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आसियान-भारत सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों पर तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विदेश राज्य मंत्री डॉ. राजकुमार रंजन सिंह द्वारा मुख्य भाषण (अक्टूबर 07, 2021)

अक्तूबर 07, 2021

महामहिम गुयेन क्वोक डंग
आसियान के गणमान्य व्यक्ति,
देवियो और सज्जनों,


मुझे आज यहाँ आसियान-भारत सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों पर तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आपके साथ शामिल होते हुए प्रसन्नता हो रही है। यह वास्तव में बहुत खुशी की बात है कि कोविड -19 महामारी की पृष्ठभूमि में भी, आसियान और भारत हमारी साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत जैसे महत्व के मुद्दों पर अपनी बातचीत और चर्चा जारी रखने में सक्षम हैं। 2015 से सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों पर आसियान-भारत अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने की प्रतिबद्धता हमारी समान सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ हमारे सांस्कृतिक संबंधों की आधुनिक अभिव्यक्तियों को बेहतर ढंग से समझने के एक प्रमुख प्रयास के हिस्से के रूप में की गई थी।

भारत और आसियान गहरे और स्थायी सभ्यतागत संपर्क साझा करते हैं। हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के साझा प्रवेश और निकास बिंदुओं के साथ जोड़ने वाली हमारी भू-रणनीतिक स्थिति ने इन संपर्कों को और मजबूत करने में मदद की है। दक्षिण पूर्व एशिया के समुद्री मार्गों ने हमारी संस्कृतियों को आपस में घुलने-मिलने का मौका दिया। व्यापार मार्गों ने प्राचीन भारत को दक्षिणी बर्मा, मध्य और दक्षिणी सियाम, निचला कंबोडिया और दक्षिणी वियतनाम के साथ सुमात्रा, जावा और बाली के द्वीपसमूह और कई अन्य शहरीकृत तटीय बस्तियों से जोड़ा। दक्षिणपूर्व एशिया में श्रीविजय और सुवर्णभूमि और मसालों के आकर्षण ने कई भारतीय व्यापारियों को इस क्षेत्र में जलयात्रा करने के लिए आमंत्रित किया था, जिसमें प्राकृतिक आपदाओं के मामले में प्रार्थना करने के लिए भिक्षुओं को बोर्ड पर साथ लिया जाता था । व्यापारियों और भिक्षुओं ने वहाँ बसने वालों को रास्ता दिखाया, जिन्होंने क्षेत्रों के धर्म, संस्कृति, समाज और राजनीति के विकास को अपना मान कर अपनाते हुए उनमें अपना अनूठा स्वरुप प्रदान किया । व्यापारियों, भिक्षुओं, विद्वानों और प्रवासियों के माध्यम से भारत और पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया के दूर के हिस्सों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। आसियान क्षेत्र के साथ ऐतिहासिक संबंधों में व्यापक अध्ययन और अनुसंधान ने हमें अपने स्वयं के ऐतिहासिक अतीत की बेहतर समझ विकसित करने में मदद की है।

हमारे प्राचीन विमर्श भारतीय उपमहाद्वीप के साथ दक्षिण पूर्व एशिया के व्यापक धार्मिक और राजनीतिक संबंधों को प्रदर्शित करती है। दक्षिण-पूर्व एशिया के दो सबसे बड़े धर्म भारत उपमहाद्वीप से/के माध्यम से फैले। पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में बिखरे हुए शानदार हिंदू और बौद्ध सभ्यताओं के पुरातात्विक अवशेष जैसे अंगकोर वाट का यूनेस्को विरासत स्थल या कंबोडिया में ता प्रोहम, लाओ पीडीआर में वट फु मंदिर, बागान, म्यांमार में आनंद मंदिर, इंडोनेशिया में बोरोबुदुर बौद्ध मंदिर, वियतनाम में माई सन टेम्पल कॉम्प्लेक्स और चाम स्मारक, थाईलैंड में मोन निवासियों से जुड़े द्वारवती स्थल, वर्तमान म्यांमार में पीयू की बस्तियाँ भारत और आसियान देशों के बीच शुरुआती संपर्कों का प्रमाण दिखाती हैं। वे प्राचीन काल से भारत और आसियान के बीच घनिष्ठ आदान-प्रदान के स्पष्ट उदाहरण हैं। यह तथ्य कि दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर भारत में नहीं बल्कि कंबोडिया में स्थित है, हमारे सांस्कृतिक आदान-प्रदान की गहराई का उदाहरण है।

यह सांस्कृतिक आत्मीयता केवल इमारतों और स्मारकों में ही नहीं बल्कि हमारी लोककथाओं और पौराणिक कथाओं में भी दिखाई देती है। रामायण और महाभारत के भारतीय महाकाव्य आसियान देशों में उतने ही लोकप्रिय हैं जितने भारत में हैं। इस क्षेत्र में प्रचलित रामायण के विभिन्न रूप, चाहे वह थाईलैंड में रामकियन हो, लाओस में फा लक फा लाम, म्यांमार में यम जत्दाव, इंडोनेशिया में काकाविन रामायण या मलेशिया में हिकायत सेरी राम हों, राम और रावण की समान कहानी बताते हैं। आज भी थाई राजाओं का राज्याभिषेक भारतीय रीति-रिवाजों से किया जाता है। इसी तरह, हमारे दोनों क्षेत्रों की भाषाओं में बहुत सारे शब्द समान हैं। वियतनाम से लेकर इंडोनेशिया तक के विभिन्न स्थलों पर प्रारंभिक दक्षिण पूर्वी सभ्यताओं से पूर्व के संस्कृत शिलालेख मिले हैं। ये सभी हमारे मजबूत ऐतिहासिक जुड़ाव की गवाही देते हैं।

आधुनिक समय में, 1990 के दशक में शुरू हुई और 2014 में फिर से जीवंत हुई भारत की एक्ट ईस्ट नीति, आसियान के प्रति हमारे दृष्टिकोण की आधारशिला रही है और हमें इस क्षेत्र से जोड़ने का एक तरीका है। यह हमारी सभ्यतागत पहुँच, हमारी आर्थिक आकांक्षाओं, एकीकरण की हमारी इच्छा और हमारे साझा मूल्यों और उद्देश्यों की क्षमता को पूरी तरह से पहचानती है। 2012 में आसियान-भारत संबंधों का रणनीतिक साझेदारी में उन्नयन, भारत के 1992 में आसियान का क्षेत्रीय भागीदार, 1996 में डायलॉग पार्टनर और 2002 में शिखर स्तर का भागीदार बनने के बाद से कवर की गई जमीन पर एक स्वाभाविक प्रगति थी। हम 2022 में आसियान-भारत संबंधों के 30 साल पूरे होने का जश्न मनाएँगे। हमारी सदियों पुरानी वाणिज्यिक बातचीत की विरासत आज आसियान के भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और निवेशों का एक प्रमुख स्रोत और लक्ष्य होने में अभिव्यक्ति पाती है। हम भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाइवे और कलादान मल्टीमॉडल परियोजना जैसी परियोजनाओं के माध्यम से आसियान के साथ भौतिक और डिजिटल संपर्क बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हमने सांसदों, युवाओं, व्यापारिक संस्थाओं और नागरिक समाज के आदान-प्रदान को बढ़ाया है। ये मानव और हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक पूँजी में निवेश हैं जो भविष्य में हमारे सहयोग की नींव बनाएँगे।

आसियान क्षेत्र में ऐतिहासिक स्मारकों के रूप में अपार संपदा है जो हमारी समान सांस्कृतिक विरासत की साक्षी है। इस ऐतिहासिक खजाने का संरक्षण और पुनरुद्धार हमारे सांस्कृतिक सहयोग की प्राथमिकता है। क्षेत्र में सांस्कृतिक/विरासत स्थलों के पुनरुद्धार ने भारत और आसियान के इस क्षेत्र में बहुआयामी और उत्कृष्ट संबंधों को एक नया आयाम दिया है। उनमें से प्रमुख हैं कंबोडिया में अंगकोर वाट, कंबोडिया में ता प्रोहम मंदिर और लाओस में वाट फु मंदिर, वियतनाम में चाम स्मारकों का पुनरुद्धार। अतीत की विरासत को सहेजने और दुनिया भर के विद्वानों और पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करने वाले जीवित स्मारकों में बदलने के प्रयास जारी हैं। प्राचीन सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों और संपर्कों को मेकांग गंगा सहयोग के रूप में समकालीन अभिव्यक्ति भी मिली है, जो एक उप-क्षेत्रीय समूह है जिसका उद्देश्य पर्यटन, शिक्षा, संस्कृति और लोगों से लोगों के संपर्क के क्षेत्र में मेकांग और गंगा नदी घाटियों के लोगों के बीच सहयोग को पुनर्जीवित करना है। सिएम रीप, कंबोडिया में एशियाई वस्त्रों का एक एमजीसी संग्रहालय स्थापित किया गया है, जो प्रसिद्ध अंगकोर वाट से दूर नहीं है, जो हमारे बुनाई और वस्त्रों में समानता प्रदर्शित करता है।

आज का सम्मेलन हमें भारत और आसियान के बीच हमारे सभ्यतागत संबंधों और समानताओं के आधार पर भारत और आसियान सदस्य देशों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए एक मंच प्रदान करता है। यह समृद्ध सांस्कृतिक समानता, विस्तृत कला, वास्तुकला, भाषा, धर्म आदि के आधार पर प्राचीन काल की दो सहस्राब्दियों पूर्व से लेकर वर्तमान तक के हमारे ऐतिहासिक संबंधों का समारोह मनाता है। एक राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के दिलों और आत्माओं में बसती है। हमारे लोगों के दिलों और आत्माओं में रहने वाली संस्कृतियों में समानता हमें वह मजबूत नींव प्रदान करती है जिस पर हमारे समकालीन मजबूत संबंध फलते-फूलते हैं। हमारे संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं और समुद्र के पार हमारे लोगों के बीच एक स्थायी संपर्क बने हुए हैं।

मैं आसियान-भारत रणनीतिक साझेदारी के सामाजिक-सांस्कृतिक स्तंभ के संवर्धन के लिए आसियान-भारत सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के पिछले 2 संस्करणों के मूल्यवान योगदान को स्वीकार करता हूँ । मैं इस आयोजन के आयोजकों - आसियान इंडिया सेंटर, आरआईएस, नई दिल्ली और वियतनाम सामाजिक विज्ञान अकादमी (वीएएसएस) में वियतनाम भारतीय और दक्षिण पश्चिम एशियाई अध्ययन संस्थान (वीआईआईएसएएस) की इस सम्मेलन के दौरान चर्चा के लिए उठाए जाने वाले व्यापक मुद्दों के लिए सराहना करता हूँ। मैं प्रतिभागियों को इस सम्मेलन के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ ।

धन्यवाद!

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