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वॉशिंगटन डी. सी. में अमेरिका भारत सामरिक भागीदारी फोरम में विदेश मंत्री द्वारा टिप्पणी (03 अक्टूबर, 2019)

अक्तूबर 04, 2019

अध्यक्ष: धन्यवाद। मुझे आज शाम अपने दो वक्ताओं को प्रस्तुत करने का सम्मान प्राप्त हुआ है। मैं विदेश मंत्री से शुरुआत करूंगा । डॉ. जयशंकर ने मई में भारत के विदेश मंत्री के रूप में शपथ ली । अपने 41 वर्षों के राजनयिक करियर में उन्होंने भारत के विदेश सचिव, साथ ही चेक गणराज्य में राजदूत, सिंगापुर में उच्चायुक्त, चीन में राजदूत और हाल ही में, जैसा कि हम सभी जानते हैं, यहाँ वाशिंगटन में भारत के राजदूत सहित कई पदों पर कार्य किया है।

अपनी उस भूमिका में वे प्रधान मंत्री मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की पहली यात्रा की अगुवाई की, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढाने में और भारत में विकास के अवसरों के बारे में बहुत उत्साह पैदा किया । वह कठिन मुद्दों पर बात करने से हिचकते नहीं है। उन्होंने पहले अपने करियर में भारत-अमेरिका परमाणु समझौता करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इस द्विपक्षीय संबंध में हम एक अन्य संभावित व्यापार सौदे के साथ एक और निर्णायक क्षण पर हैं, हम इसके पूरे होने की आकांक्षा कर रहे है। हम उन्हें इस महत्वपूर्ण भूमिका में पाकर सौभाग्यशाली हैं और अमेरिका भारत संबंधों के भविष्य के बारे में उनकी अंतर्दृष्टि की आशा करते हैं।

आज शाम हमारे दूसरे वक्ता नेल्सन कनिंघम हैं जो मैकलार्टी एसोसिएट्स के अध्यक्ष और सह-संस्थापक हैं। 1988 में मैकलार्टी एसोसिएट्स के सह-संस्थापक होने से पहले, उन्होंने व्हाइट हाउस में पश्चिमी गोलार्ध मामलों पर राष्ट्रपति क्लिंटन के विशेष सलाहकार के रूप में और व्हाइट हाउस ऑफ़िस ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन में जनरल काउंसिल के रूप में कार्य किया। वह अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीति पर राज्य की सलाहकार समिति के विभाग के सदस्य, राज्य के विदेश मामलों के नीति बोर्ड के सचिव के एक पूर्व सदस्य और एक्ज़िम बैंक सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे द अटलांटिक काउंसिल और अमरीका भारत सामरिक भागीदारी फोरम सहित कई बोर्डों में भी कार्यरत हैं, आज शाम हमारे मेजबान हैं और विदेश संबंधों पर परिषद के सदस्य के रूप में कार्यरत है। इसलिए अब अमेरिका-भारत संबंधों के बारे में एक बहुत ही आकर्षक बातचीत के लिए हमारे दो वक्ताओं का स्वागत करते हुए मेरी खुशी है।

अध्यक्ष: मंत्री जयशंकर जी, आज शाम हमारे साथ जुड़ने के लिए धन्यवाद। यहाँ आने के लिए आप सभी को धन्यवाद। जैसा कि मंत्री जी जानते हैं कि हम यहां वाशिंगटन में कई बार मिल चुके हैं, हम दिल्ली में मिल चुके हैं। मैं उन अमेरिकियों में से एक हूं, जो कुछ साल पहले से सिर से एड़ी तक भारत के साथ प्यार में है । पिछले दर्जन वर्षों में मैं 16 बार भारत गया हूं और मैं इस महीने के अंत में अमरीका-भारत सामरिक भागीदारी फोरम बोर्ड की बैठक और नेतृत्व सम्मेलन के लिए अपनी 17 वीं यात्रा पर जाने वाला हूं, जिसकी मैं वहां मेजबानी करूंगा। मुझे लगता है कि इस कमरे में उपस्थित मैं उन सब लोगों से कम जानता हूँ, जिन्होंने भारत की यात्रा की है, क्योंकि आप वास्तव में वाशिंगटन के उन लोगों के यहाँ एक कमरे में बैठे हैं, जो भारत को सबसे अच्छे से जानते हैं, और जो भारत पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं।

मैं अमरीका-भारत के बीच व्यापक संबंधों के बारे में कुछ शुरू करना चाहता हूँ । और फिर हम आगे व्यावसायिक संबंध पर बात कर सकते हैं, और फिर मैं आपसे इस कमरे में उपस्थित सभी की ओर से पूछने जा रहा हूं, मैं आपसे एक पेशेवर सलाह लेने जा रहा हूँ और हमारे वहां पहुंचने पर आप देखेंगे कि उसका क्या मतलब है। आपने 10 दिन पहले रॉक एन रोल और हाउडी मोदी के साथ ह्यूस्टन में पचास हजार भारतीयों और भारतीय अमेरिकियों के साथ अमरीका-भारत शुरू किया था। मैं समझता हूं कि आपके प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रम्प का गर्मजोशी भरा व्यवहार था जिसने दर्शकों को उत्साहित होने में मदद की । उसके बाद आपने पिछले सप्ताह अपने प्रधान मंत्री के साथ न्यूयॉर्क की यात्रा की जहाँ हम एक दूसरे से मिले थे।

आपने अकेले कुछ 30 द्विपक्षीय बैठकें कीं, आपकी विदेश मंत्री के समकक्षों के साथ 40 बैठकें हुईं, आपने कई बहुपक्षीय, विविधपक्षीय बैठकों में भाग लिया। अमरीका-भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया की चतुर्पक्षीय बैठक हुई । कल आप सचिव पोम्पेओ के साथ थे। कल आप सचिव शनहान के साथ होंगे, और परसों हमारे रक्षा सचिव एस्पेर के साथ । मैंने मंत्री से कहा कि जब मैंने उनका कार्यक्रम के बारे में पढ़ा तो मैं हैरान रह गया । मैं आपसे शुरुआत में यह पूछना चाहता हूं कि आज यह रिश्ता कहां है? आपका अमेरिका और बहुपक्षीय मामलों पर पूरा ध्यान था, भारत दुनिया में महान शक्ति संबंधों के व्यापक संदर्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपने संबंधों को कैसे देखता है?

विदेश मंत्री, डॉ.एस जयशंकर: मैं एक व्याख्यान दे सकता था, लेकिन मैं आपको एक छोटा जवाब दूंगा। मैं वास्तव में, इस शब्द का उपयोग बहुत सावधानी से करता हूं, मैं वास्तव में सोचता हूं कि यह एक बहुत ही अनूठा संबंध है क्योंकि अगर आप देखें, इस आकार के दो देश हैं, जो दुनिया के आर्थिक अनुक्रम, राजनीतिक अनुक्रम में खड़े होते हैं । और आखिर में इस रिश्ते में अद्भुत परिवर्तन को देखें, आपने वास्तव में पिछले 20 वर्षों में इस रिश्ते में एक नाटकीय बदलाव देखा है। और आप जानते हैं, बड़े देशों के बीच इतना नाटकीय बदलाव उतना आम नहीं है।

और जब मैं एक नाटकीय बदलाव देखता हूं, तो मेरा मतलब है कि आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां आप यह नहीं कह सकेंगे कि बहुत अधिक उच्च विकास नहीं हुआ है। मेरा मतलब है कि हाउडी मोदी, ओके । अब हम 10 साल पहले इस तरह की घटना की कल्पना नहीं कर सकते थे। पांच साल पहले जब हमने मैडिसन स्क्वायर गार्डन किया था तो यह कुछ ऐसा था जो सिर्फ एक बड़ा जोखिम था, इस अर्थ में कि ऐसा कुछ करने के लिए समय चाहिए था । अब ऐसा क्यों हुआ? यह धीरे धीरे हुआ, क्योंकि अगर आप भारतीय अमेरिकी समुदाय को देखें, मैंने हमारे संबंधों के इतिहास को पढ़ा जिसमें एक बहुत ही रोचक संख्या दी गई थी और वह संख्या यह थी कि जब प्रधानमंत्री नेहरू पहली बार 1949 में अमेरिका आए थे, तब 3000 भारतीय अमेरिकी थे। 1966 में जब इंदिरा गांधी आईं तो 30000 थे और जब राजीव गांधी आए तो 300,000 थे। आज 3 मिलियन से अधिक भारतीय अमेरिकी हैं, अर्थात अमेरिकी नागरिक। और अगर आप उन लोगों की संख्या भी जोड़ते हैं जो यहाँ के कानूनी निवासी हैं, तो शायद यह संख्या दुगुनी हो सकती है।

अब इन नंबरों से, जिन पर मैं जोर देना चाहता हूं, आपको खुद से पूछना होगा कि ऐसा क्यों हुआ। आज उनकी स्थिति क्या है, और मुझे लगता है कि बहुत कुछ इस तरह से हाउडी मोदी कार्यक्रम द्वारा दर्शाया गया था। आपके पास ऐसे लोग हैं जो यहाँ आए हैं, एक अर्थ में, यह एक ऐसी घटना को दर्शाता है, जो दुनिया का भविष्य बनने वाली है, जो एक भूगोल से दूसरे भूगोल में प्रतिभा का प्रवाह है। इसलिए यह होना, वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था में कुछ बड़ी प्रक्रियाओं का संकेत है।

मैं फिर से, सतर्क रूप से, आशावादी रहूंगा क्योंकि मुझे लगता है कि बहुत काम हुआ है, उन संदेशों को, जो मैं कह रहा हूं, बहुत विस्तार से, विभिन्न देशों में कहा गया है । इसलिए मुझे लगता है कि एक ऐसी स्थिति है कि हर कोई इतना आगे आ गया है कि यदि आप एक कोशिश करें तो शायद आप वहां पहुंच जाएंगे। इसलिए मुझे लगता है कि अभी इस तरह की मनोदशा है।

अध्यक्ष: मैं कुछ ही क्षणों में दर्शकों की ओर रुख करने जा रहा हूँ, इसलिए अपने प्रश्नों को तैयार कर लें, हम उनमें से कुछ ही को लेने में सक्षम होंगे और मंत्री जी उनका उत्तर देंगे, लेकिन इससे पहले कि हम ऐसा करें, मैं आपसे कुछ व्यक्तिगत सलाह लेना चाहता हूँ, कुछ पेशेवर सलाह । यह पहली बार है जब मैं किसी विदेश मंत्री के साथ बैठा हूं, जिसने वास्तव में हम में से ही एक के रूप में समय बिताया है, आप टाटा एंड संस के लिए वैश्विक सार्वजनिक मामलों के प्रमुख हैं, आप वहीं थे जहां हम थे और अब आप जब सरकार की कुर्सी पर बैठे हैं, भारत और दुनिया भर में सरकारी सोच को आकार देने में मदद करते हैं । आपने टेबल के दोनों छोरों पर बैठकर, यहाँ भी और दर्शकों के बीच भी, आपकी क्या जानने की इच्छा थी, क्या सीखा है, हमें कुछ सलाह दें?

विदेश मंत्री, डॉ.एस जयशंकर: देखिए, मेरी इच्छा है कि मैंने जो पिछले साल किया था, वह शायद 20 साल पहले किया होता। ईमानदारी से, मैं गंभीर हूं क्योंकि मेरे लिए व्यवसाय में पिछला वर्ष कुछ ऐसा था जैसे वास्तव में मैं एक अलग दुनिया में प्रवेश कर रहा था। आप जानते हैं कि जब आप कुछ समय के लिए कुछ कर रहे होते हैं, तब भी जब आप खुद को चुनौती देते रहते हैं तब आत्मतुष्टि होती है, जो हर तरह के सभी इंसानों में दिखती है । तो आपके पास अनुभव है, आपके पास आत्मविश्वास है लेकिन, मैं यह नहीं कहूंगा कि आप आलसी हो जाते हैं, लेकिन आप जानते हैं, वह ड्राइव, वह भूख, थोड़ी नरम हो जाती है। मुझे लगता है कि जब आप कुछ अलग करते हैं, तो आप अचानक जोश में आ जाते हैं जैसे कि आप एक ऐसे कमरे में प्रवेश कर रहे होते हैं, जहां दूसरे लोग आप पर हावी होते हैं, क्योंकि उन्हें आपसे ज्यादा जानकारी होती है, इसलिए गति पकड़ना और वास्तव में उनसे आगे बढ़ने की इच्छा बहुत मजबूत होती है और आप लंबे समय से कर रहे काम की तुलना में अचानक एक बहुत अधिक सीखने वाले हो जाते हैं। और यह एक बहुत ही अलग दुनिया थी और समय पर बेहतर निर्णय, बेहतर कीमत, जोखिम लेने की इच्छा, ये सभी उस दुनिया में बहुत अलग थे।

अब जैसा कि मैंने कहा, अगर मैंने इसे 20 साल पहले किया होता तो यह मददगार होता, लेकिन हमारा सिस्टम उस तरह से काम नहीं करता। मेरा मतलब है कि सरकार एक जीवन भर का रोजगार है, एक घूमने वाला दरवाजा नहीं है, सिर्फ एक दरवाजा है, आप उसी से अंदर जाते हैं और उसी से आप बाहर जाते हैं। मेरा मतलब है कि आज यह अनुभव मेरे लिए यह कर रहा है कि जब आप अक्सर उन स्थितियों में आते हैं जब एक आर्थिक मुद्दा, व्यापार मुद्दा, ऐसी चीजें शामिल होती हैं, जिनके बारे में मैं आप में से कई लोगों से बात करता हूं, तो मुझे उस अनुभव के कारण शायद इस बात की बेहतर जानकारी होती है कि आप सभी कहां से आ रहे हैं। तो मेरे लिए, मैं कहूंगा, मुझे वहां थोड़ा और ज्ञान मिला है, ज्ञान की तुलना में थोड़ी अधिक समझ, जो मुझे अन्यथा नहीं मिली होती।

अध्यक्ष: विनम्रता के लिए धन्यवाद जिसके साथ हम सब यहाँ बैठे हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि हमारे सम्बन्ध कैसे आकार लेते हैं, हम कैसे इनकी देखभाल करते हैं । हम अब दर्शकों के पास जाते हैं । मुझे लगता है कि हमारे पास सवालों के लिए सात या दस मिनट हैं।

प्रश्न : मेरे पास आपसे पूछने के लिए वास्तव में एक व्यक्तिगत प्रश्न है और यह आपके पिता और उस भूमिका से संबंधित है जिसे उन्होंने भारत के लिए एक रणनीतिक वास्तुकार के रूप में इतने लंबे समय तक निभाया था और मुझे उन दिनों में उनसे मिलने का सौभाग्य मिला, जिनका आप जिक्र कर रहे हैं, 20 साल पहले जब ऐसा बहुत कुछ शुरू हो रहा था और मुझे वास्तव में यह जानने में दिलचस्पी होगी कि आप उन्हें कैसे बताएंगे कि आप आज कहां हैं, वह वास्तव में बहुत गौरवान्वित होंगे, लेकिन यह भी कि वह दृष्टिकोण जो उनके पास था और उन्होंने आपको प्रदान किया और वह उन 20 वर्षों को हम आज जहाँ खड़े हैं, से कैसे जोड़ता है। धन्यवाद ।

विदेश मंत्री, डॉ.एस जयशंकर: खैर, यह मजेदार है, आप दूसरे व्यक्ति हैं जो पिछले दो दिनों में यह पूछ रहे है, बिल्कुल यही सवाल नहीं, लेकिन किसी और संदर्भ में किसी ने मुझसे मेरे पिता के बारे में पूछा । आप में से कुछ उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, और कुछ उनकी ख्याति से जानते हैं । मेरा मतलब है कि मेरे पास बहुत सारी यादें हो सकती हैं लेकिन उनमें से एक निश्चित रूप से मेरी बचपन की याद है, उन्होंने अपने पेशेवर जीवन का काफी समय रक्षा मंत्रालय में रक्षा मुद्दों पर काम करते हुए बिताया और उन दिनों में आपने वास्तव में लैंडलाइन पर वार्ताएं कीं जो अब कोई भी नहीं करता है । वास्तव में मेरी बचपन की बहुत सी यादों में, उनकी लोगों के साथ बहस करने की हैं, वह केनेडी प्रशासन से रक्षा मुद्दों पर वार्ता करने की हो सकती है, ठीक । तो आपूर्ति की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे, आप इसे कैसे अलग कर सकते हैं, क्योंकि यह 65 के युद्ध तक चला था, जब अमेरिका ने हमारे साथ अपने रक्षा संबंधों को समाप्त कर दिया था।

इसलिए मेरे लिए, कई मायनों में, मैं उसे अमेरिकी संबंध के साथ जोड़ता हूं, निश्चित रूप से मेरे लिए यह बहुत सकारात्मक रूप में नहीं था और वह शायद मुझसे ज्यादा तर्कशील व्यक्ति थे । तो मैं कहूंगा कि, उनके बहुत शुरुआती परिचितों ने उन्हें उनके तर्क की शक्ति के लिए अधिक याद किया है, लेकिन मुझे लगता है कि उन अनुनय करने की शक्तियाँ समय आने पर सफल हुईं और परमाणु समझौते के दौरान तो निश्चित रूप से, उस पूरी अवधि के दौरान जब उन्होंने भारत में एक बहुत ही विवादास्पद समझौते पर सार्वजनिक रूप से चर्चा की तो निश्चित रूप से एक बड़ा बदलाव आया। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने कभी कल्पना की होगी कि मैं मंत्री बनूंगा।

अध्यक्ष: आपकी माँ को भी ।

विदेश मंत्री, डॉ.एस जयशंकर:
इसका एक कारण यह है कि मैंने स्वयं कल्पना नहीं की कि मैं एक मंत्री बनूंगा, ठीक। मेरी माँ ने निश्चित रूप से, उस दिन मुझे टीवी पर देखा और सभी माताओं की तरह, मुझे इस तरह से मैसेज किया कि वे हमेशा से जानती थीं कि ऐसा होगा । लेकिन मैं अक्सर उनके बारे में सोचता हूं क्योंकि एक अर्थ में मैं उनका छात्र भी था और मैं कहूंगा कि उन्होंने मेरी पीढ़ी और डॉ. राजमोहन और संजय बारू जैसे और लोगों के लिए बहुत कुछ किया। उन्होंने हमें राजनीति की वास्तविक दुनिया से परिचित कराया और मुझे लगता है कि इस प्रक्रिया के प्रति जुनूनी होने के अलावा अन्य परिणामों तक पहुंचने की भावना कुछ ऐसी थी, जो मुझे लगता है लोगों के एक पूरे समूह पर उनका प्रभाव था जिनमें विदेश सेवा के मेरे सहकर्मी समूह के लोग थे।

प्रश्न: भारत-ईरान संबंधों के बारे में आपसे पूछना चाहता हूँ, अमेरिका के साथ आपके संबंध, ईरान के साथ आपके संबंधों को कैसे प्रभावित कर रहे हैं, जैसा कि आप जानते हैं कि ईरानी थोड़ा निराश महसूस कर रहे हैं कि आप उनसे इतना तेल खरीदना बंद कर देंगे लेकिन चाबहार बंदरगाह के माध्यम से भारत का हित अफगानिस्तान में जाता है और भारत की अचानक दिलचस्पी मध्य एशिया में पैदा होती है जो ईरान से होकर जाता है। इस संबंध में ईरान के साथ भारत के संबंध बदलते रहे हैं। आप ईरान के साथ भारत के संबंधों को कैसे आगे बढ़ते हुए देखते हैं और अमेरिका के साथ भारत के संबंधों का उस सम्बन्ध पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

प्रश्न: भारत के सामने विश्व स्तर पर मौजूद चुनौतियों और हमारे विदेश सेवा अधिकारियों की संख्या और अपेक्षित वैश्विक पदचिह्न के संदर्भ में बस एक सवाल, यह कैसे काम करता है और इस संबंध में आपकी क्या योजनाएँ हैं। धन्यवाद ।

प्रश्न: मेरा प्रश्न अमेरिका-भारत संबंधों में परिवर्तन के बारे में है और मैं इसे अर्थशास्त्र से बहुत अधिक प्रेरित देखता हूं क्योंकि हम 2002 में क्लिंटन के साथ की याद करते हैं कि एक बड़ी चीज यह थी कि भारत बड़ा उभरता हुआ बाजार था और हर बार आप यह देख सकते हैं कि जब भी अर्थव्यवस्था ने अच्छा किया तो हित और उत्साह भी बढ़ा और न केवल अमेरिका के लिए बल्कि विश्व स्तर पर भी । हाल ही में, जैसा कि आप जानते हैं, भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है, यह 7% से 5% हो गई है और मेरा सवाल यह है कि आपकी विदेश नीति की सफलता किस हद तक भारत के आर्थिक रूप से बेहतर करने पर टिकी है क्योंकि अगर आप 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचना चाहते हैं मुझे लगता है कि आपको 8 % तक जाना होगा।

प्रश्न : क्या आप प्रकाश डालेंगे कि अफगानिस्तान में भारत की लम्बी अवधि की भूमिका के बारे में आप क्या सोचते हैं, कि तालिबान के साथ ये बातचीत कब बंद होंगी, धन्यवाद ।

विदेश मंत्री, डॉ.एस जयशंकर: काफी विस्तृत प्रश्न हैं। जहां तक ईरान का संबंध है, मैं आपसे सहमत नहीं हूं कि ईरानी निराश हैं, मुझे लगता है कि ईरानी यथार्थवादी हैं, यह एक बड़ी वैश्विक स्थिति है जिसमें वे काम कर रहे हैं, हम काम कर रहे हैं । इसलिए दुनिया जिसमें हम निवास करते हैं, हम स्पष्ट रूप से एक-दूसरे की मजबूरियों, संभावनाओं को समझते हैं । इसलिए हमारे दृष्टिकोण से, असली मुद्दा यह है कि मुझे सस्ती और पूर्व-अनुमानित तेल और गैस कैसे प्राप्त हो और जब तक संभव हो मिलती रहे ।

इसलिए जाहिर तौर पर हमें खाड़ी में स्थिरता और अस्थिरता की स्थिति के बारे में चिंता है लेकिन मुझे लगता है कि ईरान मुद्दा एक निरंतर मुद्दा है, हर कोई जानता है कि आप आज के कई अखबारों के एक ऐसे पृष्ठ को पढ़ सकते हैं, जिसमें ईरान से संबंधित कुछ घटनाक्रम हों। इसलिए मैं उस समझदारी को अंतिम नहीं मानूंगा । इस अर्थ में, कम से कम, देश अनुचित अपेक्षाएँ न रखते हैं, न होती हैं और न रखनी चाहियें। इसलिए मुझे लगता है कि हम सभी समझते हैं कि यह कैसे काम करता है।

भारतीय विदेश सेवा की चुनौतियों पर, देखिये, कुछ हद तक समस्या अतिशयोक्तिपूर्ण है, क्योंकि लोग भारत में संख्या की गणना, किसी अन्य विदेशी कार्यालय की तुलना में बहुत अलग तरीके से करते हैं। तो लोग भारतीय विदेश सेवा के बारे में एक हजार लोग होने के बारे में बात करते हैं। इसे कहने का एक अलग तरीका, वास्तव में कर्मचारियों की कुल संख्या को देखना है, भारतीय कर्मचारी जो कि शायद, मुझे लगता है, मुझे नहीं पता, कहीं 5-6 हजार के बीच है। अब कोई उससे कैसे निपटता है। जाहिर है कि मैं वास्तव में आगे बढ़ना चाहता हूं, यह कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन मुझे यह भी पता है कि आज आपके संसाधनों में वृद्धि करना किसी भी सरकार में आसान नहीं है, लेकिन हम फिर भी कर रहे हैं। हम 18 नए दूतावास खोल रहे हैं, हर एक के पास संसाधनों का एक नया सेट है जो इसे दिया गया है। लेकिन जब आपकी संख्या छोटी होती है तो आप वही करते हैं जो आप वास्तव में व्यापार में करते हैं और आप बड़े परिवेश का लाभ उठा रहे हैं।

तो, बहुत हद तक अगर आप हमारे द्वारा की जाने वाली नई गतिविधियों को देखें तो वे हैं, विकास सहायता, प्रशिक्षण, परियोजनाएं। हम जो करते हैं वह आप की जानकारी में होता है, आप इस पर खोज करते हैं, आप सलाहकारों का उपयोग करते हैं, आप अन्य मंत्रालयों या अन्य संगठनों के साथ काम करते हैं और फिर आप इस पर निर्णय के लिए विचार करते हैं। तो मेरे दिमाग में, आज सरकार के अंदर और बाहर अन्य संगठनों और मंत्रालयों के साथ काम करने की क्षमता, अपना काम करा पाने के लिए अन्य क्षमताओं का उपयोग करने की उस मानसिकता को प्राप्त करना, मुझे लगता है कि इन सभी उपायों को तब ही किया जाएगा जब आप वास्तव में उस संख्या पर पहुंचेंगे जिस पर आप सहज महसूस करते हैं, इसमें कुछ समय लगेगा।

विकास दर के मुद्दे पर, देखिए, अर्थव्यवस्थाएँ प्रत्येक तिमाही के आधार पर अपनी संख्या बताती हैं, जबकि विदेश नीति तिमाही से तिमाही तक नहीं चलती। तो कभी उतार होगा और कभी चढाव होगा। मैं उन रुझानों को देखूंगा, मुझे लगता है कि लोग समझते हैं कि हालिया संख्याओं में से कुछ वास्तव में क्षणिक मुद्दे हैं। कम से कम मेरी समझ, विशेष रूप से भारत के बाहर के लोगों को आकर्षित करने के लिए, वे बहुत आत्मविश्वासी लग रहे हैं और मुझे भी यह विश्वास है कि आप बहुत जल्द मजबूत संख्या देखेंगे और मुझे भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्व की रूचि में कोई कमी नहीं दिख रही है। मैं पूरी तरह से आपके विचार से सहमति नहीं रखता हूं कि लोग भारत के बाजार के लिए भारत में रुचि रखते हैं, मुझे लगता है कि यह एक कारक भर है। मुझे लगता है कि निश्चित रूप से जहां भारत-अमेरिका का सम्बन्ध है, उनमें से कुछ वास्तव में इसके द्वारा संचालित है, मेरा मतलब है कि अगर आप क्लिंटन के वर्षों में भी देखते हैं, तो वे साल थे जब एच 1 बी प्रारंभ हुआ था, जब डॉट कॉम क्रांति ने भारत और अमेरिका के बीच एक नया संबंध बनाया था और प्रवाह वास्तव में भारत की बजाय अमेरिका की ओर था । मैं, निश्चित रूप से कहूँगा, भारत और अमेरिका जैसे देशों के लिए, राजनीतिक सुरक्षा के मुद्दे, वे गणनाएँ महत्वपूर्ण होंगी। इसलिए मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि आप एक या दो खराब तिमाही से निराश न हों। मेरा विश्वास करें कि यह रिश्ता अच्छा चल रहा है और उत्तरोत्तर बेहतर होता रहेगा।

अफगानिस्तान मुद्दे पर, देखिए, हम अफगानिस्तान को अमेरिका की तुलना में अधिक स्थायी रूप से देखते हैं क्योंकि हमें बहुत करीब रहना है। हमारे अफगानिस्तान के साथ ऐतिहासिक संबंध है। यह राज्य से राज्य के बीच का संबंध नहीं है, बल्कि इससे कहीं अधिक है, भारत के इतिहास में अफ़ग़ान भारत में रहते आए हैं। हम उनके साथ सांस्कृतिक रूप से बहुत सहज हैं, यदि आप कभी काबुल गए हैं तो आप इसके संकेत अफगान शहरों में भी देख सकते हैं। तो इस समय हम समझते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका में कुछ बदलाव हो रहा है जो संभवतः एक अलग स्थिति का नेतृत्व करेगा। यह पूरी तरह से आश्चर्य की बात नहीं है, मेरा मतलब है, कि अमेरिका लंबे समय से वहां प्रतिबद्ध है।

मुझे लगता है कि हम सभी के लिए चुनौती, सबसे पहले अमेरिका के लिए, वास्तव में सबसे ज्यादा अफगानों के लिए, फिर अमेरिका के लिए, फिर बाकी सब के लिए यह है कि आप कैसे सर्वोत्तम संभव परिणाम के साथ व्यापक संभव स्वीकृति के साथ कुछ काम करते हैं। और सर्वोत्तम संभव परिणाम में वास्तव में पिछले दो दशकों के लाभ को जितना संभव हो उतना संरक्षित करना शामिल होगा। अब इसमें से कुछ पर बातचीत की जा सकती है, कुछ में यह नहीं हो सकता है लेकिन अफगानिस्तान के सन्दर्भ में मेरी अन्दर की भावना यह है कि हम अतीत में से बहुत अधिक काम कर सकते हैं। मुझे लगता है कि पिछले 20 वर्षों में जो बदलाव हुए हैं, वे हम भविष्य में भी महसूस करेंगे।

अध्यक्ष : श्रीमान मंत्री जी, धन्यवाद। हम अपने समय के अंत तक पहुँच रहे हैं। सामरिक भागीदारी फोरम की ओर से, मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं, मैं राजदूत …………, आपके दूतावास, यहाँ व्यापार समुदाय में हमारे केंद्रीय साझेदार को धन्यवाद देना चाहता हूं । आपके यहाँ आने और हमारे साथ समय बिताने के लिए और हमें थोड़ी पेशेवर सलाह देने और एक बेटे के रूप में सलाह देने, जो कि बहुत आकर्षक था, के लिए भी धन्यवाद देना चाहता हूं, धन्यवाद।

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