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न्‍यूयार्क में शांति रक्षा पर शिखर बैठक में प्रधानमंत्री द्वारा वक्‍तव्‍य

सितम्बर 29, 2015

राष्‍ट्रपति बराक ओबामा,
महासचिव बान की मून,
महानुभावो,


संयुक्‍त राष्‍ट्र की नींव द्वितीय विश्‍व युद्ध के मैदान में बहादुर सैनिकों द्वारा रखी गई थी। 1945 तक उन्‍होंने भारतीय सेना के 2.5 मिलियन जवानों को शामिल किया जो इतिहास में सबसे बड़ा स्‍वयं सेवक बल है। 24000 से अधिक स्‍वयंसेवकों ने अपने जीवन का बलिदान दिया तथा उनमें से लगभग आधे स्‍वयंसेवकों का कोई अता-पता नहीं चला।

बलिदान की इस विरासत को यहां मौजूद तीन देश साझा करते हैं। आज भी वे संयुक्‍त राष्‍ट्र शांति रक्षा अभियानों में सबसे अधिक सैनिकों का योगदान करने वाले देश हैं। 1,80,000 से अधिक भारतीय सैनिकों ने संयुक्‍त राष्‍ट्र के शांति रक्षा मिशनों में भाग लिया है – तथा यह संख्‍या किसी अन्‍य देश से अधिक है। भारत ने अब तक संयुक्‍त राष्‍ट्र 69 शांति रक्षा मिशनों में से 48 में भाग लिया है। संयुक्‍त राष्‍ट्र मिशन में सेवा करते हुए 161 भारतीय शांति रक्षकों ने अपने जीवन की आहुति दी है।

लाइबेरिया में संयुक्‍त राष्‍ट्र मिशन में फीमेल फार्म्‍ड पुलिस यूनिट का योगदान देने वाला भारत पहला देश था। भारत भारी संख्‍या में देशों के शांति रक्षक अधिकारियों को प्रशिक्षण दे रहा है। आज तक की तिथि के अनुसार, हमने 82 देशों के लगभग 800 अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया है। शांति रक्षा पर इस शिखर बैठक का आयोजन करने के लिए मैं राष्‍ट्रपति ओबामा का धन्‍यवाद करता हूँ। यह केवल इसलिए सामयिक नहीं है कि यह संयुक्‍त राष्‍ट्र का 70वां वर्षगांठ वर्ष है, यह इसलिए शामिल भी है क्‍योंकि सुरक्षा परिवेश बदल रहा है, शांति रक्षा से जुड़ी मांगे बढ़ रही हैं तथा संसाधनों को प्राप्‍त करना कठिन होता जा रहा है।

आज न केवल शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए अपितु कई तरह की जटिल चुनौतियों से निपटने के लिए भी शांति रक्षकों का आह्वान किया जाता है। अधिदेश महत्‍वाकांक्षी हैं, परंतु संसाधन अक्‍सर अपर्याप्‍त होते हैं। कई बार अधिदेश की वजह से शांति रक्षक संघर्ष के पक्षकार बन जाते हैं और अपने जीवन और अपने मिशन की सफलता को जोखिम में डाल देते हैं।

काफी हद तक समस्‍याएं इसलिए उत्‍पन्‍न होती हैं कि सैनिकों का योगदान देने वाले देशों की निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होती है। वरिष्‍ठ प्रबंधन तथा बल कमांडरों में उनका पर्याप्‍त प्रतिनिधित्‍व नहीं होता है। शांति रक्षकों की सीमाओं को पूरी तरह ध्‍यान में रखते हुए तथा राजनीतिक समाधानों के समर्थन में चतुराई के साथ शांति रक्षा मिशनों को तैनात किया जाना चाहिए। हमें इस बात की प्रसन्‍नता है कि शांति अभियान पर उच्‍च स्‍तरीय स्‍वतंत्र पैनल ने इन मुद्दों को स्‍वीकार किया है। हम पैनल की सिफारिशों पर उनकी त्‍वरित रिपोर्ट के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव का धन्‍यवाद करते हैं। हम आशा करते हैं कि इस पर जल्‍दी से विचार करेंगे। संयुक्‍त राष्‍ट्र शांति रक्षा अभियानों के लिए भारत की प्रतिबद्धता मजबूत रही है और इसमें वृद्धि हुई।

हमने संयुक्‍त राष्‍ट्र शांति रक्षा अभियानों के लिए नए आशयित योगदानों की घोषणा की है। इनमें विद्यमान या नए अभियानों में 850 तक सैनिकों की अतिरिक्‍त बटालियन, महिला शांति रक्षकों के अधिक प्रतिनिधित्‍व के साथ अतिरिक्‍त तीन पुलिस यूनिटें, क्रिटीकल एनेब्‍लर उपलब्‍ध कराने की प्रतिबद्धता, संयुक्‍त राष्‍ट्र मिशनों में तकनीकी कार्मिकों की तैनाती और भारत में हमारी सुविधाओं में तथा फील्‍ड में शां‍ति रक्षकों के लिए अतिरिक्‍त प्रशिक्षण शामिल हैं।

अंत में, मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि संयुक्‍त राष्‍ट्र शांति रक्षा की सफलता अंतत: उन हथियारों पर निर्भर नहीं है जो योद्धाओं के पास होते हैं, अपितु नैतिक बल पर निर्भर होती है जो संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के निर्णयों से आता है।

हमें संयुक्‍त राष्‍ट्र की प्रासंगिकता एवं कारगरता बनाए रखने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों के काफी समय से लंबित कार्य को नियत समय सीमा के अंदर पूरा करना चाहिए।

मैं उन शांति रक्षकों को श्रद्धां‍जलि अर्पित करना चाहूँगा जिन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र के सर्वोच्‍च आदर्शों की रक्षा करने में अपने जीवन की आहुति दी है। यदि जल्‍दी से मृत शांति रक्षकों की याद में प्रस्‍तावित संस्‍मारक दीवार का निर्माण होता है, तो यह उनके प्रति सबसे उपयुक्‍त श्रद्धां‍जलि होगी। भारत इस उद्देश्‍य के लिए वित्‍तीय योगदान सहित हर तरह का योगदान देने के लिए तैयार है।

न्‍यूयार्क
28 सितंबर, 2015


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