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प्रधानमंत्री की संयुक्त राज्य अमेरिका यात्रा पर भारत के राजदूत द्वारा वाशिंगटन में मीडिया वार्ता का प्रतिलेखन (07 जून, 2016)

जून 07, 2016

सरकारी प्रवक्ता श्री विकास स्वरूप: दोस्तो,नमस्कार और संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रधानमंत्री की जारी यात्रा के इस प्रेस वार्ता में आपका स्वागत है।

 

जैसा कि आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री जिनेवा, स्विट्जरलैंड से इस दोपहर पहुंचे हैं और आज भी वास्तव में अधिक व्यस्त रहेंगे। वस्तुतः स्विट्जरलैंड में हमारी आपसे वार्ता 18 घंटे पहले हुई थी और हमने दिन की अपनी अंतिम वार्ता समाप्त की थी, अर्थात प्रधानमंत्री की अमरीका के विचार मंच के अग्रणी सदस्यों के साथ बातचीत का विवरण।

इससे पहले बेशक प्रधानमंत्री ने एरलिंगटन के राष्ट्रीय कब्रिस्तान का दौरा किया है। वे अंतरिक्ष शटल कोलंबिया मेमोरियल भी गये और फिर उन्होंने अमेरिका के महान्यायवादी के साथ भारत के कुछ प्राचीन सांस्कृतिक कलाकृतियों की वापसी के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लिया।

आज आपको प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के बारे में आपको जानकारी देने के लिए मेरे साथ संयुक्त राज्य अमेरिका में हमारे राजदूत अरुण कुमार सिंह हैं। मैं उनसे अनुरोध करुंगा कि वे आपको प्रधानमंत्री के दिनभर के कार्यक्रम के बारे में जानकारी प्रदान करे और फिर वह कुछ प्रश्नों के उत्तर देंगे। इसी के साथ मैं सभाकक्ष राजदूत को सौप रहा हुँ।

राजदूत यूनाइटेड स्टेट्स, श्री अरुण कुमार सिंह: धन्यवाद विकास। मुझे लगता है कि इस कार्यक्रम में सम्मिलित विषयों के बारे में आपको पहले से ही पता है इसलिए मैं अभी कुछ जानकारी दुंगा,पिछले कार्यक्रम में कई विचार मंच के प्रमुखों के साथ बातचीत हुई थी और वे विचार मंच जो प्रतिनिधित्व कर रहे थे — ब्रूकिंग्स, विदेश संबंध परिषद, अमेरिकी प्रगति केंद्र, अटलांटिक परिषद, हडसन संस्थान, राष्ट्रीय हित केंद्र, वैश्विक ऊर्जा कैपिटल, कार्नेगी एंडोमेंट, एशिया समूह, प्यू अनुसंधान केन्द्र, अमेरिकी शांति संस्थान और लोकतंत्र सुरक्षा संस्थान थे।

अतएव विचार मंच यहाँ इस प्रकार के विचारों की एक विस्तृत श्रेणी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और बातचीत का उद्देश्य उनसे ये समझना था कि, वे आने वाले वर्षों में वैश्विक रुझानों और चुनौतियों को कैसे देखते हैं, भारत और अमेरिका एक साथ मिलकर क्या काम कर सकते हैं। अगर आप प्रधानमंत्री के आदर्शो को याद करें जो कि उन्होंने व्यक्त किया है "अमेरिका और भारत एक साथ मिलकर विश्व के लिए क्या कर सकते हैं?" और वास्तव में वही विषय-वस्तु था।

अतएव इसी ढांचे में विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर मध्यम और लंबी अवधि के परिप्रेक्ष्य में विचार विमर्श किया गया था, और हमने अपने लिए अवसरों और तरीको को देखा, जिसमे हम एक साथ काम करने में सक्षम हो।


फलतः कई प्राचीन सांस्कृतिक कलाकृतियों की वापसी के संदर्भ में भी वह बहुत महत्वपूर्ण था। यह एक ऐसा प्रयास है जो कुछ समय से जारी है। भारत से कई प्राचीन सांस्कृतिक कलाकृतियाँ, विश्व के विभिन्न भागों में अवैध रूप से लाया गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी एक निश्चित संख्या में हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विभिन्न देशों की सरकारे हमारे साथ उनकी पहचान करने और उन्हें भारत भेजने के लिए बहुत सक्रिय रूप से रास्ता खोजने का काम कर रही है।


यह एक अविरत प्रक्रिया है क्योंकि यहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका में स्वदेश वापसी से पहले कुछ कानूनी और दूसरे प्रक्रियाओं को पूरा किया जाना है, लेकिन इस विशेष अवसर के लिए, 12कलाकृतियों की पहचान की गई है जो भारत की जनता और सरकार को वापस सौंपने के लिए तैयार हैं।

ये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें से कुछ तो एक हजार वर्ष पुराना है, चोल राजवंश के समय का है। उनमें से कुछ मिट्टी की कलाकृतियाँ और अन्य तो दो हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। अतएव कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण कलाकृतियाँ हमे सौंप दिया गया हैऔर निश्चित रूप से वे अब भारत भेज दिए जाएंगे।

एरलिंगटन समारोह मोटे तौर पर दो भागों में आयोजित किया गया था। पहला भाग अज्ञात सैनिकों के स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पण था। अमेरिका की ओर से, अमेरिकी के रक्षा सचिव श्री एश्टन कार्टर उपस्थित थे और उसके बाद प्रधानमंत्री ने कोलंबिया शटल हादसा में मृत लोगों, जिसमे एक भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला भी शामिल थी, के स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की। उस अवसर पर कल्पना चावला परिवार और रिश्तेदारों के प्रतिनिधि भी मौजूद थे। दूसरे भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और नासा के कुछ प्रतिनिधि भी इस अवसर पर उपस्थित थे क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष, सहयोग का महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है।

धन्यवाद।

सरकारी प्रवक्ता श्री विकास स्वरूप:कृपया अपना परिचय दें।

प्रश्न: मैं अभिषेक टाइम्स नाउ समाचार पत्र से हूं। महोदय, मुझे आप विचार मंच के प्रमुखों के साथ किस प्रकार का प्रारूप अपनाया गया था, उस पर थोड़ा विस्तार से बताएँ। क्या यह एक सवाल-जवाब सत्र की तरह था? और इस मुद्दे पर, हमने पिछले एक-दो दौरों में देखा है कि, अवधारणा संबंधी संकट-स्थिति थी, जैसे कि सुधार सही दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं और परसों (पिछला) इस मुद्दे पर एनवाईटी में एक लेख में कहा था कि भारत शायद एनएसजी की सदस्यता के लिए बहुत योग्य नहीं है। इसलिए यह कार्यक्रम अनिवार्य रूप से अवधारणा प्रबंधन और प्रारूप के संदर्भ के बारे में था। कारण है कि मैं क्यों प्रारूप के बारे में पूछ रहा हूँ, क्या प्रधानमंत्री द्वारा उन प्रश्नों का जवाब दिया गया था?

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत श्री अरुण कुमार सिंह: मुझे नहीं लगता है कि किसी को इतना ज्यादा विस्तार में जाना चाहिए, लेकिन मैं आपको बता सकता हुँ कि यह कार्यक्रम धारणा प्रबंधन के उद्देश्य से नहीं किया गया था।

इस कार्यक्रम का, जैसा कि मैंने वर्णन किया है, यहाँ के विचारक कैसे सोचते हैं और विचार मंच के नेता, वैश्विक मुद्दों और प्रवृत्तियों को कैसे देखते हैं, उसको समझने के उद्देश्य से किया गया था। वे मध्यावधि और लंबी अवधि की चुनौतियों को किस रूप में देखते हैं। उनमें भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए क्या अवसर हैं, ताकि दोनों उन चुनौतियों का सामना करने के लिए एक साथ काम करने में सक्षम हो और जो दोनों के राष्ट्रीय हित को भी पूरा कर सके।


सामान्यतया जब इस तरह के आयोजन हैं, एक संरचना होती है और मुक्त प्रवाह विस्तार होता है। लोगों के विचारों को साझा करने के लिए और प्रधानमंत्री को अंत में अपने विचारों को साझा करने और उनका आकलन कि क्या बातें कर रहे हैं, व्यापक संरचना होते हैं। अगर कोई विशेष सवाल हैं, तो वे प्रतिक्रिया के हिस्से के रूप में प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे।


विशेष सवालों के संदर्भ में जिसका आपने उल्लेख किया है, सभी लोकतांत्रिक देशों में अलग-अलग विचारधाराएँ होती हैं और आपने आर्थिक सुधार या किसी और का एक विशेष आकलन का उल्लेख किया, लेकिन मैं आपको बता सकता हुँ, मैं यहां बड़ी संख्या मे लोगों से सुना है कि भारत में सुधारों बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा है जो कि 2 साल पहले शुरु हुआ था आपको सिर्फ तथ्यों को देखना चाहिए। उदाहरण के लिए, भारत में अमेरिकी इक्विटी निवेश, जो 2013 में 7 अरब डॉलर था आज 12 अरब डॉलर है और भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह पिछले साल 50 प्रतिशत से भी ऊपर चला गया है। इसलिए अगर आप सिर्फ तथ्यों पर नजर डालें तो, आप देख सकते हैं कि पिछले दो वर्षों में भारत में उल्लेखलीय प्रगति हुई है और एक अर्थ में लोगों के माली हालत में सुधार हुआ है उस अवसर का एक हिस्सा बने हैं और हम इसे जमीनी स्तर पर देख रहे हैं।

प्रश्न: नमस्कार राजदूत महोदय। सबसे पहले आपको मुबारकबाद, जिस प्रकार से आपने वाशिंगटन पोस्ट को उपदेशात्मक बात पर पीछे रखा और मैं फर्स्ट पोस्ट न्यूयॉर्क, से निखिल नटराजन हूँ। क्या श्रीमान् मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस के किसी प्रमुख वार्ताकार को प्रमुख बात पर संबोधित किया?

सरकारी प्रवक्ता श्री विकास स्वरूप:जैसा कि मैंने कहा, यह प्रेस वार्ता विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रधानमंत्री के आज के कार्यक्रम पर है। अगर आपके पास उससे संबंधित कोई भी सवाल है, तो राजदूत उसका उत्तर देने के लिए उपलब्ध हैं।

कल व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री की बैठक के बाद एक अलग ब्रीफिंग होगी। विदेश सचिव भी ब्रीफिंग के लिए उपलब्ध होंगे। तो पहले से ही सूचित करने का कोई मतलब नहीं है कि क्या चर्चा की जाएगी, क्या चर्चा नहीं की जाएगी। सब का जवाब कल ही दिया जाएगा।

सवाल: धन्यवाद, मैं रघुवीर गोयल इंडिया ग्लोब, एशिया टुडे से। महोदय,भारतीय मूल के अमेरिकी समुदाय वाशिंगटन में, पिछले दो-तीन महीनों से प्रधानमंत्री का स्वागत करने के लिए बहुत मेहनत से काम कर रहे थे। इस समुदाय के लिए कोई संदेश है क्योंकि वे भारत और प्रधानमंत्री के के एजेंडे लिए कर रहे हैं और वे पुछ रहे हैं कि क्या उनके करने लायक और भी कुछ हैं। दूसरा, प्रधानमंत्री का दो साल का कार्यकाल, अमेरिका सहित विश्व भर में और भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच चर्चा का विषय है, चूँकि प्रधानमंत्री स्विट्जरलैंड में थे, क्या वे वहाँ से सारे जमा पैसे को लाने जा रहे हैं?

शुक्रिया जनाब।

सरकारी प्रवक्ता श्री विकास स्वरूप:जहां तक प्रधानमंत्री के स्विट्जरलैंड यात्रा का संबंध है,आपने प्रेस टिप्पणियों को जरुर देखा होगा। स्पष्ट रूप से वहाँ काला धन और कर चोरी के मुद्दे पर अधिकारियों के साथ बैठक हुई थी। स्विस राष्ट्रपति ने खुद कहा कि स्विट्जरलैंड ऐसा देश नहीं है जो इस तरह के कार्यों को प्रोत्साहित करती है। स्विट्जरलैंड ऐसा देश है जो इन मामलों पर अंतरराष्ट्रीय मुख्य धारा का एक हिस्सा बनना चाहता है तथा निश्चित रुप से भारत और स्विट्जरलैंड के बीच इस पर आगे सहयोग होगा।


दूसरा बड़ा मुद्दा है जिसकी स्विट्जरलैंड में चर्चा की गई वो परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता का था और वहाँ भी आपने खुद स्विस राष्ट्रपति से समर्थन का एक बहुत ही स्पष्ट आश्वासन देखा है, यह कहते हुए कि स्विट्जरलैंड परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता का समर्थन करेगा। इसलिए यह स्विट्जरलैंड से संबंधित है। आपने जो सवाल पूछा है, वह वास्तव में प्रधानमंत्री के आज के कार्यक्रम से संबंधित नहीं है, लेकिन राजदूत यहाँ भारतीय-अमेरिकी समुदाय पर एक सामान्य टिप्पणी करना चाहते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत, श्री अरुण कुमार सिंह:
मुझे लगता है कि जहां तक भारतीय मूल के अमेरिकी समुदाय के संदर्भ का संबंध है, प्रधानमंत्रियों के दौरे से पहले, जारी यात्रा और स्वयं की टिप्पणी से स्पष्ट है कि वे भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भूमिका को बहुत ही महत्वपूर्ण रुप से देखते हैं और उसी आधार पर हम, उन लोगों के साथ सतत संलग्न है।


प्रश्न: मेरा नाम अदिति है और मैं टाइम्स नाउ से हूँ। महोदय, हमलोग पिछले दो दिनों से एक-दो विचार मंचो के बारे में बोल रहे हैंऔर उनमें से अधिकांश की राय थी कि प्रधानमंत्री और विचार मंच के विभिन्न सदस्यों के बीच आज के बातचीत का कार्यान्वन होगा, भारत का सुरक्षा और आतंकवाद के संदर्भ के संबंध क्या रुख हो सकता है। मेरा प्रश्न एक है कि, क्या उन सलाहों पर कुछ चर्चा की गई या क्या प्रधानमंत्री के द्वारा कोई प्रश्न उठाए गए थे? और मैं प्रधानमंत्री की आज की वार्ता और संलग्नता को समझना चाहता हुँ, लेकिन अभी, अगर आप कहना चाहते हैं कि हम कोई विशेष ब्रीफिंग या घोषणा उम्मीद कल रक्षा मंत्री ऐश कार्टर के साथ बैठक के बाद आएगी।

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत श्री अरुण कुमार सिंह: सर्वप्रथम विषयों के प्रकार, जिस पर चर्चा की गई है। में सोच-समझकर कहना चाहूंगा कि, मैं विशिष्ट विषयों में नहीं जा रहा हूँ, जिस पर चर्चा की गई है। यही कारण है कि इस बैठक का विचार था कि सब कुछ पर चर्चा बहुत स्पष्ट रुप से और रिकॉर्ड से परे प्रारूप में हो। और इसमे कई मुद्दा क्षेत्रों की पहचान और संभावित सहयोग पर बहुत अच्छा विचार विमर्श किया गया।

क्या-क्या घोषणाएँ होगी, नहीं होगी इसके लिए हमें कल तक इंतजार करना होगा। आपने जो रक्षा सचिव के साथ बैठक के बारे में बात की थी, उस बैठक से पहले खुद राष्ट्रपति के साथ एक बैठक है। इसलिए हमें उन बैठकों के बाद प्रेस वार्ता के लिए कल तक का इंतजार करना होगा।


प्रश्न: एनडीटीवी से नम्रता। क्या एनएसजी में सभी पर चर्चा की गई, क्योंकि वह एक परिभाषित बिंदु है जिस पर अपनी स्विट्जरलैंड और कई देशों की यात्रा के दौरान चर्चा की और कई का कहना है कि यह अमेरिकी रणनीतिक वार्ता का नतीजा है। वास्तव में माइकल फोरमैन वापस आ सकते हैं और जहाँ तक बातचीत का संबंध है, अमेरिका-चीन संबंधों में समस्या हो सकती है। अतएव कैसे भारत एनएसजी में शामिल किए जाने के लिए अमेरिका के लॉबी के उपयोग करने के उसके रुख को प्रभावित करेगा?

सरकारी प्रवक्ता, श्री विकास स्वरूप: जैसा कि मैंने कहा, प्रधानमंत्री की आज की बैठक विचार मंच के साथ बातचीत और इससे पहले सांस्कृतिक कलाकृतियों की वापसी पर केंद्रित थी। एनएसजी उन चर्चाओं का हिस्सा नहीं था इसलिए उसको इसमें शामिल नहीं करते हैं। व्हाइट हाउस में कल ठोस राजनीतिक वार्ता होगी। हम उन वार्ता के नतीजे का इंतजार करते हैं।

प्रश्न: बस एक महत्वपूर्ण सवाल महोदय, विशेष रूप से व्हाइट हाउस में लंच से संबंधित, क्या यह एक बहुत करीबी के लिए लंच है? क्या आप हमे कुछ बता सकते हैं कि वास्तव में प्रधानमंत्री के साथ कौन-कौन रहेंगें?

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत, श्री अरुण कुमार सिंह: यह एक व्यवहार्य लंच है इसलिए इस लंच में दोनों तरफ के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल होगें।

सरकारी प्रवक्ता श्री विकास स्वरूप: कार्यात्मक लंच का मतलब, विचार-विमर्श लंच पर भी जारी रहेगा।

प्रश्न: प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से ललित झा। प्राचीन कला कृति घटना पर, क्या प्रधानमंत्री बोले? उसने क्या कहा, उनके भाषण का भावार्थ क्या था?

सरकारी प्रवक्ता, श्री विकास स्वरूप: हाँ उन्होंने बात की थी। बस आप मेरे ट्विटर हैंडल को देखे, आप प्रधानमंत्री के कुछ टिप्पणी को देखेंगे। असल में उन्होंने कहा कि कैसे ये कलाकृतियाँ न केवल भारत को अपनी प्राचीन सभ्यता से जोड़ती है बल्कि ये ऐसे खजाने हैं जिससे पूरी दुनिया आनंदित होती है, फिर भी ऐसे लोग हैं जो इन खजानो की अवैध व्यापार में संलग्न हैं और इस संदर्भ में उन्होंने ओबामा प्रशासन, राष्ट्रपति ओबामा और विशेष रूप से, अटॉर्नी जनरल का आभार व्यक्त किया।

उनकी पूरी टीम ने,इस मामले को सशक्त और सुस्पष्ट बनाने के लिए कई वर्षों से काम कर रहे हैं, उसके बाद ही इन कलाकृतियों को वापस करने का निर्णय लिया गया, और वास्तव में अटॉर्नी जनरल ने उल्लेख किया कि यह भारत को 200 कलाकृतियां को लौटाने की प्रक्रिया का आरम्भ करना है। आज, 12 लौटा दिये गये हैं लेकिन भारत से खोए हुए और चोरी सभी कलाकृतियों को प्राप्त करने की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने विशेष रूप से उस कला-डीलर के नाम का भी उल्लेख किया जो इस विशेष व्यावसाय में लगा हुआ था तथा अमेरिकी और भारतीय प्रवर्तन एजेंसियों के बीच मजबूत सहयोग के लिए धन्यवाद दिया, जिनके वजह से इन कलाकृतियों को भारत वापस लाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने गुजरात राज्य के गहन शोध को विस्तार से बताया कि वास्तव में गुजरात धोलावीरा शहर सहित कई प्राचीन खजाने का भंडार है, मोहनजोदड़ो हड़प्पा की 5000 साल पुराने इतिहास संस्कृति, कैसे अतीत और वर्तमान के बीच संबंध स्थापित करते हैं। मुझे लगता है कि उन्होंने वास्तव में बहुत ही भावनात्मक अनुभूति के साथ कही थी, क्योंकि वे व्यक्तिगत रुप से भारत की सांस्कृतिक विरासत लौटने की इस परियोजना से जुड़े हुए थे।

प्रश्न: मेरा नाम गौरव सावंत है। महोदय मैं आजतक और इंडिया टुडे से हूँ। ये जो ऐतिहासिक धरोहर की हम बात कर रहे हैं, जो लौटाई गई, क्या, इसके बारे में पता है कि कब भारत से निकली,कैसे निकली, कहां चोरी गई थी या चोरी से निकली और क्या हम ऐसा उम्मीद कर सकते हैं कि जैसा अमेरिका ने लौटाया है, कुछ और देश भी ऐसा करेंगें? कोहिनूर लौट पाएगा?

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत, श्री अरुण कुमार सिंह: इस तरह की धरोहर कई देशों से लौटाई गई है। मुझे याद है कुछ साल पहले, फ्रांस से भी एक मूर्ति भारत को लौटाई गई थी। और जब जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल हिंदुस्तान में थी तो उस समय भी एक मूर्ति लौटाई गई थी।

अभी पुरे विवरण की कब, किस तारीख से इनको भारत से लाया गया, ये सब अभी पता किया जा रहा है। वो कानून प्रवर्तन और जांच का विषय है, लेकिन ये स्थापित हो गया है कि प्राचीन मूर्ति है, हिंदुस्तान की हैं और अपने प्रक्रिया को पूरा करने के बाद यहाँ की सरकार उस स्थिति में है कि हमे वापस दे सके और उन्होंने वापस दिया है।
प्रश्न: महोदय, एक और सवाल इसी से जुड़ा हुआ है। ये जो 200 मूर्तियाँ को वापस करने की बात की जा रही है, इसकी कोई समय सीमा निर्धारित की गई है क्या की इतने समय सीमा के अंदर-अंदर इनको वापस किया जाएगा?

संयुक्त राज्य अमेरिका में राजदूत, श्री अरुण कुमार सिंह: कोई भी तय समय सीमा देना मुश्किल होता है, क्योंकि हम लोग देख रहे कि उनकी तरफ से पुरी कोशिश है कि जितनी जल्दी वापस कर सके कर दें। लेकिन वो करने से पहले एक प्रक्रिया होता है, पहले उनकी पहचान करना, समय सीमा तय करना, प्रामाणिकता करना। उसके बाद एक कानूनी प्रक्रिया होता है, वो सब पूरा करने के बाद, वो हमे उनको सौपने की स्थिति में होते हैं।

प्रश्न: एक बहुत ही छोटा सा सवाल है। विकास आपने कहा कि अटार्नी जनरल ने इस सिलसिले में एक आर्ट डीलर नाम लिया है?

सरकारी प्रवक्ता, श्री विकास स्वरूप: सुभाष कपूर। मुझे लगता है कि प्रेस ब्रीफिंग समाप्त करनी चाहिए। व्हाइट हाउस के बैठक के बाद एक और प्रेस ब्रीफिंग होगा तो हमारे ओएस- डीपीआर, आपको उस समय के बारे में बताएंगे। आप सभी को धन्यवाद।

(समाप्त)



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