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बदलती अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में पश्चिम के प्रभुत्व के बिना, विश्व में बहुपक्षवाद पर पैनल चर्चा का प्रतिलेख

मार्च 06, 2020

मेजबान: तो, सभी को शुभ संध्या और आप सभी का हार्दिक स्वागत है! यह सत्र दुनिया में वेस्टलेसनेस, बदलती विश्व व्यवस्था में बहुपक्षवाद के बारे में है। और ये मेरे लिए बड़े ही सम्मान और खुशी की बात है कि मैं इस चर्चा में मॉडरेटर की भूमिका निभा रही हूँ। आगे हमारे साथ डेढ़ घंटे का बड़ा ही रोमांचक समय होगा जिसमें हमारे साथ बेहद प्रतिष्ठित पैनालिस्ट शामिल होंगे और पैनल चर्चा की शुरुआत के लिए है हमारे साथ जर्मनी के संघीय विदेश मंत्री हेइको मास जी हैं, जो हमें दस मिनटों के लिए संबोधित करेंगे। हेइको मास के नेतृत्व में, जर्मनी बहुपक्षवाद पर राजनीतिक नीति और सार्वजनिक बहस को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसलिए, अब कोई देर किए बिना मैं मंत्री मास जी को मंच पर आने और इस खेल की स्थिति और उससे आगे की चीजों पर अपने विचार साझा करने के लिए आमंत्रित करती हूँ। जर्मनी के संघीय विदेश मंत्री हेइको मास का स्वागत करने में कृपया मेरा साथ दें।

हेइको मास: [विदेशी लेख]

अनुवादक: राजदूत इस्किंगर सम्माननीय सहयोगियों, महामहिम, देवियों और सज्जनों, दुनिया में अव्यवस्था है। छह साल पहले यह एक सूत्रवाक्य था जब संघीय राष्ट्रपति जोआचिम गौक यहां म्युनिक में उपस्थित थे और इस सम्मेलन में व्याख्यान दिया था और जर्मनी की ओर से अधिक जिम्मेदारी ली जाने के बारे में कहा था। यदि आपने आज दोपहर को उनके उत्तराधिकारी का संबोधन सुना है तो आपको यह मानना पड़ेगा कि ‘दुनिया में अव्यवस्था है’ यह कल का सूत्रवाक्य है, इसलिए नहीं क्योंकि नियम-आधारित दुनिया की 75 साल पहले शुरू हुई सफलता गाथा अब भी जारी है, बल्कि इसलिए क्योंकि कई सालों से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एक अभूतपूर्व मंदी से गुजर रहा है। एक नई व्यवस्था का विकास किया जा रहा है लेकिन इसका उदार नियम आधारित जैसे सिद्धांतों से बहुत ही कम वास्ता है। तो नया क्या है? चीन का उदय नया नहीं है जो हमने देखा है और न ही शीत युद्ध के अंत के बाद यूरोप का सिकुड़ता सामरिक महत्व नया है, ये भी नया नहीं है। खेल बदलने वाला असली मोहरा यह तथ्य है कि सर्व-व्यापी अमेरिकी पुलिसों, वैश्विक पुलिसों का दौर समाप्त हो चुका है और ये हर किसी को नज़र आ रहा है। सीरिया के बारे में सोचिए। अफ़ग़ानिस्तान और अफ्रीका के बारे में सोचिए। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि अमेरिका के पास सैन्य और आर्थिक शक्तियों का अभाव है बल्कि इसलिए है क्योंकि जब बात विश्व व्यवस्था, जिसे लाने में अमेरिका ने सहायता की थी, की होती है तब वाइट हाउस में बैठे अधिकारियों की प्रतिबद्धता बदल चुकी है। यह एक भू-राजनीतिक रिक्ति है जो विशेष रूप से मध्य और निकटतम पूर्व में नज़र आती है और इन रिक्तियों को अन्य देश भरते हैं- रूस, तुर्की, ईरान और वे अक्सर विश्व व्यवस्था के अलग मूल्यों, अलग हितों और अलग अवधारणाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। तो, मध्य पूर्व का भविष्य जिनेवा या न्यू यॉर्क में तय होने के बजाय अस्ताना और सोची में तय हो रहा है। इस तरह की प्रणालियाँ अक्सर रेत पर बनी होती हैं। हम देख सकते हैं कि जब हम इटली के बिगड़ते माहौल के बारे में सोचते हैं। तो, देवियों और सज्जनों, हम, अमेरिकी और यूरोपीय लोग, हमें अपने-आप से यह सवाल पूछना चाहिए कि हमने ऐसा कैसे होने दिया और इसे बदलने के लिए हम क्या कर सकते हैं। आपको हमारी कमियों के बारे में सोचना चाहिए। हम यूरोपीय लोगों ने बहुत पहले से ही असहज वास्तविकता के प्रति अपनी आँखें मूँद ली हैं, अमेरिका का इस तरह सैन्य प्रतिबद्धताओं और अंतर्राष्ट्रीय अनुबंधों से पीछे हटने का क्या अर्थ है। हमने अपनी आँखें मूँद ली हैं लेकिन अगर हमने अपनी आँखें खुली भी रखी होतीं, तो तब भी हम ये देखने में सक्षम नहीं थे कि अमेरिकी राजनय और राजनीति का दोलक कितनी जल्दी दूसरी तरफ झूलेगा। लेकिन इन घटनाओं में कुछ अच्छी चीजें भी सामने आई हैं। ये हमने अपनी प्रस्तुतियों और चर्चाओं के दौरान जाना है। यूरोप का हर व्यक्ति अब यह समझ चुका है कि हमें अपनी सुरक्षा और अपने पड़ोस की स्थिरता के लिए कुछ और ज्यादा करने की जरूरत है। और ये सच भी है, यूरोप यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व से लेकर लीबिया और साहेल क्षेत्र में अधिक से अधिक सैन्य गतिविधियाँ, नागरिक गतिविधियाँ और राजनयिक गतिविधियाँ कर रहा है। लेकिन यह काफी नहीं है। ये सभी संकट हमें यहाँ म्युनिक में ही व्यस्त रखेंगी और हम यही पर चर्चा करते रह जाएंगे। तो, मैं तीन कथनों पर ध्यान देना चाहूँगा। सबसे पहला, यूरोप अपनी ताकतों को आधार बनाकर ये खेल खेलने जा रहा है। यूरोप को ऐसा करना ही पड़ेगा। बेशक, मैं यूरोपीय सुरक्षा और रक्षा के विकास के बारे में बात कर रहा हूँ। नाटो यूरोप के लिए एक मजबूत स्तम्भ है। और जब बात यूरोप के भविष्य, 2020 को आकार देने की आती है तब ये एक बहुत बड़ी चुनौती प्रतीत होती है। ये इस संबंध में नहीं है कि क्या हम ऐसा करने वाले हैं या नहीं। सवाल ये है कि हम ये ‘कैसे’ करेंगे? हम फ्रांस के साथ कारिणी से सहयोग करते हैं और इन सवालों का जवाब पाने के लिए हम राष्ट्रपति मैक्रॉन को एक सामरिक संवाद करने का प्रस्ताव देंगे। हमें ऐसा करना होगा और हम ऐसा ही करेंगे भी। मैं साफ-साफ बताना चाहूँगा। जर्मनी अपनी प्रतिबद्धता बढ़ाने के लिए तैयार है और इसमें हमारी सैन्य प्रतिबद्धता भी शामिल है। लेकिन इस सैन्य प्रतिबद्धता को राजनीतिक तर्कों के आवरण में लपेटा जाना चाहिए और हमारे संघीय राष्ट्रपति फ्रैंक-वाल्टर स्टेनमर ने आज दोपहर यहीं बात कही थी। देवियों और सज्जनों, हमारे पूर्व रक्षा मंत्री पीटर स्ट्रक का यह कहना सही था कि [not audible] पर भी जर्मनी की सुरक्षा का बचाव किया गया है और आज के परिप्रेक्ष्य से हमारा यह कहना गलत नहीं होगा कि ये इराक, लीबिया और साहेल क्षेत्र के लिए सही है। लेकिन यह न्यू यॉर्क, जिनेवा और ब्रुसेल की वार्ता मेज के लिए सही नहीं है। राजनय के बिना, स्पष्ट राजनीतिक रणनीति के बिना, क्षमताओं के बिना, जो प्रभावित क्षेत्रों में बनाए जा सकते हैं, सैन्य संचालन अच्छी दशा में भी अप्रभावी होगी लेकिन बुरी दशा में ये संकटों को और भी बढ़ा सकता है। हमने ऐसा ही 2003 के बाद इराक में देखा था और अब हम सीरिया और लीबिया में भी ऐसी ही घटनाएं देख रहे हैं। अधिक जिम्मेदारी, अधिक प्रतिबद्धता का मतलब अधिक सेना नहीं है क्योंकि अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप इन संघर्षों की जटिलताओं को कभी सुलझा नहीं पाएंगे। मैं यूरोप की आर्थिक ताकत के बारे में बात कर रहा हूँ जिसके बिना सीरिया का पुनर्निर्माण संभव नहीं होगा और साथ ही, हमें इसके लिए एक राजनीतिक समाधान तलाशना होगा। हम किसी ऐसी पुनर्निर्माण प्रक्रिया में भाग नहीं लेंगे जो असद को ताकत दिलाने में मदद करे। चाहे वह महत्वपूर्ण हो या न हो, पर यूरोप द्वारा प्रदान किए गए प्रतिमान लम्बे समय में अवश्य कारगर साबित होंगे। अतीत की कई जंगों के बाद हमने ऐसा होते हुए कई बार देखा है - आप जानते होंगे, वेस्टफालियन शांति समझौता, रोम की विश्व व्यवस्था संधि और हेलसिंकी फाइनल एक्ट। रूस, तुर्की और अन्य शक्तियां भले ही सीरिया, यूक्रेन और लीबिया में अल्प समय की सफलता हासिल की हो, लेकिन ऐसे उपाय कहाँ हैं जो लम्बे समय में कारगर साबित होते हैं, जो स्थायी स्थिरता और शांति प्राप्त करने में मदद करता है क्योंकि विभिन्न खिलाड़ी भी उनसे सहमत होते हैं। तो, जर्मनी और फ्रांस कई सालों से यूक्रेन के संकट का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की दिशा में काम कर रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में, हमने यूक्रेन के नए राष्ट्रपति की सहायता से मिन्स्क शांति प्रक्रिया को बहाल किया है, हमने दलों के अलगाव और कैदियों के आदान-प्रदान के लिए काम किया है और यही समाधान का एक हिस्सा है। पर बड़ा सवाल ये है कि क्या सभी पक्ष इसमें शामिल हैं, क्या वे भू-राजनीतिक प्रभावों से निकलकर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं और यूरोपीय सुरक्षा पर साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं। [Not audible] ये अंतर्राष्ट्रीय विधि पर आधारित है। तो, हम इसके बारे में यहाँ पर म्युनिक में अपने पेरिस, मास्को और कीव के सहयोगियों के साथ बात करेंगे और इस तरह हम बर्लिन में एक और नोर्मंडी प्रारूप की बैठक की नींव रखेंगे। देवियों और सज्जनों, ये कोई संयोग नहीं है कि लीबिया शांति बहाल करने के प्रयास पहले रोम, फिर पेरिस और आखिरकार बर्लिन से सामने आए हैं। सुरक्षा परिषद ने लंबी और कठिन वार्ताओं के परिणामों को मजबूती दी जो बर्लिन में हुई थी। पिछले सप्ताह संघर्ष रत पक्षों ने सबसे पहली बार के लिए युद्धविराम पर चर्चा की और बर्लिन में शुरू हुई प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए और इस संबंध में संचालित की गई बैठकों में लिए गए फैसलों की अनुवीक्षा और कार्यान्वयन हेतु एक तंत्र स्थापित करने के लिए रविवार को विदेश मंत्रीगण यहाँ म्युनिक में मुलाकात करेंगे। सोमवार को, हम इस बारे में यूरोपीय विदेश मंत्री के साथ बात करेंगे। हम उस योगदान के बारे में बात करेंगे जो आप शस्त्रों का प्रतिषेध लागू करने में दे सकते हैं। ईयू के लिए, सिर्फ एक ही जवाब हो सकता है और मैं इस समय जोसेप बोरेल की बात कर रहा हूँ। हम मदद के लिए तैयार हैं, अगर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र और देश के पक्ष हमारी मदद माँगते हैं। देवियों और सज्जनों, मेरा दूसरा पॉइंट है कि हमें अपने बहुपक्षीय सहयोगों को नए भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाना चाहिए। सबसे पहले तो ये बात यूरोपीय संघ के लिए सही है। इसका भू-राजनीतिक दृष्टिकोण चीन की ओर या असलियत में देखा जाए तो नई प्रौद्योगिकियों की नई रणनीति तक ही केवल सीमित नहीं रहेगी। हम एक राजनीतिक, एक आर्थिक, प्रौद्योगिकीय और मूल्य आधारित दृष्टिकोण से यूरोपीय प्रभुत्व के बारे में बात कर रहे हैं। तो, हमें यूरोपीय संघ के नए आयोग के साथ एकमत होना होगा और हम इस वर्ष के द्वितीय चरण में जर्मनी में यूरोपी संघ परिषद की अध्यक्षता करेंगे और ये हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर है। हमें नाटो द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं पर भी ध्यान देना होगा। 2003 में नाटो ने इराक की जंग में हिस्सा नहीं लिया था और ये उसका सही निर्णय था। लेकिन अब 17 साल बाद परिस्थिति बदल गई है। अब हम इराकी सुरक्षा बलों को आतंकवाद, इस्लामी राज्य के आतंकियों से लड़ने में प्रशिक्षण देने पर विचार कर रहे हैं और इराकी सरकार ने नाटो से सहायता मांगी है क्योंकि नाटो इराकी प्रभुत्व का सम्मान करता है। यह एक बहुपक्षीय दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है। हमने पिछले कुछ वर्षों में बड़े प्रयासों के साथ जो कुछ भी प्राप्त किया है, उसे संरक्षित रखने का हित साझा करते हैं। तो, हम इराकी सरकार की सहमति से अपनी प्रतिबद्धता को जारी रखना चाहेंगे, चाहे ये गठबंधन पर लगाए गए दावे के रूप में हो या नाटो अभियान के हिस्से के रूप में हो। तो, अंत में ये दो सामरिक हितों को पूरा करेगा। पहला, हम मध्य पूर्व में अपनी नीतियों को जारी रख सकेंगे जिसका अर्थ है कि माहौल की तीव्रता में कमी आएगी और माहौल ज्यादा ख़राब नहीं होगा। और दूसरा, हम अमेरिका को इस भागीदारी में बने रहने में मदद कर सकते हैं। इससे एक नई अटलांटिक-पार गतिशीलता उभर सकती है और ये कोई दुष्प्रभाव नहीं है। यही हमारा उद्देश्य है। तो, मेरा तीसरा पॉइंट ये है कि यूरोप की ओर से ज्यादा से ज्यादा योगदान अमेरिका को खेल में बनाए रखेगा। मैं अफ़ग़ानिस्तान की बात कर रहा हूँ। पिछले कुछ महीनों में, हमने अमेरिका की सहायता की है। हमने अफ़ग़ानिस्तान की संघर्ष रत पक्षों के बीच शांति वार्ता में उनकी मदद की है। एक अंतः-अफ़ग़ानिस्तान संवाद आरम्भ हुई है। तो, हमें ऐसा लगता है कि अमेरिका और तालिबान के बीच संभवतः समझौते की सूचना बहुत अच्छी खबर होगी। क्या ये लम्बे समय के लिए शांति कायम करने में सफल होगा, ये इस संवाद के आगे के पड़ावों पर निर्भर करता है और हम जो कुछ भी हासिल कर चुके हैं, हमें उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। अन्दर भी एक-साथ, बाहर भी एक-साथ का सिद्धांत हमारा मार्गदर्शक होना चाहिए और हम अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य योगदान देने वाले दूसरे सबसे बड़े योगदानकर्ता हैं। मैं साहेल क्षेत्र की भी बात कर रहा हूँ जो अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया है। जर्मनी और यूरोप अपने सैन्य और नागरिक उपायों के माध्यम से मजबूती से प्रतिबद्ध हैं। पिछले तीन वर्षों में, हमने इस क्षेत्र की स्थिरता पर तीन बिलियन यूरो खर्च किया है और हम और भी ज्यादा खर्च करने को तैयार हैं। हम सुरक्षा नीतियों पर काम करते हैं और हम यहाँ पर राज्य संरचनाएं बनाने में सहायता करते हैं और हम चाहते हैं कि अमेरिका भी ऐसा ही करे। क्योंकि आख़िरकार, बामाको के लोगों के लिए इस्लामी आतंक एक खतरा है, और पेरिस, बर्लिन या बोस्टन के लिए भी और इसलिए, देवियों और सज्जनों, हमें प्रतिरोपित भवन साझा के बारे में बात करनी चाहिए। ये ब्रसेल, वाशिंगटन और यहाँ पर म्युनिक और बर्लिन के लिए सही है। हमें मालूम है कि हमें और भी बहुत कुछ करना होगा। संघीय राष्ट्रपति लाइन ने आज दोपहर में इस बात पर बल दिया है और हमने इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। लेकिन हमें अपने चर्चा को सिर्फ इसी एक सवाल तक सीमित नहीं रखना चाहिए। गठबंधन की ताकत को यूरो या डॉलर में नहीं आंका जा सकता है। हमें 21 वीं सदी में अटलांटिक-पार भागीदार पर बहस करने की जरूरत है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हम आज की इस नई वास्तविकता में जी रहे हैं, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो हमने पिछले साल दिसंबर में नाटो की रूपरेखा को ध्यान में रखते हुए शुरू किया था। हमारा मानना है कि खलल नहीं बल्कि चर्चा ही अच्छे परिणाम प्राप्त करने का सही मार्ग है। बस यही रास्ता हमें आगे ले जाता है। हम जानते हैं कि केवल एक-साथ मिलकर काम करते हुए ही हम आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता और राजनीतिक विचार प्राप्त कर सकते हैं, जिसकी हमें अपने नियम-आधारित विश्व व्यवस्था का बचाव करने में जरूरत है। आइए हम वहां से शुरुआत करते हैं जहाँ हम वेस्टलेसनेस का अनुभव कर सकते हैं, जैसा कि हमने म्युनिक की सुरक्षा रिपोर्ट में पढ़ा है। सबसे पहले, ये हमारे सामने खड़े संकटों में निहित है और इसमें इराक, सीरिया, लीबिया और साहेल क्षेत्र शामिल हैं। आइए हम सुनिश्चित करें कि हम अपनी अतीत की गलतियों, कष्टों को वापस से दुबारा न दोहराएं। हमें इन संकटों का भार उन लोगों और कातिलों के कंधे नहीं छोड़ना चाहिए जो दुनिया को हथियार पहुंचाते हैं और सुरक्षा और शांति नहीं। बहुत बहुत धन्यवाद!

मेजबान: तो, ऐसे प्रेरित करने वाले संबोधन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद मंत्री मास। आपने हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है, और इसलिए अब मुझे हमारे महान पैनलिस्टों को मंच पर आमंत्रित करते हुए ख़ुशी हो रही है। तो, हमारे पहले पैनलिस्ट हैं डॉ. एस. जयशंकर, कृपया आइए। और हमारी दूसरी पैनलिस्ट हैं मार्गरेट वेस्तागर और मैं उन्हें मंच पर आने के लिए आमंत्रित करती हूँ। वे यूरोपीय आयोग के डिजिटल एज के यूरोप फिट की कार्यकारी उपाध्यक्ष हैं। आपका बहुत बहुत स्वागत है!

मार्गरेट वेस्तागर: धन्यवाद!

मेजबान: मिस मार्गरेट वेस्तागर और डॉ. एस. जयशंकर के साथ मंच पर मिस कांग क्युंग-व्हा भी जुड़ रही हैं, जो कोरिया गणराज्य की विदेश मंत्री हैं। धन्यवाद! और आखिर में, मंच पर सीनेटर लिंडसे ग्राहम का स्वागत करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है, जो अमेरिका की न्यायपालिका की सीनेट कमिटी के चेयरमैन हैं। तो, आप आज यहाँ पर हमारे साथ कुछ बेहद बुनियादी समस्याओं, हमें आज जिनका सामना करना पड़ रहा है, को संबोधित करने के लिए उपस्थित हुए हैं ये हमारे लिए बहुत सम्मान की बात है और आप वेस्टलेसनेस और बहुपक्षवाद इन दोनों सवालों पर भी चर्चा करेंगे। मैं आशा करती हूँ कि हमारे चर्चाओं के क्रम में हम इसके कुछ समाधानों को तलाशने की कोशिश कर सकेंगे। आप चारों का हार्दिक स्वागत है और पहले पैनलिस्टों के मध्य विचारों का आदान-प्रदान होगा और फिर हमारे दर्शकों आपके साथ एक प्रश्न-उत्तर सत्र किया जाएगा और साथ ही हमारे साथ लाइव स्ट्रीम के ज़रिए जुड़ी जनता में से कुछ लोगों की तरफ से पूछे गए सवाल लिए जाएंगे। तो, अगर मैं आपको इस डिवाइस के साथ छेड़-छाड़ करती नज़र आती हूँ, तो ये इसलिए नहीं होगा कि मैं अपना ट्विटर फीड देख रही हूँ। तब मैं लोगों द्वारा भेजे जा रहे सवालों को देख रही हुंगी। तो, अब कार्यक्रम की शुरुआत करने के लिए, मैं एक सरल लेकिन बुनियादी सवाल के साथ हमारी बहस शुरू करना चाहूंगी जो मैं आप चारों से पुछूँगी और अगर आप अपना जवाब तीन से चार मिनटों तक सीमित रखते हैं तो ये बहुत अच्छा होगा और इस तरह हमें बहस के लिए ज्यादा समय मिल सकेगा और ये सवाल सरल तो है लेकिन साधारण नहीं है और ये सवाल है कि सभी देशों ने इस बात को पहचाना है कि वैश्विक समस्याओं के लिए सामूहिक समाधानों की आवश्यकता है। हमने इस बारे में आज की कई प्रस्तुतियों में भी सुना है। बहुपक्षवाद की आवश्यकता को पहचाना गया हा क्योंकि बहुपक्षवाद एक ऐसा साधन है जो हमें इन लक्षों को हासिल करने में मदद कर सकता है। पर फिर भी हम देखते हैं कि बहुपक्षवाद को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा क्यों है? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुपक्षवाद अलग-अलग देशों के लिए, अलग-अलग कर्ताओं के लिए अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहा है? या ऐसा है कि हमारी दुनिया इतने नाटकीय रूप से बदली है कि हमारे पुराने संस्थान अब इस प्रयोजन हेतु सही नहीं रहे हैं या क्या ऐसा इस वेस्टलेसनेस के कारण है जिसके बारे में हम आज दिन भर चर्चा करते रहे हैं या क्या ये बिलकुल अलग चीज है? डॉ. एस. जयशंकर, क्यों न आपसे शुरुआत किया जाए?

डॉ. एस. जयशंकर: धन्यवाद! सबसे पहले, मैं ये कहना चाहूँगा कि यहाँ आकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है। तो मैं उन दो महत्वपूर्ण घटकों पर कहना चाहूँगा- जिसके बारे में आपने उल्लेख किया था – बहुपक्षवाद और वेस्टलेसनेस। मेरा मानना है कि जाहिर तौर पर बहुपक्षवाद कमजोर हुआ है और जाहिर तौर पर वेस्टलेसनेस इसका साक्ष्य है और मैं ये कहूँगा कि इन दोनों के बीच में एक आपसी संबंध है। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ कि बहुपक्षवाद पूर्ण रूप से पश्चिम पर निर्भर है या पश्चिम हमेशा बहुपक्षीय तौर पर इमानदार रहा है। मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है। लेकिन उनके बीच एक संबंध है। तो, ऐसी क्या वजह है कि जिससे बहुपक्षवाद कमजोर और अशांत हो गया है? मेरे हिसाब से पहला पॉइंट ये है कि हमने पिछले 20-30 सालों में विश्व का आर्थिक पुनर्संतुलन देखा है, ये तो बस समय की बात थी कि कब आर्थिक पुनर्संतुलन राजनीतिक पुनर्संतुलन में रूपांतरित होगा और इस समय हम यही देख रहे हैं। मेरा मतलब है, 2008 में, G7, G8 G20 बन गया। मेरे अनुसार यही इस दौर की शुरुआत थी, और ये आखरी बोल नहीं है। तो, अगर कोई राजनैतिक पुनर्संतुलन होने वाला है, तो स्पष्ट है कि यह एक संक्रमण का दौर है, आप जानते ही होंगे। और दूसरा पॉइंट ये है कि, इसमें कोई सवाल नहीं है कि विश्व अधिक राष्ट्रवादी है, अमेरिका अधिक राष्ट्रवादी है, चीन अधिक राष्ट्रवादी है, दुनिया के कई देश इस राष्ट्रवाद के स्वामी हैं, जहाँ ये एक प्रकार सकारात्मक, निश्चयात्मक राष्ट्रवाद है। कुछ मामलों में, ये अधिक असुरक्षित राष्ट्रवाद है। लेकिन तथ्य ये है कि अधिक से अधिक राष्ट्रवादी दुनिया, कम से कम बहुपक्षवादी दुनिया है। तीसरा पॉइंट ये है कि पश्चिम, जो एक तरह से एक पुरानी व्यवस्था है, मैं कहूँगा........, यदि आप वेस्टलेसनेस की बात करते हैं, तो वेस्टफुलनेस की भी बात आती है और इसमें कोई दो अर्थ नहीं है। लेकिन उस दौर में, मेरे ख्याल से, पश्चिम इतना सुनिश्चित था कि वह अनंत तक फैलेगा। यह कि इसने वास्तव में बाकी की दुनिया में अपने क्षेत्रों का विस्तार नहीं किया है। और तो, जब राजनैतिक पुनर्संतुलन हुआ, मुझे लगता है आज सही मायनों में रिक्तियों को देख सकते हैं और मैं ये कहता हूँ कि मानिए कि पश्चिम और दक्षिण के बीच और ये ध्यान में रखिए कि दुनिया के दक्षिणी हिस्से का बड़ा भाग वास्तव में लोकतांत्रित है और आपको पता होगा कि ये सब मेरे देश के साथ शुरू हुआ है। तो, भले ही वे बहुत सारे राजनैतिक मूल्य और मान्यताओं को साझा करते हों, पर फिर भी पश्चिम और दक्षिण के बीच बहुत सारी रिक्तियां नज़र आती हैं। कुछ हद तक, हितों और मान्यताओं का द्विभाजन है, आप जानते ही होंगे कि बहुत से जो प्रचार करते हैं खुद ही उसका अभ्यास नहीं करते हैं। तो, जब बात बहुपक्षवाद की आई तब क्या हुआ? इतने लम्बे समय के दौरान कई सारे अपवाद हुए। लेकिन मुझे लगता है कि नियम कमजोर पड़ गए और बेशक इससे कोई मदद नहीं हुई क्योंकि अमेरिका अब उतना भरोसेमंद नहीं रहा जितना अतीत में था। जो वास्तव में कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि जब आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इसके बारे में सोचते हैं, तो ऐसी चीजें नहीं हैं जो 75 साल पुरानी हों पर फिर भी असरदार हों। तो, ये साफ है कि वहां कुछ करने की जरूरत है। दुनिया के सामने कई नई चुनौतियां हैं, जिनमें से एक है प्रौद्योगिकी की चुनौती जिस पर चर्चा हुई थी, संपर्कता की चुनौती भी है। मुझे लगता है कि ये सभी बहुपक्षीय समाधानों के लिए आसानी से जिम्मेदार नहीं है। ये सभी भी पश्चिम से कम प्रभावित होते हैं। तो, इस तरह वेस्टफुलनेस घटक यहाँ नज़र आता है....वेस्टलेसनेस घटक भी वहां नज़र आता है। तो, मेरा मानना है कि ये सभी प्रचलन रहे हैं जिसने काफी समय के दौरान एक-दूसरे को सुदृढ़ बनाया है। तो, अब हम उठाए गए अन्य मुद्दे पर आते हैं। आप इसके बारे में क्या कर सकते हैं? मुझे लगता है कि पश्चिम के लिए यदि ये दुनिया पर कम प्रभुत्व बनाने वाला है, तो आपको वहीँ करना चाहिए जो आप राजनीति में करते हैं। आप गठबंधन बनाते हैं। आप अभिसरण तलाशते हैं। तो, यदि बहुपक्षीय प्रणाली अच्छी तरह काम नहीं कर रही है, तो आपको अनेकपक्षी व्यवस्थाओं के माध्यम से इसमें सहायता प्रदान करनी चाहिए। आपको नए समझौते बनाने चाहिए। तो, मुझे लगता है कि ये समझौते राजनीतिक समझौते हो सकते हैं, सुरक्षा समझौते हो सकते हैं। आप जानते हैं, बोझ साझा करना एक ऐसा शब्द है जिसका इस भौगोलिकी में एक विशिष्ट संकेतार्थ है। लेकिन मुझे लगता है कि, साफ-साफ कहूँ तो, ये आज की दुनिया में एक प्रायोगिक अवधारणा है। मुझे लगता है कि आतंकवादरोध, समुद्री सुरक्षा कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसमें दुनिया को अधिक से अधिक बोझ साझा करने की आवश्यकता है। मैं ये भी कहना चाहूँगा कि पश्चिम जिन चुनौतियों का सामना करेगा उनमें से एक चुनौती है कि गठबंधन की मानसिकता से कैसे बाहर निकला जाए। मेरे कहने का अर्थ है कि अपने गठबन्धनों की चिंता करने पश्चिम का काम है। मैं इस पर कोई विवाद नहीं कर रहा हूँ। लेकिन मेरे अनुसार इस नई दुनिया की वास्तविकता ये है कि पश्चिमी देशों को अपने गठबंधन से आगे देखना होगा और गठबन्धनों से आगे अपने भागीदारों के साथ काम करना होगा, जो किसी अलग जगह से एक अलग इतिहास लेकर आएँगे। तो, इन देशों के साथ काम करने के लिए आप एक तंत्र का निर्माण कैसे कर सकते हैं? तो, वास्तव में कुल मिलाकर कहा जाए तो मैं कहूँगा कि अगर आप एक बहुध्रुवीय कला जगत चाहते हैं तो आपको स्पष्ट मालूम होगा कि कैसे क्या करना है.....मेरा मतलब है कि ये मेरे लिए महत्वपूर्ण है....और एक बहुध्रुवीय दुनिया एक अशांत दुनिया होती है। यह आवश्यक है कि एक बहुध्रुवीय दुनिया को अधिक न कि कम बहुपक्षवाद की आवश्यकता है। ताकि अधिक स्थिरता हो क्योंकि आख़िरकार जब हम वैश्विक पुनर्संतुलन की बात करते हैं तब हम असंतुलन नहीं चाहते हैं, ठीक है।

मेजबान: डॉ. एस. जयशंकर आपका बहुत बहुत धन्यवाद! हम इस पर जल्दी से एक फॉलो-अप करेंगे क्योंकि आपने बहुध्रुवीय विश्व पर एक प्यारी सी पंक्ति कहते हुए समाप्त किया है कि बहुध्रुवीय विश्व को अधिक बहुपक्षवाद की आवश्यकता है, कम की नहीं। आपको क्या लगता है कि किस हद तक पश्चिम की धारणा और अब वेस्टलेसनेस पर पश्चिमी लोकतंत्र का ध्यान वास्तव में उनके लिए अन्य देशों, जो दुनिया के दक्षिण से आते हैं, के साथ सामान्य जमीन तलाशने में उनकी मुश्किलें बढ़ा रहा है, उदाहरण के लिए....जो शायद उनमें से कुछ मूल्यों को साझा करते हैं, बस इतना ही है कि वे इसे अनिवार्य रूप से पश्चिमी मूल्य का नाम नहीं देते हैं। हमने पिछले पैनल में इसके बारे में भी कुछ सुना था।

डॉ. एस. जयशंकर: वैसे, मुझे लगता है कि ये शायद उस मुद्दे पर निर्भर होगा कि जिसके बारे में राष्ट्रपति स्टेनमर ने हमें उस संध्या को याद दिलाया था, उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका एशिया पर बहुत अधिक महत्व देता है जो शायद यूरोप को दिए गए महत्व से अधिक है। तो, आपने एक नई वैश्विक सुरक्षा परिस्थिति के प्रति अमेरिका की अनुकूलता की चपलता देखी है। वहीं दूसरे तरफ, मैं कहूँगा कि अगर आप यूरोप की बात करते हैं, तो जब बात जलवायु परिवर्तन की आती है यूरोप ने दुनिया के दक्षिण के साथ काम करने के महत्व को पहचाना है। तो, मैं यह कहूँगा कि वो दूसरों की तुलना में चालाक हैं। मुझे लगता है कि ये मुद्दे पर निर्भर करता है। मुझे लगता है कि दोनों ने कुछ क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया है, और दोनों ने ही कुछ क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है।

मेजबान: बहुत बहुत धन्यवाद! उपाध्यक्ष वेस्तागर महोदया आप बताइए कि यूरोप स्वयं ही एक बहुपक्षीय कर्ता है और यह बहुपक्षवाद, अधिक व्यापक तौर पर वैश्विक बहुपक्षवाद के बारे में हमारी धारणा को आकार देने में बहुत प्रभावशाली रहा है, इन अर्थों में कि यह विश्व व्यापार संगठन में समझौता वार्ता करता है, उदाहरण के लिए और अब भी, यूरोप को भी कुछ गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन हमें ऐसी समस्याएँ देखने को क्यों मिल रही हैं?

एम. वेस्तागर: खैर, मुझे लगता है कि ये बहुत ही दिलचस्प सवाल है और जैसा कि आपने कहा है ये सरल हैं लेकिन इसे समझना साधारण नहीं है। खैर, जब हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ हमें जाहिर तौर पर आम समाधानों की आवश्यकता होती है, हम अकेले ही जलवायु परिवर्तन से लड़ाई नहीं कर सकते, जाहिर है। तो ऐसा क्यों हैं कि हमें ये समाधान खोजने में मुश्किलें होती हैं। मेरे लिए, बहुपक्षवाद एक साधन है, एक कुछ कर दिखाने का एक साधन है और मेरे विचार में नियम-आधारित विश्व व्यवस्था कायम करने में सभी के लिए यह एक साधन है। आपका कहना सही है कि ये नियम पश्चिम द्वारा बनाए गए थे और मेरे विचार में इन नियमों की सीमाओं पर अच्छी तरह चर्चा भी हुई है। और साथ ही इस बोध के साथ कि क्या सही या गलत है, पश्चिम ने खुद को उच्च माना है और मुझे लगता है कि ये एक अच्छी बात है कि यह बदल गया है लेकिन अन्य बात ये है कि हमारी बहुपक्षीय प्रणाली एक एनालॉग दुनिया में स्थापित की गई थी और अब ये दुनिया निश्चित ही एनालॉग नहीं रह गया है। ये हमारी किस्मत है कि हम भौतिक रूप से परस्पर क्रिया करते हैं, हम एक-दूसरे को बेहतर ढंग से अनुभव कर सकते हैं, मुझे लगता है कि हम एक-दूसरे को बेहतर समझ सकते हैं क्योंकि हम एक ही कमरे में हैं लेकिन हम अक्सर एक ही कमरे में नहीं होंगे। हम एक डिजिटल दुनिया में रहते हैं जहाँ राय बनते रहते हैं, आर्थिक मूल्य बनते रहते हैं, महान शक्तियां आपस में टकराती हैं। ये एक बहुत बड़ा परिवर्तन है और इसका अर्थ ये भी है कि शक्ति के साधन, वे भी बदलते हैं। चाहे औद्योगिक जासूसी, कर चोरी, गलत जानकारी देना, चुनावों पर विदेशी प्रभाव, आतंकवाद प्रचार, महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा, जन अनुवीक्षण हो। अब हम उस दुनिया से पूरी तरह से एक अलग दुनिया में रहते हैं जिसमें बहुपक्षीय प्रणाली की स्थापना हुई थी और यह बेशक लोगों और व्यवसायों दोनों को और राज्यों को कम जवाबदेह बनने की अनुमति देता है, क्योंकि ये डिजिटल दुनिया अपारदर्शी है। क्योंकि हमारे पास एक बहुपक्षीय प्रणाली नहीं है अब यह डिजिटल है और ये अपारदर्शिता आने की अनुमति देता है, जो मेरे मुताबिक किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। तो, बेशक अब सवाल ये है कि अब जब हमारी बहुपक्षीय प्रणाली पुरानी हो चुकी है तो अब हमें क्या करना चाहिए? क्या हमें इसे छोड़ देना चाहिए या दुबारा नए सिरे से स्थापित करना चाहिए? खैर, मैं विधि प्रवर्तन में अक्सर ये प्रतिस्पर्धा देखती हूँ, जो मैं यूरोपीय आयोग में भी करती है, वैसे तो बुनियादी नियम सही हैं; क्योंकि ये लालच और डर और शक्ति की लालसा से निपटती है। ये बुनियादी चीजें हैं और हम शायद अभी डिजिटल हैं लेकिन इंसान के तौर पर हम किसी भी तरह से बदले नहीं हैं। मुझे अब भी लगता है कि बुनियादी चीजें वहीं हैं और कठिन चीज ये है कि यदि हम दुनिया को अव्यवस्थित रहने की अनुमति देंगे, तो हम सब ये जानते हैं कि एक नई दुनिया बनाने में क्या-क्या होगा। तब दूसरों की ताकत की वजह से कमजोर लोगों को इसका शिकार बनना पड़ेगा और इतिहास को देख कर हम ये समझ चुके हैं कि इसके परिणामस्वरूप आगे क्या हो सकता है और मेरे विचार में हमें ऐसा होने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। तो, मुझे लगता है कि हमें उन रास्तों की खोज करनी चाहिए जिससे हम बहुपक्षवाद के काम करने का तरीका बदल सकें और ये बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन हमें इस साधन को त्यागना नहीं चाहिए क्योंकि समस्याएँ वहीँ हैं। सुरक्षा समस्या, जलवायु परिवर्तन, कर चोरी, इन समस्याओं के लिए वैश्विक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। और यूरोप इस तरह बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने और नए रास्ते तलाशने में साथ देगा लेकिन बेशक हम एक शक्ति की हैसियत से ऐसा करेंगे का प्रयास करेंगे। क्योंकि मेरा मानना है कि राष्ट्रवाद भी बहुपक्षवाद को नवीनीकृत करने का एक तरीका है क्योंकि जब लोगों में एक मजबूत पहचान होती है, तब वास्तव में उन्हें समझाना बहुत आसान होता है क्योंकि आपको पता होता है कि आपकी जड़ें कहाँ से आई हैं, आपको पता होता है कि ये समस्याएँ हैं, और इस तरह आप आगे बढ़ने के लिए आम रास्ता तलाश लेते हैं। तो, यह हमें अलग-अलग करने के बजाय इसे एक सकारात्मक दृष्टि से भी समझा जा सकता है और ये एक ऐसी चीज बन सकता है जो हमें विभिन्न तरीकों से एक-साथ काम करने की अनुमति देता है। और इसमें, उदाहरण के लिए, हम गोपनीयता के वैश्विक मानकों को बढ़ा रहे हैं और बेशक हम ये देख कर प्रसन्न हैं कि हमारा सामान्य डेटा संरक्षण नियम विश्व में बहस के लिए प्रेरणापद बन रहा है। हम एक नैतिक मानव केन्द्रित एआई चाहते हैं, विशेष रूप से तब जब बुनियादी मूल्यों की बात जोखिमी बन जाती है, बेशक हम अपने आप को तैयार करते हैं पर हम बेशक विश्व को भी प्रेरित करने की आशा रखते हैं। जब बात करारोपण की आती है, हम ओईसीडी के अंतर्गत बहुत सक्रिय हैं ताकि हम विश्व स्तर पर करारोपण पर अपने नज़रिए को नवीनीकृत कर सकें क्योंकि एक डिजिटल दुनिया में ये उस दुनिया से एक बिलकुल ही अलग मामला है जो बीस साल पहले हुआ करता था। आर्थिक सहायता के मामले में, डब्ल्यूटीओ को वास्तव में नवीकरण की आवश्यकता है और अमेरिका, फ्रांस और जापान के साथ मिलकर हमने बदलावों का प्रस्ताव दिया है ताकि डब्ल्यूटीओ आर्थिक सहायता के मामले में बेहतर ढंग से और प्रभावी तरीके से काम कर सके। तो, मेरे विचार में उन सभी लोगों के लिए अधिक निश्चयात्मक होना अधिक महत्वपूर्ण है जो राजनीति का यह नया खेल खेलना चाहते हैं। लेकिन उस निश्चय का उपयोग करके पुनः आंकलन करना कि हम किस तरह कम से कम अपने लिए बहुपक्षवाद से काम ले सकते हैं, यूरोप के लिए ये प्राथमिकता का विषय है।

मेजबान:
बहुत बहुत धन्यवाद! ये बहुत ही दिलचस्प है और एनालॉग दुनिया से डिजिटल दुनिया के बदलाव के बारे में आपने जो कहा, जो वास्तव में हमारे संस्थानों के लिए एक गेम चेंजर भी है, बहुत महत्वपूर्ण है और ये आर्थिक मुद्दों और सुरक्षा मुद्दों के बीच नए जुड़ावों का भी निर्माण करते हैं। तो इस तरह से आपने कुछ महत्वाकांक्षाओं को उजागर किया है जो यूरोप इस संबंध में अपना सकता है और मंत्री मास जी भी यही बात कह रहे थे, वे यूरोप के लिए बहित ही महत्वकांक्षी एजेंडे के बारे में बता रहे थे। लेकिन इस बारे में मैं ये सवाल पूछना चाहूंगी कि यूरोप को वर्तमान जिन आंतरिक चुनौतियों, आंतरिक विभाजन का सामना करना पड़ रहा है उसे देखते हुए और साथ ही डिजिटलीकरण की चुनौतियों को देखते हुए यूरोप इसे अपनाने के लिए कितना तैयार है।

एम. वेस्तागर: खैर, मेरे विचार में अर्थव्यवस्था के पुनर्संतुलन को लेकर सुदृढ़ कार्यान्वयन हुआ है और उसी की वजह से वैश्विक राजनीतिक शक्ति के पुनर्संतुलन का भी कार्यान्वयन हुआ है और ये मूलतः सफल रहा है। ये सही में बहुत ही बात है कि आज कही अधिक लोग आमिर हैं, अच्छा जीवन व्यतीत करते हैं, वैश्विक पैमाने पर अपने विचार प्रकट करते हैं, ये अच्छी बात है। बात ये है कि हमें ये सभी मिला है, सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन हर चीज में आशा की एक किरण होती है। ब्रेक्सिट के पहले चरण के दौरान का अनुभव कि सत्ताईस देश अगर एक-साथ आ जाएं तो वो क्या-क्या नहीं कर सकते। और मैं आपको ये बता सकती हूँ कि कोई एक यूरोपीय सदस्य राज्य या अन्य यूरोपीय सदस्य राज्य सत्ताईस की इस एकता को तोड़कर इसलिए बाहर नहीं निकला क्योंकि वो ऐसा नहीं करना चाहता था, बल्कि ये एकता इसलिए नहीं टूटी क्योंकि हर सप्ताह संसद को बड़े ही पारदर्शिता के साथ ब्रीफ किया जाता था, उन सदस्य राज्यों को हर सप्ताह ब्रीफ किया जाता था और ये बड़े ही पारदर्शिता के साथ किया जाता था इसलिए एकता हासिल की जा सकी थी। क्योंकि आप बेशक यूरोप की ओर उंगली उठा सकते हैं और कह सकते हैं कि यूरोप अद्भुत चीजें हासिल कर सकता है लेकिन तभी जब एकता होगी और समझौता करने की चाह होगी।

मेजबान: बहुत बहुत धन्यवाद। मंत्री कांग अब आपकी बारी। यदि हम यूरोप में इस बात पर बड़ी बहस करते हैं कि यूरोप चीन और अमेरिका के दोहरे आक्रमण के बीच फंस गया है, दक्षिण कोरिया को भी ऐसी भी कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और दक्षिण कोरिया एक बहुत ही उत्सुक बहुपक्षवादी रहा है, जैसा कि आपकी पिछली कुछ नियुक्तियों से झलकता है। तो, शायद आप हमें इस क्षेत्र से भी कुछ अंतर्दृष्टि दे सकें कि वर्तमान बहुपक्षवाद को इन संकटों का सामना क्यों करना पड़ रहा है?

कांग क्युंग-व्हा: मुझे लगता है कि ये कहते हुए शुरुआत करना आवश्यक होगा कि हमने बहुपक्षवाद को जो मूल्य दिया है, अब वह पश्चिम द्वारा परिरक्षित नहीं है। अब ये वैश्विक मूल्य बन गए हैं जो सरकारों, नागरिक समाजों, लोगों के आचरण को विभिन्न हद तक आकार प्रदान करता है, लेकिन याद रहे कि ये एक मानक है जो सभी देश प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं। तो, वेस्टलेसनेस की यह अवधारणा आवश्यक ही यूरोप के लिए आत्म-तलाश की एकमात्र बिंदु हो सकती है जो पश्चिम का केंद्र है और दुनिया के अन्य हिस्सों में गैर-पश्चिमी शक्तियों के उदय के प्रति प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक है। लेकिन गैर-पश्चिम से आए किसी व्यक्ति के लिए इस बहस में भाग लेना, मेरे अनुसार चर्चा बहुत ही सीमित हो जाएगी और मुझे लगता है कि हमें बहुपक्षवाद के मुद्दे को पश्चिमी, यूरोपीय प्रकरण से आगे ले जाना चाहिए और देखना चाहिए कि दुनिया के बाकी हिस्सों में बहुपक्षवाद का कैसे उपयोग किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, एशिया में हम आसियान केन्द्रीयता के बारे में बात करते हैं। एशिया में आसियान एक उप-समूह है, यह दस आसियान देशों का एक बहुपक्षीय समूह है जो लगभग आधी सदी से एक-दूसरे के साथ रहे हैं और वे बहुपक्षवाद का एक और मॉडल भी प्रस्तुत करते हैं जो इन देशों और इस क्षेत्र के आस-पास के देशों के लिए बहुत कारगर साबित हुआ है जबकि दक्षिण कोरिया अब आसियान की केन्द्रीयता पर बोलने लगा है। तो इस सन्दर्भ में हमने बहुपक्षवाद के जिन मॉडल पर चर्चा की है, वास्तव में बहुपक्षवाद उससे भी बढ़कर है। हाँ, कोरिया बहुपक्षवाद का एक बहुत बड़ा लाभार्थी है और हम इस बहुपक्षीय अंतर व्यवस्था द्वारा स्थापित वैश्विक मूल्यों को पूरी तरह से अपनाकर एक आदर्श लोकतंत्र और बाजार अर्थव्यवस्था बन गए हैं और इसने जो खुलापन और अंतर-निर्भरता उत्पन्न किया है उसका अधिकतम लाभ उठाया है और हम निश्चित ही उन साझेदारों के साथ, जो समान दृष्टि और लक्ष्य साझा करते हैं, बहुपक्षीय प्रयासों हेतु नए अवसरों को तलाशने की इच्छा रखते हैं। हम बहुपक्षवाद हेतु जर्मनी-फ्रांस की गठबंधन पहल और संवाद और समाधान की अवधारणा को पुनर्जीवित करने का बहुत समर्थन करते हैं, जो उन लोगों के लिए बहुत लाभकारी है जो इसमें भाग लेते हैं क्योंकि वैश्विक चुनौतियों के लिए सामूहिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है और ये सामूहिक प्रतिक्रिया ज्यादा प्रभावशाली साबित नहीं होगी यदि इसमें सामूहिकता का कोई तत्व न हो। तो, इसलिए हम इसका बहुत समर्थन करते हैं। मुझे लगता है कि कोरिया में बहुपक्षवाद की अवधारणा को व्यंगपूर्ण ढंग से देखा जाता है क्योंकि हमारी दुनिया में इसकी कमी है। हमारे पास क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना नहीं है और शायद यह क्षेत्र के इतिहास और हालिया इतिहास का ही प्रतिबिम्ब है। क्योंकि हम, आप जानते ही होंगे, शीत युद्ध के आखरी जीवित विरासत हैं और इस विरासत से उबरने के लिए हमारी तत्काल चुनौतियां, आर्थात, कोरियाई प्रायद्वीप का दो हिस्सों, उत्तर और दक्षिण में विभाजन और बेशक इस चुनौती को उत्तर कोरिया ने अपने मिसाइल और परमाणु विकास के ज़रिए कई बार ज्यादा कठिन बनाया है। लेकिन वैश्विक समुदाय की सहायता से, हम उत्तर कोरिया के साथ राजनयिक जुड़ाव के माध्यम से कोरियाई प्रायद्वीप में शांति प्रक्रिया का अनुसरण कर रहे हैं ताकि शीत युद्ध की इस विरासत से उबरा जा सके और उत्तर कोरिया का सम्पूर्ण विपरमाणुकरण प्राप्त किया जा सके। ये संवाद हाल में टल गई है लेकिन हम इसका अनुसरण करने और प्रगति करने के लिए दृढ़ निश्चयी हैं और, इसी बीच, हम कुछ बहुपक्षीय पहलों का भी प्रस्ताव रख रहे हैं। उदाहरण के लिए, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय विशेष रूप से यूएन की एजेंसियों जैसे कि यूनेस्को को हमारे साथ काम करने के लिए कहा जा रहा है ताकि उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच डीएमजेड की घोषणा की जा सके और एक शांति क्षेत्र स्थापित किया जा सके, जो उसके बाद, यदि आप दोनों तरफ की सुरक्षा चाहते हैं, दोनों उत्तर और दक्षिण की, एक भौतिक और संस्थागत गारंटी होगा। हमें लगता है कि कोरियाई प्रायद्वीप की विरासत को सुलझाने में यह एक ठोस कदम होगा। मेरे अनुसार, जब हम बहुपक्षवाद की बात करते हैं, तब हमारे लिए यह सुनिश्चित महत्वपूर्ण होता है कि हम ये उन लोगों के संबंध में करें जिनकी हम सेवा करते हैं। यदि यह सड़क के लोगों और यहाँ के लोगों के लिए किसी काम की नहीं तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। शायद हमारे सामने कुछ परेशान करने वाले रुझान और कुछ प्रोत्साहित करने वाले रुझान भी हैं। एक तरफ हम देखते हैं कि जनता की अधीरता बढ़ती जा रही है और राजनेताओं को लेकर उनमें बहुत नाराज़गी है, चाहे ये स्थानीय हों या अंतर्राष्ट्रीय हों, और जैसा कि आप जानते होंगे हमने पिछले कुछ सालों में दुनिया के कई देशों की सड़कों पर विस्फोट, कुछ बड़े और हिंसक प्रदर्शन के रूप में यह देखा है। तो, लोगों में ये भावना है कि राजनेता कुछ नहीं कर रहे हैं और राष्ट्रीय सरकारों के लिए ये एक बड़ी चुनौती है और साथ ही वैश्विक संस्थानों के लिए भी जो बहुपक्षवाद की परिरक्षा करते हैं। जहाँ सीमित प्रदर्शन हो रहा है, वहां हमें स्पष्ट रूप से ये भी देखना चाहिए कि लोगों की यह नाराज़गी सड़कों पर क्रोध बनकर उमड़ रही है। वहीं दूसरे तरफ, इसका एक सकारात्मक पहलु ये है कि लोग सोच रहे हैं, सड़कों पर उमड़े लोग सोच रहे हैं और वैश्विक स्तर पर काम करना चाहते हैं और विश्व स्तर पर अधिक से अधिक कार्रवाई चाहते हैं और हम स्पष्ट रूप ये जलवायु एजेंडा में देखते हैं और मेरे विचार में जब हम विशेष रूप से युवा पीढ़ी को देखते हैं, उन्हें चुनौती लेने के लिए हमेशा तत्पर पाते हैं। वे सीमाओं की भौतिक बाधाओं और मानसिक बाधाओं को लांघ रहे हैं और मैंने हाल ही में एसजी के राजदूत से बात की थी जो संयुक्त राष्ट्र की पचहत्तर वर्षगांठ के समारोह के लिए विश्व के कुछ युवा नेताओं के साथ श्रृंखलागत चर्चा कर रहे थे और उन्होंने कहा कि वे जब भी यह चर्चा करवाते हैं, युवाओं की बातों से हमेशा वैश्विक समाधानों से लेकर वैश्विक मुद्दों तक सभी मुद्दों में आशा और उच्च अपेक्षाओं की झलक मिलती है और यही बहुपक्षवाद है। और मैंने सुना है, मुझे माफ़ कीजिएगा यदि मैं अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बन रहा हूँ तो, मैं कोरियाई सिनेमा की कामयाबी के बारे में बताना चाहूँगा, मेरा मतलब अकैडमी अवार्ड्स में पैरासाइट की जीत से है। वास्तव में हम भी ये देख कर चकित रह गए थे कि इस कोरियाई सिनेमा ने वैश्विक दर्शकों पर कितना गहरा प्रभाव डाला है और इस सिनेमा ने केवल अकैडमी में ही जीत हासिल नहीं की है बल्कि इसने पूरे साल विभिन्न फिल्म फेस्टिवल में सैंकड़ों पुरस्कार जीते हैं। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि लोगों में विश्व को लेकर मानसिकता है जो ऐसी चीजों को भी ग्रहण करती है जो अनिवार्य रूप से राष्ट्र के प्रकरण में नहीं है और मुझे लगता है कि हमें इसका भरपूर फायदा उठाना चाहिए। पिछले दशकों में बहुपक्षीय प्रयासों ने जो वैश्विक मानसिकता बनाई है, उसे बढ़ाया गया है लेकिन अब वह हमसे आगे भाग रहा है। मेरा मतलब है कि नई मीडिया ने उनमें ऊर्जा भर दी है और जब तक हम इसे अपनी मुट्ठी में नहीं करते हमें बहुत हानि सहना पड़ेगा जहाँ हमें बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के लिए कार्रवाई करने की आवश्यकता है। मैं इस पर, इस सम्मेलन के नाम, वेस्टलेसनेस पर, शायद हाँ, मैं समझता हूँ कि तत्कालीन ऐतिहासिक सन्दर्भ में शायद ये आवश्यक है और स्वाभाविक भी है लेकिन गैर-पश्चिम का एक व्यक्ति होने के नाते मैं आपको ये आश्वासन देता हूँ कि पश्चिम बेशक जीवंत है, लेकिन भौतिक रूप से नहीं; लेकिन आप जानते हैं, पूर्व के लोगों को जानते हैं और मैं आशा करता हूँ कि पूर्व को भी पश्चिम की मानसिकता में जगह मिले। तो, जब हम बहुपक्षवाद के भविष्य पर चर्चा करते हैं, तब इसे केवल पश्चिम के साथ जोड़कर देखना सही नहीं होगा, किसी भी भौगोलिक क्षेत्र के साथ जोड़कर देखना सही नहीं होगा बल्कि इस मुद्दे पर पूरे विश्व को चर्चा करने की अनुमति देना उचित होगा। धन्यवाद।

मेजबान:
इन बहुत दिलचस्प टिप्पणियों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। मुझे ढेर सारे सवाल पूछने हैं। लेकिन मैं सिर्फ एक-आध सवाल पूछुंगा या जल्दी से फॉलो-अप करुँगी। एक तो ये है कि आपने बताया था कि, आपने हमें याद दिलाया कि वर्तमान यूरोप के लिए वेस्टलेसनेस एक अनावश्यक आत्म-तलाश है, और फिर आपने हमें आसियान का भी एक अच्छा उदाहरण दिया है और मैं जानना चाहता हूँ कि क्या आप हमें बाकी की दुनिया में बहुपक्षवाद के विभिन्न दृष्टिकोण के कुछ अन्य उदाहरण दे सकते हैं जिससे पश्चिम, उत्तर, यूरोप और अमेरिका सीख हासिल कर सकता है, ये एक सवाल है। और दूसरा कि मुझे इस बात की ख़ुशी है कि आपने बहुपक्षवाद के लिए एक गठबंधन का उल्लेख किया जिसमे जर्मनी और फ्रांस अगुआई कर रहे हैं और मैं ये जानना चाहूंगी कि आप इस गठबंधन को किस तरह विस्तृत होते हुए देखते हैं और विस्तारण से मेरा अर्थ है कि, मेरा मतलब है कि क्या यह अभी अपना एजेंडा पूरा कर रहा है? यह एक बहुत ही तथ्यात्मक गठबंधन प्रतीत हो रहा है और इस बारे में डॉ. एस. जयशंकर भी बता रहे थे। लेकिन आप इसे एक अधिक नियम-आधारित, अधिक मूल्य-आधारित प्रणाली में विकसित होते हुए देखते हैं।

कांग क्युंग-व्हा:
मेरे ख्याल से राष्ट्रपति स्टेनमर ने आज हमें अपने संबोधन में कुछ महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। वर्तमान जो चीज अस्तित्व में नहीं है उस पर विलाप करने से कोई फायदा नहीं है। आपको वास्तविकता देखनी चाहिए और अपने विचार में महत्वपूर्ण मूल्यों को प्रकट करना चाहिए। हाँ, मेरे विचार में मूल्य बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये चर्चाओं में सहायता करता है और आपको दिशा देता है लेकिन वास्तविकता और उत्सुकता के आधार पर। मेरे विचार में, जब हम आगे बढ़ते हैं तो अक्सर कई बार विफल होते हैं और मैं ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ क्योंकि मैं इस प्रणाली, खास कर मानव अधिकार कार्यालय और मानवीयता कार्यालय का हिस्सा रहा हूँ। यदि हम उत्सुकता दिखाने विफल होते हैं तो हम पहले से नियम किए हुए एजेंडों के साथ जमीन पर उतरते हैं और मेरे विचार में ये हमें बांधता है, कभी-कभी ये काम भी करता है, और कभी नहीं करता है और ये काफी हद तक जमीन पर अभिग्राह्यता पर निर्भर करता है। तो, मेरे विचार में, राष्ट्रपति महोदय इन्ही बिन्दुओं को रेखांकित कर रहे थे और साथ ही वास्तविकता और उत्सुकता को भी और मुझे लगता है कि वे विनम्रता के बारे में बता रहे थे। मेरे विचार में आसियान का दृष्टिकोण, मात्र एक दृष्टिकोण से कही अधिक है। आप जानते हैं, ये सदस्य राज्यों को मजबूर नहीं करता और मुझे लगता है कि आप जानते होंगे मजबूर न होने के कारण सदस्य राज्यों के लिए एकजुटता का हिस्सा बनना आसान हो जाता है और मेरे विचार में तभी सामान्य मानदंडों की स्थापना में प्रयासों के लिए जगह बनती है। पिछले पांच दशकों के दौरान आसियान के कई सारे मानदंड विकसित हुए हैं। भले ही ये शीघ्र-अतिशीघ्र व्यवसाय आरम्भ करने में संतोषजनक नहीं है और नहीं चाहता कि आप हर बार कोई मुद्दा सामने आने पर हर चीज की संहिता तैयार करें। मेरे विचार में अंततः संहिता बनाना महत्वपूर्ण है कयोंकि ये बनाया जाने वाला एक आखरी मानदंड है लेकिन मुझे लगता है कि इसे वास्तविकता के साथ समान गति में लाना और अभिग्राह्यता सुनिश्चित करने में समय लगता है, आप रातोंरात माइनस दस डिग्री से दस डिग्री तक का सफ़र पूरा नहीं कर सकते। मेरे विचार में आपको ये समझना होगा कि कौन सी चीज वास्तव में व्यवहार्य है।

मेजबान: धन्यवाद कांग मंत्री महोदय। सीनेटर ग्राहम यहाँ पर आपकी उपस्थिति से हमें ख़ुशी है और खास कर यूरोप में लोगों को इस बात से दुःख पहुंचा है कि अमेरिका, जो यूरोप में कईयों के लिए एक बड़ा गेम चेंजर है, ने बहुपक्षीय व्यवस्था को स्थापित करने में बहुत मदद की थी, पर वहीँ अब इसे त्याग रहा है। तो, हमें विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और विभिन्न विश्लेषणों आदि में जो देखने को मिलता है, क्या इस भावना का कोई तर्क है, और यदि है तो ऐसा क्या किया जा सकता है जिससे अमेरिका वापस इसे अपनाने को तैयार हो सकता है। और इस तरह में वापस उसी बुनियादी की ओर रुख करती हूँ कि आज के समय में बहुपक्षवाद जिस तरह से काम कर रहा है, अमेरिका उससे नाखुश क्यों है?

सीनेटर ग्राहम:
पहले तो मुझे यहाँ आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद। यहाँ मौजूद कितने लोग निर्वाचित अधिकारी हैं? तो, यहाँ एक निर्वाचन वर्ष में कांग्रेस के चालीस सदस्य मौजूद हैं। आपमें से कितने लोग दक्षिण कैरोलिना में मतदान कर सकते हैं? ठीक है, तो मैं कुछ देर में आपसे बात करूँगा। तो, यहाँ पर मैं ये बताना चाह रहा हूँ कि हमें परवाह है नहीं तो हम यहाँ मौजूद नहीं होते। यहाँ पर सदन के अध्यक्ष हैं, रक्षा सचिव हैं, राज्य सचिव मौजूद हैं। यहाँ पर कांग्रेस के इकतालीस सदस्य मौजूद हैं और तिरालिस रिपब्लिकनों ने भी यहाँ उपस्थित होना चुका है। जबकि वहां पर अधिक मत मिलता है। तो मैं यहाँ पर इसलिए आया हूँ क्योंकि मेरे प्यारे मित्र जॉन मेककैन ने मुझे और सीखने की चाह रखने वाले हर व्यक्ति को सिखाया था कि जब आप पर खतरा आए तो साथ में भागीदारों का होना बेहतर होता है। जब कुछ करने की बात होती है, आप सोचते हैं कि कोई भागीदार न हो तो अच्छा होगा। तो, यही कारण है कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिका पहला अभियान क्यों चलाया था। क्या इसका अर्थ है कि अमेरिका तीस में से पहला है? नहीं। क्या इसका अर्थ है कि अमेरिका अलगाववादी है? नहीं। मुझे यकीन है कि ऐसा नहीं है, ये बोझ साझा करने के बारे में है। और उन्होंने बताया कि नाटो अधिक भुगतान कर रहा है, ये अच्छी बात है। चार सौ बिलियन डॉलर। इससे मेरे लिए दक्षिण कैरोलिना वापस जाना आसान हो जाता है और मानिए कि अमेरिका के लिए ये एक अच्छा सौदा है। व्यापार सौदों में ट्रम्प और क्लिंटन दोनों प्रशांत-पार साझेदारी समझौते के खिलाफ थे। ओबामा ने इसपर समझौता वार्ता करने की कोशिश की लेकिन डेमोक्रेट और रिपब्लिक ने कहा कि ये बुरा सौदा है। तो, राष्ट्रपति ट्रम्प इस अवधारणा का दोहन करने में सक्षम रहें कि व्यापार समझौतों, जिसे हम डब्ल्यूटीओ के नाम से जानते हैं, को बदलने की आवश्यकता है। डब्ल्यूटीओ चीन के उदय से भी था और चीन के उदय के बाद भी है और यदि हम इस नए चीन से निपटने के लिए डब्ल्यूटीओ में बदलाव नहीं करते हैं तो आपको लोगों में नाराज़गी नज़र आएगी जो अपनी समस्याओं से निपटने के रास्ते तलाश रहे होंगे। तो, मेरा मानना ये है कि अमेरिकी लोग नाटो की बात समझते हैं। ये एक लंबी समय से चलती आ रही प्रतिबद्धता है। अमेरिकी सेनाबल में सेवारत मिलियन सैनिक यूरोप आते हैं और साम्यवाद को हारने में हम सब एक-साथ हैं। वर्तमान इन समूहों की समस्या ये है कि आम तौर पर बहुपक्षवादी संगठनों को अवसरों या खतरों के इर्द-गिर्द बनाया जाता है। हम जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे से निपटने के लिए एक-साथ आते हैं। तो उन्हें पेरिस एकॉर्ड मिला, ट्रम्प ने कहा कि यह वर्तमान हमारे लिए एक अच्छा सौदा नहीं है, चीन के लिए अच्छा सौदा है, भारत के लिए अच्छा सौदा है लेकिन हमारे लिए उतना अच्छा सौदा नहीं है। मैं राष्ट्रपति ट्रम्प से यह पूछना चाहूँगा कि हमारे लिए अच्छा सौदा क्या है? ये कम हमारे लिए समस्या बनता है और यदि ये हमारे लिए समस्या है तो आपको इसके लिए एक बहुपक्षीय दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी। आप सभी इस बात से सहमत होंगे। मेरा कहना है कि आप केवल अमेरिका या यूरोप या भारत की ओर से ही जलवायु परिवर्तन की समस्या को सुलझा नहीं सकते। मैं आशा करता हूँ कि ट्रम्प प्रशासन दुनिया को ये बताएगा कि वो क्या चाहते हैं। मुझे लगता है कि हमारा ये जानना तो बनता है। जर्मनी के विदेश मंत्री जब यहाँ आए थे तब उन्होंने एक चीज का उल्लेख नहीं है। यहाँ एक समस्या ये भी है कि हम ईरान को खतरे के अर्थों में थोड़ा नज़रिए से देखते हैं। पर हम आईएसआईएस, अल कायदा और अल शबाब को लेकर सुनिश्चित हैं कि ये हमारे लिए खतरा है, बस ये सही सूची बनाने की जरूरत है। दो हजार बीस में मैं अमेरिका के लिए एक बहुत ही हस्तक्षेपी व्यक्ति हूँ। इसलिए नहीं क्योंकि मैं हमेशा लड़ना चाहता हूँ बल्कि इसलिए क्योंकि मैं इस जंग को अपने देश से दूर चाहता हूँ। क्या आपको नहीं लगता कि पश्चिम के देश जंग या आतंक से थक चुके हैं? मार्शल प्लान को याद कीजिए। मैं आपको दिखा सकता हूँ कि हमें अपनी सारी पूंजी के बदले क्या मिला है। हमें बाकी सभी जगहों की तुलना में यहाँ यूरोप में एक जीवंत लोकतंत्र मिला है, जापान, दक्षिण कोरिया में पुनर्निर्माण का प्रयास हुआ है, लेकिन अमेरिकियों के लिए यह कहना मुश्किल है कि इराक, अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया में ढेर सारे पैसे लुटाने और ढेर सारी मौतों के बाद आपको क्या मिला है। और तब मैं उन्हें ये कहूँगा कि आपके पास उम्मीद है। युद्ध की बात करना बहुत कठिन होता है यदि लोग यह नहीं समझते कि जीतना कैसा होता है। जीत किसे कहते हैं? क्या आपको यूरोपीय रक्षा बल चाहिए? ठीक है। तो दुश्मन कौन है? तो, मेरे विचार में पश्चिम में और पूरी दुनिया में समस्या ये है कि अमेरिकियों और हमारे यूरोपीय लोगों को ये समझाना कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में जितना कोई राजधानी हथियाने के समान नहीं है। ये वायु बल को मार गिराने, नौसेना को डुबाने के बारे में नहीं है, ये एक विचारधारा को हारने के बारे में है। और बढ़ती संख्या में लोगों में यह आशा ख़त्म हो रही है कि ऐसा किया जा सकता है। मुझे इससे बाहर समझें। मुझे इस संबंध में पहले से भी ज्यादा उम्मीद है और मैं ग़ैर हूँ। जॉन मैककैन के साथ मैं लगभग सत्तावन बार इराक और अफ़ग़ानिस्तान गया हूँ। मैंने इससे क्या सीखा? जब आप कुछ सही करते हैं तो आपको मालूम होता है और गलत करने पर भी मालूम होता है। 2001 के बाद से वहां लाखों लड़कियों को शिक्षित किया गया है और यदि हम यह जारी रखते हैं तो उनके बच्चे भी आवाज़ उठाने में सक्षम होंगे। अफ़ग़ानिस्तान में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था और मैं इस बारे में राष्ट्रपति ट्रम्प से लगातार बात करता रहता हूँ। इसका फल हमें कई पीढ़ियों बाद मिलेगा और लोकतंत्र के लिए धीरज रखना सबसे ज्यादा कठिन है। जब कोई असल खतरा होता है, तब अमेरिका जितना ज्यादा कोई संलग्न नहीं है बल्कि हम जितनी जल्दी हो सके पलायन करना चाहते हैं। ये सब कम ख़त्म होगा? क्या जीतने की कोई आशा है? तो, मैं पश्चिम को यह कहना चाहूँगा कि जब सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान और इराक में जंग लड़ने की बात होती है, हमें लोगों को यह समझाना होगा कि इसका परिणाम क्या हो सकता है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने वहां के लोगों से कुछ अधिक करने की विनती करके हमारे लिए कुछ मोहलत ली है। हम अफ़ग़ानिस्तान में बहुत ही जल्द आठ हजार छह सौ आतंकियों को मार गिराएंगे, यह आतंकवाद-रोध का पदचिन्ह है और हम इसे बहुत ही लम्बे समय तक कायम रख सकते हैं। मैं ये दावे से कह सकता हूँ। मैं इराक और अफ़ग़ानिस्तान में डेढ़ सौ हजार लोगों को ये बात दावे से कह सकता हूँ। जब आप आठ हजार छह सौ के साथ और तीन या चार हजार को जोड़ देते हैं, तो मेरे लिए इसे अपने देश में भी दावे से कहना आसान होता है। तो बहुपक्षवाद थक चुका है। जब आतंक के खिलाफ जंग की बात होती है जब बात विश्व अर्थव्यवस्था की होती है, तो ये इतनी तेजी से बदल रहा है कि आपका सिर चकरा जाए। हमें अब भी चीन से निपटने के बारे में सोचना है। यह इतनी जल्दी इतना बड़ा और इतना समृद्ध हो गया है कि युद्ध के बाद गठित नियम निर्माण प्रणाली का अब अस्तित्व ही नहीं रह गया है। और इसी विचार के साथ दक्षिण कैरोलिना से आए सभी लोगों को यह कहना चाहूँगा कि भले ही आप कट्टरपंथी इस्लाम से लड़ाई करके थक चुके हैं लेकिन वे आपसे लड़ते हुए अभी थके नहीं हैं। आप उनकी जमीन पर या अपनी जमीन पर उनसे जंग लड़ सकते हैं, ये आपको चुनना है। आप ये मान सकते हैं कि अर्थव्यवस्था वैश्विक नहीं है पर आप हार जाएंगे क्योंकि अर्थव्यवस्था वैश्विक है। यदि आप जलवायु परिवर्तन में यकीन नहीं करते तो आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं क्योंकि आप एक दिन जागेंगे और ये दुनिया मूल रूप से बदल चुकी होगी। तो मैं कहना चाहता हूँ कि आप या तो अभी इसकी भरपाई करें या बाद में करें? और दूसरों को भी अपने साथ काम के लिए जोड़ने इस शोरमय दुनिया में बहुत ही कठिन काम है।

मेजबान: ठीक है। सीनेटर ग्राहम साफ तौर पर कुछ टिप्पणियां देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। और मैं आपसे इसके अनुवर्तन में कई सवाल पूछना चाहती हूँ लेकिन मैं जानती हूँ कि हमारे दर्शक भी आपसे सवाल पूछने के लिए व्याकुल हैं। वास्तव में हमारी एक परंपरा रही है कि युवा नेता पहले सवाल पूछते हैं। तो क्लौडिया आपसे शुरुआत करेंगे। कृपया अपना सवाल पूछें।

क्लौडिया: नमस्ते! मेरा नाम क्लौडिया कैमन है। मैं यूरोपीय संसद की सदस्य हूँ। तो संसद के एक निर्वाचित अधिकारी और मैं उस बात पर सवाल करना चाहेंगे जो सीनेटर ग्राहम ने अभी-अभी द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद गठित संस्थानों के बारे में कही है। हमने बहुपक्षवाद में नियम-आधारित संस्थानों पर बहुत चर्चाएँ की हैं लेकिन इसे ठोस बनाने के लिए हम डब्ल्यूटीओ और इसमें संशोधन न करने का एक उदाहरण दे सकते हैं। हालांकि यह अमेरिका द्वारा उठाए गए कदमों के कारण शक्तिहीन हो गया है जो कि अपीलीय निकायों में जजों की नियुक्ति को रोकना है, जो हमें वापस उस समय में ले आया है जिस समय नियम तोड़ने वाले लोग मजबूत स्थिति में थे और अब ईयू ने इस बारे में काम करने के लिए गठबंधन में शामिल हो गया है जिससे सुधार की बची-खुची फायदें भी कम हो गई हैं। तो इन तंत्रों को सुधारने में अमेरिका का क्या योगदान है और क्या आप डब्ल्यूटीओ को छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, यदि हाँ तो उसके बाद क्या होगा? क्योंकि ये एक ऐसी बिंदु होगी जिस पर हम बहुत ही मजबूती से आज की बदलती अर्थव्यवस्था में बहुपक्षवाद को कैसे पुनर्जीवित कर सकते हैं? इस पर बात कर सकते हैं।

मेजबान: धन्यवाद

सीनेटर ग्राहम: बहुत ही अच्छा सवाल है। शायद आपको राष्ट्रपति को ये समझाना होगा कि डब्ल्यूटीओ काम कर सकता है। क्योंकि मुझे नहीं लगता कि ऐसा हो सकता है। उनका मानना है कि चीन की दृष्टि से यह बहुत ही बुरी तरह विफल हुआ है। लेकिन वाइट हाउस और दूसरों का मानना है कि डब्ल्यूटीओ को सही तरीके से सुधार कर ही कई स्तरों पर धोखेबाजी करने वाले चीन पर काबू पाया जा सकता है। तो हम अपने देश में भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इसे सुधारा जा सकता है या तोड़ दिया जाना चाहिए और राष्ट्रपति ट्रम्प को ही ये निर्णय लेना होगा कि वे इस समस्या को कब हल करेंगे और सुधारों की सूची देंगे। यदि आपको पेरिस एकॉर्ड पसंद नहीं है तो क्या पसंद है? यदि आपको ईरान परमाणु समझौता पसंद नहीं है तो आपको क्या पसंद है, और मैं राष्ट्रपति पर प्रहार नहीं कर रहा हूँ बल्कि ये एक कड़वा घूँट है। यदि आपको यूरोपीय संघ पसंद नहीं है तो क्या पसंद है? तो मेरे अनुसार हमारा अधिकार बनता है कि हम आपको इस पर कोई प्रतिक्रिया दें कि ये कैसा होना चाहिए। मेरे और सीनेटर मेनेन्देज़ के मन में एक विचार आया है कि हम तत्कालीन जेसीपीओए के बदले फ्रांस में या कहीं भी एक अंतर्राष्ट्रीय ईंधन बैंक स्थापित कर सकते हैं। जहाँ अरब के सभी देश और ईरान जितना चाहे उतनी परमाणु शक्ति ले सकता है लेकिन ईंध रॉड का निर्माण इस क्षेत्र के बाहर होगा और ये ईंधन आपूर्ति की गारंटी भी देगा ताकि कोई भी इससे समृद्ध न हो क्योंकि समृद्धि से ही बम मिलता है। तो उम्मीद है कि मैं कुछ ऐसे रास्ते तलाशने का प्रयास कर रहा हूँ जो केवल ये न कहे कि पेरिस एकॉर्ड में क्या पसंद नहीं है। आशा है कि हम अमेरिकी आपस में बात करना शुरू करेंगे कि एक बेहतर सौदे में क्या होना चाहिए और मुझे लगता है कि ये जानने का हमारा हक़ बनता है।

मेजबान: धन्यावद। सामने बैठे सज्जन, आप पूछें।

दर्शक: नमस्ते! मेरा नाम पॉल होर्वाथ है और मैं अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का अतिथि हूँ। मैं भारत के माननीय विदेश मंत्री जी से अपना सवाल करना चाहूँगा और उस पर विस्तार से बताने को कहूँगा, आपने अपनी दूसरी बिंदु में कहा था कि पश्चिम अपने अनंतहीन आधिपत्य को लेकर इतना सुनिश्चित था कि वह विश्व के अन्य हिस्सों के साथ जुड़ाव के अन्य अवसरों को खोजने में विफल रहा। मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ और मेरा मानना है कि कम से कम अमेरिका के परिप्रेक्ष्य से इसका एक कारण ये है कि भले ही हम झमेले में फंसे हैं लेकिन ऐसे कई लोग हैं जिनका मानना बिलकुल इसके विपरीत है कि यह काफी हद तक चीन और भारत की वजह से है। चीन और भारत के साथ सूचना प्रौद्योगिकी का अधिक व्यापार हमें परेशान कर रहा है। तो कृपया इस पर विस्तार से बताएं और समझाएं। क्योंकि मैं यह समझ नहीं पाया।

डॉ. एस. जयशंकर: वैसे, आप जानते हैं, मैं द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर अभी तक के समय का अवलोकन कर रहा था और न कि बस पिछले दस या बीस वर्षों का, और मैंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि यदि आप आज नियम-आधारित व्यवस्था को देखेंगे, यदि आप लोकतांत्रित प्रथाओं को देखेंगे, यदि आप अनेकवादी समाजों को देखेंगे, तो पाएंगे कि 1945 के बाद लोगों का ये सोचना कि राजनीतिक लोकतंत्र, बाजार अर्थव्यवस्था और अनेकवादी समाज एक वैश्विक मानदंड बन सकता है, इसका एक कारण ये था क्योंकि एक गरीब विकासशील देश जो अभी-अभी आजाद हुआ था, उसने ये विकल्प चुना था। तो, क्योंकि भारत ने इन विकल्पों को चुना, इसलिए यह एकमात्र रूप से पश्चिमी चरित्र नहीं रह गया और यह बहुत व्यापक बन गया और कई वर्षों के दौरान वैश्विक दक्षिण में कई देशों, एशिया और अफ्रीका के कई देशों ने भी इसे अपनाया था। और आज जब ऐसी अनेक प्रथाओं की बात होती है, मेरे विचार में यह महत्वपूर्ण है कि यदि मानदंड, वार्ताएं और हित केवल पश्चिम तक ही सीमित होतीं तो यह कहा जाता कि ये समस्या पश्चिम की है, ये एक वैश्विक समस्या नहीं है। जब मैं विश्लेषण कर रहा था कि बहुपक्षवाद कमजोर क्यों हो गया है, ये अशांति क्यों हुई है, तब मैंने देखा कि इसका एक कारण ये है कि सभी ने अपनी सुविधाओं को महत्व दिया है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ – आप जानते होंगे कि एक समय में भारत के पूर्व और भारत के पश्चिम में सैन्य तानाशाही था। भारत का वह उत्तरी भाग म्यांमार में चला गया। पश्चिम भारत वाला भाग एक बड़ा गैर-नाटो सहयोगी बन गया। तो आप जानते होंगे कि ये सब बहुत तरीकों से हुआ, मेरे कहने का अर्थ है कि आज की राजनीति ने मूल्यों और मान्यताओं और व्यवस्था और नियमों की अनेक संदेशों को विकृत किया था। और मेरे विचार में, इसने क्या किया कि, आज पश्चिम और पश्चिम से आगे के लिए एक निर्वाचन-क्षेत्र है। यदि आप मुझसे पूछें तो भारत में और दक्षिण कोरिया के मेरे साथी ने भी यही बताया था लेकिन मैं साफ तौर पर बता रहा हूँ, मुझे लगता है कि गैर-पश्चिमी लोकतांत्रित समाजों को पश्चिम में रूचि है। वो पश्चिम को कमजोर होता हुआ नहीं देखना चाहते हैं। उनके लिए भले ही पश्चिम आज कम हावी होगा लेकिन फिर भी वह वैश्विक बहु समाज का एक अनिवार्य अंग है। और उसके लिए मेरे ख्याल से आपको आज की चुनौतियों के बारे में ज्यादा जानने की आवश्यकता होगी जैसे कि समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबला, कहने का अर्थ है कि पूरी दुनिया की आम प्रबंधनीय समस्याओं के बारे में जानने की आवश्यकता होगी। मुझे लगता है कि पश्चिम से आगे भी अपने लिए भागीदार खोजना पश्चिम के लिए फायदेमंद होगा और मेरे विचार में बाकी की दुनिया भी इसके लिए खुली है।

मेजबान: पेरिस में भूमिका। वहां पीछे बैठे सज्जन, आप पूछिए।

दर्शक: अब तक की चर्चा बहुत ही दिलचस्प रही है। मेरा नाम माइक है, मैं ओटावा विश्वविद्यालय, कनाडा से हूँ, और जस्टिन ट्रुडो का पूर्व सलाहकार हूँ। ये सवाल सीनेटर ग्राहम के लिए है और अमेरिका कुछ मामलों में अपने सहयोगियों पर दबाव डाल रहा है कि वो चीन के संबंध में निश्चित कार्रवाई करे, मेरा सवाल ये है कि क्या अमेरिका के सहयोगी दुबारा से अमेरिका का साथ देंगे और मैं विशेष रूप से अमेरिका के प्रत्यावर्तन अनुरोध पर कनाडा में मिस मेंग वानजू की गिरफ़्तारी के बारे में सवाल पूछना चाहता हूँ क्योंकि आप जानते होंगे कि उसके बाद चीन ने इसके जवाब में कनाडा के दो निर्दोष लोगों को हवालात में डाल दिया था और एक साल पहले इसी मंच पर आपने उस समस्या को संबोधित किया था और कनाडा के लोगों ने उसका बहुत स्वागत भी किया था क्योंकि आपने कहा था कि ट्रम्प प्रशासन को उनको रिहा करवाने के लिए ज्यादा प्रयास करना चाहिए। पिछले साल अमेरिकी प्रशासन ने जो कदम उठाया था, उसपर आपका क्या विचार है? धन्यवाद।

सीनेटर ग्राहम: मेरे विचार में हमारी दुनिया को कुछ ज्यादा करने की आवश्यकता है। ये एक बहुत बड़ी बात है, क्या आप समझ रहे हैं कि वो क्या कह रहे हैं? ठीक है। तो एक हावेई अधिकारी है और जिसके बारे में हमने बताया था, जो कनाडा में रहता है, और प्रत्यावर्तन संधि है। वे विधि संगत ढंग से इसके खिलाफ लड़ रही हैं। चीन ने दो कनाडाई लोगों को पकड़ लिया क्योंकि वो परेशान था। अब अगली बारी आपकी हो सकती है, तो हमें क्या करना होगा कि हमें इसे सुधारना होगा। इसलिए मैं जब वापस लौटूंगा तो मैं प्रधान मंत्री ट्रूडो से इस बारे में बात करूँगा और कानून शासन के पक्ष में खड़े लोगों के लिए एक बहुत अच्छे सहयोगी रहे हैं। चीन कानून शासन के पक्ष में नहीं है। उसने हांग कांग के साथ एक समझौता किया है। अब उस समझौते को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। यदि हम उसे ऐसे ही छोड़ देंगे, यदि कोई अपने और अपने मित्रों के लाभ के लिए कोई समझौता तोड़ता है और आप उसे रोकते नहीं हैं तो आप बाद में बहुत पछताएंगे। तो उसने आज हमें एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया देने की चुनौती दी है। हमें केवल कुछ ज्यादा करने ही जरूरत नहीं है बल्कि चीन के खिलाफ कुछ आर्थिक कार्रवाई भी करनी चाहिए। यदि चीन अमेरिका और कनाडा के साथ प्रत्यावर्तन संधि की वजह से दो कनाडाई लोगों को पकड़ता है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा क्योंकि ऐसा भी हो सकता है कि अगली बारी आपके नागरिकों की हो। यदि चीन नियमों का पालन नहीं करता है तो उस पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। हावेई और एक चीन जो आपको समझनी होगी वो ये है कि हमारे देश की राजनीति इतनी ज्यादा पेचीदा हो चुकी है कि मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। हमने राष्ट्रपति और अमेरिका को किनारे पर कर दिया है। हम इस बात पर सहमत हैं कि होवेई टेक्नोलॉजी अमेरिका के लिए एक खतरा है और हम वास्तव में विश्व व्यवस्था के बारे में सोचते हैं, तो शायद नैंसी पेलोसी और डोनाल्ड ट्रम्प की आपस में इतनी बनेगी नहीं, लेकिन अगर आप उन्हें कुछ समय पहले की ब्रिटिश खरीदों के बारे में पूछेंगे तो आपको वहीँ जवाब मिलेगा। दुनिया के लिए ये जरूरी है कि आपको विकल्प दिया जाए। हम हमेशा-हमेशा के लिए 5G से इनकार नहीं कर सकते लेकिन हम रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स ने दृढ़ प्रतिबद्धता ली है कि यदि आप हावेई का साथ देंगे तो आप अपने कई सारे सहयोगियों को गवा देंगे। आपके असल पर आते हैं, मैं अपने देश वापस जाकर सिर्फ ये नहीं कहूँगा कि हमें कुछ ज्यादा करने की जरूरत है बल्कि मैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अधिक से अधिक प्रतिक्रिया प्राप्त करने का प्रयास करूँगा क्योंकि हमारे कनाडाई मित्र जिस चीज की मांग कर रहे हैं वो उचित हैं और वास्तव में पूरी दुनिया को आपकी सहायता करनी चाहिए और न कि सिर्फ अमेरिका को।

मेजबान: धन्यवाद। यहाँ सामने बैठीं मोहतरमा, आप पूछिए।

दर्शक: नमस्ते। मैं प्रोफेसर कैथरीन एपीस्काइन हूँ और वॉरसॉ पोलैंड में यूरोपीय राजनय अकैडमी की निदेशक हूँ। मैं आपको संभवतः पश्चिम की परिभाषा पर चुनौती देना चाहूंगी। पश्चिम अपने-आप में ही बहुत खास है। मेरे कहने का मतलब है कि, या तो आप पश्चिम हैं या पश्चिम नहीं हैं। पर क्या हमें उन लोकतांत्रित देशों के बारे में बात नहीं करनी चाहिए जो अपने नागरिकों के अधिकारों की परवाह करते हैं और जो कानून शासन और अंतर्राष्ट्रीय कानून को नहीं समझते हैं और क्या भारत और कोरिया या अमेरिका इन मानदंडों को पूरा करने में असफल हुआ है। उन्हें बस पश्चिम का एक हिस्सा होने के नाते नहीं देखा जाना चाहिए जबकि जो पश्चिम का हिस्सा बनने की आकांक्षा रखते हैं या इच्छा करते हैं और इस ओर काम करते हैं, उन्हें पश्चिम का हिस्सा माना जाना चाहिए। मेरा देश लम्बे समय से पूर्व का हिस्सा था और अचानक से मैं खुद को सम्मेलन में पाता हूँ जहाँ लोग मुझे पश्चिम का हिस्सा मानते हैं। ये बेहद अद्भुत है क्योंकि मुझे अब भी अपने बचपन की बात याद है कि हम बिलकुल पूर्वी खंड का हिस्सा थे, पर जो अब बदल चुका है, तो हमें सर्वोत्तम चीजों को कैसे समावेश करना चाहिए और क्या ये लोकतांत्रित दृष्टिकोण आगे बढ़ने का मार्ग है? धन्यवाद!

सीनेटर ग्राहम: मैं जल्दी से बताना चाहूँगा क्या पश्चिम का अर्थ लोकतंत्र है। जब आप पश्चिम कहते हैं तो क्या आप इसका अर्थ लोकतंत्र समझते है। यदि समझते हैं तो इसे पश्चिम नहीं कहा जा सकता है। ये लोकतंत्र के बारे में है और अमेरिकी जनता को इसके पीछे की अवधारणा समझाना इस समय बहुत कठिन है कि युवा लोकतन्त्रों को समर्थन देना लम्बे समय में हमारे सर्वोत्तम हित में होगा। क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान, इराक और सीरिया में इतनी सारी रुकावटें और शुरुआत रही हैं कि वहां पर सब कुछ पेचीदा हो गया है। लेकिन आपको इस ओर इशारा करना होगा कि हम यहाँ पर किसके बारे में बात कर रहे हैं, हम कानून शासन और प्रतिनिधि सरकारों की बात कर रहे हैं। हम जेफ़रसन एक अमेरिकी लोकतंत्र के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। जॉन मैककैन ने मरते दम तक दो बातों पर यकीन किया कि, एक नियम और दूसरा कि आपको इनका पालन करना चाहिए और यह कि पृथ्वी के हर इंसान को आत्मनिर्णय का अधिकार है और मेरे विचार में पश्चिम का अर्थ यही है। सही मायनों में दक्षिण कोरिया पश्चिम में आता है।

मार्गरेट वेस्तागर: मेरे विचार में आपने बहुत ही अच्छी बात कहीं, आखिरकार दुनिया गोल है। तो हाँ हम ये कह सकते हैं कि पश्चिम कहाँ है, ये एक अवधारणा पर आधारित है कि दुनिया सपाट है और आखिर में आप गिर जाएंगे। तो कुछ हद तक, ये बकवास बात है पर मेरे लिए ये काफी दिलचस्प है क्योंकि इस सम्मेलन से पहले मैंने वेस्टलेसनेस के बारे में कभी नहीं सुना था। तो मेरे लिए ये ऐसा है कि हम यहाँ पर अपनी ही परेशानियों पर चर्चा कर रहे हैं और बाकी की दुनिया को भी सामूहिक तौर पर इस पर मंथन करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। पर मुझे ये समझ नहीं आता क्योंकि मैं समझती हूँ कि विश्व में पहले जो मूल्य स्थापित किए गए थे वो अब भी बने हुए हैं। शायद ग्रीस से पहले लेकिन कम से कम ग्रीस में इनका विस्तार हुआ है। आप मोलर को ही देख लीजिए, जहाँ आप उन्हें दुनिया की सबसे बड़े लोकतन्त्रों में देखते हैं, आप उन्हें एशियाई देशों में देखते हैं, आप उन्हें दूर दक्षिण में देखते हैं और आप उन्हें हर जगह देखते हैं और कानून शासन और व्यक्ति की सत्यनिष्ठा से ही आपको इसका पता चलता है और इसी चीज से ही इसका पता चलना चाहिए और हमारे लिए ये सब केवल परेशानी के नतीजतन उठाया गया कदम है और कहेंगे कि खैर ये यूरोप है। तो ये बहुत अच्छी बात है और हम बाकी की दुनिया के लिए एक अद्भुत मजबूत साझेदार बनना चाहते हैं, बात ये है।

डॉ. एस. जयशंकर: हाँ, आप जानते हैं, देखिए मेरे ख्याल से आपने बहुत अच्छी बात कही है। क्योंकि ऐतिहासिक रूप से देखने पर इसका एक उचित कारण है कि पश्चिमी लोकतन्त्रों की तुलना क्यों की जाती है। लेकिन मेरे विचार से, कई सालों के दौरान, पश्चिम इससे भी आगे बढ़ना चाहा है क्योंकि आज के समय में अधिकतर लोग पश्चिमी लोकतंत्र की तुलना में गैर-पश्चिमी लोकतंत्र में रहते हैं। तो आप जानते होंगे कि हम सभी अब भी अपनी आदतों से मजबूर हैं इसलिए हम शॉर्ट हैंड सूत्रों का उपयोग करते हैं भले ही वो कालभ्रमित हो। तो मैं आपकी बात को स्वीकार करता हूँ कि वेस्टलेसनेस का हिस्सा एक तरह का पश्चिम है जिसे इस व्यापक पुनर्संतुलन के बारे में समझने की आवश्यकता है क्योंकि जैसा कि मैंने बताया था आज के लोकतन्त्रों को पुनर्संतुलन का तथ्य समझने की आवश्यकता है। अन्य महाद्वीपों में ऐसे लोग हैं जो इस बात को समझते हैं और यूरोप और उत्तर अमेरिका के लोगों के समान कड़ाई से इसका दावा करते हैं।

मेजबान:
मेरे विचार में

डॉ. एस. जयशंकर:
नहीं, मैं पूर्व का हिस्सा हूँ और दक्षिण का हिस्सा हूँ। मैं पश्चिम का हिस्सा हूँ। मैं सार्वभौमिक हूँ। मैं भारत हूँ।

कांग क्युंग-व्हा: मेरे विचार में सीनेटर महोदय ने अपने संबोधनों में बिलकुल सही बात कही है। यदि आप मूल्यों की दृष्टि से देखें तो दक्षिण कोरिया पश्चिम का हिस्सा है। मेरे ख्याल से किसी ने टिप्पणी दी थी और शुरुआत में जो फिल्म दिखाई गई थी उसमें किसी ने कहा था कि हमें पश्चिम के बारे में बात करने के बजाय, उन मूल्यों के बारे में बात करनी चाहिए जो हम साबित करने की कोशिश कर रहे हैं और मुझे लगता है कि जब तक मानव की मर्यादा में ये मूल निहित हैं और मुझे लगता है कि एक बड़ा सामान्य आधार भी है लेकिन ये भी याद रखना आवश्यक है कि हमें उन लोगों से भी बात करनी चाहिए हमारे साथ एक आम मूल्य साझा नहीं करते। हम जानते हैं कि हमारा पड़ोसी अनिवार्य रूप से हमारे मूल्य साझा नहीं करता है लेकिन हमें इस विशाल सुरक्षा चुनौतियों से उबरने के लिए बातचीत करने की जरूरत है। और इस तरह जब हम समान विचार रखने वाले लोगों के बीच इन मूल्यों को बढ़ाने और सुदृढ़ बनाने का प्रयास करते हैं, उसी समय हमें उनसे भी बात करनी चाहिए जो समान विचार नहीं रखते हैं।

सीनेटर ग्राहम: मेरे विचार में ये बहुत ही अच्छा सवाल है। तो, यदि स्कॉटलैंड यूके से बाहर निकल जाता है तो यह लोकतांत्रित प्रक्रिया के माध्यम से होगा, सही? ठीक है। आपके दरवाजे के सामने ही रूसी टैंकों ने क्रिमीआ को हथिया लिया था जो कहने के लिए कोई अच्छा तरीका नहीं था। मैं अपने देश में युद्ध और लोकतंत्र की हर चर्चाओं को ख़त्म कर देता हूँ और ये वहां पर मायने भी क्या रखता है? मैं कहता हूँ आप मुझे किसी भी दो लोकतन्त्रों के बीच छिड़ी युद्ध का नाम बताइए और यहाँ पर पाकिस्तान और भारत को सुनिश्चित करना होगा कि मैं गलत नहीं कह रहा हूँ। मैंने तो कभी ऐसे किसी युद्ध के बारे में नहीं सुना जो दो लोकतन्त्रों के बीच छिड़ी है, क्या आप ऐसे किसी युद्ध के बारे में जानते हैं? क्योंकि हम कानून शासन और व्यापार के माध्यम से कोई न कोई रास्ता निकाल लेते हैं और अपनी समस्याओं को सुलझा लेते हैं और जब जमीन को लेकर विवाद होता है तब भी हम उसे सुलझा लेते हैं। लेकिन चीन इसे सुलझाना नहीं चाहता। वो विवादग्रस्त जमीन, कश्मीर में सैन्य बेस बना रहा है। हमारे सामने दो लोकतंत्र हैं, दो बहुत ही अच्छे सहयोगी हैं। भारत जहाँ सौ करोड़ से भी ज्यादा लोग हैं। एक ओर चीन है जो लोकतंत्र से जुड़ी सभी चीजों को बंद कर रहा है और वहीं भारत आगे बढ़ रहा है और चुनाव करवा रहा है। भारत में भी वहीं समस्याएँ हैं जो हर देश में हैं पर भारत ने लोकतंत्र का रास्ता चुना है। कश्मीर की बात आती है तो मुझे नहीं मालूम कि इस मुद्दे का अंत कैसे होगा लेकिन हमें ये सुनिश्चित करना चाहिए कि दोनों लोकतंत्र एक अलग और खास तरीके से इसका समाधान करेंगे। और यदि आप यहाँ पर इस अवधारणा को साबित कर सकें, तो मेरे विचार में यह लोकतंत्र को बढ़ावा देने का सबसे अच्छा तरीका होगा।

डॉ. एस. जयशंकर: चिंता मत कीजिए सीनेटर महोदय एक लोकतंत्र इसे जरूर ही सुलझा लेगा और आपको पता होगा कि कौन सा लोकतंत्र।

मेजबान: और वहां बैठे सज्जन। यदि पैनल को ठीक लगे तो हम एक-दो सवाल इकट्ठे ले सकते हैं, क्या आपको कोई परेशानी होगी?

सीनेटर ग्राहम: मुझे लगभग मिनटों में निकलना होगा।

मेजबान: ठीक है तो कृपया संक्षेप में अपना सवाल पूछें।

दर्शक: ठीक है। मेरा नाम अब्बास असलानी है। मैं सही भाव से 2020 का सदस्य हूँ। मैं ईरानी की राजधानी तेहरान में स्थित मध्य पूर्व रणनीति अध्ययन केंद्र में एक वरिष्ठ शोधकर्ता हूँ। आपने कहा था कि मध्य पूर्व का भविष्य जिनेवा या न्यू यॉर्क की बजाय अस्ताना में तय होगा, यदि हम मान लें कि आज पश्चिम के सामने चुनौतियां और खतरे हैं या पश्चिम द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था को कोई खतरा हो सकता है, लेकिन आज इसे कम आंका जा रहा है और इसपर सवाल उठाया जा रहा है। तो क्या ये इस शिविर के सदस्यों के बीच मौजूद मतभेदों के परिणामस्वरूप सामने आया है। यदि ऐसा माना जा रहा है तो क्या यह ऐसी घटनाओं की गतिशीलता के परिणामस्वरूप हुआ है जिसका गलत अनुमान लगाकर गलतियाँ की जा सकती हैं या क्या यह एकपक्षवाद के परिणामस्वरूप हुआ है जब अमेरिका अन्य देशों की इच्छाओं को अनदेखा करते हुए परमाणु समझौते से बाहर निकल आया था। दूसरी तरह, हमें एक व्यापक चुनौती या खतरे का सामना करना पड़ सकता है, जो अन्य देशों जैसे कि चीन, रूस, भारत, कोरिया, जापान और पश्चिम के अन्य प्रश्नगत देशों के उदय का कारण बन सकता है।

मेजबान: क्या आपका सवाल पूरा हो गया?

दर्शक: इस अशांति के लिए आप किस घटक को अधिक दोषी ठहराएंगे? क्या ये आंतरिक खतरा है या बाहरी खतरा? आंतरिक खतरे के लिए, क्या ये एकपक्षवाद के कारण है या गतिवाद के कारण है? धन्यवाद!

मेजबान: और आप सज्जन जो बहुत ही धीरज से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

दर्शक: धन्यवाद महोदया। मैं लाटविया का उप प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री हूँ, और मैं कोरियाई मंत्री से बहुत सहमत हूँ क्योंकि हम कभी-कभी इस बात पर चर्चा करते हैं कि क्या यूरोप के सभी देश पर्याप्त रूप से पश्चिम का हिस्सा हैं या नहीं पर मेरे विचार में दक्षिण कोरिया निश्चित ही पश्चिम का हिस्सा है पर जब हम अशांति पर चर्चा करना शुरू करते हैं, तो हम कभी-कभी ये मानते हैं कि हमारी मूल्य प्रणाली और दुनिया में हमारी भूमिका कमजोर हो रही है और क्या हम विशेष रूप से यूरोप में केवल इस आधार पर कि हमारी शक्ति कम हो रही है, इसलिए हम इस बात पर अधिक बल देने का प्रयास करते हैं और विरोधाभास ये है कि हम पश्चिम को अधिक प्रकट बनाने में सक्षम नहीं होंगे। यदि हम ये शक्ति खो देते हैं, तो क्या हमें एक व्यवहार्य और तर्कसंगत दृष्टिकोण नज़र आएगा जो हमसे कभी-कभी वास्तविक राजनीती में छूट जाता है?

मेजबान: धन्यवाद। और कौन पूछना चाहेगा?

सीनेटर ग्राहम: तो पहले हम खतरे की बात करते हैं, उत्तर कोरिया की बात करते हैं, मुझे नहीं लगता कि किम जोंग-उन की आँखें कल खुलेंगी और वो लॉस एंजेलेस पर हमला कर देगा। मैं गलत अनुमान लगाते हुए उन्हें यह क्षमता नहीं देना चाहता हूँ। मुझे इसकी चिंता है। यदि उसे हाइड्रोजन बम और ज्यादा से ज्यादा मिसाइल मिल जाएं तो वो उन्हें बेच देगा या समझौता कर लेगा। मेरा मानना है कि यदि ईरानी शासन के पास परमाणु हथियार होंगे तो वह उसका उपयोग करेगा। मेरे विचार से धार्मिक ईश्वरानुभूति दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा और मेरे लिए ईरान धरती पर सबसे बड़ा खतरा है। और कोई भी परमाणु समझौता करते समय आपको यह सोचना चाहिए कि आप किसके साथ समझौता कर रहे हैं। इस पर यकीन कर पाना मुश्किल है और हिटलर सभी यहूदियों को मारना चाहता था और उसने ऐसा किया भी और उसने इस पर एक पुस्तक भी लिखी। जब हमारे जर्मन मित्र दुनिया भर की समस्याओं के बारे में बात कर रहे थे। उन्होंने एक बार भी ईरान का जिक्र नहीं किया, यदि आप सीरिया को आबाद करना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आप ईरानियों को डमस्कस से बाहर निकाल दें। यदि आप इराक को टूटने से बचाना चाहते हैं तो आपको तुकबंदी के ज़रिए इससे निपटना होगा। यदि आप लेबनान को दक्षिण में जाने से रोकना चाहते हैं तो आपको ईरान से निपटना होगा क्योंकि ये मध्य पूर्व का नाशक है। आप मुझे ईरानी लोगों के लिए शांतिपूर्ण परमाणु शक्ति समझौते के पक्ष में समझें। यदि आप परमाणु शक्ति कार्यक्रम चाहते हैं तो बेशक ऐसा करें। ऐसे सोलह देश हैं जहाँ परमाणु शक्ति संयंत्र स्थापित हैं लेकिन वो अपना ईंधन खुद नहीं बनाते हैं। तो मैं ईरानी सरकार को यह प्रस्ताव देना चाहूँगा। ऐसे समझौतों को मंजूरी दें को अरब राज्यों और ईरानियों को एक ही पन्ने पर लाता है कि हर कोई परमाणु शक्ति प्राप्त कर सकता है। ईंधन के आपूर्तिकर्ता फ्रांस या किसी अन्य जगह के होंगे पर इसकी गारंटी है कि इससे कोई समृद्ध नहीं होगा। ये जेसीपीओए का सबसे बड़ा गलत अनुमान था और मेरा कहना है कि आपको समझना चाहिए कि आप किसके साथ समझौता कर रहे हैं। उन्हें बम चाहिए था। मैं आशा करता हूँ कि वो समृद्धि के बिना ही परमाणु शक्ति सौदे को स्वीकार करके मुझे गलत साबित करेंगे। अब मुझे चलना चाहिए। अलविदा।

मेजबान: क्या आपमें से कोई भी आखरी दो सवालों का जवाब देना चाहेगा।

मार्गरेट वेस्तागर: मैं आखरी सवाल का जवाब देना चाहूंगी।

मेजबान: धन्यवाद।

मार्गरेट वेस्तागर: क्योंकि मेरा मानना है कि यहाँ पर ये बात महत्वपूर्ण है कि हम पश्चिम के बारे में बात करना बंद करें क्योंकि ये हमें अतीत में रखता है। यह हमारे मन में पश्चिम की अवधारणा बनाए रखता है। पश्चिम एक श्रेष्ठतर स्थान होने के नाते विश्व में पुनर्संतुलन इसलिए स्वीकार नहीं कर रहा है क्योंकि पश्चिम के लिए पिछले सत्तर साल बहुत-बहुत सफल रहे थे। खास तौर पर पिछले बीस साल, और तब हम अत्यंत गरीबी, रोग, शिक्षा के अभाव से जूंझ रहे थे। आप जानते हैं पश्चिम बहुत सफल रहा है पर हम अपने-आप को एक बहुत ही ताकतवर दुनिया, जहाँ समाज उन मूल्यों पर बने हों जो मूलतः यूरोप में देखा गया था, में एक नवीनीकृत साझेदार के रूप में देखने के बजाय अब हम यहाँ शिकायत कर रहे हैं कि पश्चिम दुनिया के शीर्ष पर क्यों नहीं है। अब इन मूल्यों को व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है और यूरोप से बाहर कुछ देशों में इसने और भी मजबूती बना ली है।

क्योंकि हमारे कुछ आंतरिक तनाव भी हैं और मेरे ख्याल में हमें इससे बाहर निकलने की आवश्यकता है, क्योंकि हम एक गोल ग्रह पर रहते हैं और हमें पूरी दुनिया में कुछ बहुत ही अच्छे साझेदार मिले हैं। जो इस बात का पछतावा नहीं करते कि अतीत में क्या था बल्कि बहुत ही मजबूत बहुपक्षीय प्रणाली बनाने की दिशा में पूरी तरह जुड़ रहे हैं और मेरे विचार में हमने कुछ हद तक ऐसा किया भी है और साथ ही इस चर्चा का एक परिशोधन प्रभाव भी है, ठीक है। अब हमने इस पर चर्चा कर ली है और अब हमें इसे युहीं छोड़ देना चाहिए और अपनी भूमिकाओं को देखना चाहिए क्योंकि अब हमारे साथ ऐसे अद्भुत साझेदार हैं जो कानून शासन के आधार पर और व्यक्ति की निष्ठा के प्रति बुनियादी सम्मान के साथ हमारे साथ जुड़े हैं और यही चीज हमें बहुपक्षवाद का निर्माण करने में मदद करती है।

मेजबान: बहुत बहुत धन्यवाद, यह एक अत्यंत गुंजायमान वाद-विवाद के लिहाज से बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण सार था। हमने कई मुद्दों पर चर्चा की। बहुत बहुत धन्यवाद। कृपया मेरे साथ मिलकर पैनल का धन्यवाद कीजिए। धन्यवाद।

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