हम मानते हैं कि अपनी धरती की रक्षा करने की हम सबकी जिम्‍मेदारी है, परंतु साथ ही जिम्‍मेदारी में भेद भी होना चाहिए। आपको विभिन्‍न देशों के विकास के स्‍तरों को ध्‍यान में रखना होगा तथा उनको विकास की गुंजाइश प्रदान करनी होगी ताकि वे भी विकसित देश बनने की आकांक्षा रख सकें।

प्रश्‍न (यशवंत) : मेरा प्रश्‍न जलवायु न्‍याय से संगत प्रश्‍न है। क्‍या प्रधानमंत्री जी उसी दलील को फिर से गढ़ रहे हैं, जिसे भारत ने काफी समय पहले रखा था कि विकसित देशों को अधिक जिम्‍मेदारी लेनी होगी?

सरकारी प्रवक्‍ता : प्रधानमंत्री जी अपने विचारों को प्रस्‍तुत करने के लिए हमेशा अपने स्‍वयं के अनोखे मुहावरों का प्रयोग करते हैं। आप इसे प्रधानमंत्री जी के बहुत ही महत्‍वपूर्ण विजन वक्‍तव्‍य के रूप में नहीं ले सकते हैं। जलवायु परिवर्तन पर इससे बड़ा वक्‍तव्‍य पेरिस में सीओपी-21 में दिया जाएगा। आज यह संपोषणीय विकास लक्ष्‍यों के बारे में था। 17 लक्ष्‍यों में से एक लक्ष्‍य जलवायु परिवर्तन से भी संबंधित था। इसलिए, प्रधानमंत्री जी ने जो कहा वह संपोषणीय विकास एजेंडा के 17 लक्ष्‍यों में से एक के संदर्भ में था जो 2015 पश्‍चात विकास एजेंडा का अंग होगा। इस प्रकार, इसे संदर्भ से हटकर न लें। उन्‍होंने कहा कि हमें विकास करने की जरूरत है परंतु साथ ही हमें अपना विकास संपोषणीय ढंग से करना चाहिए, परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हम विकास के अपने विकल्‍पों को पूरी तरह सीमित कर दें।

प्रश्‍न (यशवंत) : यह बहुत ही मानक दलील है जिसे भारत लंबे समय से देता आ रहा है। इसलिए, मूलरूप से मेरा प्रश्‍न यह है कि क्‍या 1 नंवबर आई एन डी सी से पहले कार्बन उत्‍सर्जन में कटौती के बारे में भारत की घोषणा पर इसका असर होगा?

सरकारी प्रवक्‍ता
: मेरी समझ से अंतिम तिथि 1 अक्‍टूबर की है। इस प्रकार, हमें पूरी उम्‍मीद है कि हम इस तिथि से पूर्व आई एन डी सी की घोषणा कर पाएंगे।

प्रश्‍न
: मुझे एक प्रश्‍न पूछने की अनुमति दें। कल जी-4 की बैठक हो रही है। क्‍या संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के संदर्भ में किसी विशेष पहल की योजना बनाई गई है?

सरकारी प्रवक्‍ता : इस माह के 14 सितंबर को जो एक बहुत महत्‍वपूर्ण घटना हुई है वह यह है कि कमजोर हवा में वार्ता के वस्‍तुत: 23 साल बाद अंतत: अब हमारे पास एक वार्ता पाठ – ऐसा पाठ है जिसे महासभा द्वारा, आई जी एन के अध्‍यक्ष द्वारा, महासभा के अध्‍यक्ष द्वारा अनुमोदित किया गया है तथा अब यह उस समय वार्ता का आधार होगा जब नवंबर में अंतर्सरकारी वार्ता बहाल होगी। इस प्रकार, एक कार्यकारी पाठ प्राप्‍त करने की दिशा में यह बहुत महत्‍वपूर्ण एवं उल्‍लेखनीय कदम है जिसके आधार पर लेन-देन होता है तथा जिसके आधार पर अंतत: हम ऐसा संकल्‍प तैयार कर सकते हैं जिससे अंतत: सुरक्षा परिषद का विस्‍तार एवं सुधार होगा क्‍योंकि जब तक आपके पास पाठ नहीं होगा आप किस तरह वार्ता कर सकते हैं क्‍योंकि तभी आप शब्‍दश: एक – दूसरे से हवा में बात कर सकते हैं। अब आपके पास पाठ है तथा जैसा कि मैंने कहा यह एक संकलन पाठ है। यह ऐसा पाठ नहीं है केवल भारत की हिमायत करता है या इस संबंध में किसी खास विचारधारा की हिमायत करता है। यह एक संकलन पाठ है जिसमें संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद सुधार के लिए रखे गए सभी प्रस्‍तावों को सार के रूप में ऐसे टेम्‍पलेट में प्रस्‍तुत किया गया है जो उपलब्‍ध हैं। अब इस खास पाठ वार्ता आरंभ करना और यह देखना आई जी एन के अध्‍यक्ष के ऊपर निर्भर है कि पांच समूहों में से प्रत्‍येक पर बहुमत कहां पर स्थि‍त है। संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा के निर्णय 62/557 में पांच समूहों को अनुमोदित किया गया था और अब उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर उसके तार्किक अंजाम तक ले जाना अंतर्सरकारी वार्ता के अध्‍यक्ष का कार्य है।

जब हमने खुले कार्य समूह से 2008 में अंतर्सरकारी वार्ता में कदम रखा, तो उसका मुख्‍य प्रयोजन यह था कि अब हमें पाठ के आधार पर वार्ता आरंभ करनी चाहिए। उस पाठ को प्राप्‍त करने में सात साल लग गए परंतु अंतत: हमने पाठ प्राप्‍त कर लिया है। इस प्रकार, यह एक महत्‍वपूर्ण उपलब्धि है और मेरी समझ से जी-4 की शिखर सम्‍मेलन स्‍तरीय बैठक का इसी वजह से महत्‍व है जो 2004 के बाद केवल दूसरी बार हो रही है। इस प्रकार, 2004 जी-4 के जन्‍म का वर्ष है जब भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील – चार महत्‍वपूर्ण देश संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद सुधार को बहुत मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए एकजुट हुए। अब पुन: संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद सुधार के लिए अंतर्सरकारी वार्ता को बहुत मजबूती से धक्‍का देने के लिए चारों नेताओं की बैठक हो रही है। यही महत्‍वपूर्ण है। इस बैठक के अंत में एक संयुक्‍त वक्‍तव्‍य जारी किया जाएगा। कृपया उसकी प्रतीक्षा करें।

प्रश्‍न :प्रधानमंत्री ने यह कहा कि भारत अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहा है, जो आइलैण्‍ड नेशन्‍स हैं, पैसिफिक नेशन्‍स, अटलान्टिक नेशन्‍स हैं,उनके डेवलपमेन्‍ट पार्टनर के तौर पर। साथ ही उन्‍होंने यह भी कहा कि जो विकसित देश हैं, उनको फाइनेन्‍स और टेक्‍नॉलॉजी ट्रान्‍सफर के लिए जो कमिटमेन्‍ट है,वह पूरा करना चाहिये। तो थोड़ा सा एक्‍सप्‍लेन करेंगे कि क्‍या चीज़ है जो नहीं हो रही है जिसकी तरफ़ वह इशारा कर रहे हैं?

सरकारी प्रवक्‍ता : मैनें बार-बार वही कहा है कि कई बार क्‍या होता है कि हमें कुछ टारगेट्स दे दिये जाते हैं। एक एजेण्‍डा बन जाता है लेकिन जो उन टारगेट्स को पूर्ति करने के लिए जो आपको फाइनेन्‍स चाहिये होती है, जो आपको टेक्‍नॉलॉजी ट्रान्‍सफर चाहिये होता है, एडॉप्‍टेशन मिटिगेशन की तो हम बात करते हैं लेकिन हम यह बात नहीं करत हें कि उसका रास्‍ता क्‍या होगा। कई बार जो विकासशील देश हैं उनके पास इतनी वित्‍तीय सुविधा नहीं होती है कि वह अपने बलबूते पर वह सब चेन्‍जेज़ ला सकें। अगर आपको कोई नए एमिशन रिड्यूसिंग टेक्‍नॉलॉजीज़ अगर चाहिये तो वे तो विकसित देशों के पास ही उपलब्‍ध है लेकिन उसकी कॉस्‍ट इतनी प्रॉहिबिटिव होती है कि विकासशील देश उसका इस्‍तेमाल नहीं कर सकते हैं। तो यही प्रधानमंत्री ने कहा है कि अगर क्‍लाइमेट जस्टिस की हम बात करते हैं तो जो विकसित देश हैं, उन्‍हें विकासशील देशों को टेक्‍नॉलॉजी ट्रान्‍सफर करना चाहिये और उन्‍हें वे साधन उपलब्‍ध कराने चाहिये जिससे वह अपना डेवलपमेन्‍ट पाथवे जो है उसको सस्‍टेनेबल बना सके।

प्रश्‍न : क्‍या यह माना जाये कि जो सस्‍टेनेबल डेवलपमेन्‍ट गोल्‍स हैं उनकी फाइनेन्सिंग का पूरा मॉडल पूरी दुनिया में चेन्‍ज होने वाला है, क्‍या उसके ऊपर डेलीबरेशन्‍स होंगे?

सरकारी प्रवक्‍ता : उस पर तो एक मीटिंग ऑलरेडी हो चुकी है। अद्दीस अबाबा में जुलाई में एक मीटिंग हुई थी जिसमें फाइनेन्सिंग फॉर डेवलपमेन्‍ट उसे कहते हैं और उसमें ऑलरेडी कुछ निष्‍कर्ष निकले हैं। हम उससे संतुष्‍ट हैं। हम तो चाहेंगे कि और भी ज्‍़यादा हो लेकिन कम से कम एक शुरुआत तो हुई है और यह फाइनेन्सिंग फॉर डेवलपमेन्‍ट की मीटिंग हो चुकी है। तो ऐसी बात नहीं है कि उसपर काम नहीं चल रहा है।परंतु अधिक की जरूरत है। हम यही बात कर रहे हैं। यह पर्याप्‍त नहीं है। आप सभी का धन्‍यवाद।

(समाप्‍त)



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